09 मार्च 2014

जिसका अपना कोई धर्म नहीं है

सत्य 1 है - सत्य के मार्ग पर वह व्यक्ति है । जिसने सारे मतों को तिलांजलि दे दी है । जिसका कोई पक्ष है । और कोई मत है । सत्य उसका नहीं हो सकता । सब पक्ष मनुष्य मन से निर्मित हैं । सत्य का कोई पक्ष नहीं है । और इसलिए जो निष्पक्ष होता है । पक्ष शून्य होता है । वह सत्य की ओर जाता है । और सत्य उसका हो जाता है । इसलिए किसी पक्ष को न चाहो । किसी संप्रदाय को न चाहो । किसी दर्शन को न चाहो । चित्त को उस स्थिति में ले चलो । जहां सब पक्ष अनुपस्थित हैं । उसी बिंदु पर विचार मिटता । और दर्शन प्रारंभ होता है । आंखें जब पक्ष मुक्त होती हैं । तो वे - जो है । उसे देखने में समर्थ हो पाती हैं । वास्तविक धार्मिक व्यक्ति वही है । जिसने सब धर्म छोड़ दिये हैं । जिसका अपना कोई धर्म नहीं है । और इस भांति धर्मो को छोड़कर वह धर्म हो जाता है । मुझसे लोग पूछते हैं कि - मैं किस धर्म का हूं ? में कहता हूं कि मैं धर्म का तो हूं । पर किसी धर्म का नहीं हूं । धर्म भी अनेक हो सकते हैं । यह मेरी अनुभूति में नहीं आता है । विचार भेद पैदा करते हैं । पर विचार से तो कोई धर्म में नहीं पहुंचता है । धर्म में पहुंचना तो निर्विचार से होता है । और निर्विचार में तो कोई भेद नहीं है । समाधि 1 है । और समाधि में जो सत्य ज्ञान होता है । वह भी 1 ही है । सत्य 1 है । पर मत अनेक हैं । मतों की अनेकता में जो 1 को चुनता है । वह सत्य के आने के लिए अपने ही हाथों द्वार बंद कर देता है । मतों को मुक्त करो । और मतों से मुक्त हो जाओ । और सत्य के लिए द्वार दो । यही मेरी शिक्षा है । समुद्र के नमक का स्वाद पूरब और पश्चिम में 1 है । और जल के वाष्पीभूत होने के नियम भिन्न भिन्न देशों में भिन्न भिन्न नहीं हैं । जन्म और मृत्यु की श्रंखला मेरे लिए अलग और आपके लिए अलग नहीं है । फिर अंतस सत्ता कैसे अनेक नियमों और सत्यों से परिचालित हो सकती है ? आत्मा में कोई भूगोल नहीं है । और न दिशाओं के कोई भेद हैं । और न कोई सीमाएं हैं । भेद मात्र मन के हैं । और जो मन के भेदों में विभाजित है । वह आत्मा के अभेद को उपलब्ध नहीं हो सकता है । मैं सुबह घूमकर लौट रहा था । तो 1 पक्षी को पिंजड़े में बंद देखा । उसे देख मुझे पक्षों में बंद लोगों की याद आयी । पक्ष भी पिंजड़े हैं - बहुत सूक्ष्म । अपने हाथों से निर्मित । उन्हें कोई और नहीं । हम स्वयं ही बना लेते हैं । वे अपने ही हाथों से बनाये गये कारागृह हैं । हम स्वयं उन्हें बनाते हैं । और फिर उनमें बंद होकर सत्य के मुक्त आकाश में उड़ने की सारी क्षमता खो देते हैं । और अभी मैं देख रहा हूं । आकाश में उड़ती 1 चील को । उसकी उड़ान में कितनी स्वतंत्रता है । कितनी मुक्ति है । 