10 अप्रैल 2012

क्या प्रेरणा थी इस खोज के पीछे ?

एकाचेतत सरस्वती नदीनाम । शुचिर्यती गिरिभ्य आ समुद्रात ।
रायश्चेतन्ती भुवनस्य भूरेर्घृतं पयो दुदुहे नाहुशाय । ऋग्वेद 7:95:2 
सरस्वती तट से निकली सांस्कृतिक जय यात्रा विष्णु पुराण का यह श्लोक बहुत प्रसिद्ध है ।
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं ।
वर्षं तद भारतं नाम, भारती यत्र सन्तति । अर्थात समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो वर्ष स्थित है । उसका नाम - भारत है । और उसकी सन्तति को भारती कहते हैं । अपनी लोकप्रियता के कारण प्राचीनकाल में भारत की भौगोलिक एकता के साक्षात्कार के प्रमाण के रूप में बहुधा इसी श्लोक को प्रस्तुत किया जाता है । आधुनिक विद्वत्ता ने विष्णु पुराण का रचनाकाल पांचवी शताब्दी ईसवी में रखा है । इसलिए हम गर्व के साथ कहते हैं कि - हमारे पूर्वजों ने भारत जैसे विशाल भूखण्ड की एकता का साक्षात्कार कम से कम 1500  साल पहले कर लिया था । कोई भी अन्य सभ्यता या साहित्य अपने देश के बारे में ऐसा प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता । किन्तु इसके पूर्व महाभारत और रामायण आदि ग्रंथ पूरे भारत का भौगोलिक परिचय दिग्विजय वर्णन, तीर्थयात्रा वर्णन एवं स्वयंवर वर्णन के द्वारा प्रस्तुत करते हैं । आधुनिक विद्वत्ता ने इन ग्रंथों के रचनाकाल को विवादास्पद बना दिया है । महाभारत के बारे में यह धारणा बन गयी है कि उसका महाभारत युद्ध से लेकर सातवाहन काल तक लगातार संशोधन परिवर्तन होता रहा । अत: उसका कौन सा अंश किस काल की रचना है ? यह कहना कठिन है । उसमें सरस्वती के प्रवाहमान होने का वर्णन भी है । और उसके लुप्त होने के बाद का वर्णन भी ।
अम्बितमे नदीतमे देवीतमे सरस्वति ।
अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि । ऋग्वेद 2:41:16
किन्तु कौटिल्य अर्थशास्त्र के रचनाकाल के बारे में तो अब आम सहमति बन चुकी है कि वह नंद वंश का उच्छेदन कर चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध साम्राज्य के सिंहासन पर बैठाने वाले आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य उपनाम कौटिल्य की ही रचना है ।
इसलिए आधुनिक विद्वत्ता के द्वारा निर्धारित भारतीय इतिहास के तिथि क्रम में उसका रचनाकाल चौथी शताब्दी ईसवी पूर्व अर्थात विष्णु पुराण से लगभग 1 सहस्र वर्ष पीछे चला जाता है । इस कौटिल्य अर्थशास्त्र के नवम अधिकरण के 135-136 प्रकरण में चक्रवर्ती क्षेत्र की व्याख्या निम्न सूत्र में की गयी है ।
देश:पृथिवी ! तस्यां हिमवत्समुद्रान्तरमदां चीन ।
योजन सहस्र परिमाणं तिर्यंक चक्रवर्तिक्षेत्रम ।
अर्थात हिमालय से लेकर दक्षिण समुद्र पर्यंत, पूर्व से पश्चिम दिशा में 1000 योजन तक फैला हुआ भू भाग चक्रवर्ती क्षेत्र है । कौटिल्य अर्थशास्त्र का यह सूत्र अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है । वह उत्तर और दक्षिण की सीमाओं के साथ साथ पूर्व पश्चिम के विस्तार को भी स्पष्ट करता है । चक्रवर्ती क्षेत्र कहने का अर्थ है - भारत की राजनीतिक एकता का लक्ष्य । और यह लक्ष्य केवल भारत की प्राकृतिक सीमाओं तक सीमित है । अन्य देशों पर आक्रमण करने अथवा उन पर अपना साम्राज्य स्थापित करना अभिप्रेत नहीं है ।
किन्तु इस सूत्र का महत्व इस बात में है कि यहां देश अर्थात भूभाग को पृथ्वी नाम दिया गया है । आजकल सामान्यतया पृथिवी शब्द से हम पूरे भूमंडल को सम्बोधित करते हैं । अत: प्रश्न खड़ा होता है कि कौटिल्य ने हिमालय से समुद्र तक के देश को पृथिवी क्यों कहा ?
