27 अप्रैल 2011

परमात्मा मर गया

सावधान रहो - बुद्धों से । क्राइस्टों से । कृष्णों से । मुझसे भी सावधान रहो । निष्कर्ष तो तुम्हारे अपने जीवन से ही आने चाहिए । अनुभव में उतरो । बनो अपने अनुभव के प्रति प्रामाणिक । और निष्कर्षों को अपनी विशिष्ट एवं व्यक्तिगत खोज से आने दो । सत्य तुम पर घटित होगा । लेकिन यदि तुम दूसरों से उधार लेते रहे । तो वह कभी भी घटित नहीं होगा । वह सत्य का परिपूरक बन जाता है । वैसा सत्य समस्याएं ज्यादा खड़ी कर देता है । सुलझाता कम है ।
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स्वर्ग:परोक्षवादो वेदोयम बालानामनुशासनम ।
कर्ममोक्षाय कर्माणि विधत्ते ह्यगदम यथा ।
- यह वेद सापेक्ष हैं । यह कर्मों से मुक्ति के लिये उचित कर्म का विधान करता है । जैसे बालक को औषधि देने के लिये मिठाई आदि का लालच दिया जाता है । वैसे ही यह अज्ञानियों को श्रेष्ठ कर्म में प्रवृत्त करने के लिये स्वर्ग आदि का प्रलोभन देता है । श्रीमदभागवत, एकादश स्कन्ध, अध्याय 3 श्लोक 44
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परमात्मा मर गया है - कभी ऐसे लोग थे । जो कि आस्तिक थे । जो सचमुच में ही विश्वास करते थे कि परमात्मा है । ऐसे भी लोग थे । जो कि पक्के नास्तिक थे । जो कि उतनी ही त्वरा से विश्वास करते थे कि परमात्मा नहीं है । लेकिन आधुनिक मन उदासीन है । वह चिंता नहीं करता कि परमात्मा है । या नहीं । यह बात असंगत है । कोई परमात्मा के पक्ष में । या विपक्ष में । सिद्ध करने में रस नहीं लेता । वास्तव में यही अर्थ है नीत्शे की घोषणा का कि - परमात्मा मर गया है ।
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पृथ्वी जीवित है - प्राचीन ग्रंथ तो यह कहते ही हैं । पर अब कुछ वैज्ञानिकों को भी संदेह है कि पृथ्वी भी स्वांस लेती है । पृथ्वी भी स्वांस लेती है । रोएं रोएं छिद्र छिद्र से । और इसीलिए कोई भी पृथ्वी जीवित नहीं हो सकती । अगर उसके पास कम से कम 200 मील का वायु का घेरा न हो । यह हमारी पृथ्वी भी, 200 मील तक वायु का घेरा है । इसके चारों तरफ । इसलिए अब तो वैज्ञानिकों को सूत्र मिल गया है कि जिस ग्रह के पास भी वायु का घेरा है । अगर उसमें कार्बन और आक्सीजन की 1 निश्‍चित मात्रा है । तो वहां जीवन होगा । क्योंकि वह पृथ्वी जीवित है । इसका मतलब हुआ कि कुछ पृथ्‍वियां जीवित हैं । कुछ पृथ्‍वियां मृत हैं ।
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यह कृष्ण और जीसस क्या कह रहे हैं ? - जीसस ने कहा है - बिफोर अब्राहम आइ वॉज । अब्राहम था । उसके पहले भी मैं था । अब्राहम को हुए हजारों वर्ष हो चुके थे । जीसस के वक्त में । अर्जुन से कृष्ण ने कहा है कि - इस गीता को जो मैं तुझे कहता हूं । मैंने पहले फलां ऋषि को कहा था । उसके पहले फलां ऋषि को कहा था । उसके पहले फलां ऋषि को कहा था । और इन ऋषियों को हुए हजारों वर्ष हो चुके थे । इसका क्या मतलब ? कृष्ण और जीसस यह कह रहे हैं कि समय के आयाम में जो प्रथम है । वह भी मैं हूं । और समय के आयाम में जो अंतिम होगा । वह भी मैं हूं । यह जो समय की धारा है । इसमें प्रथम और अंतिम जुड़े हैं । यह समय की पूरी धारा मेरी ही धारा है । क्षुद्रतम कण है । उसमें भी मैं हूं । और 1 विराट सूर्य है । उसमें भी मैं हूं । यह क्षेत्र, स्पेस के 2 छोर हैं । छोटे से छोटा, बड़ा से बड़ा । पहला, अंतिम । ये समय के छोर हैं । हर आयाम में 1 का ही विस्तार है ।