1 पिंजड़े में बंद पक्षी है । और 1 मुक्त आकाश में उड़न लेता । और दोनों क्या हमारे चित्त की 2 स्थितियों के प्रतीक नहीं हैं ? आकाश में उड़ता हुआ पक्षी न कोई पदचिह्न छोड़ता है । और न उड़ान का कोई मार्ग ही उसके पीछे बनता है । सत्य का भी ऐसा ही 1 आकाश है । जो मुक्त होते हैं । वे उसमें उड़ान लेते हैं । पर उनके पीछे पदचिह्न नहीं बनते हैं । और न कोई मार्ग ही निर्मित होते हैं । इसलिए स्मरण रहे कि सत्य के लिए बंधे बंधाये मार्ग की तलाश व्यर्थ है । ऐसा कोई मार्ग नहीं है । और यह शुभ ही है । क्योंकि बंधे मार्ग किसी बंधन तक ही पहुंचा सकते थे । वे मुक्त कैसे करा सकते हैं ? सत्य के लिए प्रत्येक को अपना मार्ग स्वयं ही बनाना होता है । और कितना सुंदर है । जीवन पटरियों पर चलती हुई गाडि़यों की तरह नहीं है । सुंदर पर्वतों से सागर की ओर दौड़ती हुई सरिताओं की भांति है ।
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प्रेम की झील में नौका विहार - आओ । प्रेम की 1 झील में नौका विहार करें । और ऐसी झील मनुष्य के इतिहास में दूसरी नहीं है । जैसी झील मीरा है । मानसरोवर भी उतना स्वच्छ नहीं है । और हंसों की ही गति हो सकेगी मीरा की इस झील में । हंस बनो । तो ही उतर सकोगे इस झील में । हंस न बने । तो न उतर पाओगे । हंस बनने का अर्थ है - मोतियों की पहचान आँख में हो । मोती की आकांक्षा हृदय में हो । हंसा तो मोती चुगे । कुछ और से राजी मत हो जाना । क्षुद्र से जो राजी हो गया । वह विराट को पाने में असमर्थ हो जाता है । नदी नालों के पानी से जो तृप्त हो गया है । वह मानसरोवरों तक नहीं पहुँच पाता । जरूरत ही नहीं रह जाती । मीरा की इस झील में तुम्हें निमंत्रण देता हूँ । मीरा नाव बन सकती है । मीरा के शब्द तुम्हें डूबने से बचा सकते हैं । उनके सहारे पर उस पार जा सकते हो । मीरा तीर्थंकर है । उसका शास्त्र प्रेम का शास्त्र है । शायद शास्त्र कहना भी ठीक नहीं । नारद ने भक्ति सूत्र कहे - वह शास्त्र है । वहाँ तर्क है । व्यवस्था है । सूत्रबद्धता है । वहाँ भक्ति का दर्शन हैं । मीरा स्वयं भक्ति है । इसलिए तुम्हें रेखाबद्ध तर्क न पाओगे । रेखाबद्ध तर्क वहाँ नहीं है । वहां तो हृदय में कौंधती हुई बिजली है । जो अपने आशियाने जलाने को तैयार होंगे । उनका ही संबंध जुड़ पाएगा । प्रेम से संबंध उन्हीं का जुड़ता है । जो सोच विचार खाने को तैयार हों । जो सिर गंवाने को उत्सुक हों । उस मूल्य को जो नहीं चुका सकता । वह सोचे भक्ति के संबंध में । विचारे । लेकिन भक्त नहीं हो सकता । तो मीरा के शास्त्र को शास्त्र कहना भी ठीक नहीं । शास्त्र कम है । संगीत ज्यादा है । लेकिन संगीत ही तो केवल भक्ति का शास्त्र हो सकता है । जैसे तर्क ज्ञान का शास्त्र बनता है । वैसे संगीत भक्ति का शास्त्र बनता है । जैसे गणित आधार है ज्ञान का । वैसे काव्य आधार है भक्ति का । जैसे सत्यकीखोज ज्ञानी करता है । भक्त सत्य की खोज नहीं करता । भक्त सौंदर्य की खोज करता है । भक्त के लिए सौंदर्य ही सत्य है । ज्ञानी कहता है - सत्य सुंदर है । भक्त कहता है - सौंदर्य सत्य हैं । रवीन्द्रनाथ ने कहा है - ब्यूटी इज़ ट्रुथ । सौंदर्य सत्य है । रवीन्द्रनाथ के पास भी वैसा ही हृदय है । जैसा मीरा के पास । लेकिन रवीन्द्रनाथ पुरुष हैं । गलते गलते पुरुष की अड़चने रह जाती हैं । मीरा जैसे नहीं पिघल पाते । खूब पिघले । जितना पिघल सकता है पुरुष । उतना पिघले । फिर भी मीरा जैसे नहीं पिघल पाते । मीरा स्त्री है । स्त्री के लिए भक्ति ऐसे ही सुगम है । जैसे पुरुष के लिए - तर्क और विचार ।
