सुभाष रजत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सुभाष रजत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

05 जून 2011

गुरु तो मिलता नहीं.. सतगुरु मिल जाता है

नमस्ते राजीव जी ! मैं सुभाष । मेरे से बिना पूछे ही रजत ने आपको ई-मेल कर दिया । मैंने उसको ई-मेल करने को नहीं कहा था । सिर्फ़ किस्सा ही सुनाया था । खैर जो भी हुआ । अच्छा ही हुआ । नकली सतगुरु की पोल खोलनी ही चाहिये । अब मैं वहाँ का नाम पता क्या लिखूँ ?
मेरे दोस्त ने जो मेरे को बताया । उन लोगों के बारे में । दीक्षा का नाटक है । सिर्फ़ जो वो टेकनीक इस्तेमाल करते हैं । दीक्षा के नाम पर । उसका पता लगने पर तो कोई भी सतगुरु का भेस धारण कर सकता है । मैं आपकी बात समझता हूँ कि फ़र्जी नाम काम नहीं करता । मैं तो आपके साथ और आपके ब्लाग के जरिये धर्म के नाम पर चल रही इस गहरी सामाजिक समस्या के प्रति लिख रहा हूँ ।
मैंने आपका आज का लेख पढा । बहुत ठीक लगा । आपने कृष्ण का उदाहरण देकर समझाया । बहुत अच्छा लगा । राजीव जी ! आप 1 बात समझ लीजिये । मैं आपकी बात का विरोध नहीं कर रहा । अगर कभी किया हो । तो बताईये कब ? मैं तो आपको वहाँ का आँखो देखा हाल बता रहा हूँ ।

ताकि मेरे देशवासी इस पाखंड को पहचान सकें । जो आजकल फ़ैला हुआ है । अब आप कृष्ण की ही बात ले लीजिये । वो सतगुरु कृष्ण को परमात्मा बता रहा था । हमेशा गीता पढने को कहता । उनका चेला कृष्ण को खास महत्व नहीं देता था । कहता था.. ये तो कालपुरुष है । इसकी बात नहीं माननी । अब यहाँ पर बात उन दो पाखंडियो की चल रही है । आप उत्तेजित मत होना । मैं तो आपको सहयोग दे रहा हूँ । दूसरे पाठक भाई भी कुछ न कुछ जानेगे । मेरे दोस्त की बहन ने भी उस सतगुरु से दीक्षा ली है । जबसे दीक्षा ली है । तब से बेचारी बीमार है । जिस दिन मेरे दोस्त को दीक्षा मिली । उससे 1 रात पहले सतगुरु जी ने सतसंग किया ( आपके वाला फ़ाइनल सतसंग )  फ़ायदा तो पता नहीं । उस दिन ही दोस्त के घर कलेश हो गया । वैसे अक्सर उनके घर शांति ही रहती है । तो यहाँ

पर बात नकली सतगुरु और चन्डू चेलों की चल रही है । आप इसको अपने मन से न लगायें । आप तो खुद सत्यकीखोज कर रहे हैं । हम तो आपके साथ चलने वालो में से हैं ।

************
नमस्ते राजीव जी ! मेरे भेजे लेख पर आपकी प्रतिक्रिया ठीक थी । वैसे मैंने इतने जल्दी जवाब नहीं माँगे थे । मैंने तो पहले ही कहा था कि हम सबने तो आपको अपना मार्गदर्शक चुना है । तभी तो जब सुभाष ने हमको ये सतगुरु जी.. हा हा हा.. वाला किस्सा सुनाया । तो हमने कहीं और बात नहीं की । सीधा आपको ई-मेल किया । आपके ब्लाग के जरिये कुछ और लोगों की शंका भी दूर होगी । जो बेचारे गुरु की तलाश में हैं । लेकिन गुरु तो कोई मिलता नहीं । उल्टा सतगुरु मिल जाता है.. हा हा हा... । वैसे आपने जवाब देने में उत्तेजना दिखाई ।
माफ़ करना राजीव जी ! ये बातें कहीं आपकी मंडली । या आप पर खुद । या सतगुरु जी.. से मैच तो नहीं कर गयी ? लेकिन मैं तो आपसे कभी मिला नहीं । और न ही आपके सतगुरु जी से । वैसे अगर मेरे मुँह से कोई सच्ची कडवी बात ? निकल गयी हो । तो क्षमा करें । आप खुद कहते हो कि आप शुरु से ही विरोधी स्वभाव के रहे हो ।

