14 दिसंबर 2014

एन्जीओप्लास्टी का सच

महत्वपूर्ण समाचार - ये याद रखिये कि भारत में सबसे ज्यादा मौतें कोलस्ट्रोल बढ़ने के कारण हार्ट अटैक से होती हैं । आप खुद अपने ही घर में ऐसे बहुत से लोगों को जानते होंगे । जिनका वजन व कोलस्ट्रोल बढ़ा हुआ है । अमेरिका की कईं बड़ी बड़ी कंपनियां भारत में दिल के रोगियों heart patients को अरबों की दवाई बेच रही हैं । लेकिन अगर आपको कोई तकलीफ हुई । तो डाक्टर कहेगा - angioplasty एन्जीओप्लास्टी करवाओ । इस आपरेशन मे डाक्टर दिल की नली में एक spring डालते हैं । जिसे stent कहते हैं । यह stent अमेरिका में बनता है । और इसका cost of production सिर्फ 3 डालर ( रू.150-180 ) है । इसी stent को भारत मे लाकर 3-5 लाख रूपए में बेचा जाता है । व आपको लूटा जाता है । डॉक्टरों को लाखों रूपए का commission मिलता है । इसलिए वह आपसे बारबार कहता है - angioplasty करवाओ । Cholestrol, BP या heart attack आने की मुख्य वजह है - Angioplasty आपरेशन ।
यह कभी किसी का सफल नहीं होता । क्योंकि डाक्टर जो spring दिल की नली में डालता है । वह बिलकुल pen की spring की तरह होती है । कुछ ही महीनों में उस spring की दोनों साइडों पर आगे व पीछे blockage ( cholestrol व fat ) जमा होना शुरू हो जाता है । इसके बाद फिर आता है - दूसरा heart attack हार्ट अटैक
डाक्टर कहता है - फिर से angioplasty करवाओ । आपके लाखों रूपए लूटता है । और आपकी जिंदगी इसी में निकल जाती है ।
अब पढ़िए उसका आयुर्वेदिक इलाज -
अदरक ginger juice - यह खून को पतला करता है । यह दर्द को प्राकृतिक तरीके से 90% तक कम करता है ।
लहसुन garlic juice - इसमें मौजूद allicin तत्व cholesterol व BP को कम करता है ।
वह हार्ट ब्लॉकेज को खोलता है ।
नींबू lemon juice - इसमें मौजूद antioxidants, vitamin C व potassium खून को साफ़ करते हैं । ये रोग प्रतिरोधक क्षमता immunity बढ़ाते हैं ।
एप्पल साइडर सिरका  apple cider vinegar - इसमें 90 प्रकार के तत्व हैं । जो शरीर की सारी नसों को खोलते है । पेट साफ़ करते हैं । व थकान को मिटाते हैं ।
इन देशी दवाओं को इस तरह उपयोग में लें -
1 कप नींबू का रस लें । 1 कप अदरक का रस लें ।
1 कप लहसुन का रस लें । 1 कप एप्पल का सिरका लें ।
चारों को मिलाकर धीमीं आंच पर गरम करें । जब 3 कप रह जाए । तो उसे ठण्डा कर लें ।
उसमें 3 कप शहद मिला लें । रोज इस दवा के 3 चम्मच सुबह खाली पेट लें । जिससे सारी ब्लॉकेज खत्म हो जाएंगी ।
आप सभी से हाथ जोड़कर विनती है कि इस मैसेज को ज्यादा से ज्यादा प्रसारित करें । ताकि सभी इस दवा से अपना इलाज कर सकें ।
जनहित में साभार एक बेवपेज से

