08 फ़रवरी 2012

ये कैसा सत्य पुरुष है ? जिसके काबू में कुछ नहीं

आदरणीय राजीव जी को सप्रेम नमस्ते । कहिये श्रीमान कैसे हो ? आशा है । मौज में ही होंगें । सत्यकीखोज पर मैंने ये पढ़ा है कि सत्य पुरुष के पांचवें शब्द से काल निरंजन पैदा हुआ । जिसने आज तक सभी प्राणियों को दुखी कर रखा है ।
अगर सत्य पुरुष ने इसे पैदा नहीं किया होता । तो आज बिचारे प्राणी दुखी ना होते । तो काल निरंजन को क्यों दोष दिया जावे ? सारा बखेडा तो सत्य पुरुष का फैलाया हुआ है । या फिर ये कहें कि सत्य पुरुष के वश में नहीं था कि वो काल निरंजन को पैदा नहीं करे । तो ये कैसा सत्य पुरुष है ? जिसके काबू में कुछ नहीं । और यदि वश में था । और जानते बूझते काल निरंजन को उत्पन्न किया । तो फिर सारा दोष सत्य पुरुष का है । अब आप सत्य पुरुष की पैरवी करते है । और दोष काल निरंजन का बताते हैं । तो यह तो शुद्ध  राजनीति हुई कि पहले तो खुद जनता को दुखी करो । और फिर कहो कि हमारे मत को मानो वरना । कृपया इस गुत्थी को अपने सत्य ज्ञान से सुलझायेंगे । कोटि कोटि नमन के साथ । आपका कृष्ण मुरारी ।
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मुख्य अभियुक्त कौन ? काल पुरुष या सत्य पुरुष । शीर्षक ई मेल सबजेक्ट के साथ ।

सबसे पहले तो यही जानिये कि - सत्य पुरुष कौन हैं ? आत्मा की जो मूल और कतई निर्विकारी स्थिति ( उसे स्थिति कहना भी गलत है । क्योंकि जब कहीं कुछ था ही नहीं । और वही  सार तत्व था । तो वह कोई स्थिति नहीं हुयी । बल्कि वह तो है । लेकिन समझाने  हेतु ऐसा कहा जाता है । ) है । उसी को पहुँचें हुये सन्तों ने संकेत में सत्य पुरुष कहा है । अब यहाँ एक विशेष बात है । who am i की खोज में आखीर तक पहुँचे सन्तों ने जब शाश्वत सत्य को जाना । और स्वयँ को हर स्थिति उपाधि से रहित पाया । तब उन्होंने उसे एकमात्र सत्य होने से ( मगर वास्तव में खुद को ही ) सत्य पुरुष कहा । क्योंकिं वहाँ तक पहुँचने पर उसे नीचे हुये पूर्व अनुभवों से पता चला कि - ये सब सत्य नहीं हैं । कल्पित हैं । ये सब मेरी ही कल्पना है । अहं बृह्मास्मि .. ये भी एक स्थिति है । जब योगी साधक के मुँह से वहाँ स्थिति होने पर स्वयं ही निकलता है । या बोध होता है - अरे ये सब क्या है ? मैं ही वो बृह्म हूँ । अहं बृह्मास्मि । ऐसे ही आत्मा को ही योगियों सन्तों ने अपने अपने भाव अनुसार - आत्मा । परमात्मा । सत्य पुरुष । बृह्म । अल्लाह । नूर । रब्ब आदि कहा है ।

