09 अगस्त 2010

जीवन से मृत्यु तक 1


स्त्रियां ऋतुकाल में चार दिनों के लिये त्याज्य होती हैं । इसका कारण ये है कि प्राचीनकाल में ब्रह्मा ने वृ्त्रासुर के मारे जाने पर इन्द्र को जो ब्रह्महत्या लग गयी थी । उसका एक चौथाई भाग स्त्रियों को दे दिया था । इसलिये ऋतुकाल के आरम्भ में चार दिन स्त्रियां अपवित्र मानी गयीं हैं । स्री को ऋतुकाल के पहले दिन चान्डाली । दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी । तीसरे दिन रजकी मानना चाहिये । चौथे दिन वह शुद्ध हो जाती है । एक सप्ताह में वह पूजा के योग्य ( पूजा कर सकती है ) हो जाती है । प्रथम सप्ताह के बीच स्त्री जो गर्भधारण करती है । उसकी उत्पत्ति मतिम्लुच से होती है । वीर्य स्थापन के समय माता पिता की जैसी कल्पना होती है । वैसे ही गर्भ का जन्म होता है । युग्म तिथि वाली रात में सम्भोग करने से पुत्र और अयुग्म रात में सम्भोग करने से पुत्री का जन्म होता है । मासिक के पहले सप्ताह को छोडकर । दूसरे सप्ताह की युग्म तिथियों में सहवास करना चाहिये ।
 सामान्य अवस्था में स्त्रियों का ऋतुकाल सोलह रात का होता है । यदि चौदहवी रात में सम्भोग कर गर्भाधान किया जाय । तो उस गर्भ से गुणवान । भाग्यवान । धनवान । धर्मनिष्ठ पुत्र का जन्म होता है । लेकिन वह रात सामान्य लोगों को प्राप्त नहीं हो पाती । अक्सर स्त्री में गर्भ उत्पत्ति आठवीं रात के बीच ही हो जाती है । मासिक के पांच दिन बाद । स्त्रियों को कडवे । तीखे और सूखे भोजन को त्यागकर मधुर और सरस भोजन करना चाहिये । वहीं पुरुष पुष्प चन्दन आदि से सुवासित होकर स्वच्छ सुन्दर वस्त्र धारण करे । और शुद्ध मन से स्त्री को शय्या पर लिटाये । वीर्य स्थापित करते समय जो माहौल और भाव होगे । संतान भी वैसी ही होगी । प्रारम्भ में शुक्र (रज वीर्य ) और रक्त के संयोग से जीव पिन्ड रूप होता है और फ़िर क्रम से चन्द्रमा के समान वृद्धि करता है । शुक्र में चैतन्य बीज रूप में स्थित होता है । जब काम चित्त और शुक्र एक भाव हो जाता है । उस समय स्त्री गर्भ में जीव निश्चित रूप लेकर पूर्व अवस्था में आ जाता है । रज अधिक होने पर कन्या । और शुक्र अधिक होने पर पुत्र होता है ।
जब दोनों समान होते हैं तो संतान नपुंसक होती है । शुक्र रज पहले दिन रात में कलल । पांचवे दिन बुदबुद । चौदहवें दिन मांसरूप हो जाता है । इसके बाद वह घनीभूत हुआ मांस बीस दिन तक पिन्ड रूप बडता है । पच्चीसवें दिन उसमें शक्ति और पुष्टता आने लगती है । एक महीने में वह पंच तत्वों से युक्त हो जाता है । दूसरे महीने मे त्वचा और मेदा । तीसरे मांस में अस्थि और मज्जा । चौथे महीने में केश उंगली । पांचवे महीने में कान नाक वक्षस्थल । छठे महीने में कन्ठ रन्ध्र उदर । सातवें महीने में गुह्य भाग । आठवें महीने में सब अंग प्रत्यंग से पूर्ण हो जाता है । आठवें मास में जीव गर्भ में बार बार चलने लगता है । नवें महीने में गर्भ का ओजगुण पूर्ण होता है । गर्भवास समय बीत जाने पर उसका जन्म होता है ।
जीव का पंच भौतिक शरीर मज्जा । अस्थि । शुक्र । मांस । रोम । रक्त इन छह कोशों से बना पिन्ड है । प्रसव के समय । प्रसवकालीन विशेष वायु से प्रभावित । पीडा से बैचेन । माता की सुष्मणा से मिलती शक्ति से पुष्ट वह जीव गर्भ से शीघ्र निकलने को आतुर होता है । प्रथ्वी । हवि । जल । भोक्ता । वायु । आकाश इन छह भूतों से पीडित जीव स्नायु तंत्रिकाओं से बंधा रहता है । ये ही मूलभूत तत्व हैं । ये शरीर में फ़ैली सात नाडियों के बीच में रहते हैं । त्वचा अस्थि रोम नाडी मांस ये प्रथ्वी तत्व से आते हैं । लार मूत्र शुक्र मज्जा रक्त ये जल तत्व से आते हैं । भूख प्यास नींद आलस्य कान्ति ये अग्नि तत्व से आते हैं । राग द्वेश लज्जा मोह भय ये वायु तत्व से आते हैं । शरीर की गति चलना बैठना फ़ैलना सिकोडना बोलना ये भी वायु तत्व से हैं । शब्द चिंता गाम्भीर्य सुनना आदि आकाश तत्व से हैं । पांच कर्मेंन्द्रिया । पांच ग्यानेन्द्रिया होती हैं । इडा । पिंगला । सुष्मणा । गान्धारी । गजजिह्या । पूषा । यषा । अलम्बुषा । कुहू । शंखिनी । ये दस प्रधान नाडियां शरीर के मध्य स्थित रहती हैं । प्राण अपान समान उदान व्यान नाग कूर्म कृकर देवदत्त धनज्जय ये दस वायु प्राणी के शरीर में स्थित रहते हैं । खाया हुआ अन्न शरीर को पुष्ट करता है । प्राणवायु ही अन्न को शरीर तथा उसकी संधियों में पहुंचाता है । भोजन रूप में लिया गया आहार वायु के द्वारा दो रूपों में विभक्त कर दिया जाता है । प्राणवायु गुदाभाग में प्रविष्ट होकर अन्न और जल को अलग अलग कर देता है । प्राणवायु ही अग्नि के ऊपर जल को और जल के ऊपर अन्न को पहुंचाकर स्वयं अग्नि के नीचे रहते हुये अग्नि को धीरे धीरे उद्दीप्त करता रहता है । वायु से उद्दीप्त किया हुआ अग्नि अन्न के रस भाग को अलग और शुष्क भाग को अलग कर देता है । यही शुष्क भाग बारह प्रकार के मलों के रूप में शरीर से बाहर आता है । कान नेत्र नाक जीभ दांत नाभि गुदा नाखून ये सब मल के आश्रय हैं । विष्ठा मूत्र शुक्र पसीना आदि रूप से ये मल अनन्त प्रकार के हैं । क्रमशः
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