09 मार्च 2014

जिसका अपना कोई धर्म नहीं है

सत्य 1 है - सत्य के मार्ग पर वह व्यक्ति है । जिसने सारे मतों को तिलांजलि दे दी है । जिसका कोई पक्ष है । और कोई मत है । सत्य उसका नहीं हो सकता । सब पक्ष मनुष्य मन से निर्मित हैं । सत्य का कोई पक्ष नहीं है । और इसलिए जो निष्पक्ष होता है । पक्ष शून्य होता है । वह सत्य की ओर जाता है । और सत्य उसका हो जाता है । इसलिए किसी पक्ष को न चाहो । किसी संप्रदाय को न चाहो । किसी दर्शन को न चाहो । चित्त को उस स्थिति में ले चलो । जहां सब पक्ष अनुपस्थित हैं । उसी बिंदु पर विचार मिटता । और दर्शन प्रारंभ होता है । आंखें जब पक्ष मुक्त होती हैं । तो वे - जो है । उसे देखने में समर्थ हो पाती हैं । वास्तविक धार्मिक व्यक्ति वही है । जिसने सब धर्म छोड़ दिये हैं । जिसका अपना कोई धर्म नहीं है । और इस भांति धर्मो को छोड़कर वह धर्म हो जाता है । मुझसे लोग पूछते हैं कि - मैं किस धर्म का हूं ? में कहता हूं कि मैं धर्म का तो हूं । पर किसी धर्म का नहीं हूं । धर्म भी अनेक हो सकते हैं । यह मेरी अनुभूति में नहीं आता है । विचार भेद पैदा करते हैं । पर विचार से तो कोई धर्म में नहीं पहुंचता है । धर्म में पहुंचना तो निर्विचार से होता है । और निर्विचार में तो कोई भेद नहीं है । समाधि 1 है । और समाधि में जो सत्य ज्ञान होता है । वह भी 1 ही है । सत्य 1 है । पर मत अनेक हैं । मतों की अनेकता में जो 1 को चुनता है । वह सत्य के आने के लिए अपने ही हाथों द्वार बंद कर देता है । मतों को मुक्त करो । और मतों से मुक्त हो जाओ । और सत्य के लिए द्वार दो । यही मेरी शिक्षा है । समुद्र के नमक का स्वाद पूरब और पश्चिम में 1 है । और जल के वाष्पीभूत होने के नियम भिन्न भिन्न देशों में भिन्न भिन्न नहीं हैं । जन्म और मृत्यु की श्रंखला मेरे लिए अलग और आपके लिए अलग नहीं है । फिर अंतस सत्ता कैसे अनेक नियमों और सत्यों से परिचालित हो सकती है ? आत्मा में कोई भूगोल नहीं है । और न दिशाओं के कोई भेद हैं । और न कोई सीमाएं हैं । भेद मात्र मन के हैं । और जो मन के भेदों में विभाजित है । वह आत्मा के अभेद को उपलब्ध नहीं हो सकता है । मैं सुबह घूमकर लौट रहा था । तो 1 पक्षी को पिंजड़े में बंद देखा । उसे देख मुझे पक्षों में बंद लोगों की याद आयी । पक्ष भी पिंजड़े हैं - बहुत सूक्ष्म । अपने हाथों से निर्मित । उन्हें कोई और नहीं । हम स्वयं ही बना लेते हैं । वे अपने ही हाथों से बनाये गये कारागृह हैं । हम स्वयं उन्हें बनाते हैं । और फिर उनमें बंद होकर सत्य के मुक्त आकाश में उड़ने की सारी क्षमता खो देते हैं । और अभी मैं देख रहा हूं । आकाश में उड़ती 1 चील को । उसकी उड़ान में कितनी स्वतंत्रता है । कितनी मुक्ति है । 1 पिंजड़े में बंद पक्षी है । और 1 मुक्त आकाश में उड़न लेता । और दोनों क्या हमारे चित्त की 2 स्थितियों के प्रतीक नहीं हैं ? आकाश में उड़ता हुआ पक्षी न कोई पदचिह्न छोड़ता है । और न उड़ान का कोई मार्ग ही उसके पीछे बनता है । सत्य का भी ऐसा ही 1 आकाश है । जो मुक्त होते हैं । वे उसमें उड़ान लेते हैं । पर उनके पीछे पदचिह्न नहीं बनते हैं । और न कोई मार्ग ही निर्मित होते हैं । इसलिए स्मरण रहे कि सत्य के लिए बंधे बंधाये मार्ग की तलाश व्यर्थ है । ऐसा कोई मार्ग नहीं है । और यह शुभ ही है । क्योंकि बंधे मार्ग किसी बंधन तक ही पहुंचा सकते थे । वे मुक्त कैसे करा सकते हैं ? सत्य के लिए प्रत्येक को अपना मार्ग स्वयं ही बनाना होता है । और कितना सुंदर है । जीवन पटरियों पर चलती हुई गाडि़यों की तरह नहीं है । सुंदर पर्वतों से सागर की ओर दौड़ती हुई सरिताओं की भांति है ।
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प्रेम की झील में नौका विहार - आओ । प्रेम की 1 झील में नौका विहार करें । और ऐसी झील मनुष्य के इतिहास में दूसरी नहीं है । जैसी झील मीरा है । मानसरोवर भी उतना स्वच्छ नहीं है । और हंसों की ही गति हो सकेगी मीरा की इस झील में । हंस बनो । तो ही उतर सकोगे इस झील में । हंस न बने । तो न उतर पाओगे । हंस बनने का अर्थ है - मोतियों की पहचान आँख में हो । मोती की आकांक्षा हृदय में हो । हंसा तो मोती चुगे । कुछ और से राजी मत हो जाना । क्षुद्र से जो राजी हो गया । वह विराट को पाने में असमर्थ हो जाता है । नदी नालों के पानी से जो तृप्त हो गया है । वह मानसरोवरों तक नहीं पहुँच पाता । जरूरत ही नहीं रह जाती । मीरा की इस झील में तुम्हें निमंत्रण देता