21 जनवरी 2012

महाराज जी ! मन में अकुलाहट होती है

67 प्रश्न - महाराज जी ! मन में अकुलाहट होती है । और अन्दर में मालिक का दर्शन और ऊपर के मण्डलों में रसाई में देर लग रही है । यह काम जल्दी कैसे हो ?
उत्तर - साधक जिज्ञासुओं को आन्तरिक अभ्यास के मामले में जल्दबाजी नहीं करना चाहिये । मालिक का भजन, ध्यान करते हुए बराबर प्रयत्नशील रहना चाहिये । शान्ति के साथ भजन, ध्यान के तार को बराबर मालिक से जोडे रखना चाहिये । जिज्ञासु का काम तो परमार्थ के पथ पर चलकर उस आध्यात्मिक योग विधा की प्राप्ति करना है । जो संसार की सारी विधाओं का मूल है । यदि इस काम में निरन्तर यत्नशील रहता है । तो यह आध्यात्मिक योग विधा जल्दी प्राप्त हो सकती है । यह तो बडी भारी दया सन्त सदगुरू देव जी महाराज की तथा परम पिता परमेश्वर की समझनी चाहिये कि वे इतनी थोडी मेहनत पर भी अपने अहैतुकी कृपा का बल देते हैं । यदि साधक अपने लगन में पक्का है । तो उस पर श्री सदगुरू देव जी महाराज अपने दया का हाथ बराबर लगाये रखते हैं । और आध्यात्मिक शीतलता, निर्मलता और प्रेम की रीति सदा अन्दर में जगाये रखते हैं । श्री सदगुरू देव जी महाराज ही तो आध्यात्मिक मण्डलों का ताला खोलने की कुन्जी हैं ।
गुरू कुन्जी जो बिसरे नाहीं । घट ताला छिन में खुल जाहीं । ताते शब्द किवाड । खोलो गुरू कुन्जी पकडाही ।
श्री सदगुरू देव जी महाराज के भजन, सुमिरन और ध्यान का अभ्यास बहुत ही सरल है । परन्तु जिज्ञासु के मन का बहाव संसारी होने के कारण अभ्यास करने वाले साधक थोडी कठिनाई अनुभव करते हैं । अभ्यासी को चाहिये कि सच्चे

मन से अपने इन्द्रियों को सांसारिक विषयों से हटाये । और जो लगन संसार की तरफ़ लगी है । उसे धीरे धीरे हटाता यानी छोडता जाय । और श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्री चरणों में जोडता जाय । इस काम में सदा सतर्क रहकर अपने सुरत को श्री सदगुरू देव जी महाराज के भजन । ध्यान । सेवा । पूजा । दर्शन तथा आरती पूजा से जोडे रखे । इस काम में बराबर सतर्कता बनाये रखे । ताकि मन कहीं संसारी कामनाओं के भुलावे में न जाने पाये । जो तरंगे संसार की विषय वासनाओं की तरफ़ ले जाती है । और जो भजन, सुमिरन, ध्यान में बाधा पहुंचाती है । उन्हें रोके । और परमार्थ पथ पर चलने के लिये सदा प्रेरित करता रहे । तथा उन्हें प्रोत्साहित करता रहे ।
अपने मालिक से विनती करता रहे कि हे मालिक ! मैं आपसे यही बखशीश मांगता हूं कि मुझे अपने दासों का दास बना लें । मुझे गुरू का दास बना दें । यदि ऐसा हो गया । तो बाकी क्या रहा ? कुछ भी नहीं । गुरू की दया से सब कुछ मिल गया ।
हे मालिक आपसे यही । बख्शीश मांगता हूं । बना लो दास अपने चरणों का । यही आशीष चाहता हूं ।
सतगुरू सांचा दरबार आपका । होती हैं पूरी मुरादें जहां । जो द्वार पे आके फ़ैलाता । भरता है दमन उसका यहां ।
68  प्रश्न - महाराज जी ! यह तो समझ में आया कि भजन का अभ्यास ही शान्ति का खजाना है । और ऊपर के आध्यात्मिक मण्डलों में प्रवेश का एकमात्र उपाय है । परन्तु अभ्यास के समय मन की तरंगे और तरह तरह के भुलावन एक रस अभ्यास नहीं होने देते । हे प्रभु ! ये तरंगे कैसे रूकें ? रूक जायें । तो भजन में रस मिलने लगे ।
उत्तर - मन का तो ऐसा स्वभाव ही है कि वह हाव भाव, तडक भडक तथा कंचन कामिनी यानी हर समय विषय

