05 जनवरी 2014

काल पुरुष की कलाबाजियां

अनुराग सागर को पढने के बाद हमारे पाठक धर्मेंन्द्र कुमार के मन में कुछ शंकायें कुछ प्रश्न उठे । जिन्हें उन्होंने ई मेल द्वारा पूछा । उन्हीं शंकाओं का निवारण इस पोस्ट में किया गया है ।


pranam rajeev ji   please ans my question
1 - anurag sagar ke anusar ashtangi ke teen putra hain brhama, vishnu, shanker .  apne baap ko khojne vishnu neeche gaye . aur brhama uper . and vishnu sheshnag ke vish se neelvarn ke ho gaye tab akashvani hui ki tum dwaper yug me shesh nag se badla loge . ab laut jao and wo laut aaye.
you said on blog many time - krishna and vishnu alag alag hain. and kallu hi krishna hai . .tab vishnu ne sheshnag se badla kahaan liya. qki wo krishna nahi hai
- पहले किसी चीज को गौर से पढें । फ़िर कई पहलुओं से विचार करें । जब आकाशवाणी हुयी । तो किसने की ? स्वयं कालपुरुष ने । यदि विष्णु को खुद सब पता होता । या विष्णु अपने ही स्तर से बदला लेने में सक्षम होते ।

तो उसी वक्त नहीं ले लेते । द्वापर का इंतजार क्यों करते ? क्योंकि वो आकाशवाणी और उसके करने वाले से सदा अनजान थे । फ़िर उन्होंने आकाशवाणी का कैसे विश्वास कर लिया ? ध्यान रहे । तत्कालीन समय स्थिति अनुसार अष्टांगी ने कहा था - वही सर्वेसर्वा है । और वे तीन भाई ही प्रमुख हैं । फ़िर आकाशवाणी कौन कर रहा था ? चलो माना । वेद से उन्होंने पता कर लिया कि - पुरुष कोई और है । तो भी वो उन्हें अभी हकीकत या प्रत्यक्ष नहीं हुआ था ।
अब अपने प्रश्न को समझिये - बदला कैसे लिया ? ये मनुष्य क्या है ? पाँच तत्व से बना मिट्टी का पुतला ही तो है । तब इसमें जो बदला या उपकार आदि करता है । वो कौन करता है । क्या - वायु जल अग्नि प्रथ्वी आकाश इन तत्वों में से कोई ? नहीं । बदला, मन इस शरीर के माध्यम से लेता है । और मन ही बदले की भावना पूर्ण होने पर तुष्टि पाता है । क्या आपने कभी प्रेतक घटनाओं या दैवीय आवेशों के बारे में अनुभव किया है । उस समय एक ही शरीर में शरीर स्वामी के अतिरिक्त एक या कई आत्मायें तक कैसे जुङ जाती हैं ? रामायण में कुम्भकरण के वरदान मांगते समय और कैकयी को बरगलाने के समय कुब्जा की जिह्वा या मन को सरस्वती ने देवताओं के कहने पर कैसे कब्जा कर लिया था ? अब ये दोष या क्रिया किसके द्वारा हुयी ? मेघनाद ने राम की सेना को भृमित करने के लिये नकली सीता ही बना दी थी । और जिस सीता का अपहरण हुआ । वह भी अग्नि सीता थी । ये सब कैसे हुआ ? आज अमेरिका कहीं मिसाइल हमला आदि करे । तो कहा जाता है - अमेरिका ने हमला कर दिया । आपने कभी सोचा ? क्या अमेरिका नाम की कोई एक जगह ? इस प्रथ्वी पर है भी ? वो अमेरिका हमला कर सकता है । या उसका राष्ट्रपति मिसायल दागेगा ? तब नियम अनुसार तन्त्र और प्रतिनिधि आदेशित कार्य करते हैं । क्योंकि यह अल्पज्ञ और तुच्छ की श्रेणी में आने वाले मानवों के क्रियाकलाप नहीं हैं । अतः दैवीय तन्त्र ऐसे विज्ञानों के लिये बहुत विकसित और कल्पना से परे है । मैं पहले भी इस बात का जबाब दे चुका हूँ कि - राम या श्रीकृष्ण के रुप में एक प्रतिनिधि पुतला अवतरित हुआ । जिसमें काल पुरुष की प्रमुख शक्ति और विष्णु का सत्व गुण और अंतकरण भावना, विभिन्न शाप और साधुओं भक्तों की तपस्या प्रार्थनाओं के आधार पर तथा और भी तमाम सृष्टि जनित कारणों से एक कृमादेशित ( प्रोग्राम्ड ) दिव्य शरीर प्रकट किया गया । जिसने सिर्फ़ व्यक्तिगत भावनाओं से जुङे कार्य न करके एक सत्ता से जुङे व्यक्ति की भांति कार्य किये । यदि आपकी बात ही मान लें कि विष्णु ही राम या कृष्ण थे । तो गौर करें । वही शेषनाग राम के साथ लक्ष्मण और श्रीकृष्ण के साथ बलराम रूप में अवतारी हुआ । और बहुत सहयोगी सेवाभावी और आज्ञाकारी भी था । इसलिये धर्म इतना सूक्ष्म विषय है कि स्थूल बिन्दुओं स्थूल नजरिये से इसको नहीं समझा जा सकता । इन्हीं हिन्दू धर्म शास्त्रों में सूक्ष्म विज्ञान के अंतर्गत विष्णु को सिर्फ़ सतगुण बताया गया है । अब बताओ । ये सब क्या है । महज एक गुण को इतना बङा पद या स्वामी आदि कैसे बता दिया ?


