31 अक्तूबर 2011

समाधि का अर्थ 1

योगसूत्र - वितर्कविचारानदास्मितानुगमात्सप्रज्ञातः । 17 
सप्रज्ञात समाधि वह समाधि है । जो वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता के भाव से युक्‍त होती है ।
विरामप्रत्ययाथ्यासपूर्व: संस्कारशेषोऽन्य : । 18
असंप्रज्ञात समाधि में सारी मानसिक क्रिया की समाप्ति होती है । और मन केवल अप्रकट संस्कारों को धारण किये रहता है ।
भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम । 19
विदेहियो और प्रकृति लयों को असंप्रज्ञात समाधि उपलब्ध होती है । क्योंकि अपने पिछले जम्प में उन्होंने अपने शरीरों के साथ तादात्थ बनाना समाप्त कर दिया था । वे फिर जन्म लेते हैं । क्योंकि इच्छा के बीज बने रहते हैं ।
श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिपूर्वकइतरेषाम । 20
दूसरे जो असंप्रज्ञात समाधि को उपलब्ध होते हैं । वे श्रद्धा, वीर्य ( प्रयत्न ) स्मृति, समाधि ( एकापता ) और प्रज्ञा ( विवेक ) के द्वारा उपलब्ध होते हैं ।
पतंजलि सबसे बड़े वैज्ञानिक हैं अंतर्जगत के । उनकी पहुंच 1 वैज्ञानिक मन की है । वे कोई कवि नहीं है । और इस ढंग से वे बहुत बिरले हैं । क्योंकि जो लोग अंतर्जगत में प्रवेश करते हैं । प्राय: सदा कवि ही होते हैं । जो बहिर्जगत में प्रवेश करते हैं । अक्सर हमेशा वैज्ञानिक होते हैं । पतंजलि 1 दुर्लभ पुष्‍प हैं । उनके पास वैज्ञानिक मस्तिष्क है । लेकिन उनकी यात्रा भीतरी है । इसीलिए वे पहले और अंतिम वचन बन गये । वे ही आरंभ हैं । और वे ही अंत हैं । 5000  वर्षों में कोई उनसे ज्यादा उन्नत नहीं हो सका । लगता है कि उनसे ज्यादा उन्नत हुआ ही नहीं जा सकता । वे अंतिम वचन ही रहेंगे । क्योंकि यह जोड़ ही असंभव है । वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना और आंतरिक जगत में प्रवेश करना करीब करीब असंभव संभावना है । वे 1 गणितज्ञ, 1 तर्क शास्त्री की भांति बात करते हैं । वे अरस्‍तु की भांति बात करते हैं । और वे हैं हेराक्लतु जैसे रहस्पदर्शी । उनके 1-1 शब्द को समझने की कोशिश करो । यह कठिन होगा । यह कठिन होगा । क्योंकि उनकी शब्दावली तर्क की । विवेचन की है । पर उनका संकेत प्रेम की ओर, मस्ती की ओर, परमात्मा की ओर है । उनकी शब्दावली उस व्यक्ति की है । जो वैज्ञानिक प्रयोगशाला में काम करता है । लेकिन उनकी प्रयोगशाला आंतरिक अस्तित्व की है । अत: उनकी शब्दावली द्वारा भ्रमित न होओ । और यह अनुभूति बनाये रहो कि वे परम काव्य के गणितज्ञ हैं । वे स्वयं 1 विरोधाभास हैं । लेकिन वे विरोधाभासी भाषा हरगिज प्रयुक्‍त नहीं करते । कर नहीं सकते । वे बड़ी मजबूत तर्कसंगत पृष्ठभूमि बनाये रहते हैं । वे विश्लेषण करते । विच्छेदन करते । पर उनका उद्देश्य संश्लेषण है । वे केवल संश्लेषण करने को ही विश्लेषण करते हैं । तो हमेशा ध्यान रखना कि ध्येय तो है परम सत्य तक पहुंचना । केवल मार्ग ही है वैज्ञानिक । इसलिए मार्ग द्वारा दिग्भ्रमित मत होना । इसलिए पतंजलि ने पश्चिमी मन को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है । पतंजलि सदैव 1 प्रभाव बने रहे हैं । जहां कहीं उनका नाम पहुंचा है । वे प्रभाव बने रहे । क्योंकि तुम उन्हें आसानी से समझ सकते हो । लेकिन उन्हें समझना ही पर्याप्त नहीं है । उन्हें समझना उतना ही आसान है । जितना कि आइंस्टीन को समझना । वे बुद्धि से बातें करते हैं । पर उनका लक्ष्य हृदय ही है । इसे तुम्हें खयाल में लेना है ।
हम 1 खतरनाक क्षेत्र में बढ़ रहे होंगे । अगर तुम भूल जाते हो कि वे 1 कवि भी हैं । तो तुम मार्ग से बहक जाओगे । तब तुम उनकी शब्दावली को, उनकी भाषा को, उनके तर्क को बहुत जड़ता से पकड़ लोगे । और तुम उनके ध्येय को भूल जाओगे । वे चाहते हैं कि तर्क के द्वारा ही तुम तर्क के पार चले जाओ । यह 1 संभावना है । तुम तर्क को इतने गहरे तौर पर खींच सकते हो कि तुम उसके पार हो जाओ । तुम तर्क द्वारा चलते हौ । तुम उसे टालते नहीं । तुम तर्क का उपयोग सीढ्री की तरह करते हो । तर्क से पार जाने के लिए । अब उनके शब्दों पर ध्यान दो । हर शब्द को विश्लेषित करना है ।
संप्रज्ञात समाधि वह समाधि है । जो वितर्क विचार आनंद और अस्मिता के भाव से युक्‍त होती है ?
