28 जून 2011

लोग समझते हैं कि मुक्ति मरने के बाद होती है

खिन महि हँस खिन महि रोवै । दूजी दुरमति कारज न होवै ।

दुनिया के सुख दुख जितने भी हैं । ये सब आने जाने वाले हैं । सुख में मनु्ष्य सुखी हो जाता है । दुख के समय दुखी हो जाता है । न यह आँखों के पीछे अन्दर के राज को जान पाया । न सच्चा नाम लेकर ही परदा ( third eye ) खोला । बस बाहर ही बाहर रहा । जो दौलत परमात्मा ने इसके लिये अन्दर रखी थी । उसको हाथ भी न लगाया । न जन्म मरण खत्म हुआ । न मुक्ति हुयी ।


संजोग विजोगु करतै लिखि पाए । किरतु न चलै चलाहा हे ।

जब तक हम अन्दर के इस रुहानी रहस्य को नहीं जानते । तब तक हम मन की प्रेरणा के अनुसार ठगी दुराचार चोरी हत्या झगङा फ़साद करते हैं । लेकिन जब मौत के बाद धर्मराय के दरबार में जाना पङता है । और वहाँ हिसाब खोला गया ।
तब वह धर्मराय पूछता है - क्या करके आये हो ?
अगर बुरे कर्म हैं । तो नरक में भेज दिया । अगर सब पुण्य ही हुये । तो स्वर्ग भेज दिया । अगर कुछ अच्छे कुछ बुरे हैं । तो दोनों मिले । मगर मुक्ति न हुयी । जब तक हम आत्मा को नाम के साथ नहीं जोङते । मुक्ति नहीं होती । यह नियम खुद वाहिगुरु ( परमात्मा ) का बनाया हुआ है । कोई इसे तोङ नहीं सकता । बदल नहीं सकता । मुक्ति का जो इंतजाम बनाया गया है । हमें उसी के जरिये जाना है । दूसरा कोई रास्ता नहीं है ।


जीवन मुकति गुरु सबदु कमाये । हरि सिउ सब हो रहै समाए ।

दुनियावी लोग ऐसा समझते हैं कि मुक्ति मरने के बाद होती है । लेकिन संत ऐसी मुक्ति को झूठा मानते हैं । मरने के बाद का क्या भरोसा । हमारे साथ क्या हो ? जो जीवन में नहीं पढ पाया । वह मरने के बाद भी बिना पढा ही रहेगा ।
लेकिन जो जिन्दगी में पढ लिया । वो मरा तो भी पढा लिखा ही होगा । इसलिये अगर जीते जी वाली मुक्ति प्राप्त करनी है । तो सदगुरु के पास जाओ । तब गुरु का उपदेश होगा कि - शब्द को पकङो । अर्थात निर्वाणी नाम ( दान लेकर ) का सुमरन करो । जब शब्द को भलीभांति पकङ ( ध्यान की परिपक्वता ) लेंगे । तो मुक्ति हो जायेगी । सन्त इसी मुक्ति को सच्ची मुक्ति समझते हैं । जब हमने मेहनत कर अन्दर का परदा (  third eye ) खोल लिया । परमात्मा से हमारी लिव ( लौ ) लग गयी । तो सब झगङा ही मिट गया । फ़िर कैसा आना । और कैसा जाना ।


गुरु किरपा ते मिले बडिआई । हउमै रोग न ताहा हे ।

जीते जी ये सरल सहज मुक्ति का रास्ता हमें सदगुरु की कृपा से मिलता है । अन्दर गुरु हर मंजिल पर नाम अभ्यासी की मदद करता है । वहाँ न शिष्य का शरीर यह शरीर है । न गुरु का शरीर ये शरीर है । शिष्य का असली रूप क्या है ? रूह या आत्मा । और गुरु का वास्तविक स्वरूप क्या है ? शब्द ।

और शब्द तो बहुत बङी चीज है । अगर किसी गुरु ने नूरी रूप भी प्रकट कर लिया है । तो वह भी साथ ही रहता है । शरीर रूप में तो बाहर है ही । अन्दर भी वह है ।
जैसे एक बच्चा होता है । जिसे मिश्री का स्वाद पता नहीं होता । तब तक उसे मिश्री की कदर नहीं होती । पर जब वह एक बार मिश्री खा लेता है । फ़िर उसे वह नहीं छोङ पाता ।
बहुत से लोग इतने पवित्र आत्मा वाले या पूर्वजन्म के चले हुये होते हैं । वे नाम लेते ही ( दीक्षा होते ही ) अच्छे अनुभव को प्राप्त करते हैं । परन्तु इतने साफ़ भाव के लोग कम होते हैं ।
इसलिये ये माल खजाना ये दौलत तो आप सभी के अन्दर है । पर उसे प्राप्त करना । और रुहानी मंजिलों की यात्रा सदगुरु के बगैर संभव नहीं है ।


जय गुरुदेव की । जय जय श्री गुरुदेव । सतिनामु वाहिगुरु ।
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