03 जून 2012

पुतर मितर बिलास बिनता तूटते ए नेह

प्रिय राजीव भाई ! नमस्कार । प्रस्तुत है । आज की प्रविष्टि । परन्तु कुछ लाइनें इतनी गहन थी कि मेरे भी बस के बाहर थी । और आप तो जानते है कि नेट पर इनके उथले अर्थ ही होते है । सो कुछ कार्य जो छुट गया । कृपया उस पर प्रकाश आप ही डालिए । "गुरु सेवको की चरण धूलि"
मारू महला 5 घरु 6 दुपदे । सितगुर परसादि ।
छोडि सगल सिआणपा मिल साध तिआगि गुमानु । अवरु सभु किछु मिथआ रसना राम राम वखानु । 1 ।
मेरे मन करन सुणि हिर नामु । मिटिह अघ तेरे जनम जनम के कवनु बपुरो जामु । 1 । रहाउ ।
दूख दीन न भउ बिआपै मिलै सुख बिसरामु । गुर परसादि नानकु बखानै हिर भजनु ततु गिआनु । 2 । 1 । 24 ।
मारू महला 5 ।
जिनी नामु विसारिआ से होत देखे खेह । पुतर मितर बिलास बिनता तूटते ए नेह । 1 ।
मेरे मन नामु नित नित लेह । जलत नाही अगिन सागर सूखु मिन तिन देह । 1 । रहाउ ।
बिरख छाइआ जैसे बिनसत पवन झूलत मेह । हिर भगित दिरङ मिलु साध नानक तेरै कामि आवत एह । 2 । 2 । 25 ।
मारू महला 5 ।
पुरखु पूरन सुखह दाता संगि बसतो नीत । मरै न आवै न जाइ बिनसै बिआपत उसन न सीत । 1 ।
मेरे मन नाम सिउ किर परीति । चेति मन मिह हिर हिर निधाना एह निर्मल रीति । 1 । रहाउ ।
किरपाल दइआल गोपाल गोबिद जो जपै तिसु सीधि । नवल नव तन चतुर सुंदर मनु नानक तिसु संगि बीधि । 2 । 3 । 26 ।
मारू महला 5 ।
चलत बैसत सोवत जागत गुर मंतर रिदै चितारि । चरण सरण भजु संगि साधू भव सागर उतरिह पारि । 1 ।
मेरे मन नामु हिरदै धारि । किर परीति मनु तनु लाइ हिर सिउ अवर सगल विसारि । 1 । रहाउ ।
जीउ मनु तनु पराण पर्भ के तू आपन आपु निवारि । गोविद भजु सिभ सुआरथ पूरे नानक कबहु न हारि । 2 । 4 । 27 । मारू महला 5 ।
तिज आपु बिनसी तापु रेण साधू थीउ । तिसिह परापित नामु तेरा किर किरपा जिसु दीउ । 1 ।
मेरे मन नामु अमृतु पीउ । आन साद बिसारि होछे अमरु जुगु जुगु जीउ । 1 । रहाउ ।
नामु इक रस रंग नामा नामि लागी लीउ । मीतु साजनु सखा बंधपु हिर एकु नानक कीउ । 2 । 5 । 28 ।
मारू महला 5 ।
परतिपालि माता उदिर राखै लगिन देत न सेक । सोई सुआमी ईहा राखै बूझु बु्धि विबेक । 1 ।
मेरे मन नाम की किर टेक । तिसिह बूझु जिन तू कीआ पर्भु करण कारण एक । 1 । रहाउ ।
चेति मन मिह तिज सिआणप छोडि सगले भेख । सिमिर हिर हिर सदा नानक तरे कई अनेक । 2 । 6 । 29 ।
मारू महला 5 ।
पितत पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु । महा भउजल माहि तुलहो जा को लिखओ माथ । 1 ।
डूबे नाम बिनु घन साथ । करण कारणु चित न आवै दे किर राखै हाथ । 1 । रहाउ ।
साध संगित गुण उचारण हिर नाम अमृत पाथ । करहु किरपा मुरारि माधउ सुणि नानक जीवै गाथ । 2 । 7 । 30 ।
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छोडि सगल सिआणपा ( चतुराई ) मिल साध तिआगि गुमानु । अवरु सभु किछु मिथआ ( झुठ ) रसना  राम राम वखानु ( सिमरो राम राम ) । 1 ।
मेरे मन करन ( कान ) सुणि हिर नामु  । मिटिह अघ ( पाप ) तेरे जनम जनम के कवनु बपुरो जामु ( बेचारा दयनीय यम ) । 1 । रहाउ ।
दूख दीन ( दरिद्रता ) न भउ बिआपै मिलै सुख बिसरामु । गुर परसादि ( गुरु कृपा से ) नानकु बखानै ( बाबा जी कहते है ) हिर भजनु ततु गिआनु ( तत्व ज्ञान ) । 2 । 1 । 24 ।
जिनी नामु विसारिआ ( जो हरी नाम से विमुख हो गए । या जिन्होंने राम नाम की शरण नहीं ली । उन्हें मिटटी में मिलते देखा है ) से होत देखे खेह । पुतर मितर बिलास बिनता तूटते ए नेह ( पुत्र मित्र एवं संगिनी के प्रेम एवं मोह के पाश टूट जायेंगे ) । 1 ।