वे समाधि को, उस परम सत्य को 2 चरणों में बांट देते हैं । परम सत्य बांटा नहीं जा सकता । यह तो अविभाज्य है । और वस्तुत: कोई चरण है ही नहीं । लेकिन मन को, साधक को सहायता देने के लिए ही वे पहले इसे 2 चरणों में बांट देते हैं । पहले चरण को वे नाम देते हैं - संप्रज्ञात समाधि । यह वह समाधि है । जिसमें मन अपनी शुद्धता में सुरक्षित रहता है ।
इस पहले चरण में, मन को परिष्कृत और शुद्ध होना पड़ता है । पतंजलि कहते हैं - तुम इसे एकदम से गिरा नहीं सकते । इसे गिराना असंभव है । क्योंकि अशुद्धियों की प्रवृत्ति है चिपकने की । तुम इसे केवल तभी गिरा सकते हो । जब मन बिलकुल शुद्ध होता है । इतना शुद्ध, इतना सूक्ष्म कि उसकी कोई प्रवृत्ति नहीं रहती चिपकने की ।
वे मन को गिरा देने के लिए नहीं कहते । जैसा कि झेन गुरु कहते हैं। वे तो कहते हैं यह असंभव है । और अगर तुम ऐसा कहते हो । तो तुम नासमझी की बात कह रहे हो । तुम सत्य ही कह रहे हो । पर यह संभव नहीं है । क्योंकि एक अशुद्ध मन बोझिल होता है । किसी पत्थर की भांति वह बोझ झूलता रहता है । और 1 अशुद्ध मन में इच्छाएं होती हैं - लाखों इच्छाएं जो अधूरी हैं । जो पूरी होने को ललकती रहती हैं । पूरी होने की मांग करती हैं । इसमें लाखों विचार हैं । जो अपूर्ण हैं । कैसे गिरा सकते हो तुम इसे ? अपूर्ण सदा संपूर्ण होने की चेष्टा करता है । ध्यान रखना । पतंजलि कहते हैं कि - जब कोई चीज संपूर्ण होती है । केवल तभी तुम उसे गिरा सकते हो । तुमने ध्यान दिया ? अगर तुम चित्रकार हो । और तुम चित्र बना रहे हो । तो जब तक चित्र पूरा नहीं हो जाता । तुम उसे भूल नहीं सकते । वह बना रहता है । तुम्हारे पीछे लगा रहता है । तुम ठीक से सो नहीं सकते । वह वहीं डटा है । मन में इसकी अंतर्धारा है । यह सक्रिय रहती है । और संपूर्ण होने की मांग करती है । 1 बार यह पूरी हो जाती है । तो बात खत्म हो गयी । तुम इसे भूल सकते हो ।
मन की वृत्ति है संपूर्णता की ओर जाने की । मन पूर्णतावादी है । इसलिए जो कुछ अपूर्ण रहता है वह मन पर 1 तनाव हो जाता है । पतंजलि कहते हैं कि तुम सोचने को नहीं गिरा सकते । जब तक कि सोचना इतना संपूर्ण न हो जाये कि अब इसके बारे में करने सोचने को कुछ रहे ही नहीं । तब तुम इसे सरलता से गिरा सकते हो । और भूल सकते हो । यह झेन से, हेराक्लतु से पूरी तरह विपरीत मार्ग है ।
प्रथम समाधि । जो केवल नाममात्र की समाधि है । वह है - संप्रज्ञात समाधि । सूक्ष्म और शुद्ध हुए मन वाली समाधि । द्वितीय समाधि है - असंप्रशांत समाधि । अ-मन की समाधि । किंतु पतंजलि कहते हैं कि जब मन तिरोहित हो जाता है । जब कोई विचार नहीं बच रहते । फिर भी अतीत के सूक्ष्म बीज अचेतन में संचित रहते हैं ।
चेतन मन 2 में बंटा हुआ है । प्रथम : संप्रज्ञात । शुद्ध हुई अवस्था का चित्त । बिलकुल शोधित मक्खन जैसा । इसका 1 अपना ही सौदर्य है । लेकिन यह मन मौजूद तो है । और चाहे कितना ही सुंदर हो । मन अशुद्ध है । मन कुरूप है । कितना ही शुद्ध और शांत हो जाये मन । लेकिन मन का होना मात्र अशुद्धि है । तुम विष को शुद्ध नहीं कर सकते । वह विष ही बना रहता है । उल्टे जितना ज्यादा तुम इसे शुद्ध करते हो । उतना ज्यादा यह विषमय बनता जाता है । हो सकता है । यह बहुत बहुत सुंदर लगता हो । इसके अपने रंग, अपनी रंगतें हो सकती हैं ? लेकिन यह फिर भी अशुद्ध ही होता है ।
