12 जून 2016

इंसान और भगवान

एक दयालु व्यक्ति था । एक दिन उसके पास एक निर्धन आदमी आया । और बोला कि मुझे अपना खेत कुछ साल के लिये उधार दे दीजिये । मैं उसमे खेती करूंगा और खेती करके कमाई करूंगा ।
उस व्यक्ति ने निर्धन व्यक्ति को अपना खेत दे दिया । साथ में पांच किसान भी सहायता के रूप में खेती करने को दिये । और कहा कि - इन पांच किसानों को साथ में लेकर खेती करो । खेती करने में आसानी होगी । इससे तुम और अच्छी फसल की खेती करके कमाई कर पाओगे ।
निर्धन आदमी ये देखकर बहुत खुश हुआ कि उसको उधार में खेत भी मिल गया और साथ में पांच सहायक किसान भी मिल गये ।
वह आदमी इसी ख़ुशी में खोया रहा । और वह पांच किसान अपनी मर्ज़ी से खेती करने लगे । जब फसल काटने का समय आया तो देखा कि फसल बहुत ही ख़राब हुई थी । उन पांच किसानों ने खेत का उपयोग अच्छे से नहीं किया था । न ही अच्छे बीज डाले । जिससे अच्छी फसल हो सके ।
जब दयालु व्यक्ति ने अपना खेत वापस मांगा । तो वह निर्धन व्यक्ति रोता हुआ बोला कि - मैं बर्बाद हो गया । मैं अपनी ख़ुशी में डूबा रहा और इन पांच किसानो को नियंत्रण में न रख सका । न ही इनसे अच्छी खेती करवा सका ।
दयालु व्यक्ति - भगवान
निर्धन व्यक्ति - इंसान
खेत - शरीर
पांच किसान - इन्द्रियां.. आंख, कान, नाक, जीभ और मन ।
प्रभु ने हमें यह शरीर रुपी खेत अच्छी फसल ( कर्म ) करने को दिया है । हमें इन पांच किसानों अर्थात इन्द्रियों को नियंत्रण में रख कर कर्म करने चाहिये । जिससे वो दयालु प्रभु जब ये शरीर वापस मांग कर हिसाब करें । तो हमें रोना न पड़े ।
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हृदय भीतर आरसी, मुख देखा नहिं जाय ।
मुख तो तबही देखि हो, जब दिल की दुविधा जाय । बीजक साखी 29  
- परमात्मा को देखने के लिए हृदय के भीतर आरसी तुल्य जीवात्मा का वास है । परंतु परमात्मा का साक्षात्कार नहीं किया जाता । क्योंकि परमात्मा को तभी देखा जा सकता है । जब दिल से दुविधा - देहाध्यास नष्ट न हो जाए ।
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