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31 अगस्त 2011

परम धाम किसे कहते हैं ? नबदीप

हैलो राजीव जी ! कैसे हैं आप ? आज सिर्फ़ 1 ही सवाल लेकर आयी हूँ । लेकिन इसका उत्तर आप थोडा विस्तार से और क्लीयर्ली दे देना । ताकि मुझे और सभी पाठकों को बात सही रूप में और पूरी तरह समझ आ जाये । सवाल ये है कि - सबसे पहले जब सिर्फ़ आत्मा ही थी ( क्या इसको ही अनादि अवस्था कहते हैं ) वो अपने संकल्प से 1 से अनेक हो गयी । इस तरह वो 1 आत्मा ही अब हर घट यानि हर जिन्दा शरीर में है । जो सबसे परे है ( अभी तक अपनी सबसे पहले वाली अनादि अवस्था में वो ही परमात्मा है )
तो क्या इस तरह से हम अपने वास्तविक स्वरूप को अगर अनादि कहें । तो क्या ये 100% सही ही है ? बाकी आप इस - 1 से अनेक हो जाऊँ । वाली बात को जरा गहराई से समझा दीजिये । 1 बात और अगर हम ये न कहकर कि इस सृष्टि के कण कण में परमात्मा समाया हुआ है । अगर ये कहें कि पूरी अखिल सृष्टि ही परमात्मा में समायी हुई है । क्या ये अधिक बेहतर नहीं रहेगा ।
1 बात और । मैंने कही पढा था कि श्रीकृष्ण अध्यात्म की गहराई और ऊँचाई पर पूरी तरह से पहुँचे होने पर भी उदास नहीं थे । जबकि छोटे मोटे और नकली अधूरे किस्म के साधु भी उदास और निराश घूमते नजर आते हैं । इसके बारे में भी कुछ कहें ।
आपने अपने किसी थोडा ही पुराने लेख में कहा था कि - वास्तव में परमात्मा का कोई नाम नहीं है । इस बात को आप प्लीज जरा सरल ढंग से समझा दें । वैसे 1 से अनेक

हो जाऊँ । वाली बात को गुरवाणी में अकथ कथा ही कहा गया है । यानि जिसके बारे में कहना । सुनना । लिखना । पढना । असम्भव जैसा ही है । इसके बारे में भी कुछ कहें ।
1 बात और । ये बतायें कि - परम धाम किसे कहते हैं ? सतलोक को । या अनामी लोक को । या इसके अलावा भी कुछ और बात है । आपने कहा था कि श्रीकृष्ण ( काल पुरुष ) त्रिलोकी में सबसे बलवान हैं । ये बतायें कि इस अखिल सृष्टि में कितने त्रिलोक होंगे ? क्या त्रिलोक से भी बडे संसार इस अखिल सृष्टि में होंगे । अन्त में 1 बात और । ये बतायें कि - स्वधर्म का क्या अर्थ है ? स्व + धर्म । 1 बात और । ये भी बतायें कि - स्वतन्त्र का क्या अर्थ है ? आत्मा के रुप में स्व + तन्त्र । ये भी बतायें कि - प्रभु का अर्थ क्या है ? क्या ये भी कोई उपाधि है ?
आप आजकल अपने हर लेख के नीचे ये लिखते हैं - आप सभी के अन्तर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम । ये बतायें कि - यहाँ आप आत्मदेव किसे कहते हैं ? आप किसे प्रणाम करते हैं ? परमात्मा को । या हम सबके आत्म स्वरूप को ? जाते जाते ये भी बता ही दें कि " विश्वात्मा " का शाब्दिक अर्थ क्या है ? मेरे इन सभी प्रश्नों के उत्तर जल्दी से दे दीजिये । क्यूँ कि अब आपसे मुलाकात का समय नजदीक आता जा रहा है ।
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ओ नवदीप जी ! आप सिर्फ़ 1 सवाल लेकर मत आया करो । कम से कम चार पाँच सवाल तो लाया ही करो । चलिये आपके 1 सवाल का जबाब देते हैं ।
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सबसे पहले जब सिर्फ़ आत्मा ही थी ( क्या इसको ही अनादि अवस्था कहते हैं ) वो अपने संकल्प से 1 से अनेक हो गयी । इस तरह वो 1 आत्मा ही अब हर घट यानि हर जिन्दा शरीर में है । जो सबसे परे है ( अभी तक अपनी सबसे पहले वाली अनादि अवस्था में वो ही परमात्मा है ) तो क्या इस तरह से हम अपने वास्तविक स्वरूप को अगर अनादि कहें । तो क्या ये 100% सही ही है ?