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क्या प्रमाण है कि प्रेम है ? - हनुमान से कोई पूछता है । तो अपनी छाती फाड़कर बता देते हैं । मगर अगर अभी इस वक्त बताएंगे । तो हम पकड़कर उनकी जांच करवाएंगे कि जरूर कोई चालबाजी है । इसमें राम जो अंदर दिखायी पड़ते हैं । पहले से कुछ इंतजाम किया हुआ है । प्रि-अरेंज्‍ड है । होना चाहिए । अन्यथा हृदय में कहां राम होने वाले हैं । क्या प्रमाण है कि प्रेम है ? अब तक तो कोई प्रमाण दिया नहीं जा सका । आपके हृदय को काटा पीटा जाए । वहां कोई प्रेम नहीं मिलता । आपके हृदय में फुकस मिलता है । जो स्वांस को चलाने का यंत्र है । जीवन 1 रहस्य है । और रहस्य को समझने जब भी कोई तर्क से चलेगा । तो असल में वह नहीं समझने का तय करके चला ।
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जो पिंड में है । वही ब्रह्मांड में है - कुछ रूसी वैज्ञानिकों का खयाल बनना शुरू हुआ है कि जैसे हमारी छाती फूलती है । और सिकुड़ती है स्वांस लेने में । ऐसे पृथ्वी प्रतिपल थोड़ी बड़ी और छोटी होती है । बहुत बार शायद पृथ्वी के इसी हड़कंप से बहुत से हलन चलन पैदा हो जाते हैं । आज नहीं कल यह बात शायद साफ हो जाएगी कि पृथ्वी पर भी हृदय के दौरे पड़ जाते हैं । न केवल पृथ्वी । बल्कि पूरा विश्व भी । यूनिवर्स भी स्वांस लेता है । इसी को हिंदुओं ने कहा है कि - जो अंड में है । जो पिंड में है । वही ब्रह्मांड में है । विस्तार है । जो अणु में है । वही विराट में है । विस्तार का फर्क है ।
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स्वप्न और तथाकथित वास्तविकता के बीच केवल 1 भेद है कि स्वप्न निजी वास्तविकता है । और जो संसार है । वो 1 सार्वजनिक स्वप्न है । मनुष्य स्वयं के स्वप्न मे किसी को साझीदार नही बना सकता । वो 1 निजी संसार है । तो फिर ये संसार क्या है ? ये 1 सामूहिक स्वप्न है । हम सब 1 साथ स्वप्न देखते हैँ । क्योँकि हमारे मन 1 ही ढंग से कार्य करते हैं । 1 सीधी छड़ी को पानी मे डुबोने पर वो तत्क्षण टेढ़ी दिखाई देती है । बाहर निकालते ही दिखाई देता है । वो सीधी ही है । मन का ढंग और प्रकाश किरणोँ का व्यवहार 1 धोखा निर्मित कर देता है । एक भ्रम - कि वह मुड़ गई है । सभी को वो मुड़ी हुई ही दिखाई देगी । किसी का ज्ञान काम न आएगा । ये 1 सामूहिक भ्रम है । इसी तरह संसार 1 सामूहिक स्वप्न है ।
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यह इंद्रजाल है । इनका हम कौन कौन से विधान ( प्रयोग ) में उपयोग कर सकते है ? इसकी पूजा करनी चाहिए कि नहीं ? आप महानुभावों से मेरी विनती है कि इसके बारे में योग्य मार्गदर्शन दीजिये । अथवा कोई ग्रन्थ का

सूचन करें । जिसमें इंद्रजाल के बारे में सम्पूर्ण जानकारी हो ।
( इंटरनेट के एक पेज से । उत्तर भी वहीं से )
यह श्याम ( syam ) सिद्ध समुद्री वनस्पति है । इसे रवि पुष्य नक्षत्र में पंचोपचार से पूजन करके जिस कार्य के लिये सिद्ध करना है । उसकी 11 माला करें । दशांश हवन करें । इसे फ़्रेम में लगाकर धूप दीप दिखाते रहें - लाल बाबा ।   
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