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30 जून 2011

इसलिये सोचकर ही रूह थरथर काँपती है

गुरुमुखि होवे सु ततु बिलोबै । रसना हरि रस ताहा हे ।
अगर कोई गुरुमुख होकर इस निर्वाणी नाम का जाप करे । और तत्वों को देखे । अंतर के रहस्यों को जाने । तो ये आनन्द ही आनन्द में जीते जी मुक्ति को प्राप्त हो जाये ।
लेकिन कोई शिष्य असली गुरुमुख कब बनता है ? जब वह 9 दरबाजे ( का शरीर - 2 कान 2 आँख 2 नाक छिद्र 1 मुँह 1 लिंग या योनि द्वार 1 गुदा द्वार ) बन्द करके ( यानी ध्यान में शरीर को भुलाकर ) तुरीयापद अर्थात सहस्रदल कमल में पहुँचता है । फ़िर सहस्रदल कमल से बृह्म में । और बृह्म से पारबृह्म में पहुँचता है । वहाँ अमृतसर ( अमृत का तालाब ) है ।
तब उसमें नहाकर ये स्वयँ कहता है कि - मैं एक आत्मा हूँ ।
और तब इसे अपनी असली पहचान होती है । और जब तक अपनी ही ( आत्मा की ) पहचान नहीं होती । तब  तक

परमात्मा की पहचान कैसे हो सकती है ? इसलिये ये गुरुमुख होकर अंतर आकाशों पर मंजिलों पर जाये । तो इसका आना जाना ही सफ़ल हो जाये ।
घरि बथु छोङहि बाहरि धावहि । मनमुख अँधे साधु न पावहि ।
दुनियाँ के तमाम लोग घर गृहस्थी बाल बच्चों को छोङकर साधु हो जाते हैं । कोई दुनियाँ के रंग ढंग से ऊबकर साधु हो गया । किसी का मन धर्मगृंथों को पढकर वैराग्य से भर गया । पर जब तक कोई नाम अभ्यासी सच्चा महात्मा नहीं मिला । तब तक ऐसे झूठे वैराग्य से कुछ होने वाला नहीं ।
अपनी औरत का बना हुआ भोजन खाना छोङ दिया । अब बाहर की हजार औरतों का बना खाता है । अपना घर छोङ दिया । और संसार के घरों में घूमता है । ये सब बनाबटी साधुओं के काम हुये ।
लेकिन जो भजन अभ्यासी सच्चा साधु है । वह अपना हित भी बनाता है । और जिसके यहाँ भोजन करता है । उसे भी लाभ पहुँचाता है ।
पर मुश्किल ये होती है कि दुनियाँ के लोग बहुत चालाक बनते हैं । औरतें इस पुण्य को अपने बेटे बेटियों के सिर पर वार कर देती हैं । और उनकी यह भावना रहती है कि हमारी सब बलायें ये साधु महाराज ले जायें । कई दानदाता भावना कर लेते हैं कि हमें इस दान का फ़ल आगे मिल जायेगा । इस तरह लेन देन करने के स्वभाव से मजबूर वह नाम अभ्यासी साधु की अहैतुकी कृपा से वंचित रह जाते हैं ।

गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है - जो साधु किसी का खाकर उसके लिये भजन नहीं करता । वह मरकर या तो ऊँट बनता है । या कुत्ता । या फ़िर सुअर बनता है ।
इसलिये सबसे अच्छा है । साधु बनने के बजाये गृहस्थ रहकर ही भजन करो । भले ही गृहस्थी में भजन अभ्यास में थोङी रुकावटें आती हैं । सुमिरन ध्यान थोङा थोङा करके ही हो पाता है । मगर जो कुछ सुमिरन होता है । अपना तो रहता है । किसी बाहर वाले को तो नहीं देना ।

अनरस राती रसना फ़ीकी बोले । हरि रस मूल न ताहा हे ।
वह इस्मे आजम यानी वास्तविक नाम इस मनुष्य के अन्दर ही है । मगर यह नादान उसको बाहर खोजता फ़िरता

है । सदियों से खोज रहा है । इसलिये आंतरिक ग्यान के बिना ये मनुष्य ग्यानी होकर आध्यात्म की जितनी भी मीठी मीठी बातें करता हैं । वह फ़ीकी और बेस्वाद ही हैं ।
अगर सारा दिन मिठाई मिठाई चिल्लाते रहो । तो न तो मुँह ही मीठा होता है । न ही उससे पेट भरता है । लेकिन अगर मिठाई प्राप्त करके खा लो । तो पेट भी भरेगा । और मुँह को मीठा स्वाद भी आयेगा । इसलिये जो वास्तविक आवे हयात यानी हरि रस है । वह आपके अन्दर ही है । बाहर कहीं नहीं । जहाँ तुम खोज रहे हो ।
मनमुख देही भरमु भतारो । दुरमति मरै नित होइ खुआरो ।
जिन अभागो को मनुष्य जन्म पाकर भी गुरु नहीं मिला । निर्वाणी नाम नहीं मिला । उनका दीन ईमान क्या है ? उनका दीन ईमान बस ये कुटिल पापी मन ही है । मन की इच्छा से खाया पिया । मन की इच्छा से तमाम झूठ फ़रेव किये ।
ऐसे मनमुख इंसान मन का कहा मानकर खोटी खोटी 84 लाख योनियों में ही जाते हैं । और खोटे ही नीच जन्म

