24 जून 2011

भक्त की भगवान से बातचीत मोबाइल फोन पर - ० कुलश्रेष्ठ

भगवान - हेल्लो !  क्या आप मिस्टर . कुलश्रेष्ठ बोल रहे हैं ?
मैं - हाँ ! मैं . कुलश्रेष्ठ  ही बोल रहा हूँ । परन्तु आप कौन और कहाँ से बोल रहे है ?
भगवान - मैं भगवान बोल रहा हूँ । बैकुंठपुरम से ।
मैं - बैकुंठ पुरम से ? ये कहाँ है ? ये स्थान तो मै जानता ही नहीं हूँ । हां राजाजीपुरम और जानकीपुरम में तो मेरे रिश्तेदार रहते हैं । मैं समझा नहीं । चलिए होंगे । कहिये मुझसे क्या काम है ? दरअसल मैं   ऑफिस में काम करता हूँ । और मुझे एक मीटिंग में जाना है । तमाम ऑफिसों में तमाम कर्मचारियों ने लाखों और करोड़ों के गवन कर रखे हैं । बहुत काम है । आप ऐसा करें कि आप अपना मोबाइल नंबर दे दीजिए । मैं खुद ही आपको फुर्सत में रिंग कर दूँगा । ठीक है न ।
भगवान - बात ये है कि - आप रोज 2 मिनट की पूजा करते हैं । मैंने पूजा स्वीकार कर ली । और मुझे लगा कि - मुझे अपने भक्त से पूछना चाहिए कि उसे क्या कष्ट  है ? क्यों प्रार्थना करते हो ? मैंने आपकी प्रार्थना सुन ली । कहो क्या कष्ट है ?
 मैं - अरे अरे मुझे तो कोई कष्ट नहीं है । बस मैं तो अन्य रूटीन कार्यों की तरह मेरे शिडयूल में यह भी एक कार्य है । जैसे अन्य कार्य मशीन की तरह करता हूँ । उसी तरह प्रार्थना भी करता हूँ ।
भगवान - अच्छा आप बहुत ब्यस्त हैं ? क्यूँ ब्यस्त हैं ?
मैं - हाँ.. मैं बहुत ब्यस्त रहता हूँ । पर क्यों रहता हूँ ? पता नहीं । हाँ मेरे पास समय नहीं है । दिन भर भागमभाग लगी रहती है ।
भगवान - बास्तव में ? पर इससे तुमको क्या मिलता है ?
मैं - मैं समझता हूँ कि बहुत कुछ मिलता है । पहले मैं बहुत गरीबी में रहता था । परन्तु अब मेरे पास अच्छा बंगला है । 4 व्हीलर है । एसी में रहता हूँ ।  बेंक बेलेंस भी अच्छा खासा है । और इसके अलावा एक आदमी को क्या चाहिए ? खैर मुझे नहीं पता था कि आप बिना बताये ही मुझे यकायक डिस्टर्ब करेंगे । आपको मेरा मोबाइल नंबर किसने दिया ?

भगवान - अच्छा तो मैंने तुम्हें डिस्टर्ब किया ? चलो मैं माफ़ी मांगता हूँ । फिर भी मैं चाहता हूँ कि जब तुम डिस्टर्ब हो ही गए हो । तो तुम्हें कुछ काम की बातें बता दूँ । कुछ ज्ञान करा दूँ । सुनना चाहोगे ? अभी अभी आपने जो सुख प्राप्त करना बताये हैं । बे क्या हैं ? तुम तो जानते हो कि अब इंटरनेट का जमाना है  भाई । इसलिए मुझे तुम्हारा नम्बर पता करने में कोई दिक्कत नहीं हुई । आपने जो   अपना अकाउंट खोल रखा है । मैंने उसमें से ही प्राप्त कर लिया । अरे भाई मैं भी तो फुर्सत में कभी कभी बुक खोल लेता हूँ । खूब लिखते हो ।
 मैं - आप भी खूब हैं । दिलचस्प बातें करते हैं । चलो खैर.. मुझे एक मीटिंग में जाना था । कुछ देर बाद चला जाऊँगा । दीजिए ज्ञान । बताईए कि आज की जिंदगी इतनी कोम्प्लीकेटिड क्यों हो गई है ? एक रिक्शेवाले  से लेकर बड़े से बड़ा आदमी यही कहता है कि माफ़ करो मेरे पास समय नहीं है ।
भगवान -  देखो जिंदगी को विश्लेषण करके देखना बंद करो । और जिंदगी को उसके असली रूप में देखना सीखो । मुझे इतना नुकसान हो गया । मुझे आज इतना मिलना था ।  शेयर डूब रहें हैं । उसके पास सबसे महँगी गाड़ी है । इन्ही चिंताओं ने जिंदगी को बदसूरत बना रखा है ।
मैं - कृपया ये बताएं कि हमने  सुखों के सभी साधन  जुटा रखे हैं । फिर भी हम लोग दुखी हैं ?