2 - aapne blog par kaha hai - vishnu ek pad hai . lekin anurag sagar ke anusar  wo kallu ashtangi ke dhitiya putra hain.
वो एक पद भी है । देवता भी है । सिर्फ़ सत गुण भी है । अष्टांगी का पुत्र भी है । और इस स्थिति को प्राप्त हुआ कोई पुण्यात्मा जीव भी है । जैसे संसार में एक पद उसकी स्थिति और उससे जुङे तमाम क्रियाकलाप सांसारिक नियम अनुसार होते हैं । ऐसे ही ये सृष्टि बनने के बाद जो खेल शुरू हुआ । वह चलता रहता है । पर इंसान जितना जान पाता है । उतना ही समझ पाता है ।

3 - aapke anusar krishna paramhans gyani hain.  tab he kulshreshth ! batayein ki wo kal pursh kyu kar huye. qki kallu to satya purush ka putra hai . to wo kabeer ke samkaksh hai .
स्वभाव, स्व गुण, स्व पदार्थ, तात्कालिक ज्ञान और स्वेच्छा भाव अनुसार ही जीव विभिन्न गतिविधियों, पदों और उनके अंजाम को प्राप्त होता है । श्रीकृष्ण को सही शब्दों में सिर्फ़ योगेश्वर या इस त्रिलोकी का राष्ट्रपति या स्वामी कहा जा सकता है । द्वैत और अद्वैत के परमहँस तथा गुरु अनुसार परमहँस की स्थितियां अलग अलग होती हैं । जैसे राज्य और केन्द्र के एक ही पद के मुख्यमन्त्री की पावर अधिकार और अन्य चीजों में बहुत अन्तर हो जाता है । कोई भी योगी काल पुरुष की स्थिति तक पहुँच कर अनेक कारणों वश आगे नहीं बढ पाया । या मोहित हो गया । या आगे का गुरु नहीं मिल पाया । तो उस स्थिति पर रुक जाना नियमानुसार उसकी मजबूरी ही है । या स्वेच्छा भी । ये बहुत सूक्ष्म विषय है । जो कम शब्दों में समझाना संभव नहीं है ।  

