14 सितंबर 2013

शत्रु से अदृश्य हो जाने की क्षमता

प्राचीन विमानों की 2 श्रेणियां इस प्रकार थी । मानव निर्मित विमान - जो आधुनिक विमानों की तरह पंखों की सहायता से उडान भरते थे ।  महर्षि भारद्वाज के शब्दों में पक्षियों की भांति उङने के कारण वायुयान को विमान कहते हैं - वेगसाम्याद विमानोण्डजानामिति ।
विमानों के प्रकार - शकत्युदगम विमान अर्थात विद्युत से चलने वाला विमान । धूम्र यान ( धुँआ, वाष्प आदि से चलने वाला ) अशुवाह विमान( सूर्य किरणों से चलने वाला ) शिखोदभग विमान ( पारे से चलने वाला ) तारामुख विमान ( चुम्बक शक्ति से चलने वाला ) मरूत्सख विमान( गैस इत्यादि से चलने वाला ) भूतवाह विमान ( जल, अग्नि तथा वायु से चलने वाला )
आश्चर्यजनक विमान । जो मानव निर्मित नहीं थे । किन्तु उनका आकार प्रकार आधुनिक " उडन तश्तरियों " के अनुरूप है ।

विमान विकास के प्राचीन ग्रन्थ - भारतीय उल्लेख प्राचीन संस्कृत भाषा में सैकडों की संख्या में उपलब्ध हैं । किन्तु खेद का विषय है कि उन्हें अभी तक किसी आधुनिक भाषा में अनुवादित ही नहीं किया गया । प्राचीन भारतीयों ने जिन विमानों का अविष्कार किया था । उन्होंने विमानों की संचलन प्रणाली तथा उनकी देखभाल सम्बन्धी निर्देश भी संकलित किये थे । जो आज भी उपलब्ध हैं । और उनमें से कुछ का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया जा चुका है । विमान विज्ञान विषय पर कुछ मुख्य प्राचीन ग्रन्थों का ब्यौरा इस प्रकार है ।
1 ऋगवेद - इस आदि ग्रन्थ में कम से कम 200 बार विमानों के बारे में उल्लेख है । उनमें तिमंजिला । त्रिभुज आकार के । तथा तिपहिये विमानों का उल्लेख है । जिन्हें अश्विनों ( वैज्ञानिकों ) ने बनाया था । उनमें साधारणतयाः 3 यात्री जा सकते थे । विमानों के निर्माण के लिये स्वर्ण, रजत तथा लौह धातु का प्रयोग किया गया था । तथा उनके दोनों ओर पंख होते थे । वेदों में विमानों के कई आकार प्रकार उल्लेखित किये गये हैं । अहनिहोत्र विमान के 2 ईंजन तथा हस्तः विमान ( हाथी की शक्ल

का विमान ) में 2 से अधिक ईंजन होते थे । 1 अन्य विमान का रुप किंग फिशर पक्षी के अनुरूप था । इसी प्रकार कई अन्य जीवों के रूप वाले विमान थे । इसमें कोई सन्देह नहीं कि 20वीं सदी की तरह पहले भी मानवों ने उड़ने की प्रेरणा पक्षियों से ही ली होगी । यातायात के लिये ऋगवेद में जिन विमानों का उल्लेख है । वह इस प्रकार है ।
जलयान - यह वायु तथा जल दोनों तलों में चल सकता है । ऋगवेद 6.58.3
कारा - यह भी वायु तथा जल दोनों तलों में चल सकता है । ऋगवेद 9.14.1 
त्रिताला - इस विमान का आकार तिमंजिला है । ऋगवेद 3.14.1
त्रिचक्र रथ - यह तिपहिया विमान आकाश में उड सकता है । ऋगवेद 4.36.1 
वायुरथ - रथ की शकल का यह विमान गैस अथवा वायु की शक्ति से चलता है । ऋगवेद 5.41.6
विद्युत रथ - इस प्रकार का रथ विमान विद्युत की शक्ति से चलता है । ऋगवेद 3.14.1
2 यजुर्वेद में भी 1 अन्य विमान का तथा उनकी संचलन प्रणाली उल्लेख है । जिसका निर्माण जुङवां अश्विन कुमार करते हैं ।
3 विमानिका शास्त्र - 1875 ईसवी में भारत के 1 मन्दिर में विमानिका शास्त्र ग्रंथ की 1 प्रति मिली थी । इस ग्रन्थ को ईसा से 400 वर्ष पूर्व का बताया जाता है । तथा ऋषि भारद्वाज रचित माना जाता है । इसका अनुवाद अंग्रेज़ी भाषा में हो चुका है। इसी ग्रंथ में पूर्व के 97 अन्य विमान

