26 अगस्त 2013

ईसाई धर्मगुरु कितने कट्टरपंथी हैं ?

बाबा किन्हें किन्हें समझावे रे..अंधेरी दुनियां ।
सिर्फ पाल दिनाकरन ही नहीं । पूरा यूरोप और अमेरिका ईसाई अंध विश्वास को बढावा देता है ।
- पेरू में ईसाई धर्म से ताल्लुक रखने वाले 12 लोगों को उस समय जान से हाथ धोना पड़ा । जब इन लोगों ने " अंधविश्वास " में खुद को आग के हवाले कर दिया ।
- 50 साल के पॉल बाबा भगवान यीशु ? के नाम पर कृपा का कारोबार करते हैं । वे जब कृपा के कारोबार का प्रचार करते हैं । तब दावा करते हैं कि उन्हें प्रभु यीशु की काया में प्रवेश हो जाने का अनुभव होने लगता है । और प्रभु के प्रचार के बहाने कृपा बरसाने लग जाते हैं । वे जिन पर कृपा करते हैं । उनका यदि कोई व्यापार है । तो उसमें हिस्सेदारी की मांग भी करते हैं । पॉल का यह भी दावा है कि वे ईसामसीह के साक्षात दर्शन भी कर चुके हैं । इसी मुलाकात के बाद उन्हें ज्ञान के प्राप्ति और कृपा बांटने की आध्यात्मिक उपलब्धि हासिल हुई । पॉल दिनाकरण कारूण्या विश्वविद्यालय और जीसस कॉल्स नामक संस्थाओं के मुखिया हैं । वे कॉल्स जीसस संस्था के नाम से ही कृपा बांटने का शुल्क लेते हैं । पॉल चेन्नई के ईसाई धर्मगुरु एवं प्रचारक डा. डी जी एस दिनाकरण के पुत्र हैं । डी जी एम ने भी प्रभु यीशु से 20 साल पहले साक्षात रु-ब-रु होने का दावा किया था । पॉल दिनाकरण की पत्नी इवेंजीलाइन विवाह से पूर्व का नाम विजयाध्द और उनकी तीन संतानें कृपा कारोबार का प्रबंधन देखती हैं । धर्म कोई भी हो । उससे जुङे ज्यादातर संत उसे अंधविश्वास को बढ़ावा देने और अर्थ दोहन का ही काम करते हैं । भारतीय मूल की दिवंगत नन सिस्टर अल्फोंजा को वेटिकन 

सिटी में पोप ने ईसाई संत की उपाधि से विभूषित किया था । दरअसल धर्म की बुनियाद ही चमत्कारी अंधविश्वासों पर रखी गई है । अल्फोंजा को संत की उपाधि से इसलिए अलंकृत किया गया था । क्योंकि उनका जीवन छोटी उमृ में ही भ्रामक दैवीय व अतीन्द्रिय चमत्कारों का दृष्टांत बन गया था । इससे साफ होता है कि - धर्म चाहे ईसाई हो । चाहे इस्लाम हो । या हिन्दू । उनके नीति नियंत्रक ठेकेदार धर्मों को यथार्थ से परे चमत्कारों से महिमा मंडित कर कूप मंडूकता के ऐसे कट्टर अनुयायियों की श्रृंखला खड़ी करते रहे हैं । जिनके विवेक पर अंधविश्वास की पट्टी बंधी रहे । और वे आस्था व अंधविश्वास के बीच गहरी लकीर के अंतर को समझ पाने की सोच विकसित ही न कर पाएं ?
चमत्कार की महिमा - मानवीय सरोकारों के लिए जीवन अर्पित कर देने वाले व्यक्तित्व की तुलना में अलौकिक चमत्कारों को संत शिरोमणि के रूप में महिमा मंडित करना किसी एक व्यक्ति को नहीं । पूरे समाज को दुर्बल बनाने की कोशिशें हैं । सिस्टर अल्फोंजा से जुड़े चमत्कार किवदंती जरूर बनने लगे हैं । लेकिन यथार्थ की कसौटी पर इन्हें कभी नहीं परखा गया । अब इस चमत्कार में कितनी सच्चाई है कि अल्फोंजा की समाधि पर प्रार्थना से एक बालक के मुङे हुए पैर बिना किसी उपचार के ठीक हो गए ? यह समाधि कोट्टयम जिले के भरनागणम गांव में बनी हुई है ।

