26 अप्रैल 2011

सदगुरु और शिष्यों को शराब पिलाए

जार्ज गुरजिएफ के पास जब भी कोई नये शिष्य आते थे । तो पहला उसका काम था कि वह उनको इतनी शराब पिला देता । अब यह तुम थोड़े हैरान होओगे कि कोई सदगुरु और शिष्यों को शराब पिलाए । लेकिन गुरजिएफ के अपने रास्ते थे । हर सदगुरु के अपने रास्ते होते हैं । इतनी शराब पिला देता । पिलाए ही जाता । पिलाए ही जाता । जब तक कि वह बिलकुल बेहोश न हो जाता । गिर न जाता । अल्ल बल्ल न बकने लगता । जब वह अल्ल बल्ल बकने लगता । तब वह बैठकर सुनता कि - वह क्या कह रहा है । वह उसके आधार पर उसकी साधना तय करता । क्योंकि जब तक वह होश में है । तब तक तो वह धोखा देगा । तब तक मसला कुछ और होगा । बताएगा कुछ और । कामवासना से पीड़ित होगा । और ब्रह्मचर्य के संबंध में पूछेगा । धन के लिए आतुर होगा । और ध्यान की चर्चा चलायेगा । पद के लिए भीतर महत्त्वाकांक्षा होगी । और संन्यास क्या है ? ऐसे प्रश्न उठायेगा । भोग में लिप्सा होगी । और त्याग के संबंध में विचार विमर्श करेगा । क्यों ? क्योंकि ये अच्छी अच्छी बातें हैं । और इन अच्छी अच्छी बातों पर बात करने से प्रतिष्ठा बढ़ती है । लोग अपनी सच्ची समस्याएं भी नहीं कहते । लोग ऐसी समस्याओं पर चर्चा करते हैं । जो उनकी समस्याएं ही नहीं हैं । जिनसे उनका कुछ लेना देना नहीं है । और अगर तुम चिकित्सक को ऐसी बीमारी बताओगे । जो तुम्हारी बीमारी नहीं है । तो इलाज कैसे होगा ?
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लोग प्रमाण या अथॉरिटी के बड़े दीवाने होते हैं । 1 मित्र मेरे पास आए । यही अभी परसों । उन्होंने कहा कि मैं बहुत परेशान था । नींद मुझे नहीं आती थी । नींद खो गई थी । इससे चिंतित था । मनोवैज्ञानिक के पास गया । तो मनोवैज्ञानिक ने कहा कि - यह तो बिलकुल ठीक है । मनोवैज्ञानिक ने पूछा कि - सेक्स के बाबत तुम्हारी क्या स्थिति है ? तो मनोवैज्ञानिक ने उनसे कहा कि तुम हस्तमैथुन, मस्टरबेशन शुरू कर दो । उन्होंने कहा कि - कैसी बात कहते हैं ? तो उन्होंने कहा - यह तो स्वभाव है । यह तो आदमी को करना ही पड़ता है । जब मनोवैज्ञानिक कहता हो । वे राजी हो गए । फिर 2 साल में उस हालत में पहुंच गए कि उसी मनोवैज्ञानिक ने कहा कि - अब तुम्हें इलेक्ट्रिक शॉक की जरूरत है । अब तुम बिजली के शॉक्स लो । अब जब मनोवैज्ञानिक कह रहा है । और हम तो अथारिटी के ऐसे दीवाने हैं । ऐसे पागल हैं । और जो चीज जब अथारिटी बन जाए । कभी मंदिर का पुरोहित अथारिटी था । तो वह जो कह दे । वह सत्य था । अब वह पौरोहित्य जो है मंदिर का । वह मनोवैज्ञानिक के हाथ में आया जा रहा है । अब वह जो कह दे । वह सत्य है । तो बिजली के शॉक ले लिए । सब तरह से व्यक्तित्व अस्त व्यस्त हो गया ।
