06 अप्रैल 2010

भाग्यवान तूने बाँट अच्छा कर दिया !!.


संत तुकाराम जी एक अच्छे संत हुये हैं । इनकी पत्नी बङे कर्कश स्वभाव की थी । और उसकी एक वजह ये भी थी कि तुकाराम जी का संसार के कार्यों में मन नहीं लगता था । इस बात को लेकर वह अक्सर झुँझलाया करती थी । एक बार की बात है कि गाँव के सब लोगों ने ईख ( गन्ना ) की खेती की । तो तुकाराम की पत्नी ने तुकाराम से कहा कि वो भी ईख कर लें । जिससे बच्चों के खाने हेतु गन्ने हो जांयेगे । भजन की मस्ती में मस्त रहने वाले तुकाराम जी ये कार्य कर नहीं पाये । और ईख बोने का समय निकल गया ।
 इस पर  उनकी पत्नी बहुत क्रोधित हुयी । गाँव में अन्य लोगों की ईख लहलहाने लगी । तब एक दिन तुकाराम जी की पत्नी ने कहा कि ईख तो तुमने की नहीं । जाओ किसी के यहाँ से कुछ गन्ने ही ले आओ । तो हम लोग गन्ने ही खा लें । तुकाराम जी चल दिये । उनकी पत्नी घर की छत से खङी खङी ये देखती रही कि देखें ये काम भी ये ठीक से करते हैं या नहीं ? तुकाराम जी एक खेत वाले के पास पहुँचे । तो उसने उन्हें आदरपूर्वक बैठा लिया । और तुकाराम जी सत्संग करने लगे । बाद में चलते समय उसने खुद ही गन्नों का एक गठ्ठर तुकाराम जी को ये कहकर दे दिया कि महाराज जी बच्चों के लिये ले जाओ । तुकाराम जी पीठ पर गन्ने लेकर आ रहे थे । तो रास्ते में गाँव के बच्चों ने एक एक कर गन्ना पीछे से खींच लिया । लेकिन तुकाराम जी ने उनसे कुछ नहीं कहा ।
तुकाराम जी की पत्नी छत से ये नजारा देखकर क्रोधित हो रही थी । घर आते आते तुकाराम के पास केवल एक ही गन्ना शेष रहा । जिसे तुकाराम की पत्नी ने अत्यन्त गुस्से से निकाला । और अत्यन्त क्रोध से ही उनकी पीठ में दे मारा । जिससे गन्ने के दो टुकङे हो गये । तुकाराम जी हँसते हुये बोले । अच्छा हुआ भाग्यवान तूने बाँट ठीक से कर दिया ।
दरिया सुमरे राम को । करम भरम सब खोय । पूरा गुरु सिर पर तपे । विघन न लागे कोय । नाम जपत कुष्ठी भला । चुइ चुइ परे जो चाम । कंचन देहि केहि काम की । जा मुख नाही नाम ।जीवित माटी हवे रहे । साई सनमुख होय । दादू पहले मर रहै । पीछे तो सब कोय । दरिया गुरु गरुवा मिला । करम किया सब रद्द । झूठा भरम छुङाय कर । पकङाया सत शब्द ।
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