01 जुलाई 2012

इन कथावाचकों की कोई कथा मत सुनो

। श्री अंधे शाह जी ।
भगतौं निकली वहाँ भगतैया । जियतै में मन किहयो न काबू करत फिरत धुरतैया ।
सतगुरु करो भजन बिधि जानो छूटे कपट खटैय्या । अमृत पियो सुनो घट अनहद बाजत बिमल बधैय्या ।
नागिनि जगै चक्र षट बेधैं सातों कमल खिलैय्या । सुर मुनि आय आय कर भेटैं जै जै कार करैय्या ।
ध्यान प्रकास समाधि नाम धुनि सनमुख जग पितु मय्या । अन्धे कहैं अन्त निज पुर हो छूटै जग दुख दैय्या ।
सन्त अंधे शाह कहते हैं - बिना सोचे समझे तोता की तरह राम राम रटने वाली ( अ ) क्रियात्मक भक्ति का फ़ल जब वहाँ ( परिणाम के समय ऊपर ) पता चलता है । तब हाथ मलते हुये पछताने के सिवाय कुछ नहीं रह जाता । जीते जी मन को काबू

में करके सही भक्ति में ( मन को ) नहीं लगाया । और फ़ालतू का नाच  गाना बजाना ढोल मजीरा कीर्तन ( परम्परागत प्रचलित आम पूजा पाठ ) आदि ढोंग करते रहे । तो फ़िर तो सिर्फ़ पछताना ही रह जायेगा । इसलिये सच्चे ? सतगुरु की शरण में जाओ । असली नाम जप ( से नाम कमाई ) की विधि जानो । तो यह संसार का कपट भृम सहज ही उस ( निर्वाणी अजपा स्वासों में स्वयं होता - सोहंग ) नाम के प्रताप से दूर हो जाता है । तात्पर्य है । असलियत का सत्य का स्वतः बोध होने लगता है । तब अंतर ( शरीर के अन्दर ) में प्रवेश करके हँस जीव का आहार अमृत पियो । और जो घट के अन्दर  अनहद ( लगातार ) संगीत की बधाई बज रही है । उसको सुन कर आनन्द  से मस्त हो जाओ । तब नागिन ( कुण्डलिनी ) जाग उठती है । और 6 चक्रों को बेधती ( निशाना बनाना या जागृत होना ) हुयी ( 


कृमशः ) 7 कमलों को खिला देती है ( जो अभी साधारण अवस्था में बन्द हैं ) तब अंतर जगत के देवता मुनि आकर मिलते भेंट करते हुये तुम्हारी जय जयकार करते हैं कि - आज एक पुण्यात्मा से भेंट हुयी ।  जिसने मनुष्य जीवन की कष्टकारक 84 लाख योनियों की भूल भुलैया से निकल कर दिव्यता हासिल की । अहो ! पुण्यात्मा आप धन्य हो । फ़िर ध्यान समाधि के अलौकिक दिव्य प्रकाश में सत नाम की मधुर ध्वनि के साथ जगत के पिता माता के साक्षात दर्शन होते हैं । अंधे शाह कहते हैं - आप चाहे । करोङों वर्ष क्यों न भटको । अन्त में जब कभी निज पुर  ( आत्मा के असली

घर सचखण्ड ) पहुँचते हो । तभी इस संसार की हाय दैय्या से मुक्ति मिलती है । वरना इसमें गन्दी नाली के कीङे की भांति वासनाओं के मल में मलीन रेंगते रहो ।
 । श्री अंधे शाह जी ।
सतगुरु से उपदेस लै छोड़ो सान औ मान । चारौं धाम के किहे का तब फल पावो जान ।
पर नारायन पास में तन तजि करो पयान । है चौथा बैकुंठ यह अन्धे कह हम जान ।
- सन्त अंधे शाह कहते हैं - सदगुरु से उपदेश लेकर झूठे शान मान की भावना को त्याग दो । तो चारों धाम का फ़ल यहीं पाया जानों । मैंने यही जाना है । अन्त समय जब शरीर त्याग कर जाओगे । तो स्वर्ग में नारायण को प्राप्त होओगे ।
तन मन प्रेम लगाय के तीरथ ब्रत जिन कीन । अन्धे कह बैकुँठ गे सिंहासन आसीन ।
पर स्वारथ औ दान करि गे बैकुँठ मँझार । अन्धे कह दोनों दिसा उनकी जै जै कार ।