विरोधी स्वभाव के लोग समाज में और भी हैं । मैंने उस चन्डू चेले की इस बात को इंकार नही किया था कि मानव जन्म 84 लाख भोगकर मिलता है । मैंने तो उस गुरु चेला का आँखों देखा हाल बताया था । सतगुरु कुछ और कहता है । और चेला कुछ और कहता है । अब इसको क्या समझें कि चेला सतगुरु से भी अधिक ग्यानी है ? सतगुरु जी बेचारे नालायक हैं । वैसे इस हिसाब से तो वो वाले सतगुरु जी हा हा हा नालायक ही है । पता नहीं ये बात उनके चन्डू चेले को नज़र क्युँ नहीं आयी । लगता है । सब अक्ल के अन्धे हैं.. वहाँ पर । आपका ब्लाग जन कल्याण के लिये है । इसलिये आप बात को जलेबी की तरह गोल करने की कोशिश न किया करें । रजत राजपुरा से ।

********
अथातो प्रथम जिग्यासा..यानी सबसे पहली जिग्यासा जब मानव के मन में उठी । वह यही थी कि - मैं हूँ । यह बात ठीक है । समझ में आती है । नजर भी आती है । यानी मैं शरीर मन आदि को देखता समझता हुआ खुद को अनुभव करता हूँ ।
पर मैं क्यों हूँ ? और मैं कौन हूँ ? ये इंसान की जिंदगी के इतिहास में सृष्टि के आदि से ही एकमात्र अहम और अभी

तक अनसुलझा ( पर सभी के लिये नहीं ) प्रश्न है । और ये प्रश्न हमेशा अनसुलझा ही रहेगा । क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर मिलते ही ये मिथ्या सृष्टि खत्म हो जाती है । बृह्म सत्य जगत मिथ्या ।
इसी एक प्रश्न के कारण तमाम शास्त्र वेद पुराणों धर्मगृंथों का निर्माण होता चला गया । होता रहेगा । और हमेशा ही उसमें दूसरे पक्ष का बेहद महत्व रहा । एक बात कहने वाला । दूसरा उस बात के आधार पर तर्क करने वाला । शास्त्रार्थ की इसी शास्त्रीय परम्परा से हमें सार ग्यान मिला । और थोथा हटाने में मदद मिली । सार सार को गहि रहे थोथा देय उङाय ।
पर मुश्किल ( ब्लाग पर ) ये है कि ब्लाग पर ये फ़ेस टू फ़ेस  ( जैसा कि होना चाहिये ) न होकर लिखित रूप में होता है । और तब मेरी एक बात से आपके दिमाग में सेकङों प्रश्न पैदा हो जाते हैं । और आपके कुछ प्रश्नों से मेरे मन में हजारों पहलूओं ( समझने की कोशिश करें । एक ही प्रश्न का उत्तर हजार तरह से बताया जा सकता है ) से उत्तर बनता है ।
इस बात को इस तरह समझो । आपके लेपटाप के सामने खङा तीन साल का बच्चा आपसे प्रश्न करे । ये कंप्यूटर क्या है ? और ये इंटरनेट क्या है ? तो इस प्रश्न के उत्तर से रिलेटिब हजार

पहलूओं से उत्तर आपके दिमाग में उभरने लगेगा । अब आप सोचोगे कि उत्तर कैसे दिया जाय कि बच्चा भी संतुष्ट हो जाय । उत्तर सही हो । और लाभदायक भी हो । जो बच्चे के ग्यान में वृद्धि करे ।
जबकि आप बखूबी जानते हैं । जो उत्तर आप देंगे । वह अधिकतम भी बेसिक ही होगा । ( क्योंकि आपके दिमाग में भरी सम्बन्धित सभी जानकारी आप किसी भी हालत में उस वक्त ( आयु के कारण ) उसे नहीं समझा सकते ) और आप किसी भी युक्ति से अपने दिमाग में तैरता ( सही और पूर्ण ) उत्तर बालक के दिमाग को एकदम ट्रांसफ़र नहीं कर सकते । तो निश्चित ही आपका वह परफ़ेक्ट उत्तर हरगिज नहीं होगा ।
अब आप मेरा रियल उद्देश्य समझिये । जो कि एक लेखक के तौर पर । एक ग्यानी के तौर पर । एक साधु सन्त के तौर पर स्थापित होना नहीं है । बल्कि..आपकी सोयी हुयी आत्मा को झिझोंङना है । ध्यान रहे । आप सभी का प्रश्न एकदम निजी और सार्वजनिक महत्व का भी हो सकता है । पर मेरा उत्तर हमेशा ही सर्वजन हिताय वाला होगा । और इसके लिये विभिन्न प्रयोग करने ही होते हैं । आप आज जितनी भी सुविधा वाली चीजें यूज करते हो । ये प्रयोग के कई धरातलों से होकर यहाँ तक पहुँची है । कुछ समझे सर जी !
आप लोग बङिया काम करते हो । बङिया लिखते हो । बङिया विचारों वाले हो । आल इज वैल ।
इसलिये डांट माइंड ..डांट वरी.. वी हैप्पी । थैंक्स ।

*** अब प्लीज ! इसमें कोई व्यंग्य मत समझना । और न ही बातों की जलेबी ।