23 सितंबर 2011

पत्नी और प्रेमिका

ये दोनों बातें मुझे पता नहीं । किसने कही हैं । पर जिसने भी कही हैं । दमदारी से कही हैं । अनुभव से कही हैं । आप भी सुनिये - कुदरत में प्रीत की । रीति भी अजीव है । दिल आया गधी पर । तो परी क्या चीज है ।
इसी के ठीक विपरीत सी भी एक बात किसी दिलजले ने नहले पर दहला मारा है - अजब तेरी दुनियाँ का । अजब दस्तूर है । लंगूर की गोद में । जन्नत की हूर है ।
मुझे लेखक श्री राजेन्द्र यादव की एक कविता भी याद आती है । जिसके शब्द पूरी तरह मुझे याद नहीं । पर जिसका भाव यह था - प्रेमिकायें कभी पादती नहीं । उनकी नाक भी नहीं बहती ।
पत्नी और प्रेमिका - ये दो शब्द । ये दो जरूरतें । ये दो चाहतें । ये दो लक्ष्य । ये दो मुकाम । अच्छी खासी हसरत होने के बाद भी मेरे लिये अहम होते हुये भी परिस्थिति वश उदासीन ही रहे । किसी सजा पाये कैदी की तरह । किसी मजबूरी में फ़ँसे बँधुआ मजदूर की तरह भी ।

योग के आंतरिक ज्ञान में आने के बाद जब कभी फ़ुरसत के क्षणों में मैंने इन दो महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार किया । बल्कि दूर दूर तक पीछे मुढकर देखा । तो मैं लगभग 10 000 साल पीछे तक गया । और मुझे हैरानी हुयी कि बीते 10 000 वर्ष के जीवन चक्र में स्त्री के नाम पर न तो मेरी जिन्दगी पत्नी  थी । और न ही प्रेमिका । हाँ 1400 वर्ष पहले एक मामूली हवा के झोंके के समान एक असफ़ल प्रेम अवश्य हुआ था ।
दरअसल 10 000 - 90 वर्ष पहले मैं मनुष्य देह में था । उसके बाद लम्बा समय 84 और अन्य स्थितियों में बिताने के बाद मैं 1400 वर्ष पहले कुछ समय के लिये मनुष्य हुआ । इससे थोङा और भी पहले 1700 वर्ष पूर्व भी कुछ समय के लिये 


मनुष्य देह में रहा । तब भी एक अतृप्त और मिलन रहित प्रेम ही हुआ । आश्चर्य की बात थी कि पत्नी मेरे जीवन में पिछले 10 000 वर्षों में नहीं थी । इसके बाद अभी पिछले लगभग 250 वर्षों से मैं तीन बार लगातार योगयात्री के रूप में जन्म ले चुका । और हर बार अंतिम परीक्षा में फ़ेल हो गया । सेक्स । धन । मान प्रतिष्ठा आदि रूपी अभिमान से जुङी चाहतें बङे से बङे योगी को अन्त में फ़ेल कर देती हैं । फ़िर मैं भी कोई अफ़लातून नहीं था । औरों की तरह मैं भी फ़ेल हो गया । लेकिन परम लक्ष्य के प्रति पत्नी प्रेमिका या अन्य चाहतों से अधिक चाहत मुझे शाश्वत सत्य को जानने की ही थी । और पिछले योग अनुभव या पुण्य कह लीजिये । ये चौथा जन्म मुझे मनुष्य का मिला । और तब मैं एक लम्बे भटकाव के बाद निश्चित स्थिति पर आया ।
निश्चित स्थिति.. शब्द का प्रयोग इसलिये कर रहा हूँ । क्योंकि योग में एक स्थिति खाण्डे की धार पर चलना होता है । जिसके लिये कबीर साहब ने कहा - ज्ञान का पंथ कृपाण की धारा । इसको व्यवहारिक रूप में कसौटी पर चढना भी कह सकते हैं । इसकी स्थिति को ठीक से समझने के लिये आप गन्ने से मिश्री बनने तक की कष्टदायक स्थितियों से तुलना कर सकते हैं । ये बहुत ऊँची दुर्लभ स्थिति है । जो हरेक को नहीं मिलती । बल्कि पात्र का चयन करके दी जाती हैं ।

