19 जून 2016

दिव्य साधना - खेचरी मुद्रा

मध्यजिव्हे स्फारितास्ये मध्ये निक्षिप्य चेतनाम ।
होच्चारं मनसा कुर्वस्ततः शान्ते प्रलियते । ( धारणा - 57 श्लोक 80 )
सामान्य लगने वाली इस खेचरी मुद्रा साधना का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि इससे अनेकों शारीरिक, मानसिक, सांसारिक एवं आध्यात्मिक लाभ उपलब्ध होने का शास्त्रों में वर्णन है । लेकिन इस मुद्रा के साथ साथ भाव संवेदनाओं की अनुभूति अधिकतम गहरी होनी चाहिए ।
यह मुद्रा लगभग बारह वर्ष में सिद्ध होती है । इसका अभ्यास किसी सक्षम गुरू के मार्गदर्शन एवं अनुशासन में ही करना चाहिए । स्वयं किसी प्रकार की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए । साधना के समय ब्रह्मचर्य के पालन से साधना की सफलता की संभावना प्रबल होती है । सफलता हेतु धैर्य अति आवश्यक है । 
खेचरी मुद्रा साधना की सफलता के परिणाम स्वरूप मुख्य नाङियों के अवरूद्ध मार्ग खुल जाते हैं । साधक ब्रह्मरन्ध्र से स्त्रावित सुधा का पान तथा समाधि स्थिति का अनुभव करता है । भूख, प्यास, निद्रा, आलस्य आदि आवेगों से छुटकारा पाकर दीर्घायु होता है ।
तस्मार्त्सवप्रयत्नेन प्रबोधपितुमीश्वरीम । ब्रह्मरन्ध्रमुखे सुप्तां मुद्राभ्यासं समाचरेत ।
( शिवसंहिता चतुर्थ पटल श्लोक - 23 )
ब्रह्मरन्ध्र के मुख में रास्ता रोके सोती पड़ी कुण्डलिनी को जागृत करने के लिए सर्व प्रकार से प्रयत्न करना चाहिए । और खेचरी अभ्यास करना चाहिए ।
अमृतास्वादनं पश्चाज्जिव्हाग्रं संप्रवर्तते । रोमांचश्च तथानन्दः प्रकर्षेणोपजायते । 
योग रसायनम । 255
जिव्हा ( जीभ ) में अमृत सा स्वाद अनुभव होता है । रोमांच तथा आनन्द उत्पन्न होता है ।
प्रथमं लवण पश्चात क्षारं क्षीरोपमं ततः । द्राक्षारससमं पश्चात सुधासारमयं ततः । योग रसायनम ।
उस ( रस ) का स्वाद पहले लवण ( नमक ) जैसा, फिर क्षार जैसा, फिर दूध जैसा, फिर द्राक्षारस ( अंगूर ) जैसा और तदुपरान्त अनुपम सुधा ( अमृत ) रस सा अनुभव होता है ।
आदौ लवण क्षारं च ततस्तिक्तं कषायकम । 
नवनीतं घृतं क्षीरं दधितक्रमधूनि च ।
द्राक्षारसं च पीयूषं जायते रसनोदकम ।
( घेरण्ड संहिता तृतीयोपदेश श्लोक - 31-32 )
जिव्हा को क्रमशः नमक, क्षार, तिक्त, कषाय, नवनीत, घृत, दूध, दही, द्राक्षारस, पीयूष, जल जैसे रसों की अनुभूति होती है ।
अमृतास्वादनाछेहो योगिनो दिव्यतामियात । जरारोगविनिर्मुक्तश्चिर जीवति भूतले । योग रसायनम
अमृत जैसा स्वाद मिलने पर योगी के शरीर में दिव्यता आ जाती है । वह रोग और वृद्धावस्था से मुक्त होकर दीर्घकाल तक जीवित रहता है ।
तालु मूलोर्ध्वभागे महज्ज्योति विद्यतें तर्द्दशनाद अणिमादि सिद्धिः । योग सूत्र
तालु के ऊर्ध्व भाग में महाज्योति स्थित है । उसके दर्शन से अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त होती है ।
ब्रह्मरंध्रे मनोदत्वा क्षणार्द्धं यदि तिष्ठति । सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम ।
अस्मिन लीनं मनो यस्य स योगी मयि लीयते ।
अणिमादिगुणान भुक्तवा स्वेच्छया पुरुषोत्तमः ।
एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारेऽस्मिन वल्लभो मे भवेत्सः ।
पापान जित्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्वा तारयत्यदभूतं वै ।
( शिवसंहिता पंचम पटल श्लोक - 173-174-175 )
- ब्रह्मरन्ध्र में मन लगाकर खेचरी साधना करने वाला योगी आत्मनिष्ठ हो जाता है । पाप मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है । इसमें मनोलय होने पर साधक ब्रह्मलीन होकर अणिमा आदि सिद्धियों का अधिकारी बनता है ।
न च मूर्च्छा क्षुधा तृष्णा नैवालस्यं प्रजायते । न च रोगो जरा मृत्युर्देवदेहः स जायते ।
( घेरण्ड संहिता तृतीय उपदेश श्लोक-28 )
खेचरी मुद्रा की निष्णात देव देह को मूर्च्छा, क्षुधा ( भूख ) तृष्णा ( प्यास ) आलस्य, रोग, जरा ( वृद्धावस्था ) मृत्यु का भय नहीं रहता ।
लावण्यं च भवेद गात्रे समाधिर्जायते ध्रुवम । कपालवक्त्र संयोगे रसना रसमाप्नुयात । 
( घेरण्ड संहिता तृतीय उपदेश श्लोक-30 )
