06 फ़रवरी 2012

दीक्षा और शक्तिपात का रहस्य

78 प्रश्न - भजन के समय अपने मालिक का अपने अन्दर स्पष्ट दर्शन नहीं हो पाता । जिससे असन्तोष बना रहता है । मालिक के स्वरूप के दर्शन में चित्त कैसे स्थिर हो ? कृपा कर समझाने का कष्ट करें ।
उत्तर - भजन । सुमिरन । ध्यान के अभ्यास के समय श्री सदगुरू देव जी महाराज की कृपा से अन्दर में श्री सदगुरू का दर्शन यदा कदा होता रहता है । यदि श्री सदगुरू के स्थूल रूप का ध्यान करता है । तो श्री सदगुरू के स्थूल रूप के दर्शन होते हैं । श्री सदगुरू के नाम के भजन । ध्यान के अभ्यासी को अन्दर में मालिक का दर्शन हो । तो साधक अपने को धन्य धन्य मानने लगता है । गुरू मूर्ति का दर्शन ध्यान तथा गुरू के नाम का जप । गुरू की आज्ञा का पालन करना सदा कर्त्तव्य है । तथा गुरू के सिवाय और किसी का चिन्तन करना अनुचित है । 


मन में थोडा बहुत प्रेम उनके प्रति उत्पन्न हो सकता है । गुरू स्वरूप का तो उनके सामने जाने से साक्षात दर्शन होता है । यदि गुरू का ध्यान कोई साधक अन्दर में करे । तो सूफ़ी भाषा में इसे सदव्वुरे शेख कहते हैं । यह योग है । योग का अभ्यास गुरू के सानिध्य में करना चाहिये । विशेषत: तंत्र योग के बारे में यह बात अत्यन्त आवश्यक है कि सचमुच में योग्यता वाला शिष्य नम्रता पूर्वक गुरू के पास आता है । गुरू को आत्म समर्पण करता है । गुरू की सेवा करता है । और गुरू के सान्निध्य में योग सीखता है । साधक की उन्नति के लिये विश्व में अवतरित परात्पर सत्ता सदगुरू ही हैं । गुरू को परमात्मा मानो । और उन्हीं के ध्यान में डूबे रहो । तभी आपको वास्तविक लाभ होगा । गुरू की अथक सेवा । भजन । सुमिरन । ध्यान करो । वे स्वयं ही आप पर ध्यान में जो दर्शन होने की कामना है । उसको पूरा करने के लिये सर्वश्रेष्ठ आशीर्वाद की बरसात करेंगे । सन्तोष रूपी अमृत से तृप्त ( सन्तुष्ट ) एवं शान्त चित्त वाले साधकों को जो सुख प्राप्त है । वह धन के लोभ से इधर उधर दौडने वाले लोगों को कहां प्राप्त हो सकता है ? गुरू अपने शिष्य को अपनी अमृत मयी वाणी की वर्षा कर करके । उसे आन्तरिक ज्ञान समझा समझा कर । अन्दर में ध्यान के द्वारा दर्शन की महिमा को बतला बतलाकर आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कराते हैं । तभी तो पापों का विनाश होता है । जिस प्रकार एक ज्योति से दूसरी ज्योति प्रज्ज्वलित होती है । उसी प्रकार श्री सदगुरू देव जी महाराज अपने मंत्र के भजन, सुमिरन और ध्यान में दर्शन देने के रूप में अपने दिव्य शक्ति शिष्य में संक्रमित करते हैं । शिष्य सन्तुष्ट होकर

अभ्यास करता है । बृह्मचर्य का पालन करता है । और शान्त चित्त होकर श्री सदगुरू के मंत्र के सदा सदा भजन । सुमिरन । ध्यान में सदगुण स्वरूप का दर्शन कर अपने जीवन को शीलवान, सन्तोषवान बनाता है । सन्तोष ही जीवन का सबसे बडा सुख है । अत: सुख चाहने वाले साधक सदा सन्तोष करते हैं । श्री सदगुरू देव जी महाराज के भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान में ही तो सारा सुख है । सुख शान्ति पूर्वक जीवन व्यतीत करना मनुष्य या जिज्ञासु की मौलिक इच्छा है ।
जग का जीना है भला । जब लग हिरदय नाम । नाम बिना जग जीवना । सो दादू किस काम ।
जीव को यह जो मनुष्य जन्म मिला है । तो इस जन्म को पा करके उसका फ़ायदा क्या है ? लाभ क्या है ? अगर साधक ने अपने ह्रदय में मालिक का नाम व रूप बसा लिया । यानी अन्दर में मालिक के नाम के सुमिरन और ध्यान में श्री सदगुरू देव जी महाराज का दर्शन कर लिया । तो समझो मालिक की भक्ति कर 


