01 जुलाई 2011

का से कहूँ पिया सुख सारा जिउँ तिरिया मुस्कानी ।

जाने अंतर जामी अचरज अकथ अनामी ।
जो मनुष्य नाम लेकर रूहानी मंजिलों पर गया है । वही उसका अनुभव करता है । उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । वह मालिक ( परमात्मा )  अनामी है । वास्तव में उसका कोई नाम नहीं है । और जितने भी उसके नाम हैं । वे सब सन्तों ने अपने अपने प्यार में रखे हैं ।
वह तो एक आश्चर्य है । अचरज है । वह जो है । सो है । जो रूहानी मंजिलों पर गये हैं । वे ही इस भेद को ठीक से जानते हैं । ये रूह जब नौ द्वारों को पार करके आँखों के पीछे दो दल के कमल में आ गयी । और फ़िर सूर्य चन्द्र तारा आदि आसमानों को पार करती हुयी तुरीया पद अर्थात सहस्त्र दल कमल में आ गयी ।
नौ लख कँवल जुगल दल अन्दर द्वादस साहिब स्वामी ।
जब रूह नौ द्वारों से ऊपर उठ गयी । तो आँखों के पीछे दो दल का कमल आ गया । उससे आगे तुरीया पद आता है । जहाँ 12 दल ( पत्ते ) का कमल है । यहाँ से पहली धुन ( नाम की ) शुरू होती है । सुरति द्वारा शब्द को पकङना इसी स्थान से शुरू होता है ।
सन्तों का मत यहाँ से ही शुरू होता है । जब आत्मा 9 द्वारों को लाँघकर 2 दल कमल से होती हुयी 12 दल कमल पर पहुँची । फ़िर क्या हुआ ?
सूरत कङक कँवल दल नभ पर झटक झटक थिर थामी ।
मेरी आत्मा झटके के साथ नीचे की मंजिलों को पार करती हुयी ऊपर की ओर चली गयी । मैं ( दादू साहब ) इस रास्ते से गया हूँ । मेरी सुरति ने शब्द को पकङ लिया । और फ़िर शब्द ने गर्जना के साथ रूह को अपनी ओर खींच लिया । यहाँ रूह झटके के साथ अन्दर जाती है । फ़िर जो आनन्द जो नजारे देखने को मिलते हैं । उनका वर्णन नहीं हो सकता । वे देखने से ही अनुभव किये जा सकते हैं ।
सूरत शब्द शब्द में सूरत अगम अगोचर धामी ।

जब मेरी रूह ने शब्द को पकङ लिया । यह सुरति शब्द से ही उत्पन्न हुयी है । और उसी का अंश है । सुरति शब्द में मिल गयी । और अगम लोक पहुँच गयी । अब किसी से कुछ पूछने की जरूरत नहीं । 9 द्वारों से ऊपर आकर तुरीया पद में शब्द को पकङा । और अगम लोक में पहुँच गयी ।
का से कहूँ पिया सुख सारा । जिउँ तिरिया मुस्कानी ।
बस वहाँ अब आनन्द ही आनन्द है । वहाँ की जो लज्जत है । मैं उसका अब क्या बखान करूँ । जिस तरह दस बीस कुँआरी लङकियाँ हों । और उनमें से एक की शादी हो जाये । और पति के घर से वापिस आने पर उसकी सहेलियाँ पूछें - बता पति का प्यार कैसा होता है ?
तो वह क्या जबाब दे । बस मुस्करा कर आँखें नीची करके चुप हो जाती है ।
बस ठीक यही हाल इस अनुभव वाले भक्त का होता है । जिस तरह वह स्त्री अपने प्रेम और मिलाप की खुशी का वर्णन नहीं कर सकती । यही हाल सुरति शब्द के साधक का भी होता है ।
कबीर साहब ने कहा है - कहन सुनन की बात नहीं । देखा देखी बात । दूल्हा दुल्हिन मिल गये । फ़ीकी पङी बरात
इस प्रकार अन्दर की जो अनुभूतियाँ हैं । उसका वर्णन नहीं हो सकता ।
नहीं यह योग ग्यान तुरिया तत्त । यह गति अकहिं कहानी ।

न तो ये योग है । योगी तो मन बुद्धि के ग्यान में ही उलझे रह गये । और न यह ग्यान ही है । यह तो कोई और ही चीज है । कोई और ही बात है । यहाँ की अजीब कैफ़ियत है । अजीब खुशी है । जिसके समान दूसरा कोई नमूना नहीं मिलता ।
तुलसीदास जी ने कहा है - नाम रूप दोऊ अकथ कहानी । समझत सुखद न जात बखानी ।
अर्थात उस नाम ( परमात्मा ) और रूप की अकहनीय कहानी है । जो अन्दर जाकर देखने से तो समझने में आती है । पर उसका वर्णन नहीं हो पाता ।
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विशेष - जिस नाम का वर्णन आता है । वह शब्द रूप धुन है । झींगुर की आवाज से मिलती जुलती ये निरंतर होती गैवी आवाज अंतर घट में स्वतः हो रही है । जिसे स्थिति समझाने हेतु परमात्मा का नाम कहकर बताया गया है । क्योंकि अकेला यह नाम ही परमात्मा से मिलाता है । इसलिये इसे परमात्मा का नाम कहा गया । वैसे वास्तव में परमात्मा का कोई नाम नहीं है ।
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