भगवान - तुम सबको हमेशा चिंता सताती रहती है कि कल क्या होगा ? इसीलिए आज अभी सब कुछ जुटा लेना चाहते हो । कल हो न हो । केवल अपने पर भरोसा करना चाहते हो । मुझ पर कोई भरोसा नहीं है । इसके अलावा जो सर्वसम्पन्न हैं । वो इसलिए दुखी है कि - मेरे आसपास के लोग मुझसे अधिक सुखी क्यों है ? पड़ोसी के बेटे को शादी में बहुत पैसे मिले । जबकि मेरा बेटा भी उतनी ही अच्छी नौकरी करता है । फिजूल की बातों में चिंता करते रहना तुम्हारी आदत बन चुकी है । तो फिर दुखी तो रहोगे ही ।
मैं - आप तो अंतर्यामी और सर्वज्ञानी । आपको तो मालूम है । यहाँ प्रथ्वी पर सब जगह एक अनिश्चितता  का बाताबरण है । इसीलिए हम सोचते हैं कि कल हो न हो । जो धन  और सुबिधायें अपनी कड़ी मेहनत से प्राप्त की हैं । वो कल नष्ट न हों जाय । इसलिए आज आनंद ले लें ।
भगवान - अरे भाई अनिश्चितता ही तो निश्चित है । क्योंकि - चेंज इज द लौ आफ नेचर । जब इंसान निश्चिन्त होकर बैठ जाता है । और मेरा चिंतन करना भूल जाता है । तभी मैं उसे चेताबनी के तौर पर सुनामी । भूकंप । बाढ़ । सूखा भेजता हूँ । इसलिए चिन्ता करना छोड दो । और मेरा चिंतन किया करो । चिन्ता करना । और चिन्ता न करना दोनों विकल्प तुम्हारे पास हैं । तुम जो चाहो चुन सकते हो ।
मैं - परन्तु इन अनिश्चितताओं में बहुत दुःख समाहित हैं
भगवान - दर्द एक अमिट सत्य है । लेकिन दुःख वैकल्पिक है । आप चाहो तो दुःख चुन लो । या दुःख न चुनो । यह तुम्हारे ऊपर है ।
मैं - यदि दुःख वैकल्पिक है । तो सब दुखी क्यों हैं ? सब सुख ही क्यों नहीं चुन लेते हैं ?
भगवान - हीरे को बिना कटे । बिना टुकड़े किये सुन्दर और मूल्यवान नहीं बनाया जा सकता है । सोना आग में डाले बिना शुद्ध और सुन्दर नहीं होता है । प्रथ्वी पर सभी अच्छे होते हैं । और उन्हें परख ( ट्रायल ) से गुजारा जाता है । क्या हीरा या सोना कभी कहता है कि - उसे क्यों परखा / जलाया जा रहा है ? उनको तो परख में कोई तकलीफ नहीं होती है । तो तुम सबको क्यों तकलीफ होती है ? तुम तकलीफ को दुःख समझ लेते हो । इसीलिए दुखी हो । तकलीफ तुमको एक अनुभव देता है । जो तुमको पहले से बेहतर बनाता है । तुमको भविष्य के लिए अनुभव देता है ।

मैं - तो आपका कहना है कि - ये परख / ट्रायल  लाभदायक है । आप इसलिए कह रहे है कि आपको तो ये टेस्ट / ट्रायल देने नहीं पडते हैं । हम लोग घबराएँ क्यों नहीं ?कभी कभी तो ये टेस्ट.. टेस्ट सीरीज की तरह  जम जाते है । जैसे सचिन क्रीज़ पर जम जाते है । अब टेस्ट का नहीं बल्कि 20 - 20 और बन डे मैच का जमाना है । कहाँ तक मैं टेस्ट देता रहूँ ।
भगवान - जब तुम लोगों ने टेस्टमैच से 20 - 20 कर दिए हैं । तो तुम लोग दुःख भी 100 % कि बजाय 20 % कर सकते हो । क्या मुझे टेस्ट नहीं देने पड़े ? क्या बन में 14 वर्षों तक मारा मारा नहीं घूमता रहा ? मेरी पत्नी चोरी गयी । और पुलिस में रिपोर्ट लिखने के लिए कोई थाना नहीं था । सब कुछ अपने मित्रों  और भाई लखन के दम पर किया । क्या ये मुझ पर दुःख नहीं था ? रावण से मंकी पावर ( बन्दर सेना की मदद से ) युद्ध किया । क्या धोबी ने मेरा टेस्ट नहीं लिया था ? क्या सीता को दुबारा बन नहीं जाना पड़ा ? इन सभी दुखों और टेस्ट से मुझे लाभ मिला कि मेरे धैर्य और न्याय के लिए मुझे आप लोग आज भी याद करते हैं । अनुभव एक कठोर शिक्षक है । जो टेस्ट पहले लेता है । और पाठ बाद में पढाता है । जबकि स्कूल में पहले पाठ पढाया जाता है । बाद में टेस्ट लिया जाता है ।
मैं - लेकिन आपका जमाना दूसरा था । आपके ज़माने में सोलूशन नहीं थे । विकल्प नहीं थे । यदि विकल्प होते । तो  सीताजी को बन में भेजने से पहले अन्य विकल्प सोचते । यहाँ प्रथ्वी पर हर चीज का विकल्प है । तो लगातार इतने टेस्ट और टेंसन से क्यों गुजरें ?
