18 नवंबर 2012

और अमेरिका में नरक नहीं स्वर्ग है ?


स्वर्ग नरक कैसे पैदा हुए ? How the concept of Heaven and  Hell took  place ?
स्वर्ग और नरक कैसे पैदा हुए ? इस संबंध में मैंने कई विद्वानो के विचार पढे । लेकिन ओशो के विचार ध्यान देने योग्य हैं । उनका कहना है कि - धर्मांधता अब तक जीवित है । तो केवल इसलिए कि हमारे अंदर यह भय और लालच उत्पन्न कर दिया गया । और हमने मान लिया है । भय किसका ? नरक का । लालच किसका ?  स्वर्ग का । जब भय सिर के बल खड़ा हो जाता है । तब लालच का जन्म होता है । धर्माधिकारियों ने और पुजारियों ने  बहुत पहले जान लिया था कि यदि मनुष्य को डरा दिया जाय । तो बहुत आसानी से कर्मकांडों का अपना सिक्का चलाया जा सकता है । और लगातार चलाया जा सकता है ।  क्योंकि बे जानते थे कि भय विन होय न प्रीति । कल्पना की गयी ? 1 ऐसी जगह की ? जहाँ मरने के बाद लोगों को तरह तरह की यातनायें दी जा रही हैं ? तेल की कढाही में डाला जा रहा है ? बाल और नाखून खींचें जा रहे हैं ?  ये बातें सुनाकर डरा दिया गया । तरह तरह की कहानिया गढ़कर कि दान नहीं करोगे । तो यह दंड मिलेगा । माता पिता का कहना नहीं मानोगे । तो यह दंड मिलेगा । क्योंकि ये सब कार्य पाप हैं । फिर सोचा कि केवल दंड बताकर अर्थात डराकर  लोगों को सही काम करने योग्य बनाकर हमारा ( पुजारियों और धर्माधिकारियों का ) काम चलना नहीं । क्योंकि पेट बातों से तो भरता नहीं है । पेट भरने के लिए पैसे चाहिए । तो फिर धन कमाने की बात सोची गयी । उसकी तरकीब भी सोच ली । और वह तरकीब थी “ स्वर्ग ” की कल्पना ? उन्होने बताया कि ऐसा नहीं कि पाप कर दिये । तो बे पोस्ट आफिस  की काली मुहर तो नहीं लग गयी । जो कि कभी छूटेगी ही नहीं । अरे भाई पापों से मुक्ति का रास्ता । तरकीब भी हमी बताएँगे । बस हम जैसा जैसा बताएं ? वैसा वैसा करो । तो पाप धुल जाएँगे । और स्वर्ग मिल जाएगा । ये पूजन हमसे कराओ । तो ये

पाप खत्म । और ये पुजा पाठ । हमसे कराओ तो ये पाप खत्म । ये कोई नहीं कहता है कि -  पूजा पाठ हम बता देते हैं । तुम चाहे किसी से करा लेना । नहीं पूजन हम करेंगे । तभी सफल होगा । और इतने पैसे खर्च होंगे । तुम सामान के लिए क्यों परेशान होगे । बस पैसे दे दो । पूजन हम अपने घर पर ही कर देंगे । थोड़े से पैसे में पाप धोने  की ऐसी  लोंडरी ( पाप धोने की मशीन ) खोल  दी कि सब आयेंगे । क्योंकि उनके द्वारा बनाई गयी पापों की सूची में ऐसे ऐसे काम शामिल है कि दुनियाँ का कोई भी व्यक्ति नहीं कह सकता है कि - मैं पापी नहीं हूँ । बस क्या था । पुजारी जी की लोंडरी चल निकली । और सब पुजारी मालामाल हो रहे हैं । और फ़ैक्टरी तो बंद भी हो सकती हैं । लेकिन लोग पाप करना बंद नहीं करेंगे । वे तो करते ही रहेंगे । और पूजा करबाते ही रहेंगे । क्यों ? हम सब सब SHORTCUT चाहते हैं । स्वर्ग पाने के लिए तो बहुत पापड़ बेलने पड़ेंगे । माँ बाप की ज़िंदगी भर सेवा करो । ज़िंदगी भर सच बोलो । और न जाने क्या क्या करो ?  फिर भी स्वर्ग मिला । या न मिला ? कोई गारंटी नहीं है । लेकिन पुजारी जी को  बस 5001 रुपये दो । बस सब झंझटों से मुक्ति मिल गयी ? यूँ कहो कि 5001 रुपये में विना पासपोर्ट आफिस जाये ही स्वर्ग का पासपोर्ट मिल गया । और हम निश्चिंत हो गए । और जीते जी स्वर्गवासी बन गये ? जिनके पास पैसे देने को नहीं हैं । या देने में कंजूसी करते हैं । बे लोग  बे सब कार्य कर रहे हैं । जो पुजारीजी ने पुण्य कार्यों की  सूची में रखे हैं । अर्थात माता पिता की सेवा कर रहे हैं । तो मन से नहीं ।
