23 अप्रैल 2011

लेकिन अब सब कुछ छोड देना चाहता हूँ ।...

राजीव साहेब ! मैं कुन्दन कुमार ( आजकल नेपाल में ) मैंने पहले 1 बार आप को ई-मेल की थी । जब मैंने बंगाल के " वामा खेपा " जी के बारे में पूछा था । शायद आपको याद आ गया हो । दरसल मैंने आज आपसे पूछना तो कुछ नही । सिर्फ़ दिल की बात करनी है ।
मैं और मेरी पत्नी आपका ब्लाग पढते ही रहते हैं । हमारे मन में भी कुछ सवाल जनम लेते हैं । लेकिन इससे पहले हम समय निकाल कर आपको ई-मेल करें । तब तक कोई और सज्जन पाठक आपको हमारे सवाल से मिलता जुलता सवाल कर देते हैं । परिणाम स्वरुप उसका उत्तर आपके किसी न किसी लेख में मिल जाता है । इस बात से कभी कभी बहुत खुशी होती है कि ये तो घर बैठे ही गंगास्नान हो गया ।
आप बहुत उत्तम कार्य कर रहे हैं । मेरे पास शब्द नहीं है कि कैसे आपकी तारीफ़ करुँ । शायद तारीफ़ करने की कला मे मैं निपुण नही हूँ । लेकिन आपके प्रति भावना प्रेम से भरी पडी है ।
 मैं अपने बारे में मैं ये ही कहूँगा कि मैं वैसे तो दिल्ली का रहने वाला हूँ । लेकिन कामकाज के कारण कभी बंगाल रहा । तो कभी किसी शहर तो कभी किसी । ये तो आपको बता दिया है कि आजकल नेपाल में हूँ । लेकिन वापिस भारत जल्दी आने की उम्मीद है ।
न तो मेरे पास पैसा कम है । और न ही ज्यादा । लेकिन जितना है । इसके चक्कर में ही मुझे अलग शहर और स्थानों के चक्कर अब तक पूरी जिन्दगी काटने पडे । लेकिन अब सब कुछ छोड देना चाहता हूँ । हालात के अनुसार जितनी जायज जरुरत होनी चाहिये । उतना भगवान ने दिया ही है ।
अन्त में ये ही कहूँगा कि अगर भगवान ने चाहा । तो शायद कभी आपकी और हमारी मुलाकात हो । बाकी सब ईश्वर की असीम लीला ही है । असल में सब कुछ वो ही जानता है कि कब क्या होना है । और कैसे होना है । हम लोगों को तो आने वाले 1 पल की खबर नही होती ।
क्युँ कि कभी कभी कुछ होते होते कुछ और ही हो जाता है । जिसकी कल्पना भी नहीं की होती । बस और क्या लिखूँ । अगर आप उचित समझें । तो मुझे भी अपने चरणो में स्थान दें । मैं अपनी पहचान हेतु अपनी और अपनी पत्नी की तसवीर भेज रहा हूँ । कुन्दन कुमार ( आजकल नेपाल में ) जय हनुमान ।

*** कुन्दन कुमार जी ! हालांकि आप पहले ही हमारे ब्लाग के सदस्य हो चुके हैं । फ़िर भी सपत्नीक आपके इस सुन्दर चित्र के साथ सत्यकीखोज पर आपका फ़िर से बहुत बहुत स्वागत है । साथ ही आपसे एक निवेदन भी है । कुछ इसी तरह के चित्र जिनमें आप भी मौजूद हों । और कोई खास स्थान या खास दृश्य हो । वो भी कृपया आप मुझे भेजें ।

एक और बात । अपने कार्य के चलते आप विभिन्न स्थानों पर रहे हैं । वहाँ की धार्मिक आस्थायें और रीतिरिवाज आदि पर कोई दिलचस्प अनुभव भी भेजें । आपको समय का अभाव होने पर आपकी पत्नी भी भेज सकती हैं ।
आपने इस मेल में एक बङी दिलचस्प बात कही है..लेकिन अब सब कुछ छोड देना चाहता हूँ ।...इसके तुरन्त ही बाद आपने ठीक इसके विरोध वाली बात कही है...अन्त में ये ही कहूँगा कि अगर भगवान ने चाहा । तो शायद कभी आपकी और हमारी मुलाकात हो । बाकी सब ईश्वर की असीम लीला ही है । असल में सब कुछ वो ही जानता है कि कब क्या होना है । और कैसे होना है । हम लोगों को तो आने वाले 1 पल की खबर नही होती । क्युँ कि कभी कभी कुछ होते होते कुछ और ही हो जाता है । जिसकी कल्पना भी नहीं की होती ।

