11 अगस्त 2011

ये साले शहर के लोग हरामी हैं - विनोद त्रिपाठी

गाय हमारी माता है । बैल हमारा बाप है ।
1 बार गाँव से बेचारा छ्ज्जू चौधरी ( बेचारा सिर्फ़ नाम का चौधरी है । असल में है वो सिर्फ़ 1 साधारण सा सीधा साधा किसान ) शहर में किसान मेला देखने आया । अपने गाँव के पास वाले कस्बे से उसने सुबह की सबसे पहली बस पकडी थी । इसलिये किसान मेले में छ्ज्जू सही समय पर पहुँच गया था । वहाँ छ्ज्जू बडे आराम से टहल रहा था । और मेले के रंग देख रहा था । वहाँ उसने पहले तो नाश्ते में गरमा गरम पकौडे खाये । और साथ में इलायची वाली चाय पी ।
फ़िर धीरे धीरे जैसे जैसे समय बीत रहा था । वैसे ही मेले में भीड बङ रही थी । छ्ज्जू बडे गौर से वहाँ की चहल पहल देख रहा था । दूर दूर से गाँव के किसान, जाट और जमीदार लोग वहाँ पर अपने अपने पशु बेचने के लिये लाये थे । कुछ लोग अच्छी नस्ल के पशुओं को खरीदने के लिये आये थे । वहाँ छ्ज्जू ने बडे शानदार बैल देखे । उन्हें देखकर छ्ज्जू सोच में पङ गया कि - ऐसा बैल तो हमारे पूरे गाँव में 1 भी नहीं है । फ़िर छ्ज्जू थोङा और आगे गया । वहाँ उसने कुछ अच्छी नस्ल की अधिक दूध देने वाली गायें देखी । लेकिन

उनकी महँगी कीमत सुनकर छ्ज्जू चुप कर गया ।
फ़िर छ्ज्जू थोडा और आगे गया । उसने वहाँ 1 ऊँट देखा । छ्ज्जू बेचारा बडी हैरानी से कभी ऊँट को देखे । तो कभी ऊँट के मालिक को । छ्ज्जू सोच रहा था । क्या आज के जमाने में भी लोग ऊँट पालते हैं । लेकिन इसे खरीदता कौन होगा ? और खरीदने वाला ऊँट का करता क्या होगा ?
इसी उलझन में छ्ज्जू आगे चल पङा । थोङा आगे जाने पर छ्ज्जू ने जंगली मुर्गे देखे । छ्ज्जू वहाँ पर बैठ ही गया । और जंगली मुर्गों को देखने लगा ।
छ्ज्जू सोच रहा था कि - हमारे गाँव में जो घरों में मुर्गे रखे जाते हैं । वो तो लाल रंग के है । और गोल और मोटे हैं । लेकिन ये मुर्गे काले रंग के हैं । और लम्बे लम्बे और पतले हैं । लेकिन बेचारा

छ्ज्जू चौधरी क्या जाने मुर्गे की करामात ?
छ्ज्जू वहाँ से उठा । और कहीं खाने पीने की दुकान ढूँढने लगा । फ़िर उसे थोङा दूरी पर 1 चने भटूरे की दुकान नजर आयी । छ्ज्जू चौधरी वहाँ गया । और वहाँ उसने बङी खुशी से चने भटूरे खाये । फ़िर छ्ज्जू चौधरी शान से अपनी मूँछों पर हाथ फ़िराता हुआ फ़िर से मेले में चहलकदमी करने लगा ।
उसने वहाँ पर कुछ पढे लिखे किस्म के लोग भी देखे । जो किसानों को नयी किस्म की खाद, बीज और फ़सलों के बारे में जानकारी दे रहे थे । छ्ज्जू चौधरी भी सबसे पीछे वाली लाईन में खडा होकर उनकी बात सुनने लगा । बेचारे छ्ज्जू को हिन्दी में बोली जाने वाली बातें तो समझ आ गयीं । लेकिन बीच में बोले गये कुछ अंग्रेजी के शब्द समझ नहीं आये । छ्ज्जू ने सोचा । ये तो खेती बाङी के डाक्टर लोग हैं ।
खैर.. छ्ज्जू चौधरी वहाँ घूम फ़िर कर बहुत खुश हुआ । लेकिन बेचारे ने खरीदा कुछ नहीं । इतने में पता ही नही चला कि कब शाम गहरा गयी । मेले में फ़टाफ़ट भीङ कम होने लगी ।
छ्ज्जू को अचानक याद आया कि यहाँ तो उसका पुराना जान पहचान वाला 1 आदमी रहता है । तभी अचानक छ्ज्जू के दिमाग में 1 आयडिया आया । उसने सोचा । अरे यहाँ तो मेरा मित्र लाला नैनसुख प्रसाद रहता है । कितनी बार उसने गाँव आकर मुझे कहा था कि कभी शहर