- तन मन से पूरे प्रेम भाव से जिन्होंने तीर्थ वृत किये । वे स्वर्ग में सिंहासन पर जाकर आसीन हुये । निस्वार्थ दान भक्ति आदि से उन्होंने बैकुंठ प्राप्त किया । और दोनों जगह ( यहाँ भी वहाँ भी ) उनकी जय जयकार हुयी ।
। श्री अंधे शाह जी ।
सिय राम के दर्शन भये नहीं सो तो वक्ता अज्ञानी है ।
सुर मुनि सब कैसे मिलैं उसे पढ़ि सुनि बोलत मृदु बानी है ।


जब कथा बन्द करिकै बैठैं मन करत फिरत सैलानी है ।
अंधे कहैं कैसे गती होय आखिर होती हैरानी है ।
- जिसको आंतरिक रूप से तीसरे नेत्र से सिया ( सुरति ) राम ( अनहद ररंकार ध्वनि ) का दर्शन ( बोध ) नहीं हुआ । वह कथा वक्ता बङा अज्ञानी है । देवता मुनि सभी कैसे उससे मिलें । ऐसा पढा सुना मधुर वचनों से बताते हैं । यह कथा बन्द करके यदि बैठें । तो फ़िर मन सैलानी बना घूमता है । अंधे शाह कहते हैं - हैरानी है । फ़िर अन्दर गति कैसे होगी ?
मति सुनो कथा उस वक्ता की जिन सिया राम को नहि जाना ।
उसमें तो खाली वाक्य ज्ञान वह सान मान में है साना ।
मन अपना काबू किहे बिना कहीं खुलते हैं आँखी काना ।
कहें अंध शाह तन छोड़ि चलै नाना बिधि दुख नहि कल्याना ।
- सन्त अंधे शाह कितनी महत्वपूर्ण बात कहते हैं - उन कथावाचकों की कोई कथा मत सुनो । जिन्होंने सिया ( सुरति ) राम ( ररंकार शब्द ध्वनि ) को यथार्थ रूप तत्व ज्ञान रूप नहीं जाना । उसे तो खाली वाक्यों का ज्ञान है । और वह अपनी झूठी शान

मान ( अहंकार ) में रंगा हुआ है । क्योंकि अपना मन काबू किये बिना ( तीसरी ) आँख ( तीसरा ) कान नहीं खुलते । अर्थात सत्य को सुनना और देखना असंभव है । और अन्त समय जब शरीर छूटता है ।  तब 84 लाख योनियों और घोर नरकों के अपार दुख हैं । फ़िर कल्याण का कोई रास्ता ही नहीं बचता ।
जहाँ भाव तहँ प्रेम है जहाँ प्रेम तहँ भाव । अंधे कह सतगुरु बचन गहौ मगन ह्वै जाव ।
भजन क साधन प्रेम है भजन क साधन भाव । अंधे कह मानो सही न मानौ चकराव ।
- भक्ति का भाव ही शाश्वत प्रेम से जोङता है । मन के 8 भावों - काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर ज्ञान वैराग इनमें ही जीव बरतता है । 9 वां भाव सिर्फ़ प्रेम का है । इसलिये सतगुरु के वचन उपदेश द्वारा इस भाव को गृहण कर मगन हो जाओ । इस निर्वाणी भजन का साधन सिर्फ़ प्रेम ही है । सन्त अंध शाह का कहना मानों । नहीं तो जन्म मरण की इसी अथाह भूल भुलैया में बार बार चकराते भटकते रहोगे ।
। श्री रघुबर दास पासी जी । ( अपढ़ )
घुबर पासी सच कहैं षट झाँकी सब ठौर । मन काबू कीन्हें बिना दौरि रहे सब दौर ।