शरीर सौंदर्यवान बनता है । समाधि का आनन्द मिलता है । रसों की अनुभूति होती है ।
ज्रामृत्युगदध्नो यः खेचरी वेत्ति भूतले । ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव तदभ्यास प्रयोगतः । 
तं मुने सर्वभावेन गुरु गत्वा समाश्रयेत - योगकुन्डल्युपनिषद
ग्रन्थ से, अर्थ से और अभ्यास प्रयोग से इस जरा मृत्यु व्याधि निवारक खेचरी विद्या को जानने वाला है । उसी गुरु के पास सर्वभाव से आश्रय ग्रहण कर इस विद्या का अभ्यास करना चाहिए ।
अपने मुख को क्षमतानुसार फैलाकर जिव्हा को उलटकर उपर तालु प्रदेश मे ले जाकर स्थिर करके मुख बन्द करने से खेचरी मुद्रा बनती है ।
इस मुद्रा मे चित्त को स्थिर करके केवल अनच्क - अर्थात स्वर रहित ( केवल मानसिक रूप से ) ‘हकार’ का उच्चारण परम शान्ति प्रदायक होता है । तथा निरंतर अभ्यास से साधक का शान्त स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है ।
प्राण की उच्छ्वास दशा में स्वाभाविक रूप से ‘ह’ का उच्चारण तथा निश्वास दशा मे ‘सः’ का उच्चारण निर्बाध रूप से अविरत होता रहता है ।
अर्थात यह प्राण श्वास लेते हुए ‘हकार’ के साथ शरीर में प्रविष्ट होता है । तथा ‘सकार’ के साथ शरीर से बाहर निकल जाता है ।
इस प्रकार प्राण की श्वास प्रश्वास प्रक्रिया में ‘हं सः सो हं’ इस अजपा गायत्री का स्वाभाविक रूप से दिन रात अनवरत जप चलता रहता है ।
किन्तु खेचरी साधना में जिव्हा के तालु प्रदेश में ही स्थिर रहने से ‘सकार’ का बहिर्गमन अवरुद्ध हो जाता है । जिसके परिणाम स्वरूप ‘सकार’ का उच्चारण भी नही होता ।
अतः खेचरी मुद्रा की इस अवस्था में केवल स्वर रहित ‘हकार’ के उच्चारण का ही विकल्प होता है ।
खेचरी साधना की इस अवस्था में साधक को दृढता पूर्वक भ्रूमध्य में अपनी दृष्टि को स्थिर रखना पङता है ।
कपालकुहरे जिव्हा प्रविष्टा विपरितगा ।
भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी । विवेकमार्तण्ड
- जब जिव्हा को उलटकर तालु प्रदेश में विद्यमान कपाल कुहर में प्रविष्ट करके दृष्टि को भ्रूमध्य मे स्थिर कर दिया जाता है । तो वह खेचरी मुद्रा कहलाती है ।
खेचरी मुद्रा की साधना के लिए साधक जिव्हा को लम्बी करके ‘काकं चंचु’ तक पहुँचाने के लिए जिव्हा पर काली मिर्च, शहद, घृत का लेपन करके उसे थन की तरह दुहते, खीचते हैं । और लम्बी करने का प्रयत्न करते हैं ।
खेचरी मुद्रा का भावपक्ष ही वस्तुतः उस प्रक्रिया का प्राण है । मस्तिष्क मध्य को - ब्रह्मरंध्र अवस्थित सहस्रार को अमृत कलश माना गया है । और वहाँ से सोमरस स्रवित होते रहने का उल्लेख है ।
जिव्हा को जितना सरलता पूर्वक पीछे तालु से सटाकर जितना पीछे ले जा सकना सम्भव हो । उतना पीछे ले जाना चाहिए ।
प्रारंभ मे ‘काक चंचु’ से बिलकुल न सटकर कुछ दूरी पर रह जाए । तो भी धर्य के साथ निरंतर अभ्यास से धीरे धीरे जिव्हा काकचंचु तक पहुंचने लगती है ।
तालु और जिव्हा को इस प्रकार सटाने के उपरान्त भ्रूमध्य मे दृष्टि स्थिर करके यह ध्यान किया जाना चाहिए कि तालु छिद्र से निरंतर सोम अमृत का सूक्ष्म स्राव टपकता है । और जिव्हा इन्द्रिय के गहन अन्तराल में रहने वाली रस तन्मात्रा द्वारा उसका पान किया जा रहा है ।
इसी संवेदना को अमृतपान की अनुभूति कहते हैं । प्रत्यक्षतः कोई मीठी वस्तु खाने आदि जैसा कोई स्वाद तो नहीं आता । परन्तु आनन्दित करने वाले कई प्रकार के दिव्य रसास्वादन उस अवसर पर हो सकते हैं । यही आनन्द और उल्लास की अनुभूति खेचरी मुद्रा की मूल उपलब्धि है ।
तालुस्था त्वं सदाधारा विंदुस्था बिंदुमालिनी । मूले कुण्डलीशक्तिर्व्यापिनी केशमूलगा । 
देवीभागवत पुराण
- अमृतधारा सोम स्राविनी खेचरी रूप तालु में, भ्रूमध्य भाग आज्ञाचक्र में बिन्दु माला और मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी बनकर आप ही निवास करती है । और प्रत्येक रोमकूप में भी आप ही विद्यमान है ।
ये खेचरी मुद्रा विज्ञानं भैरव में है । जो शिव शक्ति को बताते है । 
साभार - जीरो सूत्र
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