भगवान - समस्याएं तो अच्छी होती हैं । जरुरत तो इनको धैर्य और सहनशक्ति से सुलझाना चाहिए ।
 मैं - परन्तु इन समस्यायों के इतने बड़े जाल होते हैं कि पता ही नहीं चलता है कि - जाना कहाँ है । मंजिल कहाँ है ?
भगवान - यदि आप बाहर ही झांकेंगे । तो आपको पता ही नहीं चलेगा कि - जाना कहाँ है ? लेकिन जब मन के अंदर झांकेंगे । तो साफ़ दिखाई देगा कि तुम्हारी मंजिल / रास्ता कहाँ है ?जब आप बाहर देखते हो । तो स्वप्न देखते हो । जब आप अंदर देखते हो । तो जाग रहे होते हो । क्योंकि मन अंतर्दृष्टि प्रदान करता है ।
मैं - कभी कभी सफलता का शीघ्र न मिलना । या बिलकुल न मिलना । ह्रदय को तोड़कर रख देता है । और फिर मार्ग पर कुछ भी दिखाई नहीं देता । कभी कभी सच्चे मन से प्रेम करते हैं । परन्तु प्रेम नहीं मिल पाता है । तब भी लगता है कि क्या करें । क्या न करें ?
भगवान - इस बारे में भी तुमको सही ज्ञान नहीं है । सफलता वो है । जिसे दूसरे लोग नापते हैं । जबकि संतुष्टी वह है । जो आप स्वयं महसूस करते हैं । किसी कार्य को पूर्ण कर लेना कोई सफलता मानता है । परन्तु आपका मन नहीं मानता है । किसी ने दो नंबर का काम कर करके बड़ी बिल्डिंग / सुख के सभी सामान जुटा लिए । लेकिन रात को सोने से पहले एक बार मन में अंतर्द्वंद जरुर चलता है । और दो मन में से एक मन कहता है कि तूने दूसरों का हक मारकर दूसरों को कष्ट देकर प्राप्त किया है । वो अच्छा नहीं किया । लेकिन वह व्यक्ति अपने अहम अपने स्वार्थ में सही मन की बात को एक झटके में अस्वीकार कर देता है कि सब ऐसा ही कर रहे हैं । तो मैंने ही क्या गलत कर दिया ? तुम लोग गलत कार्यों पर सही का ठप्पा अपने आप  लगाकर नकली खुशी पा लेते हो । सफलता वह नहीं है । जो तुमने प्राप्त की है । बल्कि सफलता वह है । जो और लोगों को सफलता प्राप्त करने में योगदान किया । दूसरों की मदद करने में जो खु्शी मिलती है । वही सही सफलता है ।

मैं - इतना भारी कम्पटीशन का जमाना है । और आप नारदजी वाले उपदेश दे रहे हैं । क्या कभी आपको  डी ऍम आफिस या कानूनगो से जमीन संबंधी कार्य । पुलिस में कोई रिपोर्ट लिखाने का कार्य । कभी राशन कार्ड बनबाने का कार्य आदि की जरूरत पडी ? क्या ऐसे कार्यों के लिए  सौ सौ चक्कर लगाने पड़े ? नहीं न । अगर लगाने पड़ते । तो ये जो उपदेश दे रहे हैं । सब भूल जाते । वहाँ उपदेश नहीं नोट चलते हैं । ऐसे में दूसरों को सफलता दिलाने में मदद करने की मोटीवेशन कहाँ से मिलती ? अपने इन कामों के लिए चक्कर लगाते लगाते ही नानी याद आ जाती है । तो दूसरों को मदद देने की तो बात ही याद नहीं आती है ।
भगवान - जो बात मैं कह रहा हूँ । वह उन कर्मचारियों पर भी तो लागू होती है । जो  सौ सौ चक्कर केवल नोट की खातिर और दूसरों को दुःख देने के लिए लगवाते हैं । ज़रा सोचो । क्या वह लोग बाकई में सुखी हैं ? हो सकता है । तुम्हें लगे कि - बे लोग सुखी हैं । पर ऐसा है नहीं । उनमें से कोई चीनी नही खा सकता है । कोई नमक नही खा सकता है । कोई दोनों ही चीजें नही खा सकता है । अगर तुमसे कहा जाय कि लाखों रुपये ले लो । और मीठा और नमकीन दोनों ही कभी मत खाओ । क्या तुम स्वीकार करोगे ? ऐसे लोगों को केवल क्रोसिन । माईसीन । टेरामैसिन आदि ही खाने को दी जाती हैं । क्योंकि वे सिन करते रहे । तो सिन नाम की दबाएँ ही खा रहे हैं । अब तुम सोचो कि - तुम्हें क्या चुनना है ? अच्छा या बुरा मार्ग ? हमेशा यह देखो कि मैंने( भगवान ) तुमको क्या क्या दिया है । न कि मैंने तुमको क्या क्या नहीं दिया है ।
मैं - आप जब भी अपनी प्रथ्वी लोक को देखते हैं । तो आश्चर्यपूर्ण क्या लगता है ?