बल्कि इसलिए कि हमारे पास स्वर्ग के पासपोर्ट  बनबाने  के लिए पैसे नहीं है । या हमे नरक में जाने से  डर लगता है । अर्थात हम माँ बाप की सेवा किसी डर से कर रहे हैं । न कि अपना कर्तव्य समझकर । या माँ बाप के प्रति प्यार होने के कारण । यदि ऐसा न होता । तो किसी भी वृद्ध आश्रम में चले जाईए । वहाँ आपको गरीव ही नहीं । बल्कि ऐसे भी माँ या बाप । या दोनों मिल जाएँगे । जिनके  1 नहींकई लड़के हैं । और वो भी बड़े बड़े पदों पर । डिप्टी कलक्टर IAS भी  है । ऐसे माँ बाप के लड़कों को डर नही है । क्योंकि उन्होने नरक के दंडों और डंडों दोनों से ही बचने के उपाय 1001 की बजाय 5001 रुपये देकर पहले से ही निश्चिंत है ।
स्वर्ग और नरक कहाँ है ? Where  are Heaven and Hell ? 
हममें से जो थोड़ा बहुत भी भूगोल जानते है । बे समझ सकते है कि यदि हम अन्तरिक्ष में जा चुके हैं । चंद्रमा और मंगल पर अपनी मशीन भेजकर और चंद्रमा पर तो स्वयं पैर रखकर जानकारी ले चुके हैं । लेकिन 90 करोड़ 

Km तक की यात्रा में तो कहीं स्वर्ग  दिखा नहीं ?  इसी तरह प्रथ्वी में कई खोजों के लिए  न जाने कितने नीचे तक इंसान ने जानकारी प्राप्त कर ली है । लेकिन उसे नरक कहीं  नहीं दिखा ? ( हाँ नरक दिखाई  देता है । प्रथ्वी  के ऊपर ही । कोई भी शहर/ बस्ती नहीं है । जहाँ पोलिथीन~/गारवेज / सड़े फलों की बदबू/ सड़ता हुआ पानी के गड्ढे /सड़कों में सीबर के खुले मैनहोल जिनमे गिरकर लोग सीधे नरक में गिर पड़ते हैं । आदि आदि न हों ) फिर भी अगर हम प्रथ्वी पर भारत में कहीं भी खोदते जाएँ ।  खोदते जाएँ । तो हम नरक में तो नहीं । अमेरिका जरूर पहुँच जाएँगे । और अमेरिका में नरक नहीं । स्वर्ग है ? जब तक हम डर और लालच अर्थात नरक और स्वर्ग की कल्पनाओं में जीते रहेंगे । तब तक हमे भगवान कभी नहीं मिल पाएगा । क्योंकि भगवान की प्राप्ति में दोनों ही बाधक हैं । अतः हमे चाहिए कि स्वर्ग और नरक के चक्कर से बचें । और वर्तमान में ही जीयें ? और ऐसे अच्छे अच्छे  काम अपनी सोच से ( न कि पुजारी जी के बताए अनुसार ) करें कि हमारे इसी जीवन में हम स्वर्ग में होने जैसा महसूस करें । अगर हम बाग में घूम रहे हों । और फूल खिले हैं । परंतु फूलों की सुगंध और सुंदरता देखकर हमारा दिल नहीं खिल उठता है । तारे चमक रहे हैं ।  सबको ताजमहल चाँदनी में दूध से नहाया  मालूम पड़ता है । पर हमको  नहीं मालूम पड़ता है । आसमान में बादल उमड़ घुमड़ कर आ रहे है   इंद्रधनुष 7 रंग विखेर रहा है । परंतु  हमारे अंदर कोई रंग नहीं है । कोई उल्लास नहीं है । कोयल कू कू कर रही है । और हम बाग में भी दिमागी केलकुलेटर से बिजनेस के जोड़ बाकी गुणा भाग कर रहे  हैं । या IncomeTax से बचने के लिए घर में दबाकर रखे गए करोड़ों के Cash के चोरी चले जाने के डर ने हमको बहरा बना दिया है । तो समझो ।  हम नरक में हो । ये डर । ये बहरापन । किसी पुजारी/धर्माधिकारी ने नहीं पैदा किए हैं । बल्कि ये तो खुद  हमने ही पैदा किया है । नरक का संसार ।