agar krishna paramhans gyani the. to unhone apni aage ki yatra kyu puri nahi ki .
इस संसार में बहुत से व्यक्ति छोटे मन्त्री आदि बनने के बाद प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति आदि बनना चाहते हैं । तो वो क्यों नहीं बन पाते । या जो बन जाते हैं । वो हमेशा क्यों नहीं बने रहते । एक समृद्ध उद्योगपति सभी जगह बिजनेस फ़ैलाना चाहता है । क्यों नहीं फ़ैला पाता । कम्प्यूटर से अच्छे कोर्स किये युवा । सभी लाखों कमाने की सोच लेकर शुरू करते हैं । क्यों नही कर पाते ? जब एक शादी होती है । तो तमाम निरीक्षण परीक्षण तमाम शुभकामनायें तमाम नियम कानून उनके आजीवन सुखद वैवाहिक जीवन के लिये ही किये जाते हैं । और खुद उन नवदंपत्ति की भी यही सोच होती है । फ़िर कुछ ही दिनों में तलाक वैमनस्य झगङे की नौबते क्यों आती हैं ? इसलिये जब एक छोटे स्तर पर चार दिन के जीवन में ये सब नहीं हो पाता । तो वहाँ तो बहुत लम्बा खेल है । लेकिन वो भी सृष्टि ही है । और ये भी सृष्टि ही है । और दोनों में ही मूल जीवात्मा है । और उसका मूल परमात्मा है ।  

4 - blog par aapne likha hai ki tapasya karne se shakti milti hai  mukti nahi . param purush nahi . fir kalpurush ne ek pair par khade hokar tap karke kaise param purush se  sab kuchh maang liya. agar wo chahta to mukti bhi mil jati .
वह पहले से ही मुक्त था । उसे तपस्या करने की भी कोई जरूरत नहीं थी । लेकिन वह उससे हटकर अलग इच्छा रूपी राज्य की स्थापना करना चाहता था । इसलिये उसने ये सब श्रम किया । सबसे पूर्व में इसका नाम " निरंजन " था । जो कृमशः इसकी चेष्टाओं से फ़िर धर्मराय, कालपुरुष, यमराय आदि में परिवर्तित हुआ । बाद में जीवों के मन को इसने काबू में किया । और अपने अनुसार क्रियान्वित किया । अपने त्रिलोकी सत्ताओं के संचालन हेतु इसने एक तरह से दो महत्वपूर्ण उच्च मान्य पदों का निर्माण किया । जो श्रीकृष्ण और राम के रूप में प्रसिद्ध हुये । क्योंकि ये स्वयं गुप्त ही रहना चाहता था । इस तरह से ये सब कहानी बन गयी । जो अभी तक चल रही है । क्योंकि मूल रूप में जीवात्मा अविनाशी अमर और अमल है । परमात्मा का अंश ही है । इसलिये ये सब मन के स्तर पर ही चल रहा है । वैसे कुल मिलाकर तो वही एक परमात्मा ही सब रूपों में है ।

kalpurush ne apne bhai ke pet fad kar teeno lok le liye tab bhi sat purush ne kuchh ni  kia q ?
सत पुरुष ने इसके क्रूर अमर्यादित आचरण को देखते हुये इसे सचखंड से प्रतिबंधित कर दिया । और बाद में अष्टांगी को भी वासना झुकाव और नियम विरुद्ध आचरण से निकाल दिया गया । विभिन्न देशीय धार्मिक ग्रन्थों में इन्हीं को आदम हव्वा, एडम इव, और पहला स्त्री पुरुष कहा गया है । क्योंकि स्त्री पुरुष वासना काम वासना का मूल इन्हीं दोनों से शुरू हुआ ।

he shreshth ! ho sakta hai aapke liye ye sawal nirarthak ho but mere liye bahut kuchh  hain. jab tak javab ni mil jata. bechain rahunga. . truti aur hathat ke liya forgive me plzzzzzz -  dkumar

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सुख देवे दुःख को हरे करे पाप का अन्त । 
कह कबीर वे कब मिलें परम स्नेही सन्त ।
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सतगुरु जय गुरुदेव - बाबाजी की है ललकार । घनघोर अध्यात्मिक प्रचार । न ये रुकने वाला है ।  कलियुग जाने वाला है । सतयुग आने वाला है । समर बहादुर शेर सिपाही सतयुग का रखवाला । सतयुग दया मेहर से भाई ताला खुलने वाला है । आप सभी सतसंगियों से निवेदन है कि नीचे लिंक पर क्लिक करें ।
http://www.satgurujaigurudev.org/
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Give me control over a nations currency, and I care not who makes its laws - Baron M.A. Rothschild
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