लिया । और उसका जीवन सार्थक हो गया । साधक के जीवन की सार्थकता श्री सदगुरू देव जी महाराज के भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान तथा मालिक की भक्ति करने में ही है । क्योंकि साधक ने भक्ति का सच्चा धन जमा कर लिया है । जो कि लोक परलोक का संगी साथी है । भक्ति का सच्चा धन साधक के लिये सदगुरू का भजन, भक्ति तथा अन्दर में ध्यान के माध्यम से सदगुरू का दर्शन पाना ही है । और इसके करने से ही चित्त शुद्ध, पवित्र तथा निर्मल हो जाता है । चित्त के शुद्ध व पवित्र हो जाने पर श्री सदगुरू देव जी महाराज की कृपा व दया से मन सहज ही एकाग्र चित्त हो जाता है । और एकाग्रता को पाप्त हुआ मन अपने ही ह्रदय में स्थित श्री

सदगुरू के दर्शन कर आत्म ज्ञान सम्पन्न हो जाता है । मन को एकाग्र होकर जब आत्मा की ओर अग्रसर होने लगता है । तो कर्म आपसे आप छूटने लग जाते हैं । जिस अनुपात में ज्ञान उपलब्ध होता जाता है । उसी अनुपात में कर्म के बन्धन शिथिल होते जाते हैं ।
गुरू कृपा के बिना कुछ भी सम्भव नहीं हो पाता है । इसलिये सभी सन्त आन्तरिक दर्शन के लिये गुरू शरणागति की अनिवार्यता पर जोर देते हैं । यदि कभी कभार गुरू स्वरूप ध्यान में प्रगट न भी हो । तो उसकी कोशिश करके ध्यान पर ध्यान लगाते रहने से ह्रदय में मालिक के प्रति प्रेम, श्रद्धा की प्रगाढता बढती है । यह बात भली भांति समझ लेना चाहिये कि जो श्री सदगुरू का स्वरूप खुली आंखों के सामने देखते हैं । वह पंच महा भूतों का बना है । किन्तु जिस सदगुरू स्वरूप के अन्दर में दर्शन होते हैं । वह पंच महा भूतों का बना हुआ नहीं है । वरन वह चैतन्य है । चैतन्य मण्डल में अन्तर्यामी प्रभु अपने भक्तजनों के लिये श्री सदगुरू स्वरूप का आकार धारण करते हैं । कहा है  - जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरति देखी तिन तैसी ।

वह चैतन्य आकार स्वरूप बराबर अभ्यासी के साथ साथ पथ प्रदर्शक बनकर सहायता करता रहेगा । और जितना जितना अभ्यासी ऊंचे चक्रों का ध्यान करेगा । उतना ही स्वरूप भी ऊंचे चक्रों में अधिक से अधिक निर्मल चैतन्य और ज्योतिर्मय होता जायेगा ।
सारांश यह है कि श्री सदगुरू देव जी महाराज के स्वरूप का दर्शन । भजन और ध्यान के माध्यम से अन्दर होता रहे । तो शब्द स्वरूप । प्रकाश स्वरूप । गुरू स्वरूप अभ्यासी के साथ साथ रहेगा । और रास्ते में मन तथा सुरत के मिटाव और चढाई में बराबर सहाय के रूप में सदा साथ साथ रहेगा ।
श्री सदगुरू के ध्यान में सतत लीन रहने वाला शिष्य गुरू में उसी प्रकार विलीन हो जाता है । जिस प्रकार भृंग की पकड में आ जाने वाला कीडा भय वश उसी का निरन्तर ध्यान करता करता भृंगी बन जाता है ।
ध्यातव्य है कि शिष्य की परिस्थिति । मन स्थिति और पात्रता को द्रष्टि गत रखकर श्री सदगुरू भगवान अपने शिष्य को गुरू शरणागति और भजन । सुमिरन । ध्यान । साधना द्वारा आत्म साक्षात्कार का यानी अन्दर में दर्शन करने का उपदेश देते हैं । और साथ साथ श्री सदगुरू का भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान तथा भक्ति करने का उपदेश देते हैं ।
जिस साधक अभ्यासी का जिन श्री सदगुरू में सच्चा भाव और लगन है । तो वही स्वरूप सदा उसके संग साथ रहता है । यह सत्य है कि उस दिव्य स्वरूप के सामने कोई विघ्न मन व माया का ठहर नहीं सकता है । सच्ची लगन । सच्चे