मैं मेरे ही साथ काम किए एकाउंट आफ़ीसर के परिवार को जानता हूँ । जिनके घर में पत्नी है । 2 बच्चे हैं । बड़े लड़के की बहू है । मैंने पूछा कि - बहू बच्चों के साथ कैसे निभती है ? बे बोले कि मेरी बहू मेरी और मेरी पत्नी की बहुत सेवा करती है । और आत्मीयता से पैरों के दर्द में नमक डले गरम पानी में मेरे पैर रखा कर  अपने हाथ से सिकाई करती है । मेरी बहू मुझे डाँटती भी है । कहती है - आपको डायबिटीज है । आपको 2 कप से ज्यादा चाय नहीं मिलेगी । वह भी बिना शक्कर की । आप चीनी का परहेज नहीं करते हैं आदि आदि । मेरा साथी कहता था

कि जब मेरी बहू डाँटती है । तो मुझे बहुत अच्छा लगता है । मेरी कोई बेटी नहीं है । तो मुझे लगता है कि मेरी बेटी ही डांट  रही है । मेरे घर में मेरी बहू बेटी की तरह रहती है । कोई घूँघट नहीं कराता है । मेरी पत्नी भी नहीं कराती  है । मन की आँखों से देखो । तो यही स्वर्ग है । मैं जब कानपुर में था । तो वहाँ 1 परिवार मेरे पड़ोस में था । खुद तहसीलदार के पद से कुछ साल पहले रिटायर हुए थे । 2 बेटियाँ थीं । 3 बेटे थे । तीनों की शादी हो चुकी थी । 2 बहुए बाहर अपने पतियों के साथ रहती थी । और  रोज रोज की कहा सुनी  के कारण बे लोग  बहुत कम घर आते थे । परंतु हम लोग बहुत परेशान रहते थे । क्योंकि उनके यहाँ आए दिन इतनी कलह होती थी कि लोग आकर बीच बचाव करते थे । कारण यह था कि उनको और उनकी पत्नी को दिन भर अपनी सेहत की चिंता में हर चीज खाने के लिए उनके मन मुताबिक और उनके द्वारा निर्धारित समय पर मिलनी चाहिए । भले ही बहू बीमार हो । कोई मदद नहीं । केवल घमंड में चूर कि हम तहसीलदार थे । अफसर थे । घर में भी तहसीलदारी दिखाते थे । बहू ने  2-3 साल तक तो झेला - सब कुछ । बाद में जवाब देने लगी । जैसे ही जवाब देती । तो दोनों सास ससुर कलह करते । और गंदी गंदी गालियां देते थे । सब लोग पड़ोस के समझाते । लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा । 1 दिन तो बहू ने आत्महत्या का प्रयास भी किया । तो घबरा गए । लेकिन कुछ दिनों बाद । फिर वही हाल । बीमार पड़ने पर बड़ी बहुए  देखने भी नहीं आती थी । 1 बहू जिसे बहुत परेशान किया गया था ने तो 1 दिन  कह दिया था कि - आज आयी । सो आयी । अब मैं मरने की खबर पर ही आऊँगी । यह क्या है ? यही नरक है । नरक कहीं और जगह नहीं है ? हम  अपने अच्छे या खराब  व्यवहार से  इसी प्रथ्वी पर स्वर्ग और नरक बना लेते है । और कामना करते हैं । मोक्ष पा लेने की ।
अरे ! हम तो लालच और भय के दलदल में इतने धंस चुके है कि हमारे बनाए धर्मों ने तो यह तक मान लिया  है कि - जो मर जाय । उसे ताबूत में रखकर जमीन में गाढ़ दो । जब प्रथ्वी पर प्रलय ( लास्ट जजमेंट डे ) होगी । तब ईश्वर का दरबार लगेगा । जिसने पुण्य कार्य किए होंगे । उनको स्वर्ग मिलेगा । और जिन  लोगों ने पाप कर्म किए होंगे । जैसे चर्च न जाना ? भगवान की कथा न सुनना ? गंगा स्नान न करना आदि ? बे सब नरक /जहन्नुम  में जाएँगे । और वहाँ लगातार रहना होगा । वहाँ से निकलने/छुटकारा का कोई तरीका नहीं है । ये सब क्या है ?  