आओ । तो मुझसे जरुर मिलना । छ्ज्जू ने सोचा । क्यों न आज रात अपने दोस्त के यहाँ रुका जाये । वैसे भी गाँव के पास वाले कस्बे तक जाने वाली बस या तो निकल चुकी होगी । या निकलने वाली होगी ।
छ्ज्जू ने फ़टाफ़ट सोचा कि ऐसा करता हूँ । आज रात अपने दोस्त लाला नैनसुख प्रसाद के पास रूक जाता हूँ । मेरा दोस्त कितनी बार गाँव आया है । और मैंने कितनी बार उसकी सेवा की है । उसे घर के दूध की खीर खिलाई है । तो ऐसा करता हूँ । आज रात अपने दोस्त के घर रूक जाता हूँ । मैं उसके घर आज तक नहीं गया । कहीं वो बेचारा नाराज न हो जाये । ऐसा सोचकर छ्ज्जू अपने दोस्त के घर 

जाने के लिये कोई उपाय सोचने लगा ।
तभी उसे 1 रिक्शा दिखाई दिया । वो भागकर रिक्शे वाले के पास गया । और अपनी जेब से 1 कागज निकाला । और रिक्शे वाले को दिखाया । रिक्शे वाले ने पता पढा । और छ्ज्जू की तरफ़ देखा ।
और कहा - चलो साहब ।
लेकिन रिक्शे पर बिठाने से पहले रिक्शे वाले ने उसे उस पते तक पहुँचाने की कीमत बता दी । कीमत सुनकर 1 बार तो छ्ज्जू का पाद निकल गया होता । छ्ज्जू ने रिक्शे वाले को महँगाई पर भाषण दिया । रिक्शे वाले ने छ्ज्जू को उसके दिये भाषण पर उससे भी बडा भाषण दे दिया ।
छ्ज्जू बेचारा चुप करके रिक्शा पर बैठ गया । छ्ज्जू बैठा तो रिक्शा पर ऐसे था । जैसे किसी शानदार सोफ़े पर बैठा हो । लेकिन साथ में ये भी सोच रहा था कि - ये साले शहर के लोग हरामी हैं ।
खैर.. आधे घण्टे बाद रिक्शे वाले ने छ्ज्जू को उस पते पर पहुँचा दिया । छ्ज्जू उस पते पर उस मकान के सामने खडा होकर उस मकान के सामने आवाज लगाने लगा ।
तब रिक्शेवाला जाते जाते बोला - अरे भाई साहब ! बाहर घण्टी लगी है । उसे बजाओ ।
तब छ्ज्जू ने घण्टी बजाई । घण्टी बजाने पर कोयल सी आवाज निकली । छ्ज्जू ने मजे मजे में 2 या 3 बार एक साथ घण्टी बजा दी ( सिर्फ़ कोयल की आवाज सुनने के लिये )

इतने में घर का दरवाजा खुला । और बङा अजीब सा आदमी बाहर निकला ।
उसे देख छ्ज्जू बोला - मैं हूँ छ्ज्जू.. ही ही ही ।
तब वो आदमी बोला - अच्छा छ्ज्जू....लेकिन इस समय ।
छ्ज्जू बडे प्यार से बोला - मैं आज शहर किसान मेला देखने आया था ।
तब वो आदमी अपनी मेंढक जैसी गोल गोल आँखे घुमाता हुआ बोला - लेकिन मैंने तो सुना है कि वहाँ किसान सभा केन्द्र में किसानों के ठहरने के लिये कमरे बने हुए हैं ।
तब छ्ज्जू बङे भोलेपन से बोला - हाँ बने तो हुए हैं । लेकिन मैंने सोचा कि तुम भी इसी शहर में रहते हो । अगर मैं वहाँ रूक गया । तो कहीं तुम्हें बुरा न लग जाये ।

तब लाला बङे बेमन से बोला - हाँ खैर .. बुरा तो लग ही जाना था । अब आ ही गये हो । तो आओ अन्दर । लाला छ्ज्जू को अपने घर के अन्दर ले आया । छ्ज्जू भी बडे ध्यान से अपने दोस्त का घर देख रहा था ( जैसे सोच रहा हो कि मेरे दोस्त का घर है तो छोटा । लेकिन कितना साफ़ सुथरा है )
लाला ने छ्ज्जू को ड्राइंग रूम में बिठाया । और अपनी पत्नी को आवाज लगाई । अन्दर बेडरुम से लाली भी अपने नरम नरम कूल्हे मटकाती आ गयी ।
उसे देख लाला बोला - अरे सुनीता इससे मिलो । ये ही है छ्ज्जू चौधरी । जो गाँव से हम लोगों को गेहूँ । शक्कर । ईख । भुट्टा । गुङ । पालक आदि भेजता होता है ।
छ्ज्जू ने थोडा शर्माते हुये लाली को नमस्ते बुलाई । लाली ने भी फ़ीकी हँसी हँसते हुये नमस्ते बुलाई ।
फ़िर अचानक लाला चुप्पी तोङते हुये बोला - और सुनाओ । सब ठीक ठाक है । वैसे हम लोग अभी अभी खाना खाकर हटे हैं ।
छ्ज्जू बोला - लेकिन मैंने खाना नहीं खाया । दोपहर का खाया हुआ है । उसके बाद मेला देखता रहा । फ़िर सीधा अँधेरा होते ही यहाँ आ गया ।
लाला बेमन से बोला - हाँ तुम तो खाना खा ही लो ।
तब लाला जरा तिरछी नजर से अपनी लाली से बोला - अरे सुनीता ! सब्जी वगैरह गरम करो ।