लखौ षट रूप की शोभा । जाकी माया जगत लोभा । सुरति जो शब्द में चोभा । टूट तब द्वेत के टोभा । खुले तब श्रवण औ नैना । साफ दिल का भया ऐना । भई तब दृष्टि सुखदाई । रूप सन्मुख रहे छाई ।
- सन्त रघुवर पासी कहते हैं - 6 चक्रों ( में होने वाले देव दर्शन ) की झांकी सब जगह ( हर मनुष्य शरीर )  है । इसके लिये किसी स्थान विशेष काशी मथुरा हरिद्वार आदि जाने की कोई आवश्यकता ही नहीं है । इसलिये मन को ( निर्वाणी मंत्र द्वारा ) काबू में किये बिना आपकी ये भाग दौङ ( तीर्थ आदि ) सब बेकार ही है । इसलिये इन 6 चक्रों की अदभुत झांकी को अंतर की आँखों ( 3rd eye ) से साक्षात देखो । जिसकी माया से यह जगत मुग्ध हो रहा है । उसको देखो । सुरति को जब शब्द ( मष्तिष्क में स्वयं गूँजती ररंकार ध्वनि ) से जोङा । तब ये द्वैत का भृम टूट गया । सब में वही 1 नजर आने लगा । तभी तीसरी आँख 3rd eye और तीसरा कान खुल गया । दिल का  दर्पण साफ़ होकर चमकने लगा । इस रूप अनुभव को देखते हुये दृष्टि सुखदाई हो उठी ।
। श्री महंगू धोबी जी । ( अपढ़ )
मन जब तक साधू नहीं तन साधू बेकार । मन जब साधू हवै गयो दोनों दिशि जैकार ।
मन को नाम के रंग रंगै तब होवै भव पार । केवल कपड़े के रंगे मिलत नहीं सुख सार ।
मन मानी जो कोइ करै वाको काम है फीक । सुर मुनि जो कहि लिखि गये उनकी वाक्य है ठीक ।
कामी क्रोधी तरत हैं लोभी नर्क को जाय । उनका मन हरदम मगन लोभ में रहा समाय ।


महँगू धोबी जाति का पढ़ा नहीं कछु जान । राम नाम सतगुरु दियो मुक्ति भक्ति भा ज्ञान ।
त्यागि तन चढ़ि सिंहासन पर । पहुँचिगे अपने आसन पर ।
- सन्त महंगू धोबी कहते हैं - जब तक मन से साधु नहीं हुआ । तब तक कपङे आदि रंग कर शरीर पर तिलक वन्दन चन्दन करने से कोई लाभ नहीं । लेकिन जब सही अर्थों में मन से साधु ( नाम जप से हुआ क्रियात्मक आंतरिक परिवर्तन ) हो गया । तब दोनों दिशाओं ( इस प्रथ्वी पर और अन्दर सूक्ष्म जगत ) में  जय जयकार होती है । मन को इस स्वांसों में गूँजते सत्य नाम ( सो-हंग ) के रंग में रंगो । तभी इस संसार सागर से पार हो सकते हैं । बाकी सिर्फ़ कपङे रंगने से कुछ हासिल नहीं होगा । इसलिये जो 