पहले तुम इसे शुद्ध करो । फिर तुम गिरा दो । लेकिन तो भी यात्रा पूरी नहीं हुई है । क्योंकि यह सब चेतन मन में है । अचेतन का क्या करोगे तुम ? चेतन मन की तहों के एकदम पीछे ही अचेतन का फैला हुआ महादेश है । तुम्हारे सारे पिछले जन्मों के बीज अचेतन में रहते हैं ।
तो पतंजलि अचेतन को 2 में बांट देते हैं । वे सबीज समाधि को कहते है - वह समाधि । जिसमें अचेतन मौजूद है । और चेतन रूप से मन गिरा दिया गया है । यह समाधि है बीज सहित - सबीज । जब वे बीज भी जल चुके हो । तो तुम उपलब्ध होते हो संपूर्ण - निर्बीज समाधि को । बीज रहित समाधि को ।
तो चेतन 2 चरणों में बंटा है । और फिर अचेतन 2 चरणों में बंटा है । और जब निर्बीज समाधि घटती है । वह परमानंद जब कोई बीज तुम्हारे भीतर नहीं होते अंकुरित होने के लिए या विकसित होने के लिए । जो कि तुम्हें अस्तित्व में आगे की यात्राओं पर ले चलें । तो तुम तिरोहित हो जाते हो ।
इन सूत्रों में वे कहते हैं - संप्रज्ञात समाधि वह समाधि है । जो वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता के भाव से युक्त होती है ।
लेकिन यह पहला चरण है । और बहुत लोग भटक जाते हैं । वे सोचते हैं कि यही अंतिम है । क्योंकि यह इतनी शुद्ध है । तुम इतना पुलकित अनुभव करते हो । इतना आनंदित कि तुम सोचते हो कि अब पाने को और कुछ नहीं है । अगर तुम पतंजलि से पूछो । तो वे कहेंगे कि झेन की सतोरी तो पहली समाधि ही है । वह अंतिम, परम नहीं है । परम सत्य तो अभी बहुत दूर है ।
जो शब्द वे प्रयोग करते हैं । उनका ठीक से अनुवाद नहीं किया जा सकता । क्योंकि संस्कृत सर्वाधिक संपूर्ण भाषा है । कोई भाषा इसके निकट भी नहीं आ सकती । अत: मुझे तुम्हें सुस्पष्ट करना होगा । जो शब्द प्रयुक्‍त हुआ है । वह है - वितर्क । अंग्रेजी में तो इसका अनुवाद रीजनिंग किया जाता है । यह तो 1 दरिद्र अनुवाद हुआ । वितर्क को समझ लेना है । लाजिक को कहा जाता है - तर्क । और पतंजलि कहते हैं । तर्क 3 प्रकार के होते हैं । 1 को वे कहते हैं - कुतर्क । ऐसा तर्क, जो निषेध की ओर उन्‍मुख हो जाता है । सदैव नकारात्मक ढंग से सोचता है । जिसमें कि तुम अस्वीकार कर रहे हो । संदेह कर रहे हो । विनाशवादी होते हो ।
चाहे तुम कुछ भी कहो । वह आदमी जो कुतर्क में जीता है । निषेधात्मक तर्क में - सदा सोचता है । इसे अस्वीकार कैसे करें । न कैसे कहें । वह निषेध को खोजता है । वह तो हमेशा शिकायत कर रहा है । खीज रहा है । वह सदा अनुभव करता है कि कहीं कुछ गलत है । सदा ही । तुम उसे ठीक नहीं कर सकते । क्योंकि यही है उसका देखने का ढंग । अगर तुम उसे सूरज देखने के लिए कहते हो । तो वह सूरज को नहीं देखेगा । वह देखेगा सूरज के धब्बों को । वह हमेशा चीजों के ज्यादा अंधेरे पहलू को देखगा । यह है - कुतर्क । गलत तर्क । लेकिन यह तर्क की भांति जान पड़ता है ।
