28 मई 2016

भीष्म पितामह के उपदेश

महाभारत में शरशैय्या पर पडे भीष्म पितामह ने पाण्डवों को बहुत ही प्रेरणास्पद धर्मोपदेश किए थे । उनमें से उन्होंने मृत्यु को जीतने के उपाय भी बताए थे । यदि व्यक्ति वेदानुकूल आचरण करे । जीवन को छल कपट और अहिंसा से रहित करे । तो वह मृत्यु को जीत सकता है । इनमें से कुछ उपाय पढें
हिंसा का त्याग - यदि कोई मनुष्य हिंसा का त्याग कर अहिंसा को अपने जीवन में अपना ले । तो वह व्यक्ति अपने सम्पूर्ण जीवन में सदैव सुखी रहेगा । किसी को मारना, अपशब्द कहना, आँखें दिखाना, किसी के साथ मारपीट करना या किसी के साथ हिंसा करना इस प्रकार के व्यक्ति ऐसा कर दूसरों को तो चोट पहुंचाते हैं । साथ ही वे खुद भी इसकी चपेट में आ जाते हैं । और अपने आपको नुकसान पहुंचा बैठते हैं ।
जो व्यक्ति सदैव दूसरे के साथ प्रेम पूर्वक व्यवहार करता है । तथा दूसरों की मदद के लिए सदैव तत्पर रहता है । ऐसे व्यक्ति हमेशा भगवान को प्रिय होते हैं । तथा वे उनकी रक्षा करते हैं । इस प्रकार के गुण को अपनाने वाले व्यक्ति की आयु निश्चित ही लम्बी होती है । 
वेद, पुराणों और अन्य धर्मग्रंथों में अहिंसा को मनुष्य का परम धर्म बताया गया है ।
अहिंसा परमो धर्मः । अतः हमें इन तीनों ( मन, वचन, कर्म ) प्रकार की हिंसा से सदैव बचकर रहना चाहिए । मन से हिंसा का अभिप्राय किसी के बारे में बुरे विचार सोचने से है । वचन से अभिप्राय दूसरे के बारे में बुरा बोलने व कर्म से अभिप्राय किसी को शारीरिक कष्ट पहुंचाने से है ।

कभी झूठ न बोलना - मनुष्य को सदैव सत्य बोलना चाहिए । क्योंकि असत्य के सहारे वह कुछ पल के लिए अपने आपको मुसीबत से बचा तो लेता है । परन्तु आगे चलकर उसको इस झूठ का बहुत भयंकर परिणाम झेलना पड़ता है । समाज के सामने ऐसे व्यक्ति की छवि धूमिल होने के साथ ही साथ वह व्यक्ति अपने परिवार का प्रेम और विश्वास भी खो बैठता है । असत्य बोलने वाला व्यक्ति सदैव भयभीत और बेचैन रहता है । तथा इसका प्रभाव उसके स्वास्थ पर भी पड़ता है । जिस कारण उसकी आयु कम हो जाती है । यदि मनुष्य अपनी लम्बी उम्र चाहता है । तो उसे सदैव सत्य बोलना चाहिए । क्योंकि असत्य का सहारा लेने पर वह सदैव उस असत्य के कारण अंदर से भयभीत रहेगा । तथा उसे बहुत सी बीमारियाँ आ घेरेंगी व अंत में वह अपनी पूर्ण आयु जीये बिना ही मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा ।

छल कपट न करना - जो व्यक्ति सदैव सदाचार का पालन कर अपना जीवन व्यतीत करता है । तथा हमेशा छल कपट की भावना से दूर रहता है । इस प्रकार के व्यक्ति का मन सदैव प्रसन्न रहता है । मनुष्य को छल-कपट की भावना से बचते हुए अपने आपको ईश्वर भक्ति और समाज की भलाई के कार्यो में लगाना चाहिए । ऐसा कर मनुष्य के मन को बहुत शांति महसूस होती है । और शांत मन के कारण मनुष्य को कभी कोई बीमारी नहीं होती । कहा भी है कि शांत मन स्वस्थ शरीर की निशानी होती है । इस गुण का पालन कर मनुष्य अधिक समय तक जीवित रह सकता है ।

क्रोध न करना - क्रोध को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है । क्योंकि क्रोध किसी भी मनुष्य के सोचने समझने की क्षमता को हर लेता है । तथा क्रोध के आवेश में मनुष्य अनेक बार ऐसा कार्य कर देता है । जिसका उसे अपनी पूरी जिंदगी पछतावा होता है । बगैर किसी कारण हर बार गुस्सा करने से मनुष्य के मस्तिष्क ( मन ) में बुरा प्रभाव पड़ता है । और दिन प्रतिदिन उसकी आयु कम होती जाती है ।
क्रोध धीरे धीरे मनुष्य के स्वभाव को हिंसक बना देता है । तथा वह मन और शरीर दोनों प्रकार से अस्वस्थ होने लगता है । क्रोध न करने वाले व्यक्ति का मन सदैव शांत बना रहता है । और उसका स्वास्थ्य उत्तम होता है । उसकी आयु भी बहुत लम्बी होती है ।
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