चिन्तन में डूबा रहता है । संसारी सारी बातें बराबर सोचा करता है । सोते जागते हर वक्त यही बातें सोचता रहता है । इससे ऊपर उठकर कुछ अपने जीवन के कल्याण की बात को सोचना चाहिये कि मुझे मनुष्य शरीर केवल खाने, पीने और विषय वासना में आसक्त रहने के लिये नहीं मिला है । मिला तो है कि मन के अन्दर आध्यात्मिकता को जगाकर किसी योग्य सदगुरू को खोज कर उनसे नाम दान लेकर भजन, सुमिरन, ध्यान कर करके आध्यात्मिकता या रूहानियत के प्रति प्रगतिशील हो जाय । यही जीवन का उद्देश्य है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के मुखारविन्द से उनकी अमृतमयी वाणी को सुन सुनकर और उनके बताये हुए नाम मन्त्र का नित्य और नियमित भजन, सुमिरन और ध्यान करने से अभ्यासी में ऐसी योग्यता अपने आप आ जाती है कि वह अपने मन की चाल पर निगाह रख सके । अर्थात अपनी आदत या अपने कर्मों की निरख परख सदा करने लगे । मालिक से दया की भीख की याचना करते रहना चाहिये । जब जब सांसारिक हिलोंरे मन के अन्दर उठती हुई दिखाई पडें । तो तुरन्त मालिक के भजन, सुमिरन और मालिक के ध्यान में मन को लगाना चाहिये । ऐसा करने से मन का भाव इन्द्रिय सुखों को छोडकर मालिक के भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान में मग्न होकर प्रभु प्रेम के रस में विभोर हो जाता है । और सांसारिकता से बच जाता है ।
नाम के भजन, सुमिरन का रस तथा सदगुरू के स्वरूप के ध्यान का रस जिस विधि से श्री सदगुरू देव जी महाराज ने बताया हो । उस विधि से पाप्त करना चाहिये । शब्द

का आन्तरिक भजन, सुमिरन, ध्यान करने से साधक सहसदल कमल पर पहुंच कर श्री सदगुरू देव जी महाराज की दया से अमृत सरोवर में स्नान पान कर करके आगे के मण्डलों पर पहुंच जाता है । ऊंचे के मण्डलों पर जाने में इतना आनन्द आता है । यानी आकर्षण होता है कि यदि मन को पूरी तरह से भजन, सुमिरन, ध्यान, सेवा, पूजा, दर्शन में लगा दिया जाय । तो वह आनन्द मन की धार को संसार की ओर हटाकर अपनी तरफ़ खींच लेता है । मालिक के भजन, सुमिरन और ध्यान का सुरत को जैसे जैसे आनन्द या रस मिलता जायेगा । वैसे वैसे सुरत की धार आगे की तरफ़ यानी ऊपरी मण्डलों की तरफ़ बढती चली जायेगी । और जितनी देर वह जिस मुकाम पर ठहरेगी । उतना ही उसे रस या आनन्द खूब मिलता जायेगा ।
इस प्रकार अभास करने से सुरत का रूझान पूरी तरह से सांसारिक सुख छोडकर ऊपर की ओर हो जाता है । जिससे ऊंचे के मण्डलों के चढाई आसानी से चढी जा सकती है । यह सब श्री सदगुरू देव जी महाराज की असीम दया का ही फ़ल है ।
श्री सदगुरू अति दया कर । दिया नाम का दान । जपे जो श्रद्धा भाव से । चढता जय असमान ।
त्रिकुटी में गुरूदेव का । करे जो गुरूमुख ध्यान । यम किंकर का भय नहीं । पावे पद निर्वान ।
69 प्रश्न - आपकी दया से जब जब थोडा सा भी भजन हो पाता है । तो लगता है कि भीतर की बैटरी चार्ज हो गई । परन्तु बाहरी कामों का उलझाव कभी कभी इतना अधिक बढ जाता है कि अभ्यास के लिये समय ही नहीं मिल पाता ।