अब आगे की बात - जब आत्मा ( सार तत्व ) में सर्व प्रथम विचार उत्पन्न हुआ । तो पहली ध्वनि " हुं " थी । ये कोई बहुत बङा रहस्य नहीं है । कोई भी । आज भी जब विचारशील होता है । तो जैसे उसके द्वारा ध्वनि " हुं " और आंतरिक क्रिया ( संकुचन ) होती है । ठीक वैसे ही हुयी । आप स्थिर । गम्भीर । गहन स्थिति में आँख बन्द करके अभी भी उस समय का कुछ कुछ अनुभव कर सकते हैं । तो जब आप अभी भी ध्वनि " हुं " करेंगे । तो आपके अन्दर एक संकुचन सा होगा । करके देखिये । इसके ठीक बाद । दूसरी स्थिति बनी - मैं कौन हूँ ? । who am i ? गौर से सोचिये । ये प्रश्न अपने लिये ही था । यानी अपने को ही जानने की इच्छा । बस ये ही वो अहम रूप झीना पर्दा बन गया । जो आज तक कायम है । आत्मा और जीव ( विभिन्न स्थितियाँ ) के बीच झीना सा । और मिथ्या पर्दा । इसीलिये हरेक कोई आज तक यही सोचता है - मैं कौन हूँ ? । who am i ?
बस यही से खेल शुरू हो गया । तब प्रथम जो महा " शब्द " प्रकट हुआ । यही गुप्त है । इसके साथ ही मूल प्रकृति आदि निर्माण शुरू हो गया । धर्मा तोहे लाख दुहाई । सार शब्द बाहर नहिं जाई ।

इसके बाद विभिन्न स्थितियाँ बनी । जिनसे अलग अलग उपाधियाँ निर्मित हुयीं । तब अन्त में मनुष्य बना । ये " सोहम " मूल का था । अर्थात - वही मैं हूँ । फ़िर से ध्यान दें । ये भाव जहाँ अभिन्न 1 का भी बोधक है । वहीं आश्चर्यजनक रूप से 2 की भी ध्वनि देता है - जो तू है । वही मैं हूँ । इसमें एक  मिथ्या " मैं " भाव जुङ गया । मिथ्या ।
काल पुरुष - जैसा कि मैं कई बार बता चुका । यही मन भी है । यानी माना हुआ कल्पनात्मक सृजन करने वाला । अष्टांगी से मिलने से पहले इसका नाम धर्मराय था । और क्रूरता से उसको निगल जाने के कारण इसे यमराय कहा जाने लगा । इसने कई बार 64 युग एक पैर खङे होकर सृष्टि मूल " सोहंग " जीव बीज प्राप्त किया । क्योंकि ये मन रूप था । सो जैसी आज भी मन की दशा होती है । वैसे ही ये जीव को मोहरा बनाकर । आधार बनाकर । विभिन्न वासनाओं की पूर्ति करने लगा । और माया के वशीभूत जीव समझने लगा - ये सब मैं कर रहा हूँ । अब काल निरंजन की खास बात ये है कि इसे किसी प्रकार का दोष नहीं लगता । फ़िर ये जीव को पाप पुण्य के कर्म भरम जाल में उलझाकर दुखी करने लगा । तब सत्य पुरुष ने इसे शाप दिया कि - तू प्रतिदिन 1 लाख जीवों का भक्षण करेगा । और सवा लाख उत्पन्न करेगा ।
और देखिये - सृष्टि दो प्रकार की बनी । एक परमात्म सृष्टि । या सत्य पुरुष सृष्टि । या बृह्माण्ड की चोटी से ऊपर सचखण्ड सृष्टि । यह सत्य ज्ञान युक्त है । और दूसरी - काल निरंजन और माया की सृष्टि । ये काल ( समय के अधीन रचना ) और माया ( विभिन्न वासनात्मक कल्पनाओं

का साकार रूप ) की रचना है । और अज्ञान युक्त है । इसलिये यहाँ के वासियों के लिये सब कुछ रहस्यमय है । जबकि परमात्म सृष्टि की आत्माओं के लिये कुछ भी रहस्य नहीं है ।
नीचे से यह कृम इस प्रकार है - जीवात्मा । बृह्मात्मा । शिवात्मा । परमात्मा । आत्मा ।
इसी तरह यह भी है - स्थूल ( जीव ) सूक्ष्म । कारण । महाकारण । तुरीया । तुरीयातीत ।
अब आईये । आपकी जिज्ञासा पर बात करते हैं ।
सत्य पुरुष के वश में नहीं था कि वो काल निरंजन को पैदा नहीं करे - जब पहली बार कबीर जीवों की करुण पुकार पर मान सरोवर तप्तशिला पर आये । तो उन्हें काल निरंजन द्वारा जीवों पर अत्याचार करते हुये देखकर बङा क्रोध आया । और उन्होंने यही सोचा कि - इसको अभी समाप्त करके सब जीवों को मुक्त कर दूँ । लेकिन काल निरंजन ने उन्हें तपस्या से प्राप्त किया था । और ये प्राप्ति उसे सत्य पुरुष से हुयी थी । तब यहाँ दोनों के बीच एक समझौता हुआ कि - जो भी जीव इस माया वासना से तंग आकर सत्य पुरुष को पुकारेगा । तब वहाँ से कोई प्रतिनिधि आकर उसे माया से रहित सत्य ज्ञान का बोध करायेगा । और सत नाम देगा । उस सत्य नाम के ध्यान सुमरन से जीव काल जाल से मुक्त हो जायेगा । इस तरह त्रिलोकी सृष्टि का खेल चलता रहेगा ।
अब ठीक से समझने की कोशिश करें । अभी भी आप आत्मा हो । काल ये मन ही है । इसी को काबू में करना है । 