हूँ । मीरा नाव बन सकती है । मीरा के शब्द तुम्हें डूबने से बचा सकते हैं । उनके सहारे पर उस पार जा सकते हो । मीरा तीर्थंकर है । उसका शास्त्र प्रेम का शास्त्र है । शायद शास्त्र कहना भी ठीक नहीं । नारद ने भक्ति सूत्र कहे - वह शास्त्र है । वहाँ तर्क है । व्यवस्था है । सूत्रबद्धता है । वहाँ भक्ति का दर्शन हैं । मीरा स्वयं भक्ति है । इसलिए तुम्हें रेखाबद्ध तर्क न पाओगे । रेखाबद्ध तर्क वहाँ नहीं है । वहां तो हृदय में कौंधती हुई बिजली है । जो अपने आशियाने जलाने को तैयार होंगे । उनका ही संबंध जुड़ पाएगा । प्रेम से संबंध उन्हीं का जुड़ता है । जो सोच विचार खाने को तैयार हों । जो सिर गंवाने को उत्सुक हों । उस मूल्य को जो नहीं चुका सकता । वह सोचे भक्ति के संबंध में । विचारे । लेकिन भक्त नहीं हो सकता । तो मीरा के शास्त्र को शास्त्र कहना भी ठीक नहीं । शास्त्र कम है । संगीत ज्यादा है । लेकिन संगीत ही तो केवल भक्ति का शास्त्र हो सकता है । जैसे तर्क ज्ञान का शास्त्र बनता है । वैसे संगीत भक्ति का शास्त्र बनता है । जैसे गणित आधार है ज्ञान का । वैसे काव्य आधार है भक्ति का । जैसे सत्यकीखोज ज्ञानी करता है । भक्त सत्य की खोज नहीं करता । भक्त सौंदर्य की खोज करता है । भक्त के लिए सौंदर्य ही सत्य है । ज्ञानी कहता है - सत्य सुंदर है । भक्त कहता है - सौंदर्य सत्य हैं । रवीन्द्रनाथ ने कहा है - ब्यूटी इज़ ट्रुथ । सौंदर्य सत्य है । रवीन्द्रनाथ के पास भी वैसा ही हृदय है । जैसा मीरा के पास । लेकिन रवीन्द्रनाथ पुरुष हैं । गलते गलते पुरुष की अड़चने रह जाती हैं । मीरा जैसे नहीं पिघल पाते । खूब पिघले । जितना पिघल सकता है पुरुष । उतना पिघले । फिर भी मीरा जैसे नहीं पिघल पाते । मीरा स्त्री है । स्त्री के लिए भक्ति ऐसे ही सुगम है । जैसे पुरुष के लिए - तर्क और विचार ।
वैज्ञानिक कहते हैं - मनुष्य का मस्तिष्क 2 हिस्सों में विभाजित हैं । बाएँ तरफ जो मस्तिष्क हैं । वह सोच विचार करता है । गणित, तर्क, नियम, वहाँ सब श्रृंखला बद्ध हैं । और दाईं तरफ जो मस्तिष्क है । वह सोच विचार नहीं है । वहाँ भाव है । वहाँ अनुभूति है । वहाँ संगीत की चोट पड़ती है । वहाँ तर्क का कोई प्रभाव नहीं होता । वहाँ लयबद्धता पहुँचती है । वहाँ नृत्य पहुँच जाता है । सिद्धांत नहीं पहुँचते । प्रेम में कोई विधि नहीं होती । विधान नहीं होता । प्रेम की क्या विधि ? और क्या विधान ? हो जाता है बिजली की कौंध की तरह । हो गया । तो हो गया । नहीं हुआ । तो करने का कोई उपाय नहीं है । पुरुषों ने भी भक्ति के गीत गाए हैं । लेकिन मीरा का कोई मुकाबला नहीं है । क्योंकि मीरा के लिए । स्त्री होने के कारण । जो बिलकुल सहज है । वह पुरुष के लिए थोड़ा आरोपित सा मालूम पड़ता है । पुरुष भक्त हुए । जिन्होंने अपने को परमात्मा की प्रेयसी माना । पत्नी माना । मगर बात कुछ अड़चन भरी हो जाती है । संप्रदाय है ऐसे भक्तों का । बंगाल में आज भी जीवित पुरुष हैं । लेकिन अपने को मानते हैं - कृष्ण की पत्नी । रात स्त्री जैसा श्रृंगार करके । कृष्ण की मूर्ति को छाती से लगाकर सो जाते हैं । मगर बात में कुछ बेहूदापन लगता है । बात कुछ जमती नहीं । ऐसा भी बेहूदापन लगता है । जैसे कि तुम । जहाँ जो नहीं होना चाहिए । उसे जबरदस्ती बिठाने की कोशिश करो । तो लगे । पुरुष पुरुष है । उसके लिए स्त्री होना ढोंग ही होगा । भीतर तो वह जानेगा ही - मैं पुरुष हूँ । ऊपर से तुम स्त्री के वस्त्र भी पहन लो । और कृष्ण की मूर्ति को हृदय से भी लगा लो । तब भी तुम भीतर के पुरुष को इतनी आसानी से खो न सकोगे । यह सुगम नहीं होगा ।
स्त्रियाँ भी हुई हैं । जिन्होंने ज्ञान के मार्ग से यात्रा की है । मगर वहाँ भी बात कुछ बेहूदी हो गई । जैसे ये पुरुष बेहूदे लगते हैं । और थोड़ा सा विचार पैदा होता है कि ये क्या कर रहे हैं ? ये पागल तो नहीं हैं । ऐसे ही ‘लल्ला’ कश्मीर में हुई । वह महावीर जैसे विचार में पड़ गई होगी । उसने वस्त्र फेंक दिए । वह नग्न हो गई । लल्ला में भी थोड़ा सा कुछ अशोभन मालूम होता है । स्त्री अपने को छिपाती है । वह उसके लिए सहज है । वह उसकी गरिमा है । वह अपने को ऐसा उघाड़ती नहीं । ऐसा उघाड़ती है । तो वेश्या हो जाती है ।
लल्ला ने बड़ी हिम्मत की - फेंक दिए वस्त्र । असाधाराण स्त्री रही होगी । लेकिन थोड़ी सी अस्वाभाविक मालूम होती है बात । महावीर के लिए नग्न खड़े हो जाना अस्वाभाविक नहीं लगता । बिलकुल स्वाभाविक लगता है । ऐसी ही बात है । ओशो 