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ॐ 1 गुप्त कुंजी भी है । जब मैं कहता हूं कि - गुप्त कुंजी । तो मेरा अर्थ है कि वह अंतिम ध्वनि से मिलती जुलती है । यदि आप उसका उपयोग कर सकें । और उसके साथ साथ धीरे धीरे भीतर गहरे में जा सकें । तो आप अंतिम द्वार तक पहुंच जाएंगे । क्योंकि वह मिलता जुलता है । और वह और भी अधिक मिलेगा । यदि आप कुछ बातें और करें । जैसे यदि आप ॐ का उच्चारण करें । तो अपने होंठ काम में मत लें । केवल अपने भीतर अपने मन की सहायता से ॐ की ध्वनि उत्पन्‍न करें । अपने शरीर को भी काम में मत लें । तब वह और भी मिलती जुलती होगी । क्योंकि तब आप 1 और अधिक सूक्ष्म माध्यम का उपयोग करेंगे । मन का भी उपयोग न करें । बस भीतर ॐ शब्द की ध्वनि उत्पन्‍न करें । तब उसे भी बंद कर दें । और ध्वनि को प्रतिध्वनित होने दें । कोई भी प्रयास न करें । यह अपने से आता है । तब यह वह जप बन जाता है । तब वह और भी गहरा चला जाता है । और आप उसे 1 कुंजी की भांति काम में ले सकते हैं ।
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मैं जब जीसस को देखता हूं । तो मुझे वे गहरे ध्यान में डूबे दिखाई देते
है । गहन संबोधि में है वे । परंतु उनको ऐसी जाति के लोगों में रहना पडा । जो धार्मिक या दार्शनिक नहीं थे । वे बिलकुल राजनीतिक थे । इन यहूदियों का मस्तिष्क और ही ढंग से काम करता है ? इसलिए इनमें कोई दार्शनिक नहीं हुआ । इनके लिए जीसस अजनबी थे । और वे बहुत गड़बड़ कर रहे थे । यहूदियों की जमी जमायी व्यवस्था को बिगाड़ रहे थे जीसस । अंत: उन्हें चुप कराने के लिए यहूदियों ने उनको सूली लगा दी । सूली पर वे मरे नहीं । उनके शरीर को सूली से उतार कर जब 3 दिन के लिए गुफा में रखा गया । तो मलहम आदि लगाकर उसे ठीक किया गया । और वहीं से जीसस पलायन कर गए । इसके बाद वे मौन हो गए । और अपने ग्रुप के साथ अर्थात अपनी शिष्य मंडली के साथ वे चुपचाप गुह्म रहस्यों की साधना करते रहे । ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी गुप्त परंपरा आज भी चल रही है । जीसस को समझने के लिए जरूरी है कि ईसाईयत द्वारा की गई उनकी व्याख्या को बीच में से हटाकर सीधे उनको देखा जाए । तब उनकी आंतरिक संपदा से हम समृद्ध हो सकत हैं ।
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मैं गया सुसराड़ । नया कुर्ता गाड़ ।
दाढ़ी बनवाई बाल रंग्वाए । रेहड़ी पर ते संतरे तुलवाए ।
हाथ मैं दो किलो फ्रूट । मैं हो रया सूटम सूट ।
फागन का महीना था । आ रया पसीना था ।
पोहंच गया गाम मैं । मीठे मीठे घाम मैं ।
सुसराड़ का टोरा था । मैं अकड में होरा था ।
साले मिलगे घर के बाहर । बोले आ रिश्तेदार आ रिश्तेदार ।
बस मेरी खातिरदारी शुरू होगी ।
रात ने खा पीके सो गया तडके मेरी बारी शुरू होगी ।
सोटे ले ले शाहले आगी । मेरे ते मिठाईया के पैसे मांगन लागी ।
दो दो चार चार सबने लगाये । पैसे भी दिए और सोटे भी खाए ।
साली भी मेरी मुह ने फेर गी । गाढ़ा रंग घोल के सर पे गेर गी ।
सारा टोरा हो गया था ढिल्ला ढिल्ला ।
गात हो गया लिल्ला लिल्ला गिल्ला गिल्ला ।
रहा सहा टोरा साला ने मिटा दिया । भर के कोली नाली में लिटा दिया ।
साँझ ताहि देहि काली आँख लाल होगी । बन्दर बरगी मेरी चाल होगी ।
बटेऊ हाडे तो नु हे सोटे खावेगा । बता फेर होली पे हाडे आवेगा ।
मैं हाथ जोड़ बोल्या या गलती फेर नहीं दोहराऊंगा ।
होली तो के मैं थारे दिवाली ने भी नहीं आउंगा ।
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