अंततः यह नास्तिकता की ओर ले जाता है । तब तुम ईश्वर को अस्वीकार करते हो । क्योंकि अगर तुम शुभ को देख नहीं सकते । अगर तुम जीवन के अधिक प्रकाशमय पक्ष को नहीं देख सकते । तो तुम ईश्वर को कैसे अनुभव कर सकते हो ? तब तुम केवल इनकार करते हो । तब पूरा अस्तित्व अंधेरा हो जाता है । तब हर चीज गलत होती है । और तुम अपने चारों ओर नरक निर्मित कर लेते हो । अगर हर चीज गलत है । तो तुम प्रसन्न कैसे हो सकते हो ? और यह तुम्हारा निर्माण है । और तुम हमेशा कुछ गलत खोज कर सकते हो । क्योंकि जीवन द्वैत से बना होता है ।
गुलाब की झाड़ी में सुंदर फूल होते हैं । लेकिन कांटे भी होते हैं । कुतर्क वाला आदमी कांटों की गिनती करेगा । और फिर वह इस समझ तक आ पहुंचेगा कि यह गुलाब तो भ्रामक ही होगा । यह हो नहीं सकता । बहुत सारे कांटों के बीच । लाखों काटों के बीच । 1 गुलाब कैसे बना रह सकता है ? यह असंभव है । यह संभावना ही त्याज्य हो जाती है । जरूर कोई धोखा दे रहा है ।
मुल्ला नसरुद्दीन बहुत उदास था । वह पादरी के पास गया । और बोला - क्या करूं ? मेरी फसल फिर बरबाद हो गयी है । बारिश नहीं हुई । पादरी बोला - इतने उदास मत होओ, नसरुद्दीन । जिंदगी के ज्यादा रोशन पहलू की ओर देखो । तुम खुश हो सकते हो । क्योंकि फिर भी तुम्हारे पास बहुत ज्यादा है । और हमेशा ईश्वर पर भरोसा रखो । जो दाता है । वह आकाश में उड़ते पक्षियों के लिए भी जुटा देता है । तो तुम क्यों चिंतित हो ?' नसरुद्दीन बहुत कटुता पूर्वक बोला - हां मेरे अनाज द्वारा । ईश्वर आकाश के पक्षियों का इंतजाम करता है मेरे अनाज द्वारा । वह बात नहीं समझ सकता । उसकी फसल इन पक्षियों द्वारा नष्ट हुई है । और ईश्वर उनका भरण पोषण कर रहा है । इसलिए वह कहता है - मेरी फसल बरबाद हुई है । इस प्रकार का मन हमेशा कुछ न कुछ खोज निकालेगा । और हमेशा क्षुब्ध रहेगा । चिंता छाया की भांति उसका पीछा करेगी । इसे पतंजलि कहते हैं - कुतर्क निषेधात्मक तर्क । निषेधात्मक तर्कणा ।
फिर है - तर्क सीधा तर्क । सीधा तर्क कहीं नहीं ले जाता । यह 1 चक्कर में घूम रहा है । क्योंकि इसका कोई ध्येय नहीं है । तुम तर्क और तर्क और तर्क किये चले जा सकते हो । लेकिन तुम किसी निश्चय तक नहीं पहुंचोगे । क्योंकि तर्क किसी निश्चय तक केवल तभी पहुंचता है । जब बिलकुल आरंभ से ही कोई ध्येय हो । अगर तुम 1 दिशा में बढ़ रहे हो । तब तुम कहीं पहुंचते हो । अगर तुम सब दिशाओं में बढ़ रहे हो । कभी दक्षिण में, कभी पूर्व में, कभी पश्चिम में । तो तुम ऊर्जा गंवाते हो ।
बिना ध्येय का विचार तर्क कहलाता है । निषेधात्मक रुख वाला तर्क कुतर्क कहलाता है । विधायक भूमि वाला तर्क वितर्क कहलाता है । वितर्क का अर्थ है - विशिष्ट तर्क ।