आदमी अंतिम जगह आ गया

क्या भारत में नारी की " पुरूष की दासता " से मुक्ति संभव है ?
- स्‍त्री पुरूष की छाया से ज्‍यादा अस्‍तित्‍व नहीं जुटा पाई है । इसीलिए जहां पुरूष होता है । स्‍त्री वहां है । लेकिन जहां छाया होती है । वहां थोड़े ही पुरूष को होने की जरूरत है । स्‍त्री का विवाह हो । तो वह श्रीमती हो जाती हे । मिसेस हो जाती है । पुरूष के नाम की छाया रह जाती है । मिसेस फलानी हो जाती है । लेकिन इससे उल्‍टा नहीं होता कि स्‍त्री के नाम पर पुरूष जाता हो । अगर चंद्रकांत मेहता नाम है पुरूष का । तो स्‍त्री का कुछ भी नाम हो । वह श्रीमती चंद्रकांत मेहता हो जाती हे । लेकिन अगर स्‍त्री का नाम चंद्रकला मेहता है । तो ऐसा नहीं होता कि पति श्रीमान चंद्रकला मेहता हो जाते हों । ऐसा नहीं होता । ऐसा होने की जरूरत नहीं पड़ती है । क्‍योंकि स्‍त्री छाया है । उसकी कोई अपना अस्‍तित्‍व थोडे ही है । शास्‍त्र कहते हैं - जब स्‍त्री बालपन में हो । तो पिता उसकी रक्षा करे । जवान हो तो पति । बूढी हो जाए । तो बेटा रक्षा करे । सब पुरूष उसकी रक्षा करे । क्‍योंकि उसका कोई अपना अस्‍तित्‍व नहीं है । रक्षितत्‍व तो ही वह है । अन्‍यथा नहीं है । जैन धर्म के हिसाब से नारी मोक्ष की अधिकारी नहीं है । उसे पुरूष की तरह जन्‍म लेना पड़ेगा । जैनियों के चौबीस तीर्थंकर में 1 तीर्थक स्‍त्री है । नाम था मल्ली बाई - उन्‍होंने उसका नाम बदल कर मल्ली नाथ कर दिया । क्‍योंकि वे कहते है कि नारी मोक्ष की उत्‍तराधिकारी नहीं है । दुनियां में मुशिकल से कोई धर्म होगा । जिसने स्‍त्री को इज्‍जत दी हो । स्‍त्री मस्‍जिद में नहीं जा सकती । बस नारी का 1 ही उपयोग है । जिसे स्‍वर्ग जाना हो । वह नारी को छोड़कर भाग जाए । पहली क्रांति नारी को इन तथा कथित धर्मगुरूओं के खिलाफ करनी होगी । सारी मनुष्‍य जाति अधूरी है । इसके भीतर कुछ कमी है । जो पूरी नहीं हो पाती । जीवन भर दौड़कर भी प्रेम नहीं मिलता । प्रेम मिलता है समकक्ष से । और जब तक स्‍त्री पुरूष के समकक्ष नहीं होती । तब तक स्‍त्री को प्रेम नहीं मिल सकता । वह तो दासी है । पति परमात्‍मा है । पूरब की हालत है दासियों की । और पश्चिम की हालत तो और भी बदतर है । वहां औरत दिल बहलाने की वस्‍तु है । जब चाहे । स्‍त्री बदली जा सकती है । यह पुरूष की दुनिया है । जिसमें गणित से सारा हिसाब लगा रखा है । इस दुनिया में स्‍त्री का कोई हाथ नहीं । अन्‍यथा यह दुनिया बहुत दूसरी होती । यहां गणित कम महत्‍व पूर्ण होता । ह्रदय ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण होता । यह गणित से ज्यादा प्रेम का हिसाब होता । लेकिन वह नहीं हो सका । क्‍योंकि स्‍त्री के पास को आत्‍मा नहीं है । इसलिए स्‍त्री का कोई कंट्रिब्‍यूशन भी नहीं है - इस संस्‍कृति के लिए । सभ्‍यता के लिए । और यह आदमी की बनाई हुई गणित की संस्‍कृति मरने के करीब पहुंच गई हे । अगर इस संस्‍कृति को बचाना है । तो स्‍त्री को व्‍यक्‍तित्‍व देना जरूरी है । और स्‍त्री को व्‍यक्‍तित्‍व देने का अर्थ है । उसे पुरूष जैसा नहीं । स्‍त्री के ही अनुकूल क्‍या उचित हो सकता है । उसकी शिक्षा । उसका प्रशिक्षण । उसके व्‍यक्‍तित्‍व का सारा उसका ही ढंग । ताकि 1 नारी उपलब्‍ध हो सके । और वह नारी अगर उपलब्‍ध हो सकती है । तो हम मनुष्‍य जाति के जीवन में बहुत आनंद जोड़ सकते है । क्‍योंकि वह नारी न मालूम कितने अर्थों में जीवन का केन्‍द्र हे ।
