26 जून 2012

सोचिये ऐसा कर्म फ़ल कब और क्यों बनता है ?


1 कुछ इंसानी फ़ोटो देखता हूँ । कहने को तो फ़ोटो हैं । चित्र ? पर मैं जानता हूँ । इन चित्रों के पीछे सत्य है । कई जन्मों पहले के कर्म । रंग । विचार । आज आकृति रूप होकर उभरे हैं । आप भी देखते होंगे - ऐसे फ़ोटो ?
2 एकाएक दया । घिन । भगवान के प्रति आक्रोश । अन्यायी भगवान आदि तमाम विचार आते होंगे । क्योंकि फ़ोटो ( या साक्षात ) आपको विचलित कर गया है । कहीं अन्दर तक झिंझोङ गया है - अरे  ! ऐसा भी होता है ।
3 फ़िर आप निश्चित हो जाते हैं - अरे ! अपने अपने कर्म हैं । जैसा किया है । भोगना ही होगा । दुनियाँ है । लेकिन यहाँ थोङा सा गलती आपसे हो रही है । क्योंकि जाने अनजाने ऐसे ही बहुत से कर्म आपके भी संचित हो रहे हैं । हो चुके हैं ।
4 बस आपको उनका पता नहीं है । ठीक उसी तरह । जिसकी जेब नोटों से भरी होती है । उसे जैसे कोई फ़िक्र ही नहीं होती । पर गरीब की जिन्दगी रोटी दाल का जुगाङ करते ही निकल जाती है । लेकिन एक दिन जेब का माल खर्च हो जाने पर सबको गरीब होना है ।
5 और ये धन तेजी से घट रहा है । आप भले ही मरते मरते काजू बादाम की मिठाई खाकर मरो । पर बस यहीं तक । फ़िर धन का बैलेंस शून्य 0 हो ही जायेगा । और ऐसा कोई रूप आकार लिये कोई स्थिति आपके सामने आयेगी ।
6 अगर नहीं । इसके प्रति आप निश्चित हैं । तो फ़िर गौर से सोचिये । इन्होंने आखिर ऐसा क्या किया ? जो ये फ़ल रूप हुआ । थोङा सा ही गौर करने पर आपको सम्मझ आ जायेगा  । किसी न किसी प्रकार का अभिमान ।
7  शरीर का अभिमान । सुन्दरता का अभिमान । धन का अभिमान । पद का अभिमान । जाति का कुल का अभिमान । ताकत का अभिमान । यौवन का अभिमान । अभिमानों की ये श्रंखला बेहद बङी है ।
8 और अभिमान का सीधा सा मतलब है । वही पदार्थ MATTER अपने अन्दर create करना । बस थोङा सा गहराई से सोचें । तो वही चित्र तो आपके अन्दर भी बन रहा है - घृणा । द्वेष । नफ़रत । लालच । तिरस्कार ।
9 इसीलिये सन्त मत में सम रहने को सर्वश्रेष्ठ माना गया है । और सम होने का मतलब ये भी नहीं है कि - आप ऐसे किसी लाचार जरूरत मन्द को देखकर चुपचाप निकल जाओ । बल्कि बहुत दया या बहुत दुखी भी होने के बजाय । एक डाक्टर की तरह उससे सहायक व्यवहार करो । ये श्रेष्ठ है ।
10 इसी को सफ़ल परमार्थ कहा गया है । और ऐसे फ़ोटो ( लोगों ) को देखकर आप लगभग भयभीत से हुये सचेत हो जाईये । चिंतन कीजिये । विचारकों की सहायता लीजिये । और सोचिये । ऐसा कर्म फ़ल कब और क्यों बनता है ? 
11 कहीं ऐसा तो नहीं ? ऐसा कोई कर्म फ़ल आपका बन चुका  हो । या बहुत से कर्म फ़ल अनजाने में बन रहे हो । इसलिये बङे सचेत होकर इंसानी जीवन जीना होता है । क्योंकि ये कर्म योनि है । छोटी सी गलती भयंकर सजा का रूप ले सकती है । 
12 यहाँ से उत्थान कर भगवान बन जाना भी संभव है । और पतन होने पर तुच्छ गन्दगी का कीङा भी । लाखों साल की स्वर्गिक सम्पदा और भोग भी हासिल हो सकता है । और ऐसा ही युगों के समान लगने वाला कष्टकारी और अपमान युक्त जीवन भी ।
13  पर अभी भी बहुत कुछ आपके हाथ में है । हालांकि जो कर्म हो चुका है । उसे किसी हालत में भुगते बिना नहीं बचा जा सकता - काया से जो पातक होई । बिन भुगते छूटे नहीं कोई । कोई न काहू सुख दुख कर दाता ।  निज कर कर्म भोग सब भ्राता ।
14 पर फ़िर भी  2 स्थितियाँ अभी भी हैं । एक गरीबी की स्थिति में रोग के कष्ट से पीङित बिना इलाज तङप तङप कर जीना । और दूसरी - धन होने पर उस रोग का समुचित इलाज  और दर्द निवारक दवाओं से दर्द से राहत ।
15 और इस धन का मतलब यही है । सत गुण द्वारा सत ऊर्जा ( द्वैत भक्ति में ) एकत्र कर धनी होना । योग द्वारा तम ( तामसिक गुणों ) का नाश करना । इस तरह कर्म फ़ल दुख तो देता है । पर सहनीय स्थिति में ।

16 जिस प्रकार कुत्ता बिल्ली आदि पशु जीव भी अपने पूर्व कर्म संस्कारों के आधार पर कोई दूध मलाई खाते हैं । और कोई टुकङे टुकङे को दर दर भटकते हैं । मार खाते हैं । कोई मखमली बिस्तर पर सोते हैं । और कोई गन्दी नाली में लोटते हैं ।
17 इसलिये बङी सावधानी से कर्म निर्माण के प्रति इंसान को सतर्क रहना चाहिये । क्योंकि चिङियाँ खेत चुग जायें । फ़िर पछताने से कुछ नहीं होगा । इसलिये कर्मों की इस फ़सल को सावधानी से बीजारोपण करें । और खाद पानी दें ।

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