तो वितर्क प्रथम तत्व है - संप्रज्ञात समाधि का । जो व्यक्ति आंतरिक शांति पाना चाहता है । उसे वितर्क में प्रशिक्षित होना होता है - विशिष्ट तर्क । वह सदा ज्यादा प्रकाशमय पक्ष की ओर, विधायक की ओर देखता है । वह फूलों को महत्व देता है । और कांटों को भूल जाता है । ऐसा नहीं है कि कांटे नहीं हैं । लेकिन उसे उनसे कुछ लेना देना नहीं । अगर तुम फूलों से प्रेम करते हो । और फूलों को गिनते रहते हो । तो 1 क्षण आता है । जब तुम कांटों में विश्वास नहीं कर सकते । क्योंकि यह कैसे संभव है कि जहां इतने सुंदर फूल विद्यमान हों । वहीं कांटे बने रहते हों । कहीं कुछ भ्रामकता होगी ।
कुतर्क वाला व्यक्ति कांटे गिनता है । तब फूल अवास्तविक बन जाते हैं । वितर्क युक्‍त व्यक्ति फूल गिनता है । तब कांटे अवास्तविक हो जाते हैं । इसलिए पतंजलि कहते हैं कि वितर्क प्रथम तत्व है । इसके द्वारा आनंद संभव है । वितर्क द्वारा व्यक्ति को स्वर्गोपलब्धि होती है । व्यक्ति अपना ही स्वर्ग चारों ओर निर्मित कर लेता है ।
तुम्हारा दृष्टिकोण निर्णायक है । जो कुछ तुम चारों ओर पाते हो । वह तुम्हारा अपना निर्माण है - स्वर्ग या नरक । और पतंजलि कहते हैं कि तुम तर्क और बुद्धि के पार जा सकते हो । केवल विधायक तर्क के द्वारा । निषेधात्मक तर्क के द्वारा तुम कभी पार नहीं जा सकते । क्योंकि जितना अधिक तुम नकारते हो । उतना ज्यादा तुम उदास पाते हो चीजों को । अगर तुम " नहीं " कहते हो । और त्यागते हो । धीरे धीरे तुम भीतर 1 सतत नकार बन जाते हो । 1 अंधियारी रात । तो फूल नहीं । केवल कांटे ही तुममें विकसित हो सकते हैं । तुम 1 मरुस्थल होते हो ।
जब तुम हां कहते हो । तब तुम ज्यादा और ज्यादा चीजें पाते हो । हां कहने के लिए । जब तुम कहते हो - हां । तुम ही कहने वाले बन जाते हो । जीवन का स्वीकार हुआ । और तुम्हारी हां द्वारा तुम वह सब आत्मसात कर लेते हो । जो शुभ है । सुंदर है । वह सब जो सत्य है । हां - तुम्हारे भीतर 1 द्वार बन जाता है भगवत्ता के प्रवेश करने का । नहीं - 1 बंद द्वार बनता है । तुम्हारे बंद द्वार सहित तुम 1 नरक होते हो । तुम्हारे खुले द्वार सहित । सारे खुले द्वार दरवाजों सहित । अस्तित्व तुम्हारे भीतर बह आता है । तुम ताजे, यौवनमय, जीवंत होते हो । तुम 1 फूल बन जाते हो ।
वितर्क, विचार, आनंद पतंजलि कहते हैं - अगर तुम वितर्क के साथ मेल बनाते हो विधायक तर्क के साथ । तब तुम 1 विचारक हो सकते हो । उससे पहले हरगिज नहीं । तब विचारणा उदित होती है । उनके लिए विचारणा का बिलकुल अलग ही अर्थ है । तुम भी सोचते हो कि तुम विचार करते हो । पतंजलि सहमत नहीं होंगे । वे कहते हैं तुम्हारे पास विचार हैं । पर विचारणा नहीं । इसलिए मैं कहता हूं कि - कठिन है उन्हें अनुवादित करना ।
वे कहते हैं - तुम्हारे पास विचार हैं । भागते दौड़ते विचार हैं भीड़ की तरह । लेकिन कोई विचारणा नहीं है । तुम्हारे 2 विचारों के बीच कोई अंतर्धारा नहीं है । वे उखड़ी हुई चीजें हैं । कोई अंतर्व्यवस्था नहीं है । तुम्हारा सोचना 1 अस्त व्यस्तता है । यह सुव्यवस्था नहीं है । इसमें कोई आंतरिक अनुशासन नहीं है ।