आचार्यों का वर्णन है । तथा 20 ऐसी कृतियों का वर्णन है । जो विमानों के आकार प्रकार के बारे में विस्त्रत जानकारी देते हैं । खेद का विषय है कि इनमें से कई अमूल्य कृतियां अब लुप्त हो चुकी हैं । इन ग्रन्थों के विषय इस प्रकार थे ।
विमान के संचलन के बारे में जानकारी । उडान के समय सुरक्षा सम्बन्धी जानकारी । तूफान तथा बिजली के आघात से विमान की सुरक्षा के उपाय । आवश्यकता पङने पर साधारण ईंधन के बदले सौर ऊर्जा पर विमान को चलाना आदि । इससे यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि इस विमान में " एन्टी ग्रेविटी " क्षेत्र की यात्रा की क्षमता भी थी ।
विमानिका शास्त्र में सौर ऊर्जा के माध्यम से विमान को उडाने के अतिरिक्त ऊर्जा को संचित रखने का विधान भी 

बताया गया है । एक विशेष प्रकार के शीशे की 8 नलियों में सौर ऊर्जा को एकत्रित किया जाता था । जिसके विधान की पूरी जानकारी लिखित है । किन्तु इसमें से कई भाग अभी ठीक तरह से समझे नहीं गये हैं ।
इस ग्रन्थ के 8 भाग हैं । जिनमें विस्त्रत मानचित्रों से विमानों की बनावट के अतिरिक्त विमानों को अग्नि तथा टूटने से बचाव के तरीके भी लिखित हैं ।
ग्रन्थ में 31 उपकरणों का वृतांत है । तथा 16 धातुओं का उल्लेख है । जो विमान निर्माण में प्रयोग की जाती हैं । जो विमानों के निर्माण के लिये उपयुक्त मानी गयीं हैं । क्योंकि वह सभी धातुयें गर्मी सहन करने की क्षमता रखती हैं । और भार में हल्की हैं ।
4 यन्त्र सर्वस्वः - यह ग्रन्थ भी ऋषि भारद्वाज रचित है । इसके 40 भाग हैं । जिनमें से 1 भाग " विमानिका प्रकरण " के 8 अध्याय, लगभग 100 विषय और 500 सूत्र हैं । जिनमें विमान विज्ञान का उल्लेख है । इस ग्रन्थ में ऋषि भारद्वाज ने विमानों को 3 श्रेणियों में विभाजित किया है ।
अन्तर्देशीय - जो 1 स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं ।
अन्तर्राष्ट्रीय - जो 1 देश से दूसरे देश को जाते हैं ।
अंतरिक्षीय - जो 1 ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाते हैं ।

