18 जून 2011

सात 7 पाँच 5 के मायाजाल में फ़ँसा जीव

कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! सदगुरु सर्वोपरि हैं । अतः शिष्य को चाहिये कि गुरु से अधिक किसी को न माने । और गुरु के सिखाये हुये को सत्य करके जाने । एक समय ऐसा भी आयेगा । जब तुम्हारा बिंद वंश उल्टा काम करेगा । वह बिना गुरु के भवसागर से पार होना चाहेगा । जो निगुरा होकर जगत को समझाता है । अर्थात ग्यान बताता है । वह खुद तो डूबेगा ही । तथा संसार के जीवों को भी डुबायेगा । बिना गुरु के कल्याण नहीं होता । जो गुरु के शरणागत होता है । वह संसार सागर से पार हो जाता है ।
यह काल निरंजन अनेक प्रकार से जीवों को धोखे में डालता है । अतः बिना गुरु के जीवों को अहंकार वश ग्यान कहते देखकर काल बहुत खुश होता है ।
तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! आप कृपा करके नाद बिंद ग्यान को समझाने की कृपा करें ।
कबीर साहब बोले - बिंद एक और नाद बहुत से होते हैं । जो बिंद की भांति मिले । वह बिंद कहाता है । वचन वंश सत्यपुरुष का अंश है । उसके ग्यान से जीव संसार से छूट जाता है । नाद और बिंद वंश एक साथ होंगे । तब उनसे काल मुँह छुपाकर रहेगा । जैसे मैंने तुम्हें बताया । वैसे नाद बिंद योग ( योग का एक तरीका । प्रकार ) एक करना । क्योंकि बिना नाद तो बिंद का भी विस्तार नहीं होता । और बिना बिंद नाद नहीं उबरेगा । हे भाई ! इस कलियुग में काल बहुत प्रबल है । जो अहंकार रूप धर सबको खाता है ।

नाद अहंकार त्याग कर होगा । और बिंद का अहंकार बिंद सजायेगा । इसी से सत्यपुरुष ने इन दोनों को अनुशासित करने के लिये मर्यादा ( नियम ) में बाँधा । और नाद बिंद दो रूप बनाये ।
जो अहंकार छोङकर सत्य स्वरूप परमात्मा को भजेगा । उसका ध्यान सुमरन करेगा । वह हँस स्वरूप हो जायेगा । हे भाई ! नाद बिंद दोनों कोई हों । अहंकार सबके लिये हानिकारक ही है । इसलिये यह निश्चित है । जो अहंकार करेगा । वह भवसागर में डूबेगा ।
तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! आपने नाद बिंद के बारे में बताया । अब मेरे मन में एक बात आ रही है । आपके विरोधी मेरे पुत्र नारायण दास का क्या होगा ? वह संसार के नाते मेरा पुत्र है । इसलिये चिंता होती है । सत्यनाम को गृहण करने वाले जीव सत्यलोक को जायेंगे । और नारायण दास काल के मुँह में जायेगा । यह तो अच्छी बात न होगी ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! मैंने तुमको बारबार समझाया । पर तुम्हारी समझ में नहीं आया । अगर 14 यमदूत ही मुक्त होकर सत्यलोक चले जायेंगे । तो फ़िर जीवों को फ़ँसाने के लिये फ़ँदा कौन लगायेगा ?
अब मैंने तुम्हारा ग्यान समझा । तुम मेरी बातों की परवाह न करके मोह माया द्वारा सत्यपुरुष की आग्या को मिटाने में लगे हुये हो ।