इस प्रश्न ने हमें बहुत चक्कर में डाला । और उसका उत्तर खोजने के प्रयास में हमें अनेक बहुमूल्य संदर्भ मिले । किन्तु अभी उसे यहीं छोड़ देते हैं । अपने मन का दूसरा प्रश्न आपके सामने रखते हैं । कौटिल्य के सामने भारत की राजनीतिक एकता का लक्ष्य क्यों खड़ा हुआ ?
क्या उसकी प्रकृति प्रदत्त भौगोलिक एकता के कारण ? किन्तु उस भूगोल के भीतर विद्यमान भाषायी, उपासनात्मकता, सामाजिक एवं आर्थिक राजनीतिक विविधता से युक्त अनेक जनपदों में विभाजित देश पर किसी 1 जनपद के राजा को दिग्विजय के द्वारा चक्रवर्ती के सिंहासन पर बैठाना क्या साम्राज्यवादी विजय का ही दूसरा नाम नहीं है ?
कौटिल्य अर्थशास्त्र के अध्ययन से प्रगट होता है कि इस बहुमुखी विविधता के बीच सांस्कृतिक एकता के सूत्र तब तक विकसित हो चुके थे । और वह सांस्कृतिक एकता ही स्वयं को राजनीतिक एकता के रूप में अभिव्यक्त करने को बेचैन थी ।
उस युग में आवागमन और यातायात की कठिनाइयों को देखते हुए भारत जैसे विशाल भूखंड को 1 राजनीतिक केन्द्र से शासित और नियंत्रित करना लगभग असंभव था । अत: चक्रवर्ती व्यवस्था ही उसका सर्वोत्तम उपाय हो सकती थी । यही भारत की इतिहास यात्रा की मुख्य विशेषता है । और यूरोपीय इतिहास में से उपजी अवधारणाएं भारतीय इतिहास पर लागू नहीं हो पातीं ।
18वीं और 19वीं शताब्दी में जन्मे
पञ्च नद्य: सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतस: ।
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशे अभवत्सरित । यजुर्वेद 34:11
छोटे छोटे यूरोपीय राष्ट्रों की सीमाओं का निर्धारण राजनीतिक विस्तार वाद ने किया । उन्होंने पहले राजनीतिक एकता प्राप्त की । उसके आधार पर अपने राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं की व्याख्या की । और सीमाओं के भीतर रहने वाले समाज पर भाषा, उपासना, नस्ल आदि सांस्कृतिक एकरूपता थोपने का प्रयास किया । जबकि भारत में इससे उल्टा हुआ । यहां भौगोलिक एकता का साक्षात्कार पहले हुआ । उसमें विद्यमान विविधता को शिरोधार्य करते हुए विविधता के बीच एकता के सांस्कृतिक सूत्रों का विकास किया गया । यहां यह प्रश्न उठाया जाना चाहिए कि भारत जैसे विशाल भूखंड की भौगोलिक एकता का साक्षात्कार सर्वप्रथम किसने किया ? दुर्गम जंगलों, विशाल नदियों, ऊंचे पहाड़ों को लांघकर किस मानव समूह ने पूरे देश को छान मारा । उसकी प्रेरणा क्या थी ? लक्ष्य क्या था ?
क्या पूरे भारतवर्ष का भौगोलिक परिचय किसी 1 पीढ़ी के वश की बात रही होगी ? कितनी शताब्दियां, सहस्राब्दियां लगी होंगी इस खोज में ? क्या प्रेरणा थी इस खोज के पीछे ?
निश्चय ही राजनीतिक विजय तो नहीं ही थी । भारत की भोगौलिक एकता कराने वाली प्रक्रिया और तन्त्र की प्रेरणा राजनीतिक कदापि नहीं थी । यदि वह प्रक्रिया और तंत्र सांस्कृतिक था । तो उसका उदगम स्थान भारत में किस क्षेत्र में था । कहां था ?
और वह सांस्कृतिक प्रवाह अपने मूल निवास से बाहर कब निकला । कितने चरणों में, कितनी शताब्दियों या सहस्राब्दियों में उसने पूरे
भारत को आप्लावित कर दिया ? इस विशाल भूखंड की विविधता को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में गूंथ दिया । उसे 1 सांस्कृतिक व्यक्तित्व या पहचान प्रदान की ?
