29 मई 2011

वेद की उत्पत्ति

कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! तुम यह विचार करो । इसके पीछे ऐसा वर्णन हो चुका है कि अग्नि पवन जल प्रथ्वी और प्रकाश कूर्म के उदर से प्रकट हुये । उसके उदर से ये पाँचो अंश लिये । तथा तीनों सिर काटने से सत रज तम तीनों गुण प्राप्त हुये ।
इस प्रकार पाँच तत्व और तीन गुण प्राप्त होने पर निरंजन ने सृष्टि रचना की । फ़िर अष्टांगी और निरंजन के परस्पर रति प्रसंग से अष्टांगी को गुण एवं तत्व समान करके दिये । और अपने अंश उत्पन्न किये । इस प्रकार पाँच तत्व और तीन गुण को देने से उसने संसार की रचना की ।
वीर्य शक्ति की पहली बूँद से बृह्मा हुये । तब उन्हें रजोगुण और पाँच तत्व दिये । दूसरी बूँद से विष्णु हुये । उम्हें सतगुण और पाँच तत्व दिये । तीसरी बूँद से शंकर हुये । तब उन्हें तमोगुण और पाँच तत्व दिये । पाँच तत्व तीन गुण के मिश्रण से बृह्मा विष्णु महेश के शरीर की रचना हुयी । इसी प्रकार सब जीवों के शरीर की रचना हुयी ।  उससे ये पाँच तत्व और तीन गुण परिवर्तनशील और विकारी होने से बार बार सृजन और प्रलय यानी जीवन और मरण होता है । सृष्टि की रचना के इस आदि रहस्य को वास्तविक रूप से कोई नहीं जानता ।


हे धर्मदास ! तब निरंजन बोला - हे अष्टांगी कामिनी ! मेरी बात सुन । और जो मैं कहूँ । उसे मानों । अब जीव बीज सोहंग तुम्हारे पास है । उसके द्वारा सृष्टि रचना का प्रकाश करो । हे रानी सुन । अब मैं कैसे क्या करूँ । आदि भवानी ! बृह्मा विष्णु महेश तीनों पुत्र तुमको सौंप दिये । अब मैंने तो अपना मन सत्यपुरुष की सेवा भक्ति में लगा दिया है । तुम इन तीनों बालकों को लेकर राज करो । परन्तु मेरा भेद किसी से न कहना । मेरा दर्शन ये तीनों पुत्र न कर सकेंगे । चाहे मुझे खोजते खोजते अपना जन्म ही क्यों न समाप्त कर दें ।
सोच समझकर सब लोगों को ऐसा मत सुदृढ कराना कि सत्यपुरुष का भेद कोई प्राणी जानने न पाये । जब ये तीनों पुत्र बुद्धिमान हो जायँ । तब उन्हें समुद्र मंथन का ग्यान देकर समुद्र मंथन के लिये भेजना ।
इस तरह निरंजन ने अष्टांगी को बहुत प्रकार से समझाया । और फ़िर अपने आप गुप्त हो गया । उसने शून्य 0 गुफ़ा में निवास किया । वह जीवों के ह्रदयाकाश रूपी शून्य 0 गुफ़ा में रहता है । तब उसका भेद कौन ले सकता है ?
वह गुप्त होकर भी सबके साथ है । जो सबके भीतर है । उस मन को ही निरंजन जानों । जीवों के ह्रदय में रहने वाला यह मन निरंजन सत्यपुरुष परमात्मा के रहस्यमय ग्यान के प्रति संदेह उत्पन्न कर उसे मिटाता है । यह अपने मत से सभी को वशीभूत करता है । और स्वयं की बङाई प्रकट करता है ।
सभी जीवों के ह्रदय में बसने वाला यह मन काल निरंजन का ही रूप है । सबके साथ रहता हुआ भी ये मन पूर्णतया गुप्त है । और किसी को दिखाई नहीं देता । ये स्वाभाविक रूप से अत्यन्त चंचल है । और सदा सांसारिक विषयों की ओर दौङता है । विषय सुख और भोग प्रवृति के कारण मन को चैन कहाँ है ? यह तो दिन रात सोते जागते अपनी अनन्त इच्छाओं की पूर्ति के लिये भटकता ही रहता है । और मन के वशीभूत होने के कारण ही जीव अशांत और दुखी होता है । इसी कारण उसका पतन होकर जन्म मरण का बंधन बना हुआ है । जीव का मन ही उसके दुखों भोगों और जन्म मरण का कारण है । अतः मन को वश में करना ही सभी दुखों और जन्म मरण के बँधन से मुक्त होने का उपाय है ।
जीव तथा उसके ह्रदय के भीतर मन दोनों एक साथ है । मतवाला और विषयगामी मन काल निरंजन के अंग स्पर्श करने से जीव बुद्धिहीन हो गये ।  इसी से अग्यानी जीव कर्म अकर्म के करते रहने से.. तथा उनका फ़ल भोगते रहने के कारण ही.. जन्म जन्मांतर तक उनका उद्धार नहीं हो पाता । यह मन काल जीव को सताता है । यह इन्द्रियों को प्रेरित कर विभिन्न प्रकार के पापकर्मों में लगाता है । यह स्वयँ पाप पुण्य के कर्मों की काल कुचाल चलता है । और फ़िर जीव को दुख रूपी दण्ड देता है ।
उधर जब ये तीनों बालक बृह्मा विष्णु महेश सयाने और समझदार हुये । तो उनकी माता अष्टांगी देवी ने उन्हें समुद्र मथने के लिये भेजा । लेकिन वे बालक खेल खेलने में मस्त थे । अतः समुद्र मथने नहीं गये ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! उसी समय एक तमाशा हुआ । निरंजन राव ने योग धारण किया । उसमें उसने पवन यानी सांस खींचकर पूरक प्राणायाम से आरम्भ कर.. पवन ठहराकर कुम्भक प्राणायाम बहुत देर तक किया । फ़िर जब निरंजन कुम्भक त्यागकर रेचन क्रिया से पवन रहित हुआ । तब उसकी सांस के साथ वेद बाहर निकले । वेद उत्पत्ति के इस रहस्य को कोई विरला विद्वान ही जानेगा ।
वेद ने निरंजन की स्तुति की । और कहा - हे निर्गुण नाथ ! मुझे क्या आग्या है ?
तब निरंजन बोला - तुम जाकर समुद्र में निवास करो । तथा जिसका तुमसे भेंट हो । उसके पास चले जाना । वेद को आग्या देते हुये काल निरंजन की आवाज तो सुनायी दी । पर वेद ने उसका स्थूल रूप नहीं देखा । उसने केवल अपना ज्योतिस्वरूप ही दिखाया । उसके तेज से प्रभावित होकर आग्यानुसार वेद चले गये । फ़िर अंत में उस तेज से विष की उत्पत्ति हुयी । इधर चलते हुये वेद वहाँ जा पहुँचे । जहाँ निरंजन ने समुद्र की रचना की थी । वे सिंधु के मध्य में पहुँच गये । तब निरंजन ने समुद्र मँथन की युक्ति का विचार किया ।
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