भगवान - जिसे देखो । वही कहता है कि मैं तो बहुत दुखी हूँ । ये क्या किया रे दुनियां वाले । दुनिया के सभी गम तूने मुझको ही क्यों  दे डाले । लेकिन जो खूब सुखी है । जिनके पास गाड़ी है । बँगला है । बच्चे हैं । अच्छी पोस्ट पर हैं । वे यह नही कहते है कि - हे दुनियां वाले ! सभी सुख मुझे ही क्यों दे डाले ? मतलव इसका यह हुआ कि तुम लोग दुःख तो बांटना चाहते हो । दूसरों को देकर । लेकिन सुख नहीं बांटना चाहते हो । सांसदजी संसद में तो करोड़ों रुपयों की गड्डी लहराते हैं । कहते है कि वोट के एबज में दिए गए थे । लेकिन रास्ते में किसी भिखारी के माँगने पर कहते हैं कि - मेरे पास पैसे नहीं हैं । दुनिया में सब यही चाहते हैं कि सत्य उनकी तरफ रहे । परन्तु वह सत्य के साथ नहीं जाना चाहते हैं । प्रत्येक पत्नी चाहती है कि उसका पति राम के समान हो । परन्तु वह सीता के समान नहीं बनना चाहती है । प्रत्येक झूठ बोलने बाला भी कहता है कि सही सही बताना । कहो आश्चर्य समझ में आये कि नही ?
मैं - कभी कभी मैं खुद से पूछता हूँ कि जीवन का उद्देश्य क्या है ? मैं क्या हूँ ? मैं यहाँ क्यों हूँ ? लेकिन इसका उत्तर झाडियों में गिरी पतंग की तरह उलझ कर रह गया है ।
भगवान - पहले यह जानने कि कोशिश मत करो कि तुम क्या हो ? तुम यह जानो कि तुम क्या होना छाहते हो ? यहाँ पृथिवी पर आने का उद्देश्य तलाश मत करो । बल्कि उद्देश्य पैदा करो । जीवन टूटने की प्रक्रिया नहीं है । बल्कि जीवन निर्माण की  प्रक्रिया है ।
मैं - जीवन में सबसे अच्छा कैसे पाया जा सकता है ?
भगवान - अपने अतीत का सामना करने की हिम्मत रखो । यदि अतीत में गलती या गलतियां हुई हैं । तो उन पर खेद व्यक्त करो । सोरी बोलो । अगर तुम्हें लगे कि तुमसे भूल हुई थी । जान बूझ कर किसी को धोखा देने के इरादे से नहीं की थी । तो उसके लिए खेद ब्यक्त करते करते अपना वर्तमान  नष्ट मत करो । बल्कि प्राप्त किये गये अनुभबों और बिश्वासों से जीवन को सुखमय बनाओ । और भविष्य का निर्माण बिना किसी भय के करो । चिड़ियों के बच्चे कभी तुम्हारी तरह डरे डरे रहते हैं । चूजों को देखते हो । खुश रहते हैं । क्या तुम नहीं रह सकते हो ?
मैं - आपकी बातें तो बहुत अच्छी लगने लगी हैं । लेकिन यह तो समझाइये कि हम सब मंदिर । मस्जिद । गुरुद्वारे । चर्च जाते हैं । और आपकी न जाने कबसे आपकी पूजा करते आ रहे हैं ? फिर भी न तो आप दर्शन देते हैं । न प्रार्थना में माँगी गयी मनोकामना ही पूरी होती है । अर्थात प्रार्थना भी आप सुनते नहीं हैं । आपसे अच्छा तो एफ एम रेडियो स्टेशन है । जिसको किसी गाने की फरमाईस करें । और तुरंत गाना सुन लीजिए । क्या आपके यहाँ कोई ओनलाइन सिस्टम जल्दी जवाब देने का नहीं है ?