- आप दर्पण ( यहाँ अंतकरण ) के सामने खङी हो । अब यहाँ 4 हो गये । एक जो दर्पण में प्रतिबिम्ब दिख रहा ( वह जीव - यही अभी आप हो ) है । एक जिसका दर्पण में प्रतिबिम्ब ( यह आत्मा - निर्विकारी और निर्लेप ) आ रहा है । एक जो देखने वाला ( साक्षी भाव ) है । और एक तो दर्पण है ही ।
ठीक इसी प्रकार आत्मा का फ़ोकस अंतकरण पर पङ रहा है । और अंतकरण के विचारों द्वारा उसे ये संसार और 


उसकी वासनायें प्रतीत हो रही है । अब जैसे मैं बच्चा था । तब दर्पण में जीभ निकालता था । खुद को चिढाना आदि क्रियायें करता था । वैसा ही दर्पण में दिख रहा दूसरा राजीव भी करता था । जब मैं शान्त हो जाता था । तब वह भी शान्त हो जाता है । इसी प्रकार आत्मा अंतकरण द्वारा खेल रही है । वास्तव में वह हर समय ही अनादि अवस्था में थी । और रहती है ।  फ़ँसा हुआ सिर्फ़ जीव ( अहम भाव ) है । और वह क्योंकि इसको मायावश सत्य मानता है । अतः उसको फ़िर सत्य ही लगता है । इस तरह आपकी बात 100% सही है ?
1 से अनेक हो जाऊँ । वाली बात को जरा गहराई से समझा दीजिये । 1 बात और अगर हम ये न कहकर कि इस सृष्टि के कण कण में परमात्मा समाया हुआ है । अगर ये कहें कि पूरी अखिल सृष्टि ही परमात्मा में समायी हुई है । क्या ये अधिक बेहतर नहीं रहेगा ।

- वास्तव में आपने जो दूसरी तरह कहा । वह ही असली सत्य है । बाकी पहली बात को बात के चलन के आधार पर कहा जाता है । 1 से अनेक वाली बात कम शब्दों में समझाना सम्भव नहीं है । आपकी श्री महाराज जी से कुछ ही समय बाद भेंट होने वाली है । ये बात तथा अन्य बहुत सी बात वे बहुत सरलता से समझायेंगे । बस आप अपने प्रश्न कहीं नोट कर लेना ।
1 बात और । मैंने कही पढा था कि श्रीकृष्ण अध्यात्म की गहराई और ऊँचाई पर पूरी तरह से पहुँचे होने पर भी उदास नहीं थे । जबकि छोटे मोटे और नकली अधूरे किस्म के साधु भी उदास और निराश घूमते नजर आते हैं । इसके बारे में भी कुछ कहें ।
- आज नबदीप जी ! किसी ने मेरे मन की बात कही है । इसी बात पर मुँह मीठा कीजिये । यही तो..यही तो मैं आपको बारबार समझाना चाहता हूँ कि भक्ति और योग - उमंग । नयी ऊर्जा । जीवन में एक नया उल्लास । आगामी निश्चिन्तता । ये सब देते हैं । न कि बुझा बुझा सङा हुआ सा मुँह । पागल सी स्थिति । ये सब देते हैं । आपने देखा नहीं कि - मैं कैसी मस्ती में हँसी मजाक करता रहता हूँ ।
जबकि आपने इससे पहले सुना होगा । ये मत करो । वो मत करो । लव मत करो । शादी मत करो । सेक्स मत करो etc मैं आपको सच बता रहा हूँ । शुरू शुरू में जब मैं ध्यान लगाता था । और पार जाने पर जैसे ही कोई ब्यूटी नजर आयी । राजीव जी वहीं रम जाते थे । तब अक्सर मेरे गुरुदेव कान पकङकर लाते थे ।
बुद्ध ने कहा है - हसिवा खेलिवा धरिवा ध्यानम ।