जोड़ ने लिखी है 1 किताब । और उस किताब में उसने लिखा है कि जब मैं पैदा हुआ । तो पश्‍चिम में होम थे । घर थे । और अब जब मैं मरने के करीब हूं । तो पश्चिम में सिर्फ हाउस रह गए हैं । होम बिलकुल नहीं । सिर्फ मकान रह गए है । घर कोई भी नहीं है । किसी ने जोड़ से पूछा कि - तुम्‍हारा मतलब क्‍या है ? होम और हाउस में फर्क क्‍या है ?
जोड ने कहा कि जिस हाउस में 1 नारी होती है । उसको मैं होम कहता हूं । और जिस हाउस में नारी नहीं होती । वह होटल हो जाता है । मकान हो जाता है । और पश्‍चिम में नारी खो गई है । पूरब में है ही नहीं । यह मत सोच लेना कि यहां है । यहां है ही नहीं । दासियों से घर नहीं बनते । लेकिन क्‍या किया जा सकता है ।
पहली बात । नारी को पुरूष से पृथक व्‍यक्‍तित्‍व उपलब्ध करना है । न उसे पुरूष का गुलाम रहना है । और न पुरूष का अनुकरण करना है । नारी को अपने व्‍यक्‍तित्‍व की खोज करनी है । और उसे स्‍पष्‍ट यह घोषणा कर देना है कि हम स्‍त्री है । और स्‍त्री ही रहेगी । और स्‍त्री ही होना चाहेंगी । क्‍योंकि ध्‍यान रहे । हम जो होने को पैदा हुए हैं । जब वहीं हो जाते हैं । तभी हम आनंदित होते हें । हम अन्यथा कुछ भी हो जाएं । आनंदित नहीं हो सकते । घास का फूल खिल जाए । और फूल बन जाए । तो आनंदित हो सकता है । अगर वह गुलाब को फूल बनाना चाहेगा । तो मुश्‍किल शुरू हो जाएगी । वह अपने स्वभाव से भटक जाएगा । आदमी अंतिम जगह आ गया है । पुरूष की सभ्यता कगार पर आ गई है । स्‍त्री का मुक्‍त होना जरूरी है । स्‍त्री के जीवन में क्रान्‍ति होनी जरूरी हे । ताकि स्‍त्री स्‍वयं को भी बचा सके । और सभ्‍यता भी बचा सके । अगर स्‍त्री अपनी पूरी हार्दिकता, अपने पूरे प्रेम अपने पूरे संगीत, अपने पूरे काव्‍य, अपने व्‍यक्‍तित्‍व के पूरे फूलों को लेकर छा जाए । तो इस जगत से युद्ध बंद हो सकते है । लेकिन जब तक पुरूष हावी है दुनिया पर । तब तक युद्ध बंद नहीं हो सकते । वह पुरूष के भीतर युद्ध छिपा हुआ है । मां के पेट में जैसे ही बच्चा निर्मित होता है । तो 24 सेल मां से मिलते हैं । और 24 सेल पिता से मिलते हैं । पिता के सेल्‍स में 2 तरह के सेल होते हैं । 1 में 24 । और 1 में 23 सेल होते हैं । अगर 23 सेल वाला अणु मां के 24 सेल वाले अणु से मिलता है । तो पुरूष का जन्‍म होता हे । पुरूष के हिस्‍से में 47 सेल होते है । और स्‍त्री के हिस्‍से में 48 सेल होते है । स्‍त्री की जो व्‍यक्‍तित्‍व है । यह सिमैट्रिकल है । पहली ही बुनियाद से । उसके दोनों तत्‍व बराबर है - 24-24 । बायोलाजी कहती है कि स्‍त्री में जो सुघडता, जो सौंदर्य,  जो अनुपात, जो परफोरशन है । वह उन 24-24 के समान अनुपात होने के कारण है । और पुरूष में 1 इनर टेंशन है । उसमें 1 तरफ 24 अणु और दूसरी तरफ 23 अणु है । उसका तराजू थोड़ा उपर नीचे होता रहता है । उसके भीतर 1 बेचैनी जिंदगी भर उसे घेरे रहती है । वह कुछ उपद्रव करता ही रहेगा । इस टेंशन की वजह से वह कोई न कोई विवाद खड़े करता ही रहेगा । अगर पुरूष के हाथ में सभ्‍यता है पूरी की पूरी । तो युद्ध कभी बंद नहीं हो सकते । यह जानकर आपको हैरानी होगी कि महावीर, बुद्ध, राम और कृष्‍ण को आपने दाढ़ी मूंछ के नहीं देखा होगा । क्‍योंकि जैसे ही पुरूष को व्‍यक्‍तित्‍व धीरे धीरे स्‍त्री के करीब आता है । वह जैसे हार्दिक होते है । वे स्‍त्री के करीब आने लगते हैं । मूर्तिकारों ने बहुत सोचकर यह बात निर्मित की है । उनका सारा व्‍यक्‍तित्‍व स्‍त्री के इतने करीब ओ गया होगा कि दाढ़ी मूंछ बनानी उचित नहीं मालूम पड़ी होगी । व्‍यक्‍तित्‍व इतना समानुपात हो क्या होगा । ओशो