भगवान - ऐसी बात नहीं है । यदि ऑनलाइन सिस्टम नहीं होता । तो मैं आज तुमसे बातें क्यों करता ? कैसे कर पाता ? मेरे सिस्टम में ऐसी कोई आपकी प्रार्थना नहीं । जो सुनी नहीं जाती हो । कोई ऐसी प्रार्थना नहीं । जिसका जबाब नहीं दिया जाता हो । लेकिन हर प्रार्थना का जबाब “ हाँ ” में तो नहीं हो सकता है । और तुम सब लोग अपनी हरेक प्रार्थना का जबाब “ हाँ ” में ही चाहते हो । यही दिक्कत है । एक डकैत है । जो अपना काम अर्थात डकैती डालने जाता है । तो मेरे को माला हार फूल परसाद चढाता है । कभी कभी तो अपनी उंगली काटकर अपना खून तक चढ़ा जाता है । और मांगता है कि मुझे सफलता प्रदान करना । बहुत से डकैत मन से बुरे नहीं होते हैं । बहू बेटियों की तरफ कुदृष्टि नहीं रखते हैं । बल्कि कुछ अमीरों ने जो जनता के धन को लूटा है । उसे बे रात में लूटकर कई बेटियों की शादी में लगाते हैं । लेकिन अच्छे उद्देश्य को पाने के लिए अच्छे साधन भी काम में लिए जाने चाहिए । एक अपराध को खत्म करने के लिए दूसरा अपराध करना गलत है । यह मेरा काम है कि किस प्रार्थना को “ हाँ ” में सुनना है । और किस प्रार्थना को “ ना ” में सुनना है । मैं प्रार्थना करने बाले के दोनों पहलुओं को सुनता और मनन करता हूँ । तुम्हारे यहाँ भी तो सुप्रीम कोर्ट है । क्या वहाँ दोनों तरफ की बात सुने बिना ही फैसला कर दिया जाता है ? नहीं ।  कोर्ट दोनों को ही सुनता है । लेकिन एक पक्ष की ही तो “ हाँ ” में सुनबाई होती है । दोनों तो नहीं जीतते हैं । कोर्ट फैसला देने से पहले सुपात्र और कुपात्र की जांच करता है । यही बात मेरे न्यायतंत्र में लागू होती है । हाँ ! एक बात और भी महत्वपूर्ण है कि लोगों में यह भृम है कि - मैं मंदिर । मस्जिद । गुरुद्वारा और चर्च आदि जगहों में मिलता हूँ । मिल सकता हूँ । बास्तव में इन जगहों पर होता भी हूँ । और नहीं भी होता हूँ । मैं तो सर्वत्र हूँ । लेकिन आप लोग मुझे अज्ञानवश किसी विशेष जगह तलाश करते हैं । आप लोग मुझे “ शब्दों “ से नहीं रिझा / पा सकते हैं । मैं अच्छे काम करने बालों को बिना प्रार्थना के ही मिल जाता हूँ । दुनियाँ में जितनी भी भाषाएँ है । आप लोगों ने ही बनायीं हैं । मुझे तो आपकी तरह तरह की भाषायों की ग्रामर तो दूर । इनका साधारण ज्ञान भी नहीं है । और मेरे पास तो बहुभाषिया तो दूर दुभाषिया भी नही है । मैं तो केवल एक ही भाषा जानता हूँ । बह है “ प्रेम ” की भाषा । मुझे प्रेम करने वाला चाहे हिन्दीभाषी हो । अंग्रेजीभाषी हो । जापानीभाषी हो । चीनीभाषी हो । मुझे जो भी प्रेम से बुलाएगा । मैं उसे तुरंत मिल जाता हूँ । बल्कि दौड़ा चला आता हूँ । रैदास या मीरा कितने क्लास  पढ़े थे ? क्या कोई भाषा जानते थे ? नहीं वो केवल प्रेम की भाषा जानते थे । अब दौड दौड कर कहाँ तक आऊँ । मोबाइल का ज़माना है । कम्पूटर का ज़माना है । अतः मोबाइल से या ओनलाइन बातें / चेटिंग कर लेता हूँ ।

मैं - आपने प्रेम पर तो बहुत लेक्चर दे दिया है । क्या आप यह बताने का कष्ट करेंगे कि प्रेम क्या है ? प्रेम ही सब कुछ है । तो आपके द्वारा बनाई गई दुनिया में एक दूसरे के लिए नफरत  क्यों है ? स्वार्थ क्यों है ? गीता में आपने कहा है कि दुनिया में जो कुछ होता है । वो मेरे द्वारा ही किया या कराया जाता है । करता भी मैं हूँ । कारक और कारण भी मैं हूँ । तो इस दुनिया मैं ” सच्चा प्रेम ”करने वाले को प्रेम में मंजिल क्यों नही मिलती है ? क्यों वक्त / समय उनको अलग कर देता है । और वो जिंदगी भर तडपते रहते हैं । क्या आपको ऊपर बैठकर अपनी कुर्सी से यह सब दिखाई नही देता है ? इसका मतलब है कि सच्चा प्रेम करने वालों के बीच में आप ही बाधा बनते हैं ?
