28 मई 2012

बंधन और मोक्ष मन के धर्म हैं आत्मा के नहीं

प्रिय राजीव जी । नमस्कार । एक प्रश्न है । यदि उपयुक्त समझें । तो उतर दें । अन्यथा छोड़ दें । क्योंकि हर प्रश्न के प्रत्युतर में फिर से बहुत सारे प्रश्न मुँह बाये खड़े हो जाते हैं । प्रश्न ये है कि - जब मैं स्वयं ( आत्मा रूप में ) ही चेतन हूँ । और इस मल विक्षेप के शरीर से मेरा कुछ समय का ही बंधन है । और यह बंधन भी मुझ पर ही निर्भर करता है कि कब तक । अगर चाहूँ । तो अभी बंधन से मुक्त हो जाऊँ ( मृत्यु का वरन करके ) और मै हमेशा से था । और रहूँगा भी । चाहे प्रलय आ जाये । या महा प्रलय आ जाये । मेरा अस्तित्व तो हमेशा ही रहेगा । मै कर्ता नहीं हुँ । भोक्ता भी नहीं हूँ । न ही कार्य । और न ही कारण । और सबसे मुक्त हूँ ।( अद्वैत रूप में या आत्मा रूप में ) तो फिर कैसा बंधन ? बूंद हमेशा ही जल रूप रहेगी । चाहे वह वर्षा की एक बूंद हो । नदी हो । झील हो । या समुद्र हो । कैसा बंधन कैसी मुक्ति ? कैसा सुख ? कैसा दुख ? न इन सुखों में शांति । न दुखों मैं अशांति । क्योंकि ये कभी मुझे ( आत्म ) छुते मात्र भी नहीं ( ये कैसा भाव है । जो यदा कदा सांसारिक नियमो के विरुद्ध मुझे खड़ा कर देता है ? )
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हर प्रश्न के प्रत्युतर में फिर से बहुत सारे प्रश्न - देखिये । मैं जब छोटा था । तबसे जाने किस प्रेरणा से लोगों से कहता था - आप बिज्ञान को देखकर चमत्कृत होते हो । पर मैं खास नहीं होता । क्योंकि मेरी दृष्टि में कुछ ही आविष्कार हुये हैं । जिनसे पूरा बैज्ञानिक विकास
हुआ है । जिसमें सबसे मुख्य था । पहिया चक्का या wheel पुरानी किताबों में ऐसा कहा है । कोई व्यक्ति ढलान पर वृक्ष की गोल पिण्डी पर बैठा हुआ फ़िसल रहा था । और हठात उसके दिमाग में आया । लकङी को गोल गोल काटकर बना पहिया गति के क्षेत्र में क्रांति कर सकता है । और फ़िर वही हुआ । हालांकि मेरे विचार से क्रांति कुछ ज्यादा ही हो गयी । पहिये में तो हवा फ़ुल हो गयी । पर पहिया बनाने वालों की सब हवा निकल गयी । पिंचर हो गये । भस्ट तक हो गये । तो आप - पहिया । मोटर ( यहाँ मोटर से अर्थ घुमाने की तकनीक से है । जैसे - पंखा । बाइक आदि तमाम चीजों में प्रयुक्त मोटर ) रजिस्टेंस कंडेसर ( विधुत प्रवाह को निश्चित वेग में निकालना ) आदि गिनी चुनी कुछ ही चीजें पायेंगे । जिनके आधार पर सभी चीजों का निर्माण हुआ है । लेकिन प्रत्येक बिज्ञान का विकास देख कर चकाचौंध है । सोचो । ये विकास ( विनाश ) न हुआ होता । तो आज शुद्ध रोटी तो खाने को मिलती । जो कम्प्यूटर मोबायल से अधिक जरूरी है ।
बस बात यही है । द्वैत या संसार वृक्ष ऐसा ही है कि इसमें शाखायें निकलती ही जाती हैं । यदि आप - ये क्या है ।
ये क्या है ? प्रश्न करते हैं । तो प्रश्न कभी खत्म होने वाले नहीं हैं । अनन्त हैं । लेकिन यदि आप ये प्रश्न करते हैं - मैं क्या हूँ ? मैं कौन हूँ ? तो फ़िर कृमशः इसको जानते ही सभी प्रश्न समाप्त हो जायेंगे । क्योंकि सभी प्रश्न आपके अन्दर ही उठ रहे हैं । और आपकी कोशिश से ही हल हो रहे हैं । अद्वैत में कहीं कुछ नहीं है । और द्वैत का कोई पार नहीं है ।
चेतन में एक गुण है । इसमें निरंतर कल्पना विचार रूपी तरंगे उठती रहती हैं । इसमें ये शक्ति है कि - ये अपने विचारों को मूर्त रूप दे सकता है । अतः परमात्मा ( स्थिति ) की आदि सृष्टि ( चौंकिये मत । अभी भी ये स्थिति होती है ) से लेकर । चेतन के अनगिनत शक्ति स्तर ( अनुसार ) पर अनगिनत सृष्टि प्रलय निरंतर होती ही रहती है । चेतन की इस प्रकृति का विशेष गुण है कि - ये निरंतर परिवर्तन शील है ।
यदि आप एक वीडियो कैमरा लेकर बाजार से एक तरफ़ से शूट करते हुये 1 किमी भी निकल जायें । और दोबारा
उसी रास्ते का तुरन्त वीडियो शूट करें । तो उतनी ही देर में उसी स्थान पर चित्र में बहुत सा परिवर्तन हो चुका होगा । इसलिये प्रश्न कभी खत्म ही न होंगे । क्योंकि तब तक ( उत्तर मिलने तक ) स्थितियों में परिवर्तन हो जाता है ।
