02 जून 2012

सभना का दाता एकु 1 है आपे बखस करेइ

प्रिय राजीव भाई ! नमस्कार । कल कोई प्रविष्टि नहीं भेज पाया । क्षमा चाहता हूँ । आज श्री गुरु ग्रन्थ साहिब से ये लाइनें प्रस्तुत हैं । ब्लॉग के समस्त प्रेमी बंधुओं के लिये ।
सिरी रागु महला 3
घर ही सउदा पाईऐ अंतिर सभ वथु होइ । खिनु खिनु नामु समालीऐ गुरमुखि पावै कोइ ।
नामु निधानु अखुटु है वड भागि परापित होइ । 1 मेरे महलु पाइआ गुर सबदी वीचारि । 2
सतगुर ते जो मुह फेरिह मथे तिन काले । 3 अनिदनु दुख कमावदे नित जोहे जम जाले ।
सुपनै सुखु न देखनी बहु चिता परजाले । 3 सभना का दाता एकु है आपे बखस करेइ ।
कहणा किछू न जावई जिसु भावै तिसु देइ । नानक गुरमुखि पाईऐ आपे जाणै सोइ । 4
घर ( शरीर मे ही )  ही सउदा ( सौदा ) पाईये । अंतिर ( अन्तर मे ही ) सभ वथु ( वस्तु ) होइ ।
खिनु ( क्षण ) खिनु ( क्षण ) नामु समालीऐ ( निर्वाणी नाम संभालिये ) गुरमुखि ( गुरु मुख ) पावै कोइ ।
नामु निधानु अखुटु ( नाम कभी न समाप्त होने वाला ) है । वड भागि ( बहुत ही सौभाग्य वाले को ) परापित ( प्राप्त ) होइ । मेरे महलु ( अपने शरीर मे ही ) पाइआ गुर सबदी ( गुरु द्वारा दिया निर्वाणी नाम ) वीचारि ( विचार करके या नाम कमाई से ) । सतगुर ते जो मुंह फेरिह ( सदगुरु से मुँह फ़ेरने वाले ) मथे तिन काले ( उनको काल मारता है ) । अनिदनु ( बहुत समय से ) दुख कमावदे नित जोहे ( देखे ) जम जाले । सुपनै सुखु न देखनी बहु चिता परजाले ( स्वपन में भी चिन्ता सताती रहती है । और दिन रात दुख की चिता पर जलता रहता है ) सभना ( सभी ) का दाता एकु 1 है । आपे बखस करेइ । कहणा किछू न जावई जिसु भावै तिसु देइ । नानक गुरमुखि पाईऐ आपे जाणै सोइ ।
- अरे ! भेङों के भाई बंधु एण्ड रिश्तेदारो । कहीं झूठे मन्दिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा जाने की कोई जरूरत ही नहीं है । ये अनमोल कीमती सौदा घर ( शरीर ) में ही मौजूद है । आराम से पा सकते हो । आपके अंतर में ही सभी वस्तु ( सभ वथु ) रखी है । किसी सच्चे गुरु ( गुरमुखि होकर ) द्वारा ये ( स्वांसों में गूँजता निर्वाणी नाम रूपी अक्षय धन ) हँस दीक्षा प्राप्त कर शरीर रहने तक इसकी प्रत्येक क्षण ( खिनु खिनु ) बङे जतन से ( नाम जपना ) कमाई कीजिये । यही वो अक्षय धन है । जो मरने के बाद काम आयेगा । बाकी कुछ भी साथ न जायेगा । बङे भाग्य से प्राप्त होने वाला ये (  स्वांसों में गूँजता निर्वाणी ) नाम अक्षय ( अखुटु ) है । इसका कभी क्षय नहीं होता । गुरु के शब्द ( सबदी - नाम ) पर विचार ( वीचारि ) करके इसे अपने शरीर में (  मेरे महलु ) पाया है । फ़िर भी जो ऐसे सतगुरु से मुँह फ़ेर लेते है । उन्हें काल ही रगङ रगङ कर मारता ( मथे तिन काले ) है । बहुत समय से ( अनिदनु ) तू दुखों को ( कर्मों द्वारा ) कमाता हुआ रोजाना जम के जाल को देखता ( जोहे ) है । तुझे स्वपन में भी सुख नहीं है ( सुपनै सुखु न देखनी ) और बहुत सी चिंताओं से दुखी होकर जलता रहता है ( बहु चिता पर जाले ) इन सब दुखों से छुटकारा दिलाने वाला वो सबका दाता मालिक 1 ही है ( सभना का दाता एकु है ) कहने में कुछ नहीं जाता । या कहिये । कहने सुनने से कोई लाभ नहीं ( कहणा किछू न जावई ) जो पूरे भाव से इस तरफ़ आता है । उसी को तू देता है ( जिसु भावै तिसु देइ ) नानक साहब कहते हैं - इसको सिर्फ़ गुरुमुख ( का अर्थ है । अपने गुरु में पूर्ण समर्पण ) ही पाता है ( नानक गुरमुखि पाईऐ ) और तब वह आपको ( परमात्मा ) या स्वयं ( परमात्मा या स्वयं को जानना 1 ही बात है ) को जानता है ( आपे जाणै सोइ ) अब समझे । ऐसे होता है - ऊ ला ला ।
"निकृष्ट अतिनिकृष्ट दास"
प्रस्तुतकर्ता - अशोक कुमार दिल्ली से । धन्यवाद अशोक जी ।
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