डरा दिया गया न ? अब तो डर के कारण वे सब कार्य करोगे । जो पुजारी जी ने बताए । लेकिन पैसे खर्च न करने के कारण नहीं कर रहे हो । डर के कारण अब बे सब कार्य /कर्मकांड करने लगे । और पुजारीजी का धंधा चलने लगा । अपने को नरक में जाने से बचाने  के लिए हमने लास्ट जजमेंट डे बना लिया । चलो जब तक प्रलय नहीं होती  है । तब तक नरक में जाने से तो बचे । नरक से तो अच्छा है कि - कब्र में चुपचाप पड़े रहो । बरना  नरक में तो खौलते  तेल के कड़ाहे में पकौड़े की तरह सिक रहे होते । नरक में जाने से बचने का 1 तरीका और निकाल लिया है । वह है “ पाप कर्म करने की बात को खुद  स्वीकार कर लेंना  “ अर्थात कंफ़ेशन ।  यह स्वीकारोक्ति क्या है ? यह चीज यह है कि पाप करो । करते रहो । और जब भी चर्च/मंदिर आदि में जाओ । चर्च में  फादर / मंदिर में भगवान या पुजारी जी  के सामने बस SORRY बोल दो । और तुम माफ कर दिये जाओगे ? क्योंकि फादर ईसा मसीह का । और मंदिर में पुजारी जी भगवान के एजेंट है । क्योंकि इसी बहाने हम आप चर्च/मंदिर तो जाएँगे । जब मंदिर जाएँगे । नियमित रूप से ( क्योंकि हम पाप भी तो करते जा रहे हैं । नियमित रूप से ) तो पुजारी जी की  आमदनी भी होगी नियमित रूप से । क्योंकि कुछ तो दान/चढाबा कुछ तो ले जाओगे । बार बार आकर माफी मागने की कोई पाबंदी भी नहीं है । क्योंकि हर बार माफ कर दिये जाने पर ही तो बार बार जाएँगे । इस तरह 1 लाइसेंस दे दिया जाता है । आगे फिर पाप करते रहने पर पाप धुलवाने का । यही चलता चला आ रहा है । हजारों सालों से । किसके पास वक़्त है । चर्च में जाने का ? डर की बजह से जाते हैं ? कुछ लोगों के अलावा । कौन मन से जाता है ? लगता है कि हमको कह दिया गया है कि पाप खूब करो । कौन रोक रहा है तुमको ?  हम माफ करवा देगे । मजमा लगाने वाले भीड़ बुलाने के लिए कुछ खेल दिखाते है । उसी तरह लोगों से स्वीकारोक्ति कराना भी 1 तरीका है बुलाने का । बर्ट्रेन्ड रसल ने लिखा - और मैं यह हिसाब लगाऊँ कि - मैंने जो भी पाप किए । या पाप कर्म करने की सोची ( पर कर नहीं सका ) ऐसे सब पापों को मिलाकर भी कोई भी जज यहाँ प्रथ्वी पर 4 वर्ष से ज्यादा की सजा नहीं दे सकता है । तो मुझे नर्क में हमेशा हमेशा के लिए कैसे रखा जा सकता है ( अगर ये इतने गंभीर होते । तो प्रथ्वी के पैनल कोड में आजीवन कारावास की सजा  का प्रावधान होता । जो कि नही है । ) यह बात उसने अपनी पुस्तक - मैं क्यों क्रिश्चियन नहीं हूँ ? में लिखी ।
 http://myviews-krishnagopal.blogspot.in/2012/08/blog-post_9.html
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इस लेख के लेखक भारत सरकार के उच्च पद से रिटायर्ड ( 64 ) हैं । मैंने ये लेख सत्यकीखोज के पाठकों के चिंतन मनन व प्रश्नों के हेतु साझा किया है । आप चाहें । तो टिप्पणी द्वारा इस लेख में उठे प्रश्नों के उत्तर भी दे सकते हैं । या फ़िर ( मूल ) प्रश्न निकाल कर मुझसे उत्तर पूछ भी सकते हैं । इन सभी के सरल सहज प्रयोगात्मक स्तर पर उत्तर मेरे पास हैं ।
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