अतः अब मैं गन्ने की तरह कोल्हू में पिरता हुआ खुद को बेहद सुखी महसूस कर रहा हूँ । क्योंकि ये वह स्थिति होती है । जिसके बाद पतन या डिमोशन नहीं हो सकता । अब मेरा जूस निकलना ही निकलना है । और निकल रहा है । अतः निश्चित स्थिति.. शब्द का प्रयोग यहाँ सटीक हो जाता है । यह ठीक उसी तरह है । जिस तरह कोई महत्वाकांक्षी अति गरीब इंसान अपनी अथक मेहनत के बलबूते पर उच्च शिक्षा दीक्षा प्राप्त करके उच्च पद स्थिति को पाता है । और अभी पूर्व ट्रेनिंग में चल रहा है ।
जाहिर है । अपनी अब तक की मजबूरियों के चलते वह न तो पत्नी के बारे में सोच सका । न प्रेमिका के बारे में कोई इच्छा करता हुआ भी किसी से प्रेम ही कर पाया । और जब वह एक स्थायी सन्तुष्टि पूर्ण स्थिति को प्राप्त होने वाला हो । तब दिल में दबे अरमानों का मचलना अंगङाई लेना स्वाभाविक ही है ।
सो पिछले कुछ समय से स्वाभाविक ही मैं भी ऐसे ही भावों से गुजर रहा हूँ । कौन होगी मेरी प्रेमिका ? कैसी होगी ? कौन होगी मेरी पत्नी ? और कैसी होगी ?
पर ये जीवन लीला बङी विलक्षण है । ज्ञान रहित जीवन में पूर्व के वासनात्मक संस्कार से पत्नी या प्रेमिका वासना देही यानी मनुष्य रूपा मिलती है । तब आकर्षण होता है । और फ़िर प्रेम की परिणति यानी प्रेम रूपी पौधा फ़लने फ़ूलने लगता है । लेकिन ज्ञानयुक्त जीवन में यह चयन करना मिलना सिर्फ़ कठिन ही नहीं । बल्कि होता ही नहीं है । ज्ञानयुक्त जीवन में किसी ज्ञानी की पत्नी और प्रेमिका भी उसी स्थिति की भक्त और पहुँच वाली ही हो सकती है । जिसका स्तर कम से कम उच्च देवी वाला हो । क्योंकि तभी वह शाश्वत सत्ता में कोई स्थान या निवास प्राप्त कर सकती है ।

अतः सीधी सी बात है । किसी युवा लङके लङकी की तरह अभी मैं भी सिर्फ़ कल्पना ही कर सकता हूँ । कौन है । कैसी है.. वो । जाने कहाँ हैं ? मेरे सपनों में आये । आ के मुझे छेङ जाये । इसलिये अभी..तुझे देखा तो ये जाना सनम । प्यार होता है दीवाना सनम । अब यहाँ से कहाँ जाय हम । एक दूजे के हो जायं हम । तो कहना तो दूर । सोच भी नहीं सकता । और इसके बाद..डोली सजा के रखना । मेंहदी लगा के रखना । लेने तुझे आयेंगे । ओ गोरी तेरे सजना ..तो और भी बहुत दूर की बात है । इसलिये आप लड्डू खाने के लिये अभी से लार मत टपकाईये ।
खैर..मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की तरह स्त्री के इन दो रूपों पत्नी और प्रेमिका पर मैंने पिछले दिनों में कई बिन्दुओं पर विचार किया । और ज्ञान के आदि धरातल पर जाकर स्त्री और पुरुष को नजदीक से देखा । पहली स्त्री । और पहला पुरुष । इसको दो तरह से कह सकते हैं । चेतन पुरुष और उसकी भावना से उसी से अर्धाग होकर प्रकट हुयी प्रकृति रूपा स्त्री । ये एक अलग और बहुत ही गहन मामला है । इस पर फ़िर कभी बात करेंगे । लेकिन अभी इतना जान लें कि ये दोनों पूर्ण थे । पूर्ण पुरुष । और पूर्ण स्त्री । एक दूसरे को परस्पर अपने स्तर से पूर्णता से भरने वाले । और सन्तुष्ट करने वाले । एक दूसरे के पूरक ।
अब सृष्टि रचना पर आते है । तब काल पुरुष और अष्टांगी । ये दो सबसे पहले स्त्री पुरुष हुये । जिनमें परस्पर काम उत्पन्न हुआ । ये दोनों चेतन पुरुष और प्रकृति स्त्री की प्रतिकृति यानी जेराक्स कापी थे । लेकिन मैंने कहा । पहला वाला मामला बहुत विलक्षण सा अलग सा है । अतः इन्हें ही पहला स्त्री पुरुष मानिये । ये उनके तुलनात्मक पूर्ण न होकर क्षीण थे । इनकी मर्यादायें निहित थी । बाद में इनकी ही तमाम 