ईसाई धर्म गुरुओं द्वारा बचाव - यही अलौकिक कलावाद धर्म के बहाने व्यक्ति को निष्क्रिय व अंधविश्वासी बनाता है । वही भावना मानवीय मसलों को यथास्थिति में बनाए रखने का काम करती है । और हम ईश्वरीय तथा भाग्य आधारित अवधारणा को प्रतिफल व नियति का कारक मानने लग जाते हैं ।
ईसाई धर्मगुरु कितने कट्टरपंथी हैं ? यह इस बात से भी पता चलता है कि जब बाबा रामदेव का " योग " प्रचार के चरम पर दुनिया में विस्तार पा रहा था । तब इंगलैंड की दो चर्चों में योग के पाठ पर पाबंदी लगा दी गई थी । टॉन्टन की एक चर्च के पादरी स्मिथ ने तो यहां तक कहा था कि - योग ईसाई धर्म से भटकाने का एक रास्ता है । और यह भारतीय मूल के हिन्दू, बौद्ध व जैन दर्शन से कतई अलग नहीं है । इसी तरह 2007 में अमेरिकी सीनेट के उदघाटन के अवसर पर जब हिन्दू पुरोहित ने वैदिक मंत्रों का शंखनाद किया । तो सूली पर टंगे ईसाई धर्म की चूलें हिल गई । सदन में मौजूद कट्टरवादी ईसाईयों ने भविष्य में वेद मंत्रों के पाठ पर पाबंदी लगाने के लिए हल्ला बोल दिया । यह शोर तभी थमा । जब मंत्रोच्चार पर भविष्य में स्थाई तौर से रोक लगा दी गई ।
दरअसल भारत या अन्य पूर्वी देशों से कोई ज्ञान यूरोपीय देशों में पहुंचता है । तो इन देशों की ईसाईयत पर संकट के बादल मंडराने लगते हैं । ओशो रजनीश ने जब अमेरिका में उपनिषद और गीता को बाइबिल से तथा राम और कृष्ण को जीसस से श्रेष्ठ घोषित करने के दावे शुरू किए । और धर्म तथा अधर्म की अपनी विशिष्ट शैली में व्याख्या की । तो रजनीश के आश्रम में अमेरिकी बुद्धिजीवियों का तांता लग गया । उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि - पूरब के जिन लोगों को हम हजारों मिशनरियों के जरिये शिक्षित करने में लगे हैं । उनके ज्ञान का आकाश तो कहीं बहुत ऊंचा है । यही नहीं । जब रजनीश ने व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति रोनाल्ड रोगन जो ईसाई धर्म को ही दुनिया का एकमात्र धर्म मानते थे । और वेटिकन सिटी में पोप को धर्म पर शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी । तो ईसाईयत पर संकट छा गया । और षडयंत्र पूर्वक रजनीश को अमेरिका से बेदखल कर दिया गया । अब तो अमेरिका और ब्रिटेन में हालात इतने बदलाव है कि वहाँ के कई राज्यों में डार्विन के विकासवादी सिद्धांत को स्कूली पाठ्यक्रमों से हटाने की मांग जोर पकड़ रही है । क्योंकि डार्विन को ईसाई धर्म का विरोधी और नास्तिक माना जाता है । यही कारण है कि पॉल बाबा पर सवाल उठना शुरू हुए । तो कई चर्चों के फादर उनका बचाव करते दिख रहे हैं । बहरहाल खुद को ईसाई धर्म का प्रचारक बताते हुए पॉल दिनाकरण का ईश्वर तक भक्तों की बात पहुंचाने और फिर कृपा बरसाने का कारोबार निष्कंटक जारी है ।
पूरी पोस्ट देखें । कमेंट कर विचारों से अवगत कराएं ।
साभार Ramgopal Sharma's फ़ेसबुक
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अध्यात्मिक किताबें शायद आपके काम आयें । हमारे एक शुभचिंतक द्वारा मुझे प्रेषित किया गया लिंक
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ये भी जानिये । 
- 1 , 10 , 100 , 1000 , 10000 इत्यादि के बढ़ते कृम को ही दशमलव प्रणाली कहा जाता है । क्योंकि इसमें हर अलग अंक में पिछले अंक से 10 गुणा की बढ़ोत्तरी होती चली जाती है । इस दशमलव प्रणाली को बाल्मीकि रामायण में कुछ इस तरह समझाया गया है ।
इक पानी का छींटा सहस्त्र आयुत लक्ष प्रयुत कोट्यः क्रमशः ।
अर्बुदम अब्दम खर्व निखार्वं महापद्मं शंख्वः तस्मात ।
निधिः चा अन्तम मध्यम परर्द्हम आईटीआई पानी का छींटा गुना उत्तरं संज्ञाह । संख्याय स्थानानाम व्यवहार अर्थम कृताः पूर्विः इति ।
(  वाल्मीकि रामायण 3/39/44 )