देवा इमम मधुना संयुतं यवं सरस्वत्यामधि मणावचर्कृषु ।
इन्द्र आसीत सीरपति: शतक्रतु: कोनाशा आसन मरुत: सुदानव: ।
अथर्ववेद 6:30:1
इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए जब हम आधुनिक शोध पद्धति से कौटिल्य से पीछे जाते हैं । तो पाते हैं कि बौद्ध त्रिपिटक के सबसे पुराने अंश निकाय से भी पुराने माने गए महागोविंद सुत्त में भारत भूमि के स्वरूप का सटीक चित्रण उपलब्ध है । भारत भूमि का स्वरूप बैलगाड़ी जैसा बताया गया है । कहा गया है कि - उत्तर का क्षेत्र आयताकार है । और दक्षिण का क्षेत्र बैलगाड़ी के अगले भाग ( शकट मुख ) जैसा त्रिकोणीय । महत्व की बात यह है कि यह गोविंद सुत्त भी इस शकटाकार भूखण्ड को महापृथिवी नाम से सम्बोधित करता है ।
आश्चर्य होता है कि उस युग में किस विधि से भारतीय मनीषियों ने सहस्र योजन लम्बे चौड़े इस भूखण्ड के स्वरूप को अपनी आंखों में बांधा होगा ।
पुराणों में इस स्वरूप की उपमा कही गर्दन फैलाये कछुवे से दी गयी है । तो कहीं प्रत्यंचा खिंचे धनुष के साथ । ये सब उपमाएं 1500 -2000  वर्ष पुरानी तो हैं ही । बौद्ध और जैन साहित्य में भगवान
बुद्ध और तीर्थंकर महावीर की समकालीन जनपद सूचियों को देखने से विदित होता है कि ये जनपद पश्चिम में अफगानिस्तान और ईरान से लेकर पूर्व में बंगाल तक और दक्षिण में समुद्र तक फैले हुए थे ।
इस साहित्य में भारत नामक बड़ी इकाई तो 5 विभाजन यथा - उत्तरापथ, मध्यदेश, प्राच्यदेश दक्षिणा पथ एवं अपरान्त का भी उल्लेख मिलता है । स्पष्ट ही, छठी शताब्दी ईसवी पूर्व तक किसी केन्द्रीय व्यवस्था ने भारत नामक इकाई का 5 भागों में विभाजन भी कर दिया था । जो उस समय तक पूरी तरह प्रचलित हो चुका था ।
सरस्वती दृषद्वत्वोर्देवनघोर्यदन्तरम । तं देवनिर्मितं देशं ब्राह्मवर्त प्रचक्षते ।
3:17
इसका अर्थ है कि - भारत की भौगोलिक एकता का साक्षात्कार बुद्ध और महावीर के समय से काफी पहले किया जा चुका था । इससे निष्कर्ष निकलता है कि जिस सांस्कृतिक प्रक्रिया ने इस भौगोलिक एकता का साक्षात्कार कराया । वह भी पूरे देश को आप्लावित कर चुकी थी । इस सत्य का दर्शन हमें अथर्ववेद के पृथिवी सूक्त में होता है । अथर्ववेद को पाश्चात्य विद्वता ने आठवीं शताब्दी ईसवी पूर्व में रखा है । जबकि भारतीय परम्परा उसे राजा परीक्षित ( 3102 ई.पू. ) के निकट रखती है । किन्तु इस लेख में हम तिथि क्रम के झगड़ों को नहीं उठाना चाहते । और पाश्चात्य विद्वता द्वारा गढ़े गये तिथि क्रम के पूर्वापर्य को ज्यों का त्यों स्वीकार करके ही अपने प्रश्नों का उत्तर खोजना चाहते हैं ।
63 मंत्र लम्बा पृथिवी सूक्त अपने ढंग की अनूठी रचना है । इसी सूक्त के 12वें मंत्र में माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या; अंश को भारत माता के प्रति हमारी पुत्रवत भक्ति भावना का प्रथम उदघोष कहा जाता है । इस छोटे से अंश में "भूमि' और "पृथ्वी' दोनों शब्दों का प्रयोग है । क्या वे 1 ही हैं । या अलग अलग हैं ?