05 जनवरी 2014

काल पुरुष की कलाबाजियां

अनुराग सागर को पढने के बाद हमारे पाठक धर्मेंन्द्र कुमार के मन में कुछ शंकायें कुछ प्रश्न उठे । जिन्हें उन्होंने ई मेल द्वारा पूछा । उन्हीं शंकाओं का निवारण इस पोस्ट में किया गया है ।


pranam rajeev ji   please ans my question
1 - anurag sagar ke anusar ashtangi ke teen putra hain brhama, vishnu, shanker .  apne baap ko khojne vishnu neeche gaye . aur brhama uper . and vishnu sheshnag ke vish se neelvarn ke ho gaye tab akashvani hui ki tum dwaper yug me shesh nag se badla loge . ab laut jao and wo laut aaye.
you said on blog many time - krishna and vishnu alag alag hain. and kallu hi krishna hai . .tab vishnu ne sheshnag se badla kahaan liya. qki wo krishna nahi hai
- पहले किसी चीज को गौर से पढें । फ़िर कई पहलुओं से विचार करें । जब आकाशवाणी हुयी । तो किसने की ? स्वयं कालपुरुष ने । यदि विष्णु को खुद सब पता होता । या विष्णु अपने ही स्तर से बदला लेने में सक्षम होते ।