मेरे मन नामु नित नित लेह । जलत नाही अगिन सागर सूखु मिन तिन देह ( इससे भव सागर की अग्नि में जलना न होगा । एवं उस परम सुख की प्राप्ति होगी )
बिरख छाइआ जैसे बिनसत पवन झूलत मेह ( वृक्ष की छाया जिस प्रकार स्थिर नहीं है । और जैसे पवन बादलों को झुलाते हुए ले जाती है । उसी प्रकार तेरा भी हरी नाम बिना ये ही हाल है ।
)  हिर भगित दिरङ मिलु साध नानक तेरै कामि आवत एह ( ह्रदय में यदि भक्ति भाव उदित है । और मिलन की तड़प है । तो ( मिलु साध नानक ) किसी सच्चे सतगुरु की शरण ही इन सब से छुटकारा दिला सकती है ) 2 । 2 । 25 ।
मारू महला 5 ।
पुरखु पूरन सुखह दाता संगि बसतो नीत ( वह पूर्ण पुरुष सब सुखों का दाता हरदम तेरे साथ है )  मरै न आवै न जाइ बिनसै बिआपत उसन न सीत ( न वह मरता है । न जन्म लेता है । न आता है । न जाता है । वह तो सदा से है । एवं उस पर किसी ऋतू ( सर्दी गर्मी )  का कोई असर नहीं होता ) । 1 ।
मेरे मन नाम सिउ किर पर्रीति । चेति ( सदा सिमर ) मन मिह हिर हिर निधाना एह निर्मल रीति । 1 । रहाउ ।
किरपाल दइआल गोपाल गोबिद जो जपै तिसु सीधि ( इस अमृत नाम ( कृपाल । दयाल । गोबिंद । गोपाल ) को जिसने जपा । वह ही उस परम को पाप्त हुआ )  नवल नव तन चतुर सुंदर मनु नानक तिसु संगि बीधि( जिसने भी अपना मन उसके संग बींधा । उसके इन्ही गुणों में समां गया )
मारू महला 5 ।
चलत बैसत सोवत जागत गुर मंतर रिदै चितारि । चरण सरण भजु संगि साधू भव सागर उतरिह पारि ( जो सच्चे सदगुरु की शरण जाकर उनके चरण में सिस देकर नाम का भजन करते है । वे ही भव सागर से पार उतर जाते है ) । 1 ।
मेरे मन नामु हिरदै धारि । किर परीति मनु तनु लाइ हिर सिउ अवर सगल विसारि ( ह्रदय से बाकी सब फालतू बाते निकाल कर ) । 1 । रहाउ ।
जीउ ( जीव ) मनु तनु पराण ( स्वास ) पर्भ ( प्रभू ) के तू आपन आपु निवारि । गोविद भजु सिभ सुआरथ पूरे नानक कबहु न हारि । 2 । 4 । 27 ।
मारू महला 5 ।
तिज आपु ( अहम खोकर ) बिनसी ( दूर होना ) तापु रेण साधू थीउ । तिसिह परापित नामु तेरा किर किरपा जिसु दीउ । 1 ।
मेरे मन नामु अमृतु पीउ । आन ( मान ) साद ( स्वाद ) बिसारि ( छोड कर ) होछे अमरु जुगु जुगु जीउ । 1 । रहाउ ।
नामु इक रस रंग नामा नामि लागी लीउ ( केवल एक नाम रस में रंग कर । नाम की ही लिव लगाओ )  मीतु साजनु सखा बंधपु हिर एकु नानक कीउ । 2 । 5 । 28 ।
मारू महला ५ ।
परतिपालि माता उदिर राखै लगिन देत न सेक ( वह प्रति पालक माता के गर्भ में भी हमें सुरक्षित रखता है । एवं किसी प्रकार का दुख या हानि से रक्षा करता है ) सोई सुआमी ईहा राखै बूझु बु्धि विबेक ( वो ही स्वामी यहाँ भी हमें भव जम से सुरक्षित करना चाहता है । यदि बुधि विवेक से उस मार्ग को खोजा जाय ) । 1 ।
मेरे मन नाम की किर टेक । तिसिह बूझु जिन तू कीआ ( उस मालिक को पहचान जिससे तेरी उत्पत्ति हुई है ) पर्भु करण कारण एक । 1 । रहाउ  ।
चेति मन मिह तिज सिआणप ( चतुराईयां त्याग कर ) छोडि सगले भेख ( अपने धार्मिक लबादे उतार कर )  सिमिर हिर हिर सदा नानक तरे कई अनेक । 2 । 6 । 29 ।
मारू महला 5 ।
पितत पावन नामु जा को अनाथ को है नाथु ( वो पतित पवन नाम ही है । जो अनाथों का नाथ है ) । महा
भउजल माहि तुलहो जा को लिखओ माथ ( उस घनघोर भव जल में ये नाम ही तेरी नैया होगी । एवम यहाँ से वो ही बच पाएंगे । जिनके माथे पर नाम की मुहर होगी ) । 1 ।
डूबे नाम बिनु घन साथ । करण कारणु चित न आवै दे किर राखै हाथ । 1 । रहाउ ।
साध संगित गुण उचारण हिर नाम अमृत पाथ । करहु किरपा मुरारि माधउ सुणि नानक जीवै गाथ । । 2 । 7 । 30 ।
इस सुन्दर वाणी की सम्पूर्ण व्याख्या शीघ्र ही ।
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