इनमें से अति उल्लेखनीय सैनिक विमान थे । जिनकी विशेषतायें विस्तार पूर्वक लिखी गयी हैं । और वह अति आधुनिक साइंस फिक्शन लेखक को भी आश्चर्यचकित कर सकती हैं । उदाहरणार्थ सैनिक विमानों की विशेषतायें इस प्रकार की थीं ।
पूर्णतया अटूट । अग्नि से पूर्णतया सुरक्षित । तथा आवश्यकता पङने पर पलक झपकने मात्र समय के अन्दर ही एकदम से स्थिर हो जाने में सक्षम ।
शत्रु से अदृश्य हो जाने की क्षमता ।  शत्रुओं के विमानों में होने वाले वार्तालाप तथा अन्य ध्वनियों को सुनने में सक्षम । शत्रु के विमान के भीतर से आने वाली आवाजों को तथा वहाँ के दृश्यों को रिकार्ड कर लेने की क्षमता ।  शत्रु के विमान की दिशा तथा दशा का अनुमान लगाना । और उस पर निगरानी रखना ।  शत्रु के विमान के चालकों तथा यात्रियों को दीर्घकाल के लिये स्तब्ध कर देने की क्षमता ।  निजी रुकावटों तथा स्तब्धता की दशा से उबरने की क्षमता ।  आवश्यकता पङने पर स्वयं को नष्ट कर सकने की क्षमता ।  चालकों तथा यात्रियों में मौसमानुसार अपने आपको बदल लेने की क्षमता ।   स्वचालित तापमान नियन्त्रण करने की क्षमता ।   हल्के तथा उष्णता ग्रहण कर सकने वाले धातुओं से निर्मित । तथा अपने आकार को छोटा बङा करने । तथा अपने चलने की आवाजों को पूर्णतया नियन्त्रित कर सकने में सक्षम ।
विचार करने योग्य तथ्य है कि इस प्रकार का विमान अमेरिका के अति आधुनिक स्टेल्थ फाइटर और उङन तश्तरी का मिश्रण ही हो सकता है । ऋषि भारद्वाज कोई आधुनिक फिक्शन रायटर नहीं थे । परन्तु ऐसे विमान की परिकल्पना करना ही आधुनिक बुद्धिजीवियों को चकित कर सकता है कि भारत के ऋषियों ने इस प्रकार के वैज्ञानिक माडल का विचार कैसे किया । उन्होंने अंतरिक्ष जगत और अति आधुनिक विमानों के बारे में लिखा । जबकि विश्व के अन्य देश साधारण खेती बाङी का ज्ञान भी पूर्णतया हासिल नहीं कर पाये थे ।
5 समरांगनः सूत्र धारा - य़ह ग्रन्थ विमानों तथा उनसे सम्बन्धित सभी विषयों के बारे में जानकारी देता है । इसके 230 पद्य विमानों के निर्माण । उङान । गति । सामान्य तथा आकस्मिक उतरान एवम पक्षियों की दुर्घटनाओं के बारे में भी उल्लेख करते हैं ।
लगभग सभी वैदिक ग्रन्थों में विमानों की बनावट त्रिभुज आकार की दिखायी गयी है । किन्तु इन ग्रन्थों में दिया गया आकार प्रकार पूर्णतया स्पष्ट और सूक्ष्म है । कठिनाई केवल धातुओं को पहचानने में आती है ।
समरांगनः सूत्र धारा के अनुसार सर्वप्रथम 5 प्रकार के विमानों का निर्माण बृह्मा, विष्णु, यम, कुबेर तथा इन्द्र के लिये किया गया था । पश्चात अतिरिक्त विमान बनाये गये । 4 मुख्य श्रेणियों का ब्यौरा इस प्रकार है ।
रुकमा - रुकमा नौकीले आकार के और स्वर्ण रंग के थे ।
सुन्दरः - सुन्दर राकेट की शक्ल तथा रजत युक्त थे ।
त्रिपुरः - त्रिपुर 3 तल वाले थे ।
शकुनः - शकुनः का आकार पक्षी के जैसा था ।
10 अध्याय संलगित विषयों पर लिखे गये हैं । जैसे कि विमान चालकों का प्रशिक्षण । उङान के मार्ग । विमानों के कल पुरज़े । उपकरण । चालकों एवम यात्रियों के परिधान । तथा लम्बी विमान यात्रा के समय भोजन किस प्रकार का होना चाहिये ।
ग्रन्थ में धातुओं को साफ करने की विधि । उसके लिये प्रयोग करने वाले दृव्य । अम्ल जैसे कि नीबू अथवा सेब । या कोई अन्य रसायन । विमान में प्रयोग किये जाने वाले तेल तथा तापमान आदि के विषयों पर भी लिखा गया है ।
7 प्रकार के इंजनों का वर्णन किया गया है । तथा उनका किस विशिष्ट उद्देश्य के लिये प्रयोग करना चाहिये । तथा कितनी ऊँचाई पर उसका प्रयोग सफल और उत्तम होगा । सारांश यह कि प्रत्येक विषय पर तकनीकी और प्रयोगात्मक जानकारी उपलब्ध है । विमान आधुनिक हेलीकाप्टरों की तरह सीधे ऊँची उङान भरने तथा उतरने के लिये, आगे पीछ तथा तिरछा चलने में भी सक्षम बताये गये हैं ।