बाकी - दुविधा में दोनों गये माया मिली न राम..यानी संसार का मजा भी न ले पाये । और बाबागीरी का भी फ़ायदा ( कुछ हासिल न होना ) न हुआ । इसलिये बेचारे हताश ही घूमते हैं ।
आपने अपने किसी थोडा ही पुराने लेख में कहा था कि - वास्तव में परमात्मा का कोई नाम नहीं है । इस बात को आप प्लीज जरा सरल ढंग से समझा दें । वैसे 1 से अनेक हो जाऊँ । वाली बात को गुरवाणी में अकथ कथा ही कहा गया है । यानि जिसके बारे में कहना । सुनना । लिखना । पढना । असम्भव जैसा ही है । इसके बारे में भी कुछ कहें ।
- आत्मा को " सारतत्व " भी कहा जाता है । यही सबका मूल है । यही सबका सार है । और यही इसकी असली स्थिति है । जो सबसे ऊपर " सार शब्द " के भी पार है । इसी सार शब्द को परमात्मा का नाम कहा गया है । यह आदि सृष्टि के समय आत्मा का प्रथम शब्द था । और इसके भी पार की पूर्व स्थिति को आत्मा या परमात्मा कहा जाता है । अतः जाहिर है । उसका कोई नाम नहीं है । 1 से अनेक वाली बात को सिर्फ़ समझने की कोशिश की जा सकती है । पूरी तरह समझना और समझाना दोनों ही असम्भव है । हाँ उस स्थिति में पहुँचकर अपने आप समझ में आ जाता है । इसके दो उदाहरण ।
1 - किसी बङे मैदान में लाखों करोंङो दर्पण ( यहाँ अंतकरण ) रख दें । तो हरेक में सूर्य नजर आने लगेगा ।
2 - जैसे सागर का जल बरसात के द्वारा अनेक स्थानों और अनेक रूपों में बिखर गया । और फ़िर घूम फ़िरकर विभिन्न तरीकों से दोबारा सागर में पहुँच गया ।
1 बात और । ये बतायें कि - परम धाम किसे कहते हैं ? सतलोक को । या अनामी लोक को । या इसके अलावा भी कुछ और बात है ।
- बृह्माण्ड की चोटी से ऊपर सतलोक आते ही यह सृष्टि से परे होने के कारण परम स्थान कहा गया है । यहाँ भी बहुत बङा खेल है । 88000 तो दीप ही हैं । और अनेक भव्य देश हैं । लेकिन परम धाम इनमें नियुक्त होने वाली गिनी चुनी आत्माओं जिन्हें पुरुष कहा गया है । उन्हें ही प्राप्त होता हैं । इसका अन्तर इसी तरह समझ सकते हैं कि राजा और फ़िर उसके बङे कर्मचारी । फ़िर छोटे कर्मचारी । अब जीते जी जो जितनी मेहनत कर ले । उसी हिसाब से प्राप्त करेगा । अतः परम धाम कोई एक स्थान नहीं है । किसका परमधाम है । इस पर निर्भर है । शास्त्रों में कृष्ण और विष्णु के लोक को भी परम धाम कहा गया है । जो मृत्युलोक और स्वर्गलोक आदि लोकों की तुलना में श्रेष्ठ होने के कारण और उनसे परे होने के कारण एक दृष्टि से उचित भी है ।
आपने कहा था कि श्रीकृष्ण ( काल पुरुष ) त्रिलोकी में सबसे बलवान हैं । ये बतायें कि इस अखिल सृष्टि में कितने त्रिलोक होंगे ? क्या त्रिलोक से भी बडे संसार इस अखिल सृष्टि में होंगे ।