यदि यहां "पृथिवी' शब्द "भूमि' या हर मंत्र का पर्याय है । तो क्या हम पूरे भूमंडल को अपनी माता और स्वयं को उसका पुत्र बता रहे
हैं ? क्या इस सूक्त में "पृथिवी' नामक भूखण्ड की पहचान के भी कुछ संकेत विद्यमान हैं ?
अगला ही मंत्र पृथिवी की सांस्कृतिक पहचान को स्पष्ट कर देता है कि जिस भूमि पर यज्ञ वेदियों का निर्माण कर विश्वकर्मा यज्ञों का विस्तार करता है ।
जहां आहुति देने के लिए यज्ञ स्तम्भ खड़े हैं । पुन: 22वें मंत्र में कहा गया है - जिस भूमि पर देवताओं के लिए यज्ञों में हवि दी जाती है । जहां मनुष्य यज्ञ शेष को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं आदि आदि ।
मंत्र 37 में देव विरोधी असुरों पर, वृत्रासुर इन्द्र की विजय का उल्लेख है । उससे अगले मंत्र में पुन: यज्ञ मण्डपों के निर्माण, यूप की स्थापना और ऋग्वेद की ऋचाओं, सामवेद की अर्चना और यजु: मंत्रों से इन्द्र को सोमरस पिलाने का वर्णन है । मंत्र 39 में प्राचीन सप्तर्षियों द्वारा द्वाद्वश वर्षीय सत्र एवं सोमयाग के निमित्त तपस्या करने एवं वेदमंत्रों का गान करने की बात कही गयी है ।
संक्षेप में कहना हो । तो पृथिवी सूक्त की पृथिवी संस्कृति की पहचान यज्ञ संस्कृति में है । वस्तुत: पृथिवी सूक्त का पहला मंत्र ही यज्ञ
संस्कृति का सार तत्व प्रस्तुत कर देता है । वह कहता है कि सत्य, ऋत, दीक्षा, तप ब्रह्म और यज्ञ इस पृथिवी को धारण करते हैं । 45वें मंत्र में पृथिवी पर रहने वाले जनों की विविधता को भी स्वीकार किया गया है ।
यह मंत्र कहता है कि यह पृथिवी अनेक बोलियां बोलने वाले ( जन विभ्रती बहुधा विवाचसं ) और नाना धर्मों ( आचार विचार ) का पालन करने वाले ( नाना धर्माणां ) जनों को धारण करती है । और सबको समान रूप से माता की तरह अपना दूध पिलाकर पालती है । सूक्त में हिमवंत, समुद्र और सिंधु आदि के उल्लेख से स्पष्ट है कि सूक्तकार की पृथिवी महागोविन्द सुत्त और कौटिल्य की पृथिवी से भिन्न नहीं है । पर इस सूक्त में यह स्पष्ट नहीं होता कि इस यज्ञ संस्कृति का उदगम कहां हुआ ?
किस क्रम से किस तंत्र के द्वारा पूरे - ब्राह्म नद्या सरस्वत्यामाश्रम: पश्चिमे तटे । शम्याप्रास इति प्रोक्त ऋषीणां सम्वर्धन । भारत में फैली ?