संतति हुयी । जो कृमशः गुण कलाओं में पतित होकर क्षीण दर क्षीण ही होती गयी । और यही सबसे बङा सृष्टि के स्त्री पुरुषों के वासनात्मक भटकाव का रहस्य है कि स्त्री विभिन्न संसारी पुरुषों में खोजती हुयी सी उसी पूर्ण पुरुष की तलाश कर रही है । जो पूर्ण आदि पुरुष था । और पुरुष संसारी स्त्रियों में उसी स्त्री को तलाश कर रहा है । जो पूर्ण आदि स्त्री थी । बस इसी तलाश के चलते अनन्त काल से ये वासना संसार बसता उजङता रहता है । पर तलाश पूरी नहीं हुयी । और परस्पर सभी जोङे एक दूसरे से असन्तुष्ट से रहते हुये नये मनवांछित प्रेमी की हसरत भरी तलाश लिये बारबार जन्मते मरते रहते हैं ।
अब इस रामलीला को भी छोङकर सीधे राधा कृष्ण पर आ जाईये । जिस मानसिक उथल पुथल के चलते मैंने ये लेख लिखा । वो उथल पुथल यही थी कि - क्या पत्नी कभी प्रेमिका हो सकती है ? या एक प्रेमिका कभी पत्नी हो सकती है ? विपरीत भाव में इसको पति या प्रेमी समझ लें । तो मेरा वृहद अध्ययन शोध और अनुभव से निकला जबाब यही था । प्रेमिका कभी पत्नी नहीं हो सकती । और पत्नी कभी प्रेमिका नहीं बन सकती । ये रूपान्तरण होने का अर्थ ही है । किसी एक का मर जाना । प्रेमिका के पत्नी बनते ही उसके अन्दर की प्रेमिका निश्चित ही मर जायेगी । तो फ़िर पत्नी के तो प्रेमिका होने का प्रश्न ही नहीं ।
ओशो ने इसी बात को इस तरह कहा है - प्रेम को कभी बाँधो मत । उसे मुक्त रहने दो । क्योंकि बाँधते ही प्रेम मर जायेगा । जैसे ही अधिकार जताया । प्रेम खत्म । प्रेम को उन्मुक्त ही रहने दो ।
अब राधा कृष्ण पर विचार करें । वो इसलिये क्योंकि प्रेमी प्रेमिका की पूर्णता के मामले में अखिल सृष्टि में सबसे

टाप जोङी यही है । राधा एक पूर्ण प्रेमिका । कृष्ण एक पूर्ण प्रेमी । अब गहराई से सोचिये । एक प्रेमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है ? कृष्ण की प्रमुख आठ पत्नियों की तुलना में प्रेमिका राधा का स्थान सदैव सबसे ऊँचा रहता है । अगर प्रेमिका की तुलना में पत्नी ज्यादा बङी और महत्वपूर्ण होती । तो राधा निश्चय ही कृष्ण से कब की शादी कर लेती । लेकिन उसे मालूम है । विवाह होते ही उसके अन्दर की प्रेमिका मर जायेगी । कृष्ण भी जानते हैं । अतः ये प्रेम युगों युगों से सदा जवान है ।
अतः मैं पिछले दिनों से बङी गम्भीरता से पत्नी बनाम प्रेमिका के इन्हीं गूढ तत्वों का निरन्तर चिन्तन कर रहा था । क्योंकि आगामी कुछ समय में ही मेरे अस्तित्व की किताब में ये दो अध्याय भी जुङने वाले हैं । ये बङी अजीव बात है । पत्नी भी अपनी जगह बेहद महत्वपूर्ण है । उसका बेहद सम्मानजनक स्थान है । और फ़िर दूसरे दृष्टिकोण से प्रेमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है । एक बङी जरूरत है । क्योंकि उसके न होने से जीवन की सभी उमंगे ही मर जाती है । अब मुश्किल बात ये है कि - एक ही स्त्री में ये दोनों कभी किसी हालत में नहीं हो सकती ।
इसलिये सांसारिक जीवन में धन शक्ति पद आदि से समर्थ पुरुष , राजाओं आदि के जीवन में पत्नी और प्रेमिका दोनों ही सदैव रही हैं । और वे अलग अलग थी । पत्नी अलग । प्रेमिका अलग । देव पुरुषों और अन्य योग पुरुषों में तो इन दोनों का निश्चित ही स्थान रहा है । क्योंकि वे सांसारिक पुरुष की तुलना में धातु और तत्व स्तर पर बेहद सबल होते है । उनकी पौरुष क्षमता अद्वितीय होती है ।


चलिये आज इतना ही । ये प्रेम कथा आगे भी जारी रहेगी । इस शुरूआत के बाद इसके और भी महत्वपूर्ण पहलूओं पर चर्चा होगी ।
और अन्त में - अभी मेरे दिमाग में ये ख्याल आया कि मैं प्रत्येक लेख में फ़ोटो छापता ही हूँ । और आप लोग अपने क्वेश्चन मेल में साथ में फ़ोटो भेजते ही हो । तब ये जरूरी नही कि आप अपने प्रश्नों के साथ ही फ़ोटो भेजें । आप अलग से भी अपने विभिन्न आकर्षक फ़ोटो जितने चाहे भेज सकते हैं । जिन्हें मैं अपने स्तर पर लिखे जाने वाले लेखों में छापूँगा । इस तरह आपका ये ब्लाग फ़ालतू अपरिचित से फ़ोटो के बजाय हमारे अपने परिचित लोगों के चित्रों से एक खूबसूरत एलबम की तरह सजा नजर आयेगा । और तब इसको बारबार देखने की इच्छा होगी ।
- आप सभी के अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।
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