लाली तपाक से बोली - सब्जी.. ही ही ही.. सब्जी तो जब हमने खाना खाया । तब खत्म हो गयी थी ।
तब लाला बोला - अच्छा । कोई बात नहीं । दाल ही गरम कर लो ।
लाली फ़टाफ़ट बोली - दाल तो जी । दोपहर को ही खत्म हो गयी थी ।
तब लाला बोला - अच्छा....तो ऐसा करो अचार ही ले आओ । कोई बात नहीं । घर की ही बात है ।
तब लाली बोली - आप बहुत भुलक्कड होते जा रहे हो । पिछ्ले हफ़्ते ही तो अचार आपके सामने फ़ेंका था । जब अचार खराब हो गया था ।
तब लाला बोला - ओह हो । इस साली काम काज की टेंशन से मेरी याददाश्त बहुत कमजोर हो गयी है । लाला साथ की साथ फ़िर बोला - चलो कोई बात नहीं । हम इतने गये गुजरे भी नहीं है । चटनी ही ले आओ । छ्ज्जू बेचारा हमारे

घर पहली बार आया है । इसकी सेवा करना तो हमारा फ़र्ज है ।
तब लाली ने टेबल पर लाकर नकली मिलावटी बाजारी टमाटर सौस की बोतल रख दी ।
छ्ज्जू उन दोनों की बातें सुनकर हैरान तो हो ही रहा था । लेकिन टेबल पर पडी इस काँच की बोतल को गौर से देखने लगा । उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये चटनी है । या शरबत है ।
उसके बाद लाली रसोई में जाकर छ्ज्जू को आवाज लगाकर पूछती है - भाई साहब ! कितनी रोटी खाओगे ? 
छ्ज्जू बोला - भाभी जी ! मेरी माता ने कभी मुझे गिनकर रोटी नहीं खिलाई । सारे परिवार को खाना खिलाने के बाद मेरे को पूछती थी कि बेटा छ्ज्जू ! अब तेरे लिये आटा गूँध लूँ ।
खैर छ्ज्जू ने थोडा झिझकते हुये कहा - 4 रोटी बना लो 


लाली की चीख निकलते निकलते बची - क्याssssss 4... ?
लाला भी बिना कुछ बोले छ्ज्जू की तरफ़ शहरी बन्दर की तरह देखने लगा ।
छ्ज्जू को शर्म सी महसूस हुई । उसने थोडा हिम्मत से कहा - मेरे कहने का मतलब था कि 3 रोटी बना लो ।
रसोई में से कोई आवाज नहीं आयी ।
लेकिन लाला समझदारों के स्टायल में बोला - भई छ्ज्जू ! क्या हो गया तुझे । होश में आ ।
छ्ज्जू बेचारा शर्म से पानी पानी हो रहा था । लेकिन भूख भी लगी हुई थी ।
छ्ज्जू ने कहा - भाभी जी 2 रोटी बहुत हैं ।
लाली रसोई से बोली - भाई साहब ! क्या आप मेरी बनाई 2 रोटी खा लोगे ?
छ्ज्जू अपना सर खुजाता सोचने लगा कि

इसने क्या रोटी ट्रैक्टर के टायर जितनी बङी बनानी है । जो मैं खा नही पाऊँगा ।
खैर छ्ज्जू ने आखिरी बार हिम्मत करके कहा - भाभी जी ! बस 1 रोटी ही बना दीजिये । मैं खाकर सो जाऊँगा ।
छ्ज्जू के इतना कहते ही लाला तपाक से बोल पङा - अरे भई छ्ज्जू ! तू भी बस भोला शंकर है । अब 1 रोटी के लिये इतनी रात को क्या पापङ बेलने । अब तो सुबह ही खा लेना ।
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प्रस्तुतकर्ता - श्री विनोद त्रिपाठी । प्रोफ़ेसर । लाला लाजपत राय नगर । भोपाल । मध्य प्रदेश । ई मेल से ।
- त्रिपाठी जी ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद । वास्तव में गाँव के लोगों के भोलेपन और निश्छल प्रेम तथा इसके विपरीत शहरी लोगों की स्वार्थी मानसिकता को दर्शाता हुआ यह सार्थक व्यंग्य है । ऐसा अनुभव कई बार जीवन में देखने को आज भी आता है ।
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