6 कथा सरित सागर - यह ग्रन्थ उच्चकोटि के श्रमिकों का उल्लेख करता है । जैसे कि काष्ठ का काम करने वाले जिन्हें राज्यधर और प्राणधर कहा जाता था । यह समुद्र पार करने के लिये भी रथों का निर्माण करते थे । तथा 1 सहस्त्र यात्रियों को लेकर उडने वालों विमानों को बना सकते थे । यह रथ विमान मन की गति के समान चलते थे ।
कोटिल्य के अर्थशास्त्र में अन्य कारीगरों के अतिरिक्त सेविकाओं का उल्लेख है । जो विमानों को आकाश में उङाते थे । कोटिल्य ने उनके लिये विशिष्ट शब्द आकाश युद्धिनाह का प्रयोग किया है । जिसका अर्थ है आकाश में युद्ध करने वाला ( फायटर पायलट ) आकाश रथ । चाहे वह किसी भी आकार के हों का उल्लेख सम्राट अशोक के आलेखों में भी किया गया है । जो उसके काल 256-237 ईसा पूर्व में लगाये गये थे ।
उपरोक्त तथ्यों को केवल कोरी कल्पना कहकर नकारा नहीं जा सकता । क्योंकि कल्पना को भी आधार के लिये किसी ठोस धरातल की जरूरत होती है । क्या विश्व में अन्य किसी देश के साहित्य में इस विषयों पर प्राचीन ग्रंथ हैं ? आज तकनीक ने भारत के उन्हीं प्राचीन ज्ञान को हमारे सामने पुनः साकार करके दिखाया है । मगर विदेशों में या तो परियों और एंजिलों को बाहों पर उगे पंखों के सहारे से उडते दिखाया जाता रहा है । या किसी सिंदबाद को कोई बाज उठाकर ले जाता है । तो कोई गुलफाम उङने वाले घोडे पर सवार होकर किसी सब्ज परी को किसी जिन्न के उङते हुये कालीन से नीचे उतार कर बचा लेता है । और फिर ऊँट पर बैठाकर रेगिस्तान में बने महल में वापिस छोड देता है । इन्हें विज्ञान नहीं । फैंटेसी कहते हैं ।  साभार - आर्यावर्त भरतखण्ड संस्कृति
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छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति ।
अस्मान मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया सन्निरुद्धः ।
वेदमंत्र, यज्ञ, तप, व्रत, भूत भविष्य या जिसका भी वेद व्याख्यान करते हैं । उन सबकी उत्पत्ति उस बृह्म से ही हुई है । वही बृह्म अपनी माया शक्ति से इस बृह्माण्ड को प्रकट करता है । वही बृह्म जीव रुप माया के बंधन मे बंधता है ।
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मोच एवं सूजन Sprains and swelling 
कुछ घरेलू आसान तरीके मोच और सूजन से निजात पाने के लिये ।
प्रयोग 1 - लकड़ी पत्थर आदि लगने से आयी सूजन पर हल्दी एवं खाने का चूना एक साथ पीसकर गर्म लेप करने से अथवा इमली के पत्तों को उबालकर बाँधने से सूजन उतर जाती है ।
प्रयोग 2 - अरनी के उबाले हुए पत्तों को किसी भी प्रकार की सूजन पर बाँधने से तथा 1 ग्राम हाथ की पीसी हुई हल्दी को सुबह पानी के साथ लेने से सूजन दूर होती है ।
प्रयोग 3 - मोच अथवा चोट के कारण खून जम जाने एवं गाँठ पड़ जाने पर बड़ के कोमल पत्तों पर शहद लगाकर बाँधने से लाभ होता है ।
प्रयोग 4 - जामुन के वृक्ष की छाल के काढ़े से गरारे करने से गले की सूजन में फायदा होता है ।  सूजन में करेले का साग भी लाभप्रद है ।
भीतरी चोट -
प्रयोग 1 - 1 से 3 ग्राम हल्दी और शक्कर फांकने और नारियल का पानी पीने से तथा खाने का चूना एवं पुराना गुड़ पीसकर एक रस करके लगाने से भीतरी चोट में तुरंत लाभ होता है ।
प्रयोग 2 - 2 कली लहसुन 10 ग्राम शहद 1 ग्राम लाख एवं 2 ग्राम मिश्री इन सबको चटनी जैसा पीसकर, घी डालकर देने से टूटी हुई अथवा उतरी हुई हड्डी जल्दी जुड़ जाती है ।
प्रयोग 3 - बबूल के बीजों का 1 से 2 ग्राम चूर्ण दिन शहद के साथ लेने से अस्थि भंग के कारण दूर हुई हड्डी वज्र जैसी मजबूत हो जाती है ।

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