अर्थात -
एक = 1
1 दस = 10 ।
10 दस = 1 सौ ।
10 सौ = 1 हजार ( Ayut )
10 हजार ।
हजार 100 = 1 लाख ।
1 प्रयुतम = 10 लाख = 1 मिलियन ।
100 लाख = 1 कोटि = 1 करोङ ।
100 करोड़ = 1 अर्बुद ( अरब ) = 1 अरब ।
100 अर्बुद = 1 वृन्दा ।
100 वृन्दा = 1 खर्व ( खरब )
100 खर्व = 1 निखर्व ( नील )
100 निखर्व = 1 महा पद्म ( पद्म )
100 महा पद्म = 1 शंकु ( शंख ) = 1 लाख करोड़ ।
100 शंकु = 1 समुद्र ।
100 समुद्र = 1 अन्त्य ।
100 अन्त्य = 1 मध्यम ।
100 मध्यम = 1 परार्ध ।
- साभार फ़ेसबुक के एक पेज से ( जिसका नाम कापी करना भूल गया । इसका खेद है )
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आज दिव्य भास्कर में एक लेख पढ़ा - जार्ज बुश एप्पल के सी ई ओ स्टीव जाब्स की प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे । और उन्हें अमेरिकी सरकार और राष्ट्रपति का मुख्य तकनीक सलाहकार जैसे भारी भरकम पद पर नियुक्त करना चाहते थे ।
लेकिन एफ बी आई ने अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रपति को लिखा - स्टीव जाब्स ईसाई धर्म छोडकर बौद्ध धर्म अपना चुके हैं । और अपनी युवावस्था में हरे रामा हरे कृष्णा ( इस्कान ) सम्प्रदाय से जुड़कर लोगों को हिन्दुत्व के तरफ आने की प्रेरणा देते थे । इसलिए उन्हें इतनी बड़े पद पर नियुक्त करना उचित नहीं है । फिर जार्ज बुश ने उनकी नियुक्ति नहीं की ।
सोचिये मित्रो ! जो अमेरिका आज अपने आपको विश्व का धर्म निरपेक्षता का सबसे बड़ा पैरोकार समझता है । वो खुद धर्म निरपेक्षता की किस कदर धज्जियां उड़ाता है । शायद इसीलिए बाबी जिंदल को ईसाई धर्म स्वीकार करना पड़ा ।
साभार फ़ेसबुक पेज एक ही विकल्प मोदी ( EK Hi Vikalp Modi ) से
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एक बहरा स्कूटर खींचकर ले जा रहा था । दूसरा बहरा - क्या हुआ ? पेट्रोल खतम हो गया क्या ?
पहला - नहीं यार । पेट्रोल खतम हो गया ।
दूसरा - अच्छा ! मुझे लगा । पेट्रोल खतम हो गया ।
साभार - मूर्ख shaan फ़ेसबुक पेज मूर्खिस्तान से ।
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जेम्स बॉन्ड - मेरा नाम है बॉन्ड…जेम्स बॉन्ड । और तुम्हारा ?
दक्षिण भारतीय छोरा - मेरा नाम है साई… मूर्ख वेंकटा साई…शिवावेंकटा साई…लक्ष्मीनारायणनाशिवावेंकटा साई…श्रीनिवासुलु लक्ष्मीनारायणनाशिवावेंकटा साई… राजशेखरा श्रीनिवासुलु लक्ष्मीनारायणनाशिवा वेंकटा साई… सीतारामानजनाएलुराजशेखरा श्रीनिवासुलु लक्ष्मीनारायणनाशिवावेंकटा साई…बोम्मिराजु सीतारामानजनाएलुराजशेखरा श्रीनिवासुलु लक्ष्मीनारायणनाशिवावेंकटा साई…
जेम्स बॉन्ड बेहोश !
साभार - मूर्ख shaan फ़ेसबुक पेज से ।
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