भी पाते हैं । उनका यही बुरा हाल रहता है । जनमें और मरे । फ़िर जनमे और फ़िर मरे । 84 लाख योनियों का बङा लम्बा चक्कर घनचक्कर है । अगर एक एक योनि का एक एक साल ही जोङा जाये । तो 84 लाख साल होते हैं । अगर वृक्ष और पहाङों की भी बात करें । जो हजारों साल जीते हैं । तो फ़िर करोंङो साल की बात हो जाती है । इसलिये सोचकर ही रूह थरथर काँपने लगती है । लेकिन फ़िर भी मनमुख 84 लाख योनियों के चक्कर में आ ही जाते हैं । और बारबार आते जाते हुये उस दुखदायी स्थिति को भोगते हैं ।

01 जून 2011

84 क्यों बनी ?


कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! मैंने चारों खानि के लक्षण तुमसे कहे । अब सुनो । मनुष्य योनि की अवधि समाप्त होने से पहले किसी कारण से देह छूट जाय । वह फ़िर से संसार में मनुष्य जन्म लेता है । अब उसके बारे में सुनो ।
तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! मेरे मन में एक संशय उठा है । वह मुझे समझाईये । जब 84 लाख योनियों में भरमने भटकने के बाद ये जीव मनुष्य देह पाता है । और मनुष्य देह पाया हुआ ये जीव फ़िर देह ( असमय ) छूटने पर पुनः मनुष्य देह पाता है । तो मृत्यु होने और पुनः मनुष्य देह पाने की यह संधि कैसे हुयी ? यह विधि मुझे समझाईये । और उस पुनः मनुष्य जन्म लेने वाले मनुष्य के गुण लक्षण भी कहो ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! सुनो । आयु शेष रहते जो मनुष्य मर जाता है । फ़िर वह शेष बची आयु को पूरा करने हेतु मनुष्य शरीर धारण करके आता है । जो अग्यानी मूर्ख फ़िर भी इस पर विश्वास न करे । वह दीपक बत्ती जलाकर देखे । और बहुत प्रकार से उस दीपक में तेल भरे । परन्तु वायु का झोंका ( मृत्यु आघात ) लगते ही वह दीपक बुझ जाता है ( भले ही उसमें खूब तेल भरा हो ) उसे बुझे दीपक को आग से फ़िर जलायें । तो वह दीपक फ़िर से जल जाता है । इसी प्रकार जीव मनुष्य फ़िर से देह धारण करता है ।
हे धनी धर्मदास ! अब उस मनुष्य के लक्षण भी सुनो । उसका भेद तुमसे नही छुपाऊँगा । मनुष्य से फ़िर मनुष्य का शरीर पाने वाला वह मनुष्य शूरवीर होता है । भय और डर उसके पास भी नहीं फ़टकता । मोह माया ममता उसे नहीं व्यापते । उसे देखकर दुश्मन डर से कांपते हैं । वह सतगुरु के सत्य शब्द को विश्वास पूर्वक मानता है । निंदा को वह जानता तक नहीं है । वह सदा सदगुरु के श्रीचरणों में अपना मन लगाता है । और सबसे प्रेममयी वाणी बोलता है । अग्यानी होकर ( जानते हुये भी ) ग्यान को पूछता समझता है । उसे सत्यनाम का ग्यान और परिचय करना बेहद अच्छा लगता है ।