*** वास्तव में यही सच है । आप न कुछ पकङ सकते हैं । न कुछ छोङ सकते हैं । आपके जहाँ और जितने संस्कार जुङे हुये हैं । वहाँ हर हालत में आप खिंचे चले जाओगे ।.. दरअसल ये सब हो रहा है । और इंसान या जीव क्योंकि " अहम " मूल से बना है । इसलिये उसे ऐसा लगता है कि वो ये सब कर रहा है । अगर वास्तव में कोई भी इंसान अपनी स्थिति में बदलाव करना चाहता है । तो वह सिर्फ़ भक्ति से ही संभव है । इसलिये जो आप चाहते हैं । उसके लिये बस सिर्फ़ प्रभु से प्रार्थना ही कर सकते हैं ।

आपने इससे पहले वाले मेल में श्री महाराज जी से " हँसदीक्षा " हेतु अर्जी लगायी थी । इससे एक प्रेमी होने के नाते मैं अपनत्व भाव से बता रहा हूँ । और ये मानें । स्पेशली आपको ही नहीं । अपने सभी पाठकों को बता रहा हूँ । इस संसार के सभी लोगों के पास महज 7 महीने का टाइम रह गया है । इन 7 महीनों में भी विभिन्न स्थानों पर लोग आपदा के शिकार होंगे । पर वो ज्यादा हाहाकारी नहीं होगा । हालांकि जिस पर बीतती है । उसके लिये तो सर में दर्द होना भी हाहाकारी हो जाता है । पर कुछ संकट ऐसे होते हैं । जिनका उपचार तो किया जा सकता है ।
लेकिन 7 महीने बाद रोग लाइलाज स्थिति में होगा । और उस वक्त एकमात्र बङे स्तर की प्रभुभक्ति और उससे भी अधिक समर्थ  " हँसदीक्षा " ही इंसान को सबसे बङा सहारा देगी । और काल के हाहाकार से बचायेगी ।

इसलिये आप जितना भी जल्द संभव हो सके । सपत्नीक बाल बच्चों को हँसदीक्षा दिलवा दें । और जब तक आप आने में असमर्थ हैं । श्री महाराज जी से फ़ोन पर स्वयँ निवेदन करके अपनी अर्जी खुद लगा दें । आप लोग पता नहीं क्यों महाराज जी से बात करने में झिझकते हो ।
श्री  महाराज जी बहुत सरल ह्रदय हैं । उनसे फ़ोन पर बात करके ही एक अनोखी शान्ति और आनन्द प्राप्त होता है । मेरी प्रेरणा से जिन लोगों ने महाराज जी से एक बार भी बात कर ली । अब वो अक्सर ही बात करते रहते हैं । और अभी एक बार भी उनके दर्शन न कर पाने के बाद भी लाभ उठा रहे हैं ।
दरअसल आप लोग सन्तमत का एक रहस्य को नहीं जानते । ये आवश्यक नहीं कि किसी कारणवश किसी सच्चे सन्त के पास नहीं पहुँच पा रहे । तो जाये बिना काम ही नहीं होगा । आपकी सच्ची प्रेममय और श्रद्धायुक्त भावना भी उन तक पहुँचती है । फ़िर फ़ोन से तो आपको भी तसल्ली हो जाती है कि मैं भी अब महाराज जी की शरण में हूँ । इसलिये गलत स्थान पर जाने से हिचको । गलत कार्य से हिचको । पर शुभ कार्य तो जितनी जल्दी कर सको । उतना ही बेहतर ।
अन्त में आप सभी प्रेमीजनों का बहुत बहुत आभार । जो मुझ जैसे साधारण इंसान को बारबार सतसंग और प्रभु की याद दिलाते रहते हो । धन्यवाद ।
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