जैसे 1 माला होती है । वहां मनके हैं । और एक दूसरे से बंधे हैं अदृश्य धागे द्वारा । जो उनमें से गुजर रहा है । विचार मनके हैं । विचारणा धागा है । तुम्हारे पास मनके हैं बहुत सारे । वस्तुत: जितने तुम्हें चाहिए उससे ज्यादा । लेकिन कोई आंतरिक धागा । कोई अंतर्सूत्र उनमें व्याप्त नहीं है । उस अंतर्सूत्र को पतंजलि कहते हैं - विचार । तुम्हारे पास विचार हैं । पर कोई विचारणा नहीं । और अगर ऐसा ही होता चला जाता है । तो तुम पागल हो जाओगे । पागल आदमी वह आदमी है । जिसके पास लाखों विचार हैं । और विचारणा नहीं । और संप्रज्ञात समाधि वह अवस्था है । जिनमें विचार नहीं होते हैं । लेकिन विचारणा समग्र होती है । यह भेद समझ लेना ।
पहली तो बात यह कि तुम्हारे विचार तुम्हारे नहीं हैं । तुमने उन्हें इकट्ठा कर लिया है । जैसे अंधेरे कमरे में, कभी रोशनी की किरण छत से चली आती है । और तुम धूल के असंख्य कणों को उस किरण में तैरते हुए देख लेते हो । जब मैं तुममें झांकता हूं । मैं वही घटना देखता हूं -  धूल के लाखों कण । तुम उन्हें विचार कहते हो । वे तुम्हारे बाहर भीतर चल रहे हैं । वे 1 सिर से दूसरे में प्रवेश करते हैं । और वे चलते जाते हैं । उनकी अपनी जिंदगी है ।
विचार 1 वस्तु है । उसका अपना स्वयं का अस्तित्व होता है । जब कोई आदमी मरता है । तो उसके सारे पागल विचार तुरंत निकल भागते हैं । और वे कहीं न कहीं शरण ढूंढना शुरू कर देते हैं । फौरन वे उनमें प्रवेश कर जाते हैं । जो आसपास होते हैं । वे कीटाणुओं की भांति होते हैं । उनका अपना जीवन है । तुम जब जीवित भी होते हो । तब तुम अपने चारों ओर विचार बिखेरते चले जाते हो । जब तुम बोलते हो । तब निस्संदेह अपने विचार तुम दूसरों में फेंकते हो । किंतु जब तुम मौन होते हो । तब भी तुम चारों ओर विचार फेंक रहे होते हो । वे तुम्हारे नहीं होते । यह तो है पहली बात ।
विधायक तर्क वाला व्यक्ति उन सारे विचारों को निकाल फेंकेगा । जो उसके अपने न हों । वे प्रामाणिक नहीं होते हैं । उन्हें उसने स्वयं अनुभव द्वारा नहीं पाया होता । उसने दूसरों द्वारा संचित कर लिया है । वे उधार हैं । वे मैले हैं । वे बहुत हाथों और सिरों में रहे हैं । सोचने  विचारने वाला व्यक्ति उधार नहीं जीयेगा । वह अपने स्वयं के ताजे विचार पाना चाहेगा । और अगर तुम विधायक हो । और अगर तुम सौंदर्य को, सत्य को, शुभ को, फूलों को देखते हो । अगर तुम सबसे अंधियारी रात में भी देखने के योग्य हो जाते हो कि सबेरा निकट आ रहा है । तो तुम विचारने के योग्य हो जाओगे ।
तब तुम स्वयं अपने विचार निर्मित कर सकते हो । और वह विचार जो तुम्हारे द्वारा निर्मित हो जाता है । वास्तव में शक्तिशाली होता है । उसकी स्वयं की अपनी शक्ति होती है । ये विचार जो तुमने उधार ले लिये हैं । करीब करीब मुर्दा हैं । क्योंकि वे यात्रा करते रहे हैं । लाखों वर्षों से यात्रा कर रहे हैं । उनका स्रोत खो चुका है । अपने स्रोत के साथ वे सारा संपर्क खो चुके हैं । वे तो बस चारों ओर तैरते धूलकणों की भांति हैं । तुम उन्हें पकड़ लेते हो । कई बार तुम उनके प्रति जाग्रत भी हो जाते हो । लेकिन तुम्हारी जागृति ऐसी है कि चीजों को आरपार देख नहीं सकती ।