और ये सोहम से बना है । अतः सोहम को जानने या सोहम की रगङ से काबू हो जाता है । या नष्ट हो जाता है ।  ओहम ॐ से काया बनी । सोहम से मन होय । ओहम सोहम से परे जाने बिरला कोय यानी बहुत झंझट में न पङें । तो शरीर और मन के बाद आत्मा ही शेष है । इन्हीं का संयुक्त रूप पूरा खेल है । शरीर और मन से आप बखूबी परिचित हो ही । सिर्फ़ आत्मा को जानना है ।
अब बात ये है कि - सत्यपुरुष काल निरंजन को पैदा ही नहीं करते । एक बात बताईये । करोंङों माँ बाप अपनी सन्तान को पैदा करते हैं । और वह प्रतिकूल निकल जाती है । तब वे उसे पैदा ही क्यों करते हैं ? या ऐसा होने पर उसे काबू में क्यों नहीं कर पाते ? या मार क्यों नहीं डालते ? जाहिर है । ये सब स्थितियों के संस्कार वश बना खेल मात्र है । मन का खेल । जो अज्ञान वश सत्य प्रतीत हो रहा है ।
और ये बात - सत्य पुरुष के सिर्फ़ उसी समय की नहीं है । आज भी हर इकाई ( जीव ) द्वारा यही खेल है । सत्य पुरुष ( आत्मा ) प्रथम स्थिति । काल निरंजन ( मन ) दूसरी स्थिति । शरीर ( माया कृत या प्रकृति ) तीसरी स्थिति । बस उस 1 से यही 2 बात पैदा होती है । 1 वह स्वयं । 2 मन ( विचार वायु । वासना वायु )  और 3 शरीर ( चेतन शक्ति से निज वासना का प्रकृति द्वारा स्थूल रूप होना )
नाम - इस चेतन धारा से सृजन की विभिन्न स्थितियाँ हैं । सहस्रार चक्र ( सिर के मध्य ) से नाभि तक ये शब्द ध्वनि ऊपर से कृमशः नीचे तक स्थूल और स्थूल होती गयी है । इसी डोरी या सीङी पर चढते चले जाना है ।

अब सार बात - मैंने तरीका आपको बता दिया । आप इस काल निरंजन ( मन ) को अधीन कर सके । तो ये आपको दुखी नहीं कर पायेगा । फ़िर आप ही सत्य पुरुष हो । और काल माया ( प्रकृति ) आपके आधीन । सार शब्द जब आवे हाथा । तब तब काल नवावे माथा । इस  तरह ये खेल ही है । लेकिन आप इसके उलट मन और माया के अधीन हो जाते हो । तब यही जीव है । कबीर साहब ने इसी को कहा है - एक अचम्भा मैंने देखा । नैया में नदिया डूबी जाये । यानी ये मन ( काल ) और माया ( प्रकृति ) आपके ( आत्मा ) होने से ही कार्य कर रहे हैं । वरना ये जङ ही हैं । और हैरानी ये है कि - आप इन्हीं को सब कुछ मान बैठे । राजा गुलाम हो गया । और गुलाम राजा ।
- वैसे ये बातें थोङी जटिल हैं । फ़िर भी मैंने यथासंभव सरलता से समझाने की पूरी कोशिश की है । फ़िर भी किसी बिन्दु पर अस्पष्टता लगने पर निसंकोच पुनः पूछ सकते हैं ।

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

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