वैज्ञानिक कहते हैं - मनुष्य का मस्तिष्क 2 हिस्सों में विभाजित हैं । बाएँ तरफ जो मस्तिष्क हैं । वह सोच विचार करता है । गणित, तर्क, नियम, वहाँ सब श्रृंखला बद्ध हैं । और दाईं तरफ जो मस्तिष्क है । वह सोच विचार नहीं है । वहाँ भाव है । वहाँ अनुभूति है । वहाँ संगीत की चोट पड़ती है । वहाँ तर्क का कोई प्रभाव नहीं होता । वहाँ लयबद्धता पहुँचती है । वहाँ नृत्य पहुँच जाता है । सिद्धांत नहीं पहुँचते । प्रेम में कोई विधि नहीं होती । विधान नहीं होता । प्रेम की क्या विधि ? और क्या विधान ? हो जाता है बिजली की कौंध की तरह । हो गया । तो हो गया । नहीं हुआ । तो करने का कोई उपाय नहीं है । पुरुषों ने भी भक्ति के गीत गाए हैं । लेकिन मीरा का कोई मुकाबला नहीं है । क्योंकि मीरा के लिए । स्त्री होने के कारण । जो बिलकुल सहज है । वह पुरुष के लिए थोड़ा आरोपित सा मालूम पड़ता है । पुरुष भक्त हुए । जिन्होंने अपने को परमात्मा की प्रेयसी माना । पत्नी माना । मगर बात कुछ अड़चन भरी हो जाती है । संप्रदाय है ऐसे भक्तों का । बंगाल में आज भी जीवित पुरुष हैं । लेकिन अपने को मानते हैं - कृष्ण की पत्नी । रात स्त्री जैसा श्रृंगार करके । कृष्ण की मूर्ति को छाती से लगाकर सो जाते हैं । मगर बात में कुछ बेहूदापन लगता है । बात कुछ जमती नहीं । ऐसा भी बेहूदापन लगता है । जैसे कि तुम । जहाँ जो नहीं होना चाहिए । उसे जबरदस्ती बिठाने की कोशिश करो । तो लगे । पुरुष पुरुष है । उसके लिए स्त्री होना ढोंग ही होगा । भीतर तो वह जानेगा ही - मैं पुरुष हूँ । ऊपर से तुम स्त्री के वस्त्र भी पहन लो । और कृष्ण की मूर्ति को हृदय से भी लगा लो । तब भी तुम भीतर के पुरुष को इतनी आसानी से खो न सकोगे । यह सुगम नहीं होगा ।
स्त्रियाँ भी हुई हैं । जिन्होंने ज्ञान के मार्ग से यात्रा की है । मगर वहाँ भी बात कुछ बेहूदी हो गई । जैसे ये पुरुष बेहूदे लगते हैं । और थोड़ा सा विचार पैदा होता है कि ये क्या कर रहे हैं ? ये पागल तो नहीं हैं । ऐसे ही ‘लल्ला’ कश्मीर में हुई । वह महावीर जैसे विचार में पड़ गई होगी । उसने वस्त्र फेंक दिए । वह नग्न हो गई । लल्ला में भी थोड़ा सा कुछ अशोभन मालूम होता है । स्त्री अपने को छिपाती है । वह उसके लिए सहज है । वह उसकी गरिमा है । वह अपने को ऐसा उघाड़ती नहीं । ऐसा उघाड़ती है । तो वेश्या हो जाती है ।
लल्ला ने बड़ी हिम्मत की - फेंक दिए वस्त्र । असाधाराण स्त्री रही होगी । लेकिन थोड़ी सी अस्वाभाविक मालूम होती है बात । महावीर के लिए नग्न खड़े हो जाना अस्वाभाविक नहीं लगता । बिलकुल स्वाभाविक लगता है । ऐसी ही बात है । ओशो 
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