उत्तर - अभ्यास के लिये समय की कमी नहीं होती । अपनी चाह या रूझान की कमी होती है । बहुत व्यस्त होने पर भी आदमी शौच, भोजन और निद्रा के लिये समय निकाल ही लेता है । इसी तरह भजन के अभ्यास के लिये भी समय निकाल सकता है । श्री स्वामी जी महाराज समझाते हुए कहते हैं कि भजन, सुमिरन, ध्यान करने के लिये समय निश्चित कर ले । भजन, ध्यान करने का समय तो हर दिन, हर घडी है । पर सवेरे का बृह्म मुहूर्त का समय सबसे अच्छा है । उस समय भजन, ध्यान करने से मन लगता है । और अन्दर में ध्यान भी जमने लगता है । भजन, ध्यान में बैठने पर संसार के किन्हीं भी कामों का ख्याल मन में किसी भी प्रकार से नहीं आने देना चाहिये । अपने मन को हर वक्त श्री सदगुरू देव महाराज के भजन, ध्यान में बराबर लगाये रखें । ऐसा करने से भजन, ध्यान में रस मिलता है । मन दुनिया के ख्यालों से हटकर मालिक के श्री चरणों का भंवरा बन जाता है । अर्थात श्री सदगुरू देव महाराज के सम्मुख हो जाता है । प्रभु नाम के बिना सुख नहीं मिलता । और न ही आन्तरिक दुख दूर होता है ।
शारीरिक सुख के सामान तो संसार में बहुत हैं । परन्तु उनको प्राप्त करने पर आन्तरिक दुख तो दूर नहीं होता । आन्तरिक दुख तो तभी दूर होगा । और सच्चे सुख की प्राप्ति तभी होगी । जब साधक अपने अन्दर प्रभु के नाम को बसायेगा ।
जो साधक नियम पूर्वक प्रतिदिन भजन, सुमिरन, ध्यान का अभ्यास करते हैं । उनको आन्तरिक आनन्द का

अनुभव होने लगता है । और उनका चित्त प्रसन्न रहता है । कभी कभी ऐसा होता है कि भजन ध्यान में रस कुछ कम मिलता है । ऐसी स्थिति में अभ्यासी अपने चित्त में दुखी होते हैं । निराश होते हैं । जिस स्थिति में भजन व ध्यान में आनन्द व रस मिलता है । वह मालिक श्री सदगुरू देव जी महाराज की प्रत्यक्ष दया और कृपा है । परन्तु कभी कभी जब मन संसार की ओर जरा सा भी चला जाता है । तो भजन और ध्यान की प्रक्रिया बिगड सी जाती है । जैसे भजन बीच में टूट जाना । अन्दर में ध्यान का न आना शामिल है । उसको भी अपनी कमजोरी समझें । और मालिक से दया की याचना करे कि - हे मालिक ! मेरी कमी पर ध्यान न देकर मेरी गलती को सुधारने की दया करें। हे मालिक ! जो आनन्द व रस भजन ध्यान में मिल रहा था । वह उस समय रूक गया है । जिसकी वजह से मेरा आध्यात्मिक हास हो रहा है । ऐसा मन में लगता है कि हमारे लोक और परलोक के मालिक आप ही हैं । और आपके समान दयावान दूसरा कोई नहीं है । हे प्रभु ! मेरा भटकाव दूर करके मुझे सुमिरन, ध्यान के रास्ते में लगा लें ।
70  प्रश्न - महाराज जी ! आपकी कृपा से जब साधना का कृम नियमित रूप से चलता रहता है । तो भजन, ध्यान में खूब रस और आनन्द आता है । फ़िर कभी यह रस और आनन्द मिलना बन्द हो जाता है । और चित्त डावांडोल हो जाता है । इसका क्या कारण है ?
उत्तर - भजन और ध्यान में रस तथा आनन्द न आने के तीन कारण हो सकते हैं । पहला कारण है । कुसंग का

प्रभाव । यह प्रभाव दुर्जनों, निपट संसारियों, निन्दकों के संग से होता है । ऐसे लोग परमार्थ के विरोधी होते हैं । धर्म परमार्थ की हंसी उडाते हैं । व्यंग्य कसते हैं । ताने मारते हैं । और सन्तों की निन्दा करते हैं । इन बातों को सुनकर अभ्यासी के मन में भृम पैदा हो जाता है । अभ्यास करते समय साधक के सामने वही कटु वचन, भृम सामने आते रहते हैं । जिसकी वजह से प्रेम में ग्लानि आती है । सुरत का चढाव नीचे गिर जाता है । अभ्यास में रस व आनन्द की जगह निराशा आती है ।
दूसरा कारण भी संग का ही प्रभाव है । जगह जगह की सैर । संसार की ओर आकर्षण । धनवानों । उच्चकोटि के अधिकारियों की संगति से मन में संसारी भोग पदार्थों की इच्छा की जाग्रति होती है । बडे बडे पदों की इच्छा मन में जागने लगती है । यश, सम्मान प्राप्त करने की इच्छा मन में जागते लगती है । किन्तु इस प्रकार की इच्छा की पूर्ति न होने पर मन सुस्त हो जाता है । वह मन में सोच सोच कर उदास और परेशान हो जाता है । मेरा मालिक परम पिता परमेश्वर तो अत्यन्त दयालु हैं । वह क्षण भर में जो चाहे, चाहे जिसको दे सकता है । फ़िर मुझे यह धन, मान, सम्मान 