स्नेह के साथ भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान की साधना में भक्ति के साथ लगे रहने से अन्दर में ध्यान के जरिये जो श्री सदगुरू का दर्शन होता है । वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है ।
79 प्रश्न - आध्यात्मिक ग्रन्थों में दीक्षा और शक्तिपात की चर्चा देखने को मिलती है । कृपया इन शब्दों का रहस्य समझाने का कष्ट करें ।
उत्तर - श्री सदगुरू देव जी महाराज के नाम का भजन । सुमिरन । दर्शन करने में सत्संग और ध्यान की प्रगाढता बढ जाती है । श्री सदगुरू का दर्शन कर उनके श्री मुख से जो अमृत वचन निकलते हैं । उसे ही सतसंग कहते हैं । श्री सदगुरू देव जी महाराज के सत्संग सुनने से साधक के मन की मनोदशा एकदम बदल जाती है । अन्दर में प्रेम उमड पडता है । सांसारिक विचार उसके पास नहीं फ़टकने पाते । जब तक श्री सदगुरू देव जी महाराज के सम्मुख साधक उपस्थित रहता है । तब तक उसका मन और सुरत श्री सदगुरू भगवान के दर्शनों में अथवा उनके श्री मुख से निकले हुए अमृत वचनों को सुनने में लगे रहते हैं । साधक के अन्दर में मन और सुरत का खिंचाव ऊपर की ओर बढता चला जाता है । जब ऐसी अभ्यासी श्री सदगुरू के सत्संग के समय के अतिरिक्त कभी भी अपने अन्दर में गुरू के स्वरूप का ध्यान का ख्याल करेगा । तो उसकी वही हालत हो जायेगी । जिससे मन में प्रेम उमडेगा । और सांसारिक विचार तथा इच्छायें दूर खडी रहेगी । जब तक साधन की 


ऐसी दशा रहेगी । तब तक साधक को भजन । सुमिरन । ध्यान में रस व आनन्द निर्विघ्न मिलता रहेगा । आन्तरिक सुगमता के साथ प्रगट होता रहेगा । ऐसी स्थिति में साधक भजन । सुमिरन । ध्यान में तन्मय होकर रस व आनन्द में निमग्न रहता है । श्री सदगुरू की कृपा से जब कभी भी ऐसी हालत गुजरे । उस समय उस भाव को अपने ह्रदय में फ़ैलने दे । ऐसी हालत अभ्यासियों की प्राय: तब होने लगती है । जब साधक का आन्तरिक सम्बन्ध श्री सदगुरू भगवान से जुड जाता है । सूफ़ियों में इसे निखत कायम होना कहते हैं ।
बिना गुरू कृपा के साधक । शिष्य । जिज्ञासु की सुरत ऊपर उठ नहीं सकती । और साधना में अग्रसर नहीं हो सकती । इसलिय कहा गया है  - मोक्षमूलं गुरो कृपा ।
श्री सदगुरू देव जी महाराज की दया दृष्टि से ही तो सुषुप्त शक्तियां जाग्रत होती है । जिसका सहारा लेकर साधन प्रगति की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है । तंत्र शास्त्र में इसी गुरू कृपा को शक्तिपात कहकर अभिहित किया गया है ।
इसमें शिष्य को अपनी तरफ़ से कोई क्रिया नहीं करनी पडती । इसमें गुरू अपनी दया से शिष्य के शरीर में प्रविष्ट होकर भक्ति की शक्ति को जाग्रत कर देता है । और उसे उठाकर गुरू रूप में परिवर्तित कर देता है ।
गुरू अपने शिष्य को अपने सम्मुख बैठाकर अपने प्रज्ज्वलित संकल्प से शिष्य के कु संस्कारों को दग्ध करता है । और उसे यानी शिष्य को गुरू की श्रेणी में स्थिर कर देता है ।

जहां गुरू और शिष्य के बीच भौगोलिक दूरी होती है । वहां गुरू को शिष्य के स्मरण से काम लेना पडता है । हजारों कोस की दूरी पर बैठा हुआ गुरू अपने आत्मबल अथवा मनोबल से शिष्य के मल को हटाता है । और अपनी शुद्ध आध्यात्मिक शक्ति शिष्य के अन्दर पहुंचाता है । इस क्रिया में श्री सदगुरू देव जी महाराज की असीम दया की प्रधानता है । इस क्रिया में गुरू और शिष्य दोनों अभ्यास में मिलकर एक हो जाते हैं । और फ़िर ऊंची चढाई चढते हैं । इसलिये इसे यौगिक क्रिया कहा गया है । इसमें भजन । सुमिरन । ध्यान तथा गुरू के प्रति शिष्य की निष्ठा । श्रद्धा । प्रेम की ही विशेष से भी विशेष महत्ता है ।
इसमें श्री सदगुरू अपनी विशेष दया से या दया की शक्ति से शिष्य के सारे कर्मों को काटकर छिन्न भिन्न करके अपने शिष्य को भजन । सुमिरन । ध्यान ।

सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान का बोध कराकर भक्ति की शक्ति बढाता रहते हैं । और उसके यौगिक चक्रों को बेध डालता है । अन्तर की सुषुप्त पडी हुई कलाओं की अपनी असीम कृपा से चलायमान कर श्री सदगुरू देव जी महाराज इस विशेष क्रिया द्वारा शिष्य को शक्ति सम्पन्न बना डालते हैं ।
जीव काज के हेतु ही । तजा अनामी लोक । परमहंस बन आये हैं । हरने दुख अरू शोक ।
सदगुरू कृपा कटाक्ष से । बिगडी सब बन जाय । जीव सुखमय होत है । विपदा सकल बिलाय ।
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ये शिष्य जिज्ञासा की सुन्दर प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा जी द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार

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