इसकी जानकारी हमें मनुस्मृति देती है । मनुस्मृति का दूसरा अध्याय
( श्लोक 18-25 ) न केवल यज्ञ संस्कृति का उदगम क्षेत्र बताता है । बल्कि वहां से निकली सांस्कृतिक जय यात्रा के विभिन्न चरणों का भी वर्णन करता है । यज्ञ संस्कृति का उदगम सरस्वती नदी के पवित्र तट पर हुआ है । इसको रेखांकित करते हुए श्लोक 18 कहता है
सरस्वती दृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम ।
तं देवनिर्मितं देशं ब्राह्मावर्त प्रचक्षते । 18 
सरस्वती और दृषद्वती नामक देव नदियों के मध्यवर्ती भूभाग स्वयं देवों द्वारा निर्मित ब्राह्मावर्त नामक देश कहलाता है ।
वस्मिन्दे थे य: आचार: पारम्पर्यक्रमागत: ।
वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ।
उस देश में जो आचार परम्परा से चला आ रहा है । उसे ही सब वर्णों के लिए सदाचार कहा गया है ।
कहां है यह ब्राह्मावर्त ? कहां है सरस्वती । और दृषद्वती नामक देव नदियां ? आज तो भारत के मानचित्र पर इनमें से कोई भी नाम नहीं है । महाभारत के वन पर्व से हमें ज्ञात होता है कि सरस्वती और दृषद्वती के मध्य का क्षेत्र ही कुरुक्षेत्र कहलाया । इसका अर्थ हुआ कि ब्राह्मावर्त और कुरुक्षेत्र 1 ही प्रदेश के 2 नाम हैं । किन्तु आधुनिक विद्वत्ता कहेगी कि मनु स्मृति और महाभारत तो बहुत बाद की रचनाएं हैं । उन्हें प्रमाण कैसे मान लें ।
सौभाग्य से यहां ऋग्वेद हमारी मदद को आते हैं । ऋग्वेद ( 3.23.4 ) मंत्र में कहा गया है - दृष्द्वत्या मानुष आपयायां सरस्वत्यां देवदग्ने दिदीहि ।
अर्थात हे अग्नि ! हम तुम्हें दृषद्वती और सरस्वती के तट पर स्थित मानुष तीर्थ में स्थापित करते हैं । तुम पूरी पृथिवी को आलोकित करो ।
आधुनिक विद्वता ने ऋग्वेद के सूक्त विकास की जो कहानी गढ़ी है । उसके अनुसार यह मंत्र जिस तीसरे मंडल में विद्यमान है । वह मंडल ऋग्वेद के सबसे प्राचीन भाग का अंग है ।
मनु स्मृति के उपरोक्त श्लोकों से स्पष्ट है कि ब्राह्मावर्त क्षेत्र में 1
ऐसी संस्कृति का जन्म हुआ । जिसका मूल सदाचार में था । इस संस्कृति का प्रवाह ब्राह्मावर्त के चारों ओर फैला । अगला श्लोक कहता है -
मत्स्याश्च पाञ्चाला: शूरसेनका ।
एष ब्राह्मर्षिदेशो वै ब्राह्मावर्तादनन्तर । 20
ब्राह्मावर्त के चारों ओर के प्रदेश को जिसमे कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पंचाल और शूरसेन जनपद आते हैं । ब्राह्मर्षि देश कहा गया है । इस प्रदेश के
अन्तर्गत पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, बृज प्रदेश आते हैं । इस प्रदेश में पहुंच कर संस्कृति का चरित्र और भी निखरा । क्योंकि मनु स्मृति के अनुसार -
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन: ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानवा: ।
अर्थात इस प्रदेश में जन्मे अग्रजन्माओं ( ब्राह्मणों ) से पृथिवी के सभी मानव अपने अपने लिए चरित्र की शिक्षा प्राप्त करते हैं । किन्तु यह सांस्कृतिक प्रवाह या जय यात्रा आगे बढ़कर मध्यप्रदेश में फैल जाती है । मनु स्मृति के अनुसार हिमालय से विंध्यपर्वत और पूर्व में प्रयाग से पश्चिम में विनशन के बीच का क्षेत्र ही मध्य प्रदेश है । यह यज्ञिय देश है । यहां तक यज्ञिय की संस्कृति का विस्तार हो चुका है ।
सांस्कृतिक जय यात्रा के अगले चरण के रूप में मनु स्मृति आर्यावर्त हिमालय से रेवा नदी तक और पूर्व पश्चिम में समुद्र से समुद्र तक फैला हुआ है । यह देश यज्ञिय देश है । यहां पवित्र काला मृग नि:शंक विचरण करता है । आर्यावर्त से बाहर के निवासी मलेच्छ हैं । स्पष्ट ही यहां आर्य और म्लेच्छ शब्दों का प्रयोग नस्ल के आधार पर नहीं । सांस्कृतिक श्रेष्ठता के आधार पर किया गया है । इसी अर्थ में ऋग्वेद -