और पद प्रतिष्ठा क्यों नहीं देता ? औरों की हालत सुनकर, पढकर अभ्यासी साधक के मन में किन्हीं विशेष प्रकार के भोगों की तीव्र प्रकार की अभिलाषा पैदा हो । तो ऐसी दशा में वह सुस्त और दुखी हो जाता है । वह सोचने लगता है कि मैं भोगों में लिप्त क्यों हुआ ? इन्द्रियों को भोगों में क्यों लिप्त होने दिया ? ऐसी स्थिति में उसका चित्त चलायमान हो जाता है । और वह परेशान हो जाता है ।
तीसरा कारण प्रारब्ध से सम्बन्धित है । पिछले जन्म के और वर्तमान के जन्म के कर्मों के फ़लस्वरूप कोई रोग, व्याधि अभ्यासी को स्वयं लग जाती है । अपनी बीमारी या अपने घनिष्ठ सम्बन्धी की चिन्ता के कारण उसके मन व सुरत भजन व ध्यान में भली भांति नहीं लगते । उस समय वह घबरा जाता है । और श्री सदगुरू भगवान के श्री चरणों मे आतुर होकर पुकार करता है कि - हे मालिक ! इन सभी व्याधियों से अब बचा लें । यदि उसका आर्तभाव देखकर मालिक के द्वारा उसकी प्रार्थना तुरन्त सुन ली गयी । तो उसकी सारी व्याधि समाप्त हो जाती है । और वह प्रसन्न होकर ह्रदय से प्रभु को धन्यवाद देता है । और भजन, सुमिरन, ध्यान पूरी लगन के साथ करने लग जाता है ।
यदि ऐसा करते करते उसके मन में किसी भी प्रकार की कोई कमी आ गई । तो उसका मन दुखी और उदास हो जाता है । मन में मालिक की तरफ़ से असन्तोष हो जाता

है । सोचने लगता है कि श्री सदगुरू भगवान ने मेरे कर्मों को क्यों नहीं काट ( समाप्त कर ) दिया । मेरी सहायता अपने तरफ़ से क्यों नहीं कर दिया । इसी के कारण मेरा मन भजन, सुमिरन, ध्यान के अभ्यास में नहीं लगता है । हे मेरे मालिक ! यदि आप मेरे ऊपर तुरन्त दया नहीं करेंगे । तो मेरे द्वारा किये हुए कर्म कैसे कटेंगे  । और कैसे मैं इस कलिकाल के दुखों से छुटकारा पा सकूंगा ? सन्तों ने इन कारणों के निवारण के लिये अनेकों उपाय बताये हैं । जिनमें से कुछ उपाय यहां दिये जा रहे हैं ।
कुसंग का प्रभाव इसलिये तुरन्त होता है कि साधक की भक्ति में अभी कच्चापन है । श्री सदगुरू देव जी महाराज के वचनों को ध्यान देकर नहीं सुनता है । तथा उन्हें याद नहीं करता । उनकी बातों को समझने की कोशिश नहीं करता । उसे यह चाहिये कि श्री सदगुरू देव जी महाराज के वचनों पर ध्यान पूर्वक विचार करे । भक्ति की रीति पर ध्यान देना चाहिये । और निन्दक की बातों को अपने ह्रदय में प्रवेश ही न करने देने का प्रयास करना चाहिये । इसके साथ साथ ऐसी बातें कहने वाले लोगों को अज्ञानी या विरोधी समझना । तथा अपने भाग्य को इसलिये सराहना चाहिये कि मैंने श्रीसदगुरू महाराज की शरण ग्रहण की है । और अधिक से अधिक लगन से भजन, सुमिरन, ध्यान, पूजा, दर्