वास्तव में बंधन और मोक्ष मन के धर्म हैं । आत्मा के नहीं । आत्मा तो सदा सर्वदा मुक्त और आनन्दमय ही है । वह कभी बंधन में आयी ही नहीं । जो मुक्त होगी । लेकिन आपने जिस आसानी से ? इसको अपनी इच्छा से मुक्त होना कह दिया । वह अज्ञान है । यह बात सदियों से तप करते तमाम तपस्वी भी सिद्धांत रूप में जानते थे । त्यागी वैरागी ज्ञानी भी थे । लेकिन बंधन मुक्त नहीं हो पाये - कोटि जन्म मुनि जतन कराहीं । अन्त राम कह आवत नाहीं ।
मल विक्षेप का आवरण सिर्फ़ यही शरीर नहीं है । आपके अविनाशी जीव पर इच्छाओं के आवरण रूप अनगिनत सूक्ष्म और कारण शरीर आपके अन्दर हैं । जिनके बीज सिर्फ़ ज्ञान की अग्नि से भुनकर निर्बीज होते हैं । तब छुटकारा मिलता है । और इसके लिये आपको अपने ही आवरण की गहन पर्तों को नष्ट करना होगा । जब आत्मा से सभी जीव आवरण उतर जायेंगे । तब बात बनेगी । इसलिये जेल ( शरीर ) से भाग कर तोङ कर ( स्व मृत्यु करना ) मुक्त होना । मुक्त होना नहीं है । आपको फ़िर गिरफ़्तार कर जेल ( दूसरे शरीर ) में डाल दिया जायेगा । कानून के नियम अनुसार मुक्त होना ही असली मुक्त होना है ।
ठीक है । आप हमेशा से हो । हमेशा ही रहोगे । पर प्रश्न वही है । इस अनन्त जीवन काल में आपकी विभिन्न स्थितियाँ क्या हैं ? श्रीकृष्ण रहस्यमय ढंग से हँसते हुये अपनी पत्नी से कहते हैं - ये चींटा ( जो नीचे जमीन पर 
चल रहा था को देखकर ) 16 बार इन्द्र बन चुका । और अपने कर्म और अज्ञान से आज फ़िर इस स्थिति में है । सोचिये । उस जीव ने कितने प्रयास उत्थान के किये होंगे ? और नहीं हो पाया ।
सामान्यतः 1 मनुष्य के ही देखिये । कितने अनगिनत स्तर हो जाते हैं । हैं । हमारे सामने तमाम दुखी हैं । अशिक्षित है । निर्धन हैं । रोगी हैं । और सबका उपाय भी है - अरे ! ये कर दिया जाये । समस्या खत्म हो जायेगी । पर ये करना क्या इतना आसान है ?? 1 form से दूसरे form में जाना बहुत कठिन है भाई ।
कहीं कहीं तो असंभव जैसा । 1 उदाहरण देता हूँ । एक मकान बनाने वाला राज मिस्त्री कम मेहनत और बेलदार मजदूर से दोगुने पैसे लेता है । मजदूर उसको सालों से काम करते देख रहा है । जानता है । मेहनत कम और पैसा अधिक है । फ़िर भी वह अपनी भूमिका को बदल नहीं पाता । सोचिये ये स्थूल जगत की बात है । और बहुत साधारण सा गणित है । साधारण सा ज्ञान है तब । फ़िर सूक्ष्म और कारण जगत के खेल इतने आसान नहीं है ।
आपने बूँद का उदाहरण भी गलत दिया । आत्मा ( मूल रूप ) बूँद रूप नहीं है । बल्कि सागर रूप है । बूँद से सागर के बीच जो तमाम स्थितियाँ परिवर्तन हैं । वह आत्मा की विभिन्न जीव भावों स्थितियों में शक्ति क्षीणता ही है । 1 बूँद किसी की प्यास नहीं बुझा सकती । पर एक झील हजारों की प्यास बुझा सकती है । और फ़िर कृमशः जल स्तर पर सागर सबको जल दे रहा है । तब इन सभी स्थितियों में बहुत अन्तर है । मनमोहन
सिंह और बराक ओबामा नाम के और वैसे ही ( मनुष्य ) शरीर वाले लाख तो होंगे ही । पर सोचिये । इन 1 और उन लाख में कितना अन्तर है ?
ये कैसा भाव है । जो यदा कदा सांसारिक नियमो के विरुद्ध मुझे खड़ा कर देता है - आपका ये वाक्य बहुत ही महत्वपूर्ण है । यही ऊब है । यही अपने निज की याद आना है - क्या झंझट है साला । मैं कहाँ फ़ँस गया । वो भी बे मतलब । बे प्रयोजन । जैसे कभी बेहद रुचि से खेलता हुआ बच्चा ऊब कर अपने ही खेल को बिगाङ देता है । खिलौने को तोङ देता है । लगन से खुद बनाये घरौंदे को फ़ोङ देता है । क्योंकि कभी न कभी तो इस खेल से ऊबना ही है । जिसको मोह माया का खेल कहते हैं ।
कैसा अदभुत खेल बनाया । मोह माया में जीव फ़ँसाया ।
दुनियाँ में फ़ँसकर वीरान हो रहा है । खुद को भूल कर हैरान हो रहा है ।
माया महा ठगिनी हम जानी । त्रि गुन फ़ाँस लिये कर डोले । बोले मधुरी वानी ।
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