- श्रीकृष्ण काल पुरुष का एक लीला रूप हैं । सन्तों ने जहाँ काल पुरुष को इसके क्रूर स्वभाव की वजह से आदर की दृष्टि से नहीं देखा । वहीं श्रीकृष्ण के योगी रूप आदि सभी बातों की सराहना की है । काल पुरुष के ही दूसरे रूप राम को भी यथोचित मान मिला है । प्रारम्भ में काल पुरुष का नाम धर्मराय था । जो इसके स्वभाव के कारण बदलकर यमराय हो गया । और इसकी सबसे बङी आलोचना सिर्फ़ इस बात को लेकर ही है कि ये नहीं चाहता कि जीव को उसकी खुद की सत्यता पता चल जाये । त्रिलोक अब की बार गिनती करके बताऊँगा । अखिल सृष्टि बहुत ही विलक्षण है ।
स्वधर्म का क्या अर्थ है ? स्व + धर्म ।
- स्व - अपना । धर्म - धारण किया हुआ । अब स्वधर्म बहुत हो जाते हैं । जो जाति है । वह भी स्वधर्म है । शरीर का कामन रूप से स्वधर्म अलग है कि वह शरीरधारी शरीर से क्या व्यवहार करता है । जबकि आत्मा का स्वधर्म सनातन है । और शाश्वत है । यही सबका एक है ।
स्वतन्त्र का क्या अर्थ है ? आत्मा के रुप में स्व + तन्त्र ।
- स्व - अपना । तन्त्र - सिस्टम । लेकिन यहाँ थोङा अलग हो जाता है । तन - शरीर यानी ॐ । और त्र - यानी तीन गुण - सत । रज । तम । अब अपना यानी आत्मा तन यानी शरीर और त्र यानी तीन गुणों से ये सब संयुक्त होकर विभिन्न योनि रूप होकर कार्य करते हैं ।
आत्मा का तन्त्र - प्रकृति 5 महाभूत आदि बहुत गहन विषय है । वह आसानी से समझ नहीं पाओगी ।
प्रभु का अर्थ क्या है ? क्या ये भी कोई उपाधि है ?
- प्रभु और स्वामी या मालिक होना एक ही बात है । इसका अर्थ है । किसी अधिकार या सम्पदा को प्राप्त कर लेना । जिससे आत्मा प्रभुता को प्राप्त होता है । अब इसमें भी विभिन्नता आ जाती हैं । जैसे श्रीराम को प्रभु कहा गया । तो वो राम की प्रभुता हुयी । और कृष्ण को । तो वो कृष्ण की । अतः महत्वपूर्ण है कि वो प्रभु कौन है ? प्रभुत्व और प्रभाव शब्द से भी यही ध्वनि निकलती है ।
ये बतायें कि - यहाँ आप आत्मदेव किसे कहते हैं ? आप किसे प्रणाम करते हैं ? परमात्मा को । या हम सबके आत्म स्वरूप को ? 
- आप सबके आत्मस्वरूप को । इसीलिये मैं आप सबको आत्मीयजन भी कहता हूँ । सांसारिक नाता संस्कारी और देही नाता होता है । जो संस्कार खत्म हो जाने और देह छूट जाने पर समाप्त हो जाता है । यह सम्बन्ध के अनुसार स्वार्थ पूर्ति से भी जुङा होता है । इसका सम्बन्ध देह से किसी न किसी रूप में भाई बहन माँ बाप पति पत्नी आदि के रूप में होता है । जबकि आत्मा निर्मल और निर्विकारी और सदैव होता है ।
विश्वात्मा का शाब्दिक अर्थ क्या है ? 
- सात समन्दर पार मैं तेरे पीछे पीछे आ गयी । ओ जुल्मी तेरे प्यार के खातिर सब कुछ छोङ के आ गयी । 
कसम से सच्ची ! बहुत बोर करते हो आप लोग । 
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सीताराम सीताराम । जय सीता जी ।