कोई मनमानी करता है । उसका काम फ़ीका है । देवता ऋषि मुनियों ने अपने उपदेश में ऐसा ठीक ही कहा है । कामी क्रोधी भी इस नाम के प्रताप से तर जाते हैं । लेकिन हर समय लोभ में ही डूवा रहने वाला नरक को जाता है । सन्त रैदास की तरह महंगू सन्त कहते हैं कि - मैं जाति का धोबी हूँ । पढा लिखा नहीं । कोई ज्ञान भी नहीं । लेकिन सतगुरु ने ये राम नाम ( ररंकार - प्रथम स्थिति सोहंग ) देकर मुझे असली मुक्ति भक्ति का अनमोल ज्ञान दिया । इसलिये मैं तो शरीर छूटने क्के बाद सिंहासन पर चढकर अपने पद को प्राप्त करूँगा ।
- विशेष गौर करें । ये अनपढ थे । और जाति के धोबी थे ।
। श्री कसनी साह जी । ( अपढ़ )
अहंकार की पिये शराब । लोभ क खाते सदा कबाब ।
जम पकड़ैं तब हो बेताब । तब किमि देवैं उन्हैं जवाब ।
नर्क में जायके उनको छोड़ैं । राम नाम ते जे मुख मोड़ैं ।
हाय हाय हरदम चिल्लावैं । फटकि फटकि के मुख को बावैं ।
सन्त कसनी भी अनपढ थे । कसनी कहते हैं - ये इंसान जिन्दगी भर लोभ रूपी कबाब खाता है । और अहंकार रूपी शराब के नशे में रहता है । फ़िर मृत्यु के बाद जब जम उसको पकङते हैं । तब फ़ङफ़ङाता है । अब क्या और कैसे अपने अपराधों का जबाब दे ? इसलिये इस शरीर के रहते जो राम नाम ( स्वांसों में गूँजता निर्वाणी नाम ) से मुख मोङे रहते हैं ।  फ़िर उनको नरक ही नसीब होता है । तब वे नरक में पछताते हुये हरदम हाय हाय  चिल्लाते हुये मुँह फ़ाङते रहते हैं ।
कामी क्रोधी तरि गये लोभी नर्क को जाँय । बार बार जनमैं मरैं चौरासी चकरांय ।
बहुत बड़ा बिस्तार है कहं लगि को लिखि पाय । यासे श्री रामै भजै अन्त में निज पुर जाय ।
- कसनी कहते हैं - इस नाम के प्रताप से कामी क्रोधी भी तर गये । लेकिन लोभी बार बार जनमते मरते हुये

84 लाख योनियों में भटकते रहते हैं । इस 84 लाख योनियों में दुसाध्य कष्टों का कोई पार नहीं है । कहाँ तक लिखा जाये । इसलिये राम का भजन करता हुआ आयु पूरी होने पर अपने असली घर सचखण्ड पहुँचने का इंतजाम कर ।
मान बड़ाई सुनि खुश होवैं । सो चलि अन्त नर्क में रोवैं ।
निंदा सुनि के क्रोध जो करहीं । सो भी जाय नर्क में परहीं ।
अस्तुति निंदा सम करि मानै । सो बसि पावै ठीक ठेकानै ।
कसनी साह अपढ़ की बानी । सोधि लेहु मैं हौं अज्ञानी ।
मिला साकेत स्थाई । अचल पदवी जो कहलाई ।
बिना हरि के भजे भाई । कौन वहँ पर सकै जाई ।


दास रघुबर कहैं गाई । जौन जाना सो लिखवाई ।
- इस संसार में जो मान बङाई सुन कर खुश होते हैं । वे भी अन्त में नरक में जाकर रोते है । जो अपनी निंदा सुन कर क्रोध करते हैं । वो भी अन्त समय नरक में गिरते हैं । लेकिन जो प्रशंसा और निंदा को समान समझते हैं । वो सही स्थान पाते हैं । सन्त कसनी कहते हैं - मैं अनपढ अज्ञानी हूँ । फ़िर भी स्थाई स्थान और अचल पदवी जो मुझे मिली । बिना हरि ( स्वांस - शरीर को हरा भरा रखने के कारण असल अर्थों में स्वांस को ही हरि कहा जाता है ) को भजे हे भाई  ! वहाँ जाना मुमकिन ही नहीं है । इसलिये मुझे जो अनुभव में आया । वही मैंने लिखवाया ।
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