भगवान - वाह वाह ! बहुत अच्छे विचार रखते हो । क्या तुमने नही पढ़ा है कि “ ए लिटिल नोलेज इस ए  डेंजरस थिंग “ अर्थात अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है । तुमको भी “ प्रेम ” के बारे में सही ज्ञान नहीं है । सच ये है कि “ प्रेम ”अत्यंत पवित्र चीज है । इसे शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता है । यह तो एक अहसास है । जो केवल आत्मा / रूह से महसूस किया जा सकता है । इसमें स्वार्थ और अहंकार का कोई स्थान नहीं है । प्रेम में कुछ भी “ लिया ” नहीं जाता है । बल्कि अपना सब कुछ देकर अपने को खाली कर दिया जाता है । प्रेम में देने वाला व्यक्ति देने में ही सब कुछ पा जाता है । मीरा ने । द्रोपदी ने । हीर ने । रांझा ने । भाई भरत ने । भाई लक्ष्मण ने । महात्मा गांधी आदि अनेकों  ने क्या लिया ? कुछ नहीं । बल्कि उन्होंने  प्रेम में सब कुछ देकर । देखा जाए तो सब कुछ पा लिया । जहाँ तक दुनिया में स्वार्थ और नफरत होने की बात है । तो ये ही तो वे रास्ते हैं । जिन पर तुमको नहीं चलना है । बल्कि बचकर निकलना है । और जहाँ तक हो सके । नफरत और स्वार्थ के दुनिया के इस तालाब में “ प्रेम ” के कमल खिलाओ । वरना तुममें और जानवर में क्या फर्क रहा ? यह  सही है कि दुनिया में जो कुछ हो रहा है । उसमें कारण । कारक और कर्ता मैं ही हूँ । लेकिन यह बहुत सूक्ष्म ज्ञान की बातें हैं । जिन्हें  जानने के लिए बाहरी दुनिया से अंदर की दुनिया में जाना होगा । जहाँ तक प्रेम करने वालों को मंजिल न मिलने की बात है । वह समय का फेर है । और फिर मंजिल न मिले । लेकिन सच्चे प्रेम की अनुभूति जीवन बिताने के लिए एक धरोहर होती है । जो बात प्रेम की तडफ में है । वह प्रेम के पा लेने में नहीं है । अगर पा ही लिया । तो फिर बचा ही क्या ? क्या यह सब तुम्हारे साथ ही होता है ? क्या मेरे साथ नहीं हुआ ? क्या मैं बन बन सीता के लिए नहीं घूमता फिरा ? क्या मैंने तड़प नहीं सही ? क्या वक्त  ने मुझ पर सितम नही किये ? क्या मैं गोकुल से मथुरा जाते समय राधा से नहीं बिछुड़ा ? हाँ बिछुडा और हमेशा हमेशा के लिए ?

क्या मैंने राधा का बिछोह नहीं सहा ? पर सोचो क्या मैं राधा से कभी एक पल के लिए भी अलग रह सका ? नहीं । क्योंकि राधा के प्रेम में न स्वार्थ था । न अहंकार । यदि कुछ था तो । सम्पूर्ण समर्पण । उसने मुझे सब कुछ देकर अपने को बिलकुल खाली कर रखा था । इसीलिए मैं उसमें पूर्ण रूप से मौजूद था । यही बात थी द्रोपदी में । यही बात थी रैदास में । तुम सब जब भी मुझसे कुछ मांगते हो । तो “ सुख सम्पति घर आवे कष्ट मिटे तन का ” माँगते हो । तुमको धन चाहिए । भगवान नहीं माँगते हो । और न हीं मेरा प्यार । मेरी पत्नी रुक्मणि को घमंड था कि राधा की तुलना में वह मुझे अधिक प्यार करती है । इसलिए मुझ पर राधा की बजाय उसका अधिक अधिकार है । बहुत समझाया । लेकिन नहीं मानी । तो मुझे ही सोने चांदी से तौलने लगी । क्या हुआ ? तुम सब जानते हो । एक पलड़े में राधा का प्रेम अर्थात मैं था । और  दूसरे में रुकमनी के सोने चांदी जवाहरात आदि । प्रेम ही जीता ।
मैं - आप इतना और बता दें कि - यहाँ प्रथ्वी पर जो स्त्री पुरुष विवाह में 7 फेरे लेकर 7 जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाते हैं । पर बहुत सारे तो 7 जन्मों की बात तो दूर । इसी 1 ही जन्म में डाइवोर्स / तलाक ले लेते हैं । और इसी जन्म में तलाक ले लेकर एक बार नहीं 7-7  बार विवाह / निकाह कर लेते हैं । कोई कोई तो तलाक लिए बिना ही तलाक पूर्ण जीवन जी रहे हैं ।  जीवन में उनके लिए न कोई रूप है । न कोई रंग है । यह क्या है ? ऐसा क्यों है ?