जब मनुष्य के मन में मोह अँधकार छा जाता है । तब सारा ग्यान भूलकर वह अपना परमार्थ कर्म नष्ट करता है । बिना विश्वास के भक्ति नहीं होती । और बिना भक्ति के कोई जीव भवसागर से नहीं तर सकता ।  फ़िर से तुम्हें काल फ़ँदा लगा है । तुमने प्रत्यक्ष देखा कि नारायण दास कालदूत है । फ़िर भी तुमने उसे पुत्र मानने का हठ किया ।
जब तुम्हें ही मेरे वचनों पर विश्वास नहीं आता । तो संसारी लोग गुरुओं पर क्या विश्वास करेंगे ? जो अहंकार को छोङकर गुरु की शरण में आता है । वही सदगति पाता है । जो त्रिगुणी माया को पकङते हैं । उनमें मोह मद जाग जाता है । और वे अभागे भक्ति ग्यान सब त्याग देते हैं ।
जब तुम ही गुरु का विश्वास त्याग दोगे । जो जीवों का उद्धार करने वाले हो । तब सामान्य जीवों का क्या ठिकाना । इस प्रकार भृमित करने की यही तो काल निरंजन की सही पहचान है ।
हे धर्मदास ! सुनो । जैसा तुम कह रहे हो । वैसा ही तुम्हारा वंश भी प्रकाशित करेगा । मोह की आग में वह सदा जलेगा । और इसी से तुम्हारे वंश में विरोध पङेगा । जिससे दुख होगा । पुत्र । धन । घर । स्त्री । परिवार और कुल का अभिमान यह सब काल ही का तो विस्तार है । वह इन्हीं को माध्यम बनाकर जीव को बँधन में डालता है । इनसे तुम्हारा वंश भूल में पङ जायेगा । और सत्यनाम की राह नहीं पायेगा ।
संसार के अन्य वंश की देखा देखी तुम्हारे वंश के लोग भी पुत्र धन घर परिवार आदि के मोह में पङ जायेंगे । और यह देखकर कालदूत बहुत प्रसन्न होंगे । तब कालदूत प्रबल हो जायेंगे । और जीवों को नरक भेजेंगे ।
काल निरंजन अपने जाल में जीव को जब फ़ँसाता है तो उसे काम । क्रोध । मद । लोभ । मोह  विषयों में भुला देता है । फ़िर उसे गुरु के वचनों पर विश्वास नहीं रहता तब सत्यनाम की बात सुनते ही वह जीव चिङने लगता है । गुरु पर विश्वास न करने का यही लक्षण है ।

हे धर्मदास ! जिसके घट ( शरीर ) में सत्यनाम समा गया है । उसकी पहचान कहता हूँ । ध्यान से सुनो । उस भक्त को काल का वाण नहीं लगता । और उसे काम क्रोध मद लोभ नहीं सताते । वह झूठी मोह तृष्णा तथा सांसारिक वस्तुओं की आशा त्यागकर सदगुरु के सत्य वचनों में मन लगाता है । जैसे सर्प मणि को धारण कर प्रकाशित होता है । ऐसे ही शिष्य सदगुरु की आग्या को अपने ह्रदय में धारण करे । तथा समस्त विषयों को भुलाकर विवेकी हँस बनकर  अबिनाशी निज मुक्त स्वरूप सत्यपद प्राप्त करे । सदगुरु के वचन पर अटल और अभिमान रहित कोई बिरला ही शूरवीर संत प्राप्त करता है । और उसके लिये मुक्ति दूर नहीं होती ।
इस प्रकार जीवित ही मुक्ति स्थिति का अनुभव और मुक्ति प्रदान कराना सदगुरु का ही प्रताप है । अतः सदगुरु के चरणों में ही प्रेम करो । और सब पाप कर्म अग्यान एवं सांसारिक विषय विकारों को त्याग दो । अपने नाशवान शरीर को धूल के समान समझो ।
यह सुनकर धर्मदास सकपका गये । और कबीर साहब के चरणों में गिर पङे । और दुखी स्वर में बोले - हे प्रभु मैं अग्यान से अचेत हो गया था । मुझ पर कृपा करें । कृपा करें । हे स्वामी ! मेरी भूल चूक क्षमा करें । जो नारायण दास के लिये मैंने जिद की थी । वह अग्यान में खुद को पिता जानकर की थी । अतः मेरी इस भूल को क्षमा करें ।
तब कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! तुम सत्यपुरुष के अंश हो । परन्तु वंश नारायण दास काल का दूत है । उसे त्याग दो । और जीवों का कल्याण करने के लिये भवसागर में सत्यपँथ चलाओ ।
यह सुनकर धर्मदास कबीर साहब के पैरों पर गिर पङे । और बोले - आज से मैंने अपने उस पुत्र रूप कालदूत को त्याग दिया । अब आपको छोङकर किसी और की आशा करूँ । तो मैं सत्य संकल्प के साथ कहता हूँ । मेरा नरक में वास हो ।
यह सुनकर कबीर साहब प्रसन्नता से बोले - हे धर्मदास ! तुम धन्य हो । जो मुझको पहचान लिया । और नारायण दास को त्याग दिया । जब शिष्य के ह्रदय रूपी दर्पण में मैल नहीं होगा । गुरु का स्वरूप तब ही दिखायी देगा । जब शिष्य अपने पवित्र ह्रदय में सदगुरु के श्रीचरणों को रखता है । तो काल की सब शाखाओं के समस्त बँधनों को मिटाता है । परन्तु जब तक वह सात 7 पाँच 5 ( सात स्वर्ग - काल तथा माया ( के ) तीनों पुत्र - बृह्मा विष्णु महेश - ये पाँच ) की आशा लगी रहेगी । तब तक वह शिष्य गुरु पद की महिमा नहीं समझ पायेगा ।
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