कई बार तुम बैठे हुए होते हो । अचानक तुम उदास हो जाते हो बिना किसी भी कारण के । तुम कारण ढूंढ नहीं सकते । तुम चारों ओर देखते हो । और कारण कोई होता नहीं । कुछ नहीं है वहां । कुछ घटित नहीं हुआ । तुम बिलकुल वैसे ही हो । अचानक 1 उदासी तुम्हें जकड़ लेती है । 1 विचार गुजर रहा है । तुम तो बस रास्ते में हो । यह 1 दुर्घटना है । विचार 1 बादल की भांति गुजर रहा था ।  1 उदास विचार किसी के द्वारा छोड़ा हुआ । यह 1 दुर्घटना है कि तुम पक्क में आ गये हो । कई बार कोई विचार अड़ा रहता है । तुम नहीं जानते कि तुम क्यों इसके बारे में सोचते चले जाते हो । यह बेतुका दिखाई पड़ता है । यह किसी काम का नहीं जान पड़ता । लेकिन तुम कुछ नहीं कर सकते । यह द्वार खटखटाये चला जाता है । यह कहता है - मुझे सोचो । 1 विचार द्वार पर प्रतीक्षा कर रहा है - खटखटाता हुआ । यह कहता है - स्थान दो । मैं भीतर आना चाहूंगा । प्रत्येक विचार का अपना स्वयं का जीवन है । यह चलता रहता है । और इसके पास ज्यादा शक्ति है । और तुम बहुत कमजोर हो । क्योंकि तुम बहुत बेखबर हो । अत: तुम विचारों द्वारा चलाये जाते हो । तुम्हारा सारा जीवन ऐसी दुर्घटनाओं से बना है । तुम लोगों से मिलते हो । और तुम्हारी जिंदगी का सारा ढांचा ढर्रा बदल जाता है ।
कुछ तुममें प्रवेश करता है । फिर तुम वशीभूत हो जाते हो । और तुम भूल जाते हो कि तुम कहां जा रहे थे । तुम अपनी दिशा बदल देते हो । तुम इस विचार के पीछे हो लेते हो । यह 1 दुर्घटना ही है । तुम बच्चों की भांति हो । पतंजलि कहते हैं कि - यह विचारणा नहीं है । यह विचारणा की अनुपस्थिति वाली अवस्था है । यह विचारणा नहीं है । तुम भीड़ हो । तुम्हारे पास, तुम्हारे भीतर कोई केंद्र नहीं है । जो सोच सके । जब कोई वितर्क के अनुशासन में बढ़ता है - सम्यक तर्क में । तब वह धीरे धीरे सोचने के योग्य बनता है । सोचना 1 क्षमता है । विचार क्षमता नहीं है । विचार दूसरों से सीखे जा सकते हैं । विचारणा कभी नहीं । विचारणा तुम्हें स्वयं ही सीखनी होती है ।
और यही है भेद पुराने भारतीय विद्यापीठों और आधुनिक विश्वविद्यालयों के बीच । आधुनिक विश्वविद्यालयों में तुम विचारों को जुटा रहे हो । प्राचीन विद्यालयों में, शान विद्यालयों में वे सोचना विचारना सिखाते रहे थे । न कि विचार ।
विचारशीलता तुम्हारे आंतरिक अस्तित्व की गुणवत्ता है । विचारशीलता का अर्थ क्या है ? इसका अर्थ है । तुम्हारी चेतना को बनाये रखना । समस्या से साक्षात्कार करने को, सजग और जागरूक बने रहना । समस्या वहां मौजूद है । तुम अपनी समग्र जागरूकता के साथ उसका सामना करो । और तब 1 उत्तर उठ खड़ा होता है - 1 प्रत्युत्तर । यह है विचारणा ।
1 प्रश्न सामने रखा जाता है । और तुम्हारे पास 1 बना बनाया उत्तर होता है । इससे पहले कि तुम इसके बारे में सोचो भी । उत्तर आ पहुंचता है । कोई कहता है - क्या ईश्वर है ? उसने अभी यह कहा भी न हो । और तुम कह देते हो - हां । तुम अपना निर्जीव सिर 'हां' में हिला देते हो । तुम कह देते हो - हां ईश्वर है ।