तो उसी वक्त नहीं ले लेते । द्वापर का इंतजार क्यों करते ? क्योंकि वो आकाशवाणी और उसके करने वाले से सदा अनजान थे । फ़िर उन्होंने आकाशवाणी का कैसे विश्वास कर लिया ? ध्यान रहे । तत्कालीन समय स्थिति अनुसार अष्टांगी ने कहा था - वही सर्वेसर्वा है । और वे तीन भाई ही प्रमुख हैं । फ़िर आकाशवाणी कौन कर रहा था ? चलो माना । वेद से उन्होंने पता कर लिया कि - पुरुष कोई और है । तो भी वो उन्हें अभी हकीकत या प्रत्यक्ष नहीं हुआ था ।
अब अपने प्रश्न को समझिये - बदला कैसे लिया ? ये मनुष्य क्या है ? पाँच तत्व से बना मिट्टी का पुतला ही तो है । तब इसमें जो बदला या उपकार आदि करता है । वो कौन करता है । क्या - वायु जल अग्नि प्रथ्वी आकाश इन तत्वों में से कोई ? नहीं । बदला, मन इस शरीर के माध्यम से लेता है । और मन ही बदले की भावना पूर्ण होने पर तुष्टि पाता है । क्या आपने कभी प्रेतक घटनाओं या दैवीय आवेशों के बारे में अनुभव किया है । उस समय एक ही शरीर में शरीर स्वामी के अतिरिक्त एक या कई आत्मायें तक कैसे जुङ जाती हैं ? रामायण में कुम्भकरण के वरदान मांगते समय और कैकयी को बरगलाने के समय कुब्जा की जिह्वा या मन को सरस्वती ने देवताओं के कहने पर कैसे कब्जा कर लिया था ? अब ये दोष या क्रिया किसके द्वारा हुयी ? मेघनाद ने राम की सेना को भृमित करने के लिये नकली सीता ही बना दी थी । और जिस सीता का अपहरण हुआ । वह भी अग्नि सीता थी । ये सब कैसे हुआ ? आज अमेरिका कहीं मिसाइल हमला आदि करे । तो कहा जाता है - अमेरिका ने हमला कर दिया । आपने कभी सोचा ? क्या अमेरिका नाम की कोई एक जगह ? इस प्रथ्वी पर है भी ? वो अमेरिका हमला कर सकता है । या उसका राष्ट्रपति मिसायल दागेगा ? तब नियम अनुसार तन्त्र और प्रतिनिधि आदेशित कार्य करते हैं । क्योंकि यह अल्पज्ञ और तुच्छ की श्रेणी में आने वाले मानवों के क्रियाकलाप नहीं हैं । अतः दैवीय तन्त्र ऐसे विज्ञानों के लिये बहुत विकसित और कल्पना से परे है । मैं पहले भी इस बात का जबाब दे चुका हूँ कि - राम या श्रीकृष्ण के रुप में एक प्रतिनिधि पुतला अवतरित हुआ । जिसमें काल पुरुष की प्रमुख शक्ति और विष्णु का सत्व गुण और अंतकरण भावना, विभिन्न शाप और साधुओं भक्तों की तपस्या प्रार्थनाओं के आधार पर तथा और भी तमाम सृष्टि जनित कारणों से एक कृमादेशित ( प्रोग्राम्ड ) दिव्य शरीर प्रकट किया गया । जिसने सिर्फ़ व्यक्तिगत भावनाओं से जुङे कार्य न करके एक सत्ता से जुङे व्यक्ति की भांति कार्य किये । यदि आपकी बात ही मान लें कि विष्णु ही राम या कृष्ण थे । तो गौर करें । वही शेषनाग राम के साथ लक्ष्मण और श्रीकृष्ण के साथ बलराम रूप में अवतारी हुआ । और बहुत सहयोगी सेवाभावी और आज्ञाकारी भी था । इसलिये धर्म इतना सूक्ष्म विषय है कि स्थूल बिन्दुओं स्थूल नजरिये से इसको नहीं समझा जा सकता । इन्हीं हिन्दू धर्म शास्त्रों में सूक्ष्म विज्ञान के अंतर्गत विष्णु को सिर्फ़ सतगुण बताया गया है । अब बताओ । ये सब क्या है । महज एक गुण को इतना बङा पद या स्वामी आदि कैसे बता दिया ?


2 - aapne blog par kaha hai - vishnu ek pad hai . lekin anurag sagar ke anusar  wo kallu ashtangi ke dhitiya putra hain.
वो एक पद भी है । देवता भी है । सिर्फ़ सत गुण भी है । अष्टांगी का पुत्र भी है । और इस स्थिति को प्राप्त हुआ कोई पुण्यात्मा जीव भी है । जैसे संसार में एक पद उसकी स्थिति और उससे जुङे तमाम क्रियाकलाप सांसारिक नियम अनुसार होते हैं । ऐसे ही ये सृष्टि बनने के बाद जो खेल शुरू हुआ । वह चलता रहता है । पर इंसान जितना जान पाता है । उतना ही समझ पाता है ।

3 - aapke anusar krishna paramhans gyani hain.  tab he kulshreshth ! batayein ki wo kal pursh kyu kar huye. qki kallu to satya purush ka putra hai . to wo kabeer ke samkaksh hai .
स्वभाव, स्व गुण, स्व पदार्थ, तात्कालिक ज्ञान और स्वेच्छा भाव अनुसार ही जीव विभिन्न गतिविधियों, पदों और उनके अंजाम को प्राप्त होता है । श्रीकृष्ण को सही शब्दों में सिर्फ़ योगेश्वर या इस त्रिलोकी का राष्ट्रपति या स्वामी कहा जा सकता है । द्वैत और अद्वैत के परमहँस तथा गुरु अनुसार परमहँस की स्थितियां अलग अलग होती हैं । जैसे राज्य और केन्द्र के एक ही पद के मुख्यमन्त्री की पावर अधिकार और अन्य चीजों में बहुत अन्तर हो जाता है । कोई भी योगी काल पुरुष की स्थिति तक पहुँच कर अनेक कारणों वश आगे नहीं बढ पाया । या मोहित हो गया । या आगे का गुरु नहीं मिल पाया । तो उस स्थिति पर रुक जाना नियमानुसार उसकी मजबूरी ही है । या स्वेच्छा भी । ये बहुत सूक्ष्म विषय है । जो कम शब्दों में समझाना संभव नहीं है ।  

