28 मई 2016

आत्महत्या क्यों ?

एक व्यक्ति जीवन में आने वाली परेशानियों से बहुत दुखी था । उसे अपने दुखों के बीच जीने का कोई अर्थ समझ नहीं आ रहा था । वह डूबकर आत्महत्या करने नदी किनारे पहुंच गया । वह नदी में कूदने ही वाला था कि किसी ने उसे पकड़कर पीछे खींच लिया ।
उस व्यक्ति को आत्महत्या से रोकने वाले उस नदी किनारे झोपड़ी में रहने वाले एक साधु थे ।
युवक क्रोधित होते हुए साधु से बोला - आपने मुझे क्यों बचा लिया ? इतने दुखों के बीच मैं जिंदा नहीं रह सकता ।
साधु ने उस व्यक्ति की बात कोई जवाब नहीं दिया और कहा - तुम पानी पियो ।
साधु ने एक कटोरी निकाली । उसमें पानी भरा और एक चुटकी नमक डाल दिया ।
पानी का एक घूंट पीकर युवक ने कहा - यह मैं नहीं पी सकता । इसमें बहुत नमक है ।
साधु ने कहा - चलो, फिर नदी का पानी पी लो । लेकिन जरा ठहरो ।
यह कहकर साधु ने नदी में एक चुटकी नमक डाल दिया ।
युवक ने पानी पिया, साधु ने पूछा - कैसा था पानी ?
युवक बोला - यह तो मीठा है ।
अब साधु ने उसे समझाया - जिन दुखों से डरकर तुम आत्महत्या करने जा रहे थे । वे तो बस चुटकी भर नमक की तरह हैं । लेकिन अभी तुम कटोरी की तरह हो । जिसमें यह नमक ज्यादा लग रहा है ।
जिस दिन तुम नदी बन जाओगे । यह दुखों का नमक तुम्हें नगण्य लगने लगेगा ।
हमें खुद को इतना योग्य और बड़ा बनाना होगा । ताकि दुखों का हमारे ऊपर प्रभाव न पड़ सके ।
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छोटी सी मछली पानी के उल्टे बहाव में भी आगे निकल जाती है । जबकि एक बड़ा हाथी तक उस बहाव में बह जाता है ।
क्योंकि मछली पानी की शरण में है ।
ऐसे ही जो प्रभु की शरण में हैं । वे विपरीत परिस्थिति में भी इस भवसागर से तर जाते हैं।
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