भगवान - मैंने पहले ही कहा कि तुम लोग नहीं जानते हो कि प्रेम क्या है ? प्रेम तो करते नहीं । प्रेम करने का दिखावा करते हो । फेरे चाहे 7 लो । या 700 । जब तक मन से प्रेम नही किया । तो सब बेकार । महत्वपूर्ण सगाई नही है । दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण है । प्रेम की सगाई । तुमको पता है न कि मीरा से यह मेरी प्रेम सगाई ही थी कि जब उसे बिना गलती के जहर दिया गया । तो मैं उसके जहर के प्याले में ही घुलमिल गया कि पीते ही अमृत हो गया । सबरी से मेरी प्रेम सगाई ही तो थी कि यह जानते हुए भी कि वह मुझे झूठे करके बेर खिला रही है । मैंने खाए । क्योंकि उनमें प्रेम की मिठास थी । अर्जुन से मेरी प्रेम सगाई ही तो थी कि मैं भगवान होते हुए भी उसके रथ का ड्राइवर बना ।
क्योंकि उसने मेरे सामने प्रेम समर्पण कर दिया था । और मैं अपनी चतुराई और ठकुराई भूल गया । सुदामा के साथ मेरी प्रेम की सगाई ही तो थी कि मैंने खुद उसके पैरों के कांटे निकाले । और उसके पैरों को अपने आंसुओं के जल से धोकर उसी पलंग पर बैठाया । और झोपडी को महलों में बदल दिया । रहने को । बस प्रेम करना सीख जाओ । सब प्रश्नों के जवाब खुद मिल जायेंगे । जिससे प्रेम करो । बस उसी के होकर रह जाओ । सच्चा प्रेम एक समय में / एक साथ 2 से हो ही नही सकता है । केवल मैं ही एक साथ असंख्य प्रेमियों के साथ प्रेम कर सकता हूँ । और हजारों गोपियों से प्रेम किया । क्योंकि वो सब मुझमें  समाई थी । और मैं उन सब में समाया हुआ था । इसके अलावा तुम मुझसे भी प्रेम करना चाहते हो । और धन संपत्ति से भी । धन चाहते हो । इसीलिए रूपए पैसे मुझे भेंट करते हो । यह भी भूल है । मुझे केवल सच्चे प्रेम से ही पा सकते हो ।
मैं - ऐसा क्यों होता है कि कई धर्मात्मा और आपके कई भक्त बद्रीनाथ । केदारनाथ । गंगा स्नान । तिरुपति बालाजी । प्रयाग । काशी । मथुरा आदि आपके धामों में जाते हैं । और सुनने में आता है कि रास्ते में दुर्घटना में उनमें से कई की मृत्यु हो जाती है । जबकि उनमें से कई तो कई बार पहले भी आपके धामों में आपके दर्शन करने जा चुके थे ।
भगवान - मैं पहले ही कह चुका हूँ कि लोग मुझे पाने के लिए जहां जहां जाते है । मैं बहाँ होता भी हूँ । और नहीं भी होता हूँ । लेकिन यह सौ फीसदी सही है कि मैं उन लोगों को कहीं भी दिख जाता हूँ । जो सत्य के मार्ग पर चलते हैं । दूसरों को दुःख नही देते हैं । बल्कि उनकी तकलीफों को दूर करने में जो कुछ भी मदद कर सकते हैं ।  मदद करते हैं । ऐसे लोगों को कहीं जाने की जरूरत नहीं । और बहुत लंबी चौडी पूजा करने की भी जरूरत नहीं है । जो कार्य तुमको करना चाहिए । उसे सच्चे मन से । ईमानदारी से । लगन से करो । बदनीयत मत रखो । यही मेरी पूजा है । जो लोग केवल  मेरी पूजा को ही अपना कार्य समझते हैं । वे धोखे में हैं । क्योंकि - वर्क इज बर्शिप एंड बर्शिप इस नाट बर्क  । मुझे 101 या 1001 बार जपने की जरूरत नहीं है । जरूरत है । सच्चे मन से अहंकार रहित समर्पण की भावना से केवल एक बार ही पुकार लेने की । मीरा ने जहर पीते वक्त । द्रोपदी ने चीरहरण के वक्त केवल एक बार ही तो सच्चे मन से वह भी मन के अंदर पुकारा था । बताओ क्या मैं पहुँचा कि नहीं । फिर भी तुम लोगों की आँखें नहीं खुलती हैं । तो मैं क्या करूँ ? रही बात अच्छे कार्य करने पर दुःख या मृत्यु प्राप्त होने की । तो यह तो ऐसा है कि जैसे तुम अपने आफिस में । फैक्ट्री में प्रत्येक होने बाले कार्य या लेनदेन के लिए लेज़र / बुक रखते हो । ताकि मालूम हो सके कि किस किसने कितने लेनदेन किये । और किसने कितना धन जमा किया । कितना निकाला ? उसी तरह मेरे कार्यालय में भी प्रथ्वी के प्रत्येक ब्यक्ति का हिसाब किताब रखा जाता है । लेकिन