agar krishna paramhans gyani the. to unhone apni aage ki yatra kyu puri nahi ki .
इस संसार में बहुत से व्यक्ति छोटे मन्त्री आदि बनने के बाद प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति आदि बनना चाहते हैं । तो वो क्यों नहीं बन पाते । या जो बन जाते हैं । वो हमेशा क्यों नहीं बने रहते । एक समृद्ध उद्योगपति सभी जगह बिजनेस फ़ैलाना चाहता है । क्यों नहीं फ़ैला पाता । कम्प्यूटर से अच्छे कोर्स किये युवा । सभी लाखों कमाने की सोच लेकर शुरू करते हैं । क्यों नही कर पाते ? जब एक शादी होती है । तो तमाम निरीक्षण परीक्षण तमाम शुभकामनायें तमाम नियम कानून उनके आजीवन सुखद वैवाहिक जीवन के लिये ही किये जाते हैं । और खुद उन नवदंपत्ति की भी यही सोच होती है । फ़िर कुछ ही दिनों में तलाक वैमनस्य झगङे की नौबते क्यों आती हैं ? इसलिये जब एक छोटे स्तर पर चार दिन के जीवन में ये सब नहीं हो पाता । तो वहाँ तो बहुत लम्बा खेल है । लेकिन वो भी सृष्टि ही है । और ये भी सृष्टि ही है । और दोनों में ही मूल जीवात्मा है । और उसका मूल परमात्मा है ।  

4 - blog par aapne likha hai ki tapasya karne se shakti milti hai  mukti nahi . param purush nahi . fir kalpurush ne ek pair par khade hokar tap karke kaise param purush se  sab kuchh maang liya. agar wo chahta to mukti bhi mil jati .
वह पहले से ही मुक्त था । उसे तपस्या करने की भी कोई जरूरत नहीं थी । लेकिन वह उससे हटकर अलग इच्छा रूपी राज्य की स्थापना करना चाहता था । इसलिये उसने ये सब श्रम किया । सबसे पूर्व में इसका नाम " निरंजन " था । जो कृमशः इसकी चेष्टाओं से फ़िर धर्मराय, कालपुरुष, यमराय आदि में परिवर्तित हुआ । बाद में जीवों के मन को इसने काबू में किया । और अपने अनुसार क्रियान्वित किया । अपने त्रिलोकी सत्ताओं के संचालन हेतु इसने एक तरह से दो महत्वपूर्ण उच्च मान्य पदों का निर्माण किया । जो श्रीकृष्ण और राम के रूप में प्रसिद्ध हुये । क्योंकि ये स्वयं गुप्त ही रहना चाहता था । इस तरह से ये सब कहानी बन गयी । जो अभी तक चल रही है । क्योंकि मूल रूप में जीवात्मा अविनाशी अमर और अमल है । परमात्मा का अंश ही है । इसलिये ये सब मन के स्तर पर ही चल रहा है । वैसे कुल मिलाकर तो वही एक परमात्मा ही सब रूपों में है ।

kalpurush ne apne bhai ke pet fad kar teeno lok le liye tab bhi sat purush ne kuchh ni  kia q ?
सत पुरुष ने इसके क्रूर अमर्यादित आचरण को देखते हुये इसे सचखंड से प्रतिबंधित कर दिया । और बाद में अष्टांगी को भी वासना झुकाव और नियम विरुद्ध आचरण से निकाल दिया गया । विभिन्न देशीय धार्मिक ग्रन्थों में इन्हीं को आदम हव्वा, एडम इव, और पहला स्त्री पुरुष कहा गया है । क्योंकि स्त्री पुरुष वासना काम वासना का मूल इन्हीं दोनों से शुरू हुआ ।

he shreshth ! ho sakta hai aapke liye ye sawal nirarthak ho but mere liye bahut kuchh  hain. jab tak javab ni mil jata. bechain rahunga. . truti aur hathat ke liya forgive me plzzzzzz -  dkumar

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सुख देवे दुःख को हरे करे पाप का अन्त । 
कह कबीर वे कब मिलें परम स्नेही सन्त ।
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सतगुरु जय गुरुदेव - बाबाजी की है ललकार । घनघोर अध्यात्मिक प्रचार । न ये रुकने वाला है ।  कलियुग जाने वाला है । सतयुग आने वाला है । समर बहादुर शेर सिपाही सतयुग का रखवाला । सतयुग दया मेहर से भाई ताला खुलने वाला है । आप सभी सतसंगियों से निवेदन है कि नीचे लिंक पर क्लिक करें ।
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Give me control over a nations currency, and I care not who makes its laws - Baron M.A. Rothschild
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