कृण्वंतो विश्वमार्यम, जैसी घोषणा करता है ।
यदि आर्य शब्द को नस्लवाचक मानें । तो इसका अर्थ होगा । पूरे विश्व में अन्य सब नस्लों का उच्छेदन कर केवल आर्य नस्ल का प्रभुत्व स्थापित करना । सरस्वती के तट से सांस्कृतिक जय यात्रा का संदर्भ शतपथ ब्राह्मण में माथव विदेघ की कथा में भी उपलब्ध है । इस कथा के अनुसार सरस्वती के तट पर सम्पन्न यज्ञ की अग्नि पूर्व दिशा की ओर चल पड़ी । माथव विदेघ उसके पीछे पीछे चला । वह अग्नि सदानीरा नदी वर्तमान गंडकी के तट पर आकर रूक गयी । माथव विदेघ भी वहीं ठहर गया ।
सदानीरा यहां संस्कृति की सीमा बन गई । मनुस्मृति आर्यावर्त पर रुक जाती है । जनश्रुति के अनुसार लम्बे समय तक यज्ञिय आर्य संस्कृति विंध्याचल को लांघ नहीं पायी । उसे पहली बार लांघा अगस्त्य ऋषि ने । परम्परा कहती है कि अगस्त्य ऋषि के आदेश को मानकर विंध्यपर्वत झुका का झुका रह गया । और संस्कृति का प्रवाह उसे पार कर पूरे भारत में फैल गया । इसी सांस्कृतिक विस्तार के माध्यम से भारत की प्राकृतिक सीमाओं और भौगोलिक एकता का साक्षात्कार हो सका । इस साक्षात्कार की गाथा महाभारत, रामायण एवं पुराणों में भारत की नदियों, पर्वतों, पुण्य नगरियों एवं जनपदों की सूचियों के रूप में सुरक्षित है ।
यदि महाभारत भारत का कीर्तिगान करते हुए प्राचीन राजर्षियों के नाम गिनाती है । तो विष्णु पुराण यज्ञिय संस्कृति के अगले सोपान अर्थात ब्रह्म विद्या या मोक्ष मार्ग की जन्मदाती भारत भूमि की गोद में जन्म पाने के लिए स्वर्ग के देवताओं की व्याकुलता का वर्णन करता है ।
सम्पूर्ण वाड्मय में कहीं भी नस्ली आक्रमण या नस्लों के विनाश की चर्चा नहीं है । किन्तु पश्चिमी विद्वानों ने पन्द्रहवीं शताब्दी में अपनी गोरी नस्ल की राक्षसी विजयों के दर्पण में अपने चेहरे को भारत का चेहरा बना दिया । भारतीय विद्वता के सामने यह चुनौती है कि वह अपने प्राचीन वाड्मय में यत्र तत्र बिखरे संदर्भों को खोज बटोर कर उस सांस्कृतिक जय यात्रा की कहानी को सूत्रबद्ध रूप में प्रस्तुत करें । जिसने सहस्राब्दियों पहले सरस्वती के पावन तट से निकल कर आसेतु हिमालय विशाल भारत को उसकी बहुविध विविधता के बीच 1 सांस्कृतिक व्यक्तित्व प्रदान किया । देवेन्द्र स्वरूप । साभार - गूगल
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पृथु ने ही वत्स बनकर जिस भूभाग को दुहा । वह पृथिवी कहा गया ।  पृथु ने निश्चय ही भूमि सुधार कार्यक्रम चलाकर कृषि कराई होगी । यही मख है । यही यज्ञ है । अन्न को यज्ञ, ब्रह्म आदि कहा गया है । अन्नोत्पादन नियंत्रित कृषि की देन है । मेरा भारतवर्ष पूर्व में जहाँ कमल होते हैं से लेकर पश्चिम में देवदारु जहाँ पाये जाते हैं । वहाँ तक के विस्तार वाला होता है । दक्षिण में आस्ट्रेलिया से लगाकर उत्तर में टॉरिम बेसिन तक निर्बाध विस्तार वाला था ।
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अशा - 09.1.17 देशः पृथिवी । अशा - 09.1.18 तस्यां हिमवत समुद्र अन्तरम उदीचीनं योजन सहस्र परिमाणं तिर्यक चक्रवर्ति क्षेत्रम । अशा - 09.1.19 तत्रअरण्यो ग्राम्यः पर्वत औदको भौमः समो विषम इति विशेषाः । अशा - 09.1.20 तेषु यथा स्व बल वृद्धि करं कर्म प्रयुञ्जीत । अशा - 09.1.21 यत्र आत्मनः सैन्य व्यायामानां भूमिः अभूमिः परस्य ।  स उत्तमो देशः विपरीतो अधमः साधारणो मध्यमः । अशा - 09.1.22 कालः शीत उष्ण वर्ष आत्मा । अशा - 09.1.23 तस्य रात्रिर अहः पक्षो मास ऋतुर अयनं संवत्सरो युगम इति विशेषाः । VikramArk Vikram

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