दूसरी तरह से । हमारे यहाँ यह नही है कि आपने पुण्य कर्म किये । तो जमा में आ गया । और पाप कार्य किये । तो पुण्य कार्यों के बैलेंस से घटा दिया जायेगा । ज्यादा पुण्य कार्य थे । और पाप कार्य कम थे । तो बैलेंस पुण्य कार्यों का होगा । ऐसा नहीं है । हमारे यहाँ तो पाप का हिसाब अलग । और पुण्य कार्यों का हिसाब अलग रखा जाता है । पुण्य कार्यों के लिए सुख मिलेगा । और पाप कार्यों के लिए दुःख अबश्य भोगना पडेगा । हमारे यहाँ समायोजन / एडजस्टमेंट नहीं होता है । रावण को तो जानते ही हैं । उसने मेरी ( शंकर ) पूजा की । तो ऐसा राजा बना कि देवता भी थरथर कांपते थे । और जो उसने धर्म / मर्यादा के खिलाफ़ कार्य किये । उसके लिए ही उसे मरना पड़ा । और आप लोग उसे हर साल जलाकर मारते हैं । दशरथ भी अपने पुण्य कार्यों के कारण चार महान पुत्रों के पिता बने । और यह उन्होंने श्रवणकुमार को बिना अपराध के मारा । तो उनको भी पुत्रवियोग में मरना पडा । अगर गंगास्नान से पुण्य मिलते । तो गंगा / संगम के किनारे रहने बाले तो रोज ही गंगा / संगम स्नान करते हैं । लेकिन क्या वे दुखी नहीं होते हैं ? फिर भी लोग गंगा स्नान करने इसी लिए जाते हैं कि वे पुण्य के अपने बैलेंस में बढोतरी कर रहे हैं । जबकि यह उनकी सबसे भारी भूल है । आप लोग जितने भी कर्म कांड और पूजा में औपचारिकताएं करते हैं । यह आपकी बनायी हुई हैं । मैंने नही कही हैं ।
इन सबको करने के लिए । फिर भी आप करते हैं । तो करें । मैं यह देखकर दुखी होता हूँ कि लोग लाउडस्पीकर लगवाकर मंदिर और मस्जिद में चिल्ला चिल्लाकर मुझे बुलाते हैं । जैसे कि मैं बहरा हूँ । कोई बडी बडी दाडी और जटा रख लेते हैं । जबकि ये तो स्वास्थय के लिए बहुत हानिकारक है । शरीर के हर अंग की सफायी रखना अति आवश्यक है । पता नहीं लोग कब और कैसे सुधरेंगे ?
मैं - आपको बहुत बहुत धन्यबाद । आपने कुछ ही समय में उन कई बातों / प्रश्नों के बारे जिनके उत्तर मैं न जाने कबसे जानने की इच्छा थी । समाधान कर दिया । वह भी मोबाइल पर । अपने खर्चे पर । वह भी रोमिंग चार्ज देकर । आप महान हैं । इस सुखद और ज्ञानवर्धक वार्ता के लिए मैं आपको बार बार धन्यबाद देता हूँ । और मैं सभी से कह सकता हूँ कि प्रार्थनायें  सुनी जाती हैं । चाहे जल्दबाजी में ही क्यों न की जाती हों । पर मन से और अहंकार त्यागकर समर्पण की भाबना से निस्वार्थ भावना से  की गयी हो । मक्का मदीना । रामेश्वरम । काशी । चर्च । मथुरा । वृंदावन । शिरडी । अयोध्या काशी कहीं जाने की जरूरत नहीं है ।
भगवान - मेरा शुभ आशीर्बाद तुम्हारे साथ है । बस विश्वास रखो । भय को त्यागो । अपने संदेहों पर विश्वास मत करो । बल्कि अन्धबिश्वासों पर संदेह करो । उन्हें दूर करो । जीवन एक रहस्य है । इसे जितना सुलझाने की कोशिश करोगे । उतने ही उलझोगे । इसमें उलझो मत । मेरी बात मानों । जीवन जो मैंने दिया है । यह बहुत सुन्दर है । बस जिंदगी जीने की कला जान लो । मुझे कभी भी फोन कर सकते हो । मेरे पास लाइफ टाइम इनकमिंग फ्री कॉल स्कीम का कनेक्शन है । गुड बाय !
अब आप फिर कब ज्ञान प्रदान करेंगे ?
भगवान - जब भी तुम मुझे चाहे भागते में ही सही मगर दिल से बुलाओगे ।
मैं - जी अच्छा । बैसे भी मेरा रिटायरमेंट बहुत जल्दी ही जनवर में होने जा रहा है । लगता है । तब आफिस के तमाम टेंसन से मुक्त हो जाऊंगा । तब आपको याद करने के लिए पर्याप्त समय होगा ।
आपका बहुत बहुत धन्यबाद । आपका आशीर्बाद चाहिए ।
आपका एक छोटा सा भक्त - कुलश्रेष्ठ


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कुलश्रेष्ठ जी ! इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिये आपका बहुत बहुत आभार ।
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