28 मई 2016

केवल दो हाथ न होने से

एक बाग में एक फ़क़ीर रहता था । उस बाग़ में मच्छर बहुत थे । मैंने कई बार देखा उस फ़क़ीर को । उसके दोनों बाज़ू नहीं थे । आवाज़ देकर, माथा झुकाकर वह पैसा माँगता था । 
एक बार मैंने उस फ़क़ीर से पूछा -  पैसे तो माँग लेते हो, रोटी कैसे खाते हो ?
उसने बताया -  जब शाम उतर आती है । तो उस नानबाई को पुकारता हूँ..ओ जुम्मा । आके पैसे ले जा, रोटियाँ दे जा । वह भीख के पैसे उठा ले जाता है, रोटियाँ दे जाता है ।
मैंने पूछा -  खाते कैसे हो बिना हाथों के ?
वह बोला -  खुद तो खा नहीं सकता । आने जाने वालों को आवाज़ देता हूँ..ओ जाने वालों । प्रभु तुम्हारे हाथ बनाए रखे । मेरे ऊपर दया करो । रोटी खिला दो मुझे, मेरे हाथ नहीं हैं । हर कोई तो सुनता नहीं, लेकिन किसी किसी को तरस आ जाता है । वह प्रभु का प्यारा मेरे पास आ बैठता है । ग्रास तोड़कर मेरे मुँह में डालता जाता है, मैं खा लेता हूँ । 
सुनकर मेरा दिल भर आया । मैंने पूछ लिया -  पानी कैसे पीते हो ?
उसने बताया -  इस घड़े को टांग के सहारे झुका देता हूँ । प्याला भर जाता है । तब पशुओं की तरह झुककर पानी पी लेता हूँ ।
मैंने कहा -  यहाँ मच्छर बहुत हैं । यदि मच्छर लड़ जाए तो क्या करते हो ?
वह बोला -  तब शरीर को ज़मीन पर रगड़ता हूँ । पानी से निकली मछली की तरह लोटता और तड़पता हूँ । 
हाय । केवल दो हाथ न होने से कितनी दुर्गति होती है ।
अरे, इस शरीर की निंदा मत करो । यह तो अनमोल रत्न है । शरीर का हर अंग इतना कीमती है कि संसार का कोई भी खज़ाना उसका मोल नहीं चुका सकता । परन्तु यह भी तो सोचो कि यह शरीर मिला किसलिए है ? इसका हर अंग उपयोगी है । इनका उपयोग करो ।
स्मरण रहे कि ये आँखे पापों को ढूँढने के लिए नहीं मिलीं ।
कान निंदा सुनने के लिए नहीं मिले ।
हाथ दूसरों का गला दबाने के लिए नहीं मिले ।
मन अहंकार में डूबने या मोह माया में फंसने को नहीं मिला ।
आँख सच्चे पातशाह वाहेगुरू की खोज के लिये मिली है । जो हमें परमात्मा के बताये मार्ग पर चलने सिखाये ।
हाथ प्राणी मात्र की सेवा करने को मिले हैं ।
पैर उस रास्ते पर चलने को मिले हैं । जो परम पद तक जाता हो ।
कान उस संदेश सुनने को मिले हैं । जिसमें परम पद पाने का मार्ग बताया जाता हो ।
जिह्वा वाहेगुरू का गुणगान करने को मिली है ।
मन उस वाहेगुरू का लगातार शुक्र और सुमिरन करने को मिला है ।
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