हे धर्मदास ! ऐसे लक्षणों से युक्त मनुष्य से ग्यान वार्ता करने का अवसर कभी खोना नहीं चाहिये । और अवसर मिलते ही उससे ग्यान चर्चा करनी चाहिये । जो जीव सदगुरु के शब्द ( नाम या महामंत्र ) रूपी उपदेश को पाता है । और भली प्रकार गृहण करता है । उसके जन्म जन्म का पाप और अग्यान रूपी मैल छूट जाता है । सत्यनाम का प्रेमभाव से सुमरन करने वाला जीव भयानक काल माया के फ़ंदे से छूटकर सत्यलोक जाता है । सदगुरु के शब्द उपदेश को ह्रदय में धारण करने वाला जीव अमृतमय अनमोल होता है । वह सत्यनाम साधना के बल पर अपने असली घर अमरलोक ( या सत्यलोक एक ही बात है ) चला जाता है । जहाँ सदगुरु के हँस जीव सदा आनन्द करते हैं । और अमृत का आहार करते हैं । जबकि काल निरंजन के जीव कागदशा ( विष्ठा मल के समान घृणित वासनाओं के लालची ) में भटकते हुये जन्म मरण के काल झूले में झूलते रहते हैं ।
सत्यनाम के प्रताप से काल निरंजन जीव को सत्यलोक जाने से नहीं रोकता । क्योंकि महाबली काल निरंजन केवल इसी से भयभीत रहता है । उस जीव पर सदगुरु के वंश की छाप ( दीक्षा के समय लगने वाली नाम मोहर ) देखकर काल बेबशी से सिर झुकाकर रह जाता है ।
तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! आपने चार खानि के जो विचार कहे । वो मैंने सुने । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि 84 लाख योनियों की यह धारा का विस्तार किस कारण से किया गया । और इस अविनाशी जीव को अनगिनत कष्टों में डाल दिया गया । मनुष्य के कारण ही यह सृष्टि बनायी गयी है । या कि कोई और जीव को भी भोग भुगतने के लिये बनायी गयी है ?
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! सभी योनियों में श्रेष्ठ यह मनुष्य देह सुख को देने वाली है । इस मनुष्य देह में ही गुरु ग्यान समाता है । जिसको प्राप्त कर मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है । ऐसा मनुष्य सरीर पाकर जीव जहाँ भी जाता है । सदगुरु की भक्ति के बिना दुख ही पाता है ।
मनुष्य देह को पाने के लिये जीव को 84  के भयानक महाजाल से गुजरना ही होता है । फ़िर भी यह देह पाकर मनुष्य अग्यान और पाप में ही लगा रहता है । तो उसका घोर पतन निश्चित है । उसे फ़िर से भयंकर कष्टदायक साढे 12 लाख साल की 84 धारा से गुजरना होगा । दर बदर भटकना होगा ।
सत्य ग्यान के बिना मनुष्य तुच्छ विषय भोगों के पीछे भागता हुआ अपना जीवन बिना परमार्थ के ही नष्ट कर लेता है । ऐसे जीव का कल्याण किस तरह हो सकता है ? उसे मोक्ष भला कैसे मिलेगा ? अतः इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये सतगुरु की तलाश और उनकी सेवा भक्ति अति आवश्यक है ।
हे धर्मदास ! मनुष्य के भोग उद्देश्य से 84 धारा या 84 लाख योनियाँ रची गयीं हैं । सांसारिक माया और मन इन्द्रियों के विषयों के मोह में पङकर मनुष्य की बुद्धि ( विवेक ) का नाश हो जाता है । वह मूढ अग्यानी ही हो जाता है । और वह सदगुरु के शब्द उपदेश को नहीं सुनता । तो वह मनुष्य 84 को नहीं छोङ पाता ।
उस अग्यानी जीव को भयंकर काल निरंजन 84 में लाकर डालता है । जहाँ भोजन । नींद । डर और मैथुन के अतिरिक्त किसी पदार्थ का ग्यान या अन्य ग्यान बिलकुल नहीं है । 84 लाख योनियों के विषय वासना के प्रबल संस्कार के वशीभूत हुआ ये जीव बार बार क्रूर काल के मुँह में जाता है । और अत्यन्त दुखदायी जन्म मरण को भोगता हुआ भी ये अपने कल्याण का साधन नहीं करता ।
हे धर्मदास ! अग्यानी जीवों की इस घोर विपत्ति संकट को जानकर उन्हें सावधान करने के लिये ( सन्तों ने )   पुकारा । और बहुत प्रकार से समझाया कि मनुष्य शरीर पाकर सत्यनाम गृहण करो । और इस सत्यनाम के प्रताप से अपने निज धाम सत्यलोक को प्राप्त करो । आदि पुरुष के विदेह ( बिना वाणी से जपा जाने वाला ) और स्थिर आदि नाम ( जो शुरूआत से एक ही है ) को जो जाँच समझकर ( सच्चे गुरु से - मतलब ये नाम मुँह से जपने के बजाय धुनि रूप होकर प्रकट हो जाय । यही सच्चे गुरु और सच्ची दीक्षा की पहचान है ) जो जीव गृहण करता है । उसका निश्चित ही कल्याण होता है । गुरु से प्राप्त ग्यान से आचरण करता हुआ वह जीव सार को गृहण करने वाला नीर क्षीर विवेकी ( हँस की तरह दूध और पानी के अन्तर को जानने वाला ) हो जाता है । और कौवे की गति ( साधारण और दीक्षा रहित मनुष्य ) त्याग कर हँस गति वाला हो जाता है । इस प्रकार की ग्यान दृष्टि के प्राप्त होने से वह विनाशी तथा अविनाशी का विचार करके इस नश्वर नाशवान जङ देह  के भीतर ही अगोचर और अविनाशी परमात्मा को देखता है ।
हे धर्मदास ! विचार करो । वह निअक्षर ( शाश्वत नाम ) ही सार है । जो अक्षर ( ज्योति जिस पर सभी योनियों के शरीर बनते हैं । ..ध्यान  की एक ऊँची स्थिति ) से प्राप्त होता है ।  सब जङ तत्वों से परे वही असली सारतत्व है ।