क्या यह तुम्हारा विचार है ? क्या तुमने बिलकुल अभी समस्‍या के बारे में सोचा है । या तुम अपनी स्मृति में कोई बना बनाया उत्तर ढो रहे हो ?  किसी ने तुम्हें इसे दे दिया है - तुम्हारे माता पिता ने । तुम्हारे शिक्षकों ने । तुम्हारे समाज ने । किसी ने इसे तुम्हें दे दिया है । और तुम इसे कीमती खजाने की तरह लिये चलते हो । और यह उत्तर उसी स्मृति से आता है । विचारशील व्यक्ति । हर बार जब समस्या होती है । तो अपनी चेतना का उपयोग करता है । ताजे रूप से वह अपनी चेतना का उपयोग करता है । वह समस्या से साक्षात्कार करता है । और फिर उसके भीतर जो कोई विचार उदित होता है । वह स्मृति का हिस्सा नहीं होता । भेद यही है । विचारों से भरा व्यक्ति स्मृति का व्यक्ति है । उसके पास चिंतन की क्षमता नहीं है । अगर तुम वह प्रश्न पूछते हो । जो नया है । वह हकबकाया हुआ होगा । वह उत्तर नहीं दे सकता । अगर तुम कोई प्रश्न पूछते हो । जिसका उत्तर वह जानता है । वह तुरंत उत्तर देगा । यह अंतर है पंडित और उस व्यक्ति के बीच । जो जानता है । वह व्यक्ति जो सोच सकता है ।
पतंजलि कहते हैं कि - वितर्क, सम्यक तर्क ले जाता है अनुचितन की ओर । विचार की ओर । अनुचितन, विचार ले जाता है आनंद की ओर । यह पहली झलक है । और निस्संदेह यह 1 झलक ही है । यह आयेगी । और यह खो जायेगी । तुम इसे बहुत देर तक पकड़े नहीं रख सकते । यह मात्र झलक ही बनने वाली थी । जैसे कि 1 क्षण को बिजली कौंधी । और तुम देखते हो । सारा अंधकार तिरोहित हो जाता है । किंतु फिर वहां अंधकार आ बनता है । यह ऐसा है कि जैसे कि बादल तिरोहित हो गये । और तुमने क्षण भर को चांद देखा । फिर दोबारा वहां बादल आ जाते हैं ।
या किसी उज्जवल सुबह हिमालय के निकट, क्षण भर को तुम्हें गौरी शंकर की झलक मिल सकती है - उच्चतम शिखर की । लेकिन फिर वहां धुंध होती है । और फिर वहां बादल होते हैं । और शिखर खो जाता है । यह है सतोरी । इसीलिए सतोरी का अनुवाद समाधि की भांति करने की कोशिश कभी न करना । सतोरी 1 झलक है । यह उपलब्ध हो जाती है । तो बहुत कुछ करना होता है इसके बाद । वस्तुत: वास्तविक कार्य शुरू होता है पहली सतोरी के बाद । पहली झलक के बाद । क्योंकि तब तुमने अपरिसीम का स्वाद पा लिया होता है । अब 1 वास्तविक, प्रामाणिक तलाश शुरू होती है । इससे पहले तो, वह बस ऐसी वैसी थी । कुनकुनी । क्योंकि तुम वास्तव में आश्वस्त न थे । निश्चित न थे । इस बात के लिए कि तुम क्या कर रहे हो । तुम कहां जा रहे हो ? क्या हो रहा है ?
इससे पहले । यह 1 आस्था थी । श्रद्धा थी । इसके पहले 1 गुरु की आवश्यकता थी तुम्हें मार्ग दर्शाने को । तुम्हें बारबार वापस मार्ग पर लाने को । लेकिन अब सतोरी के घटित होने के बाद यह कोई आस्था न रही । यह 1 अनुभव बन चुका है । अब आस्था 1 प्रयत्न नहीं है । अब तुम श्रद्धा करते हो । क्योंकि तुम्हारे अपने अनुभव ने तुम्हें दर्शा दिया है । पहली झलक के बाद वास्तविक खोज शुरू होती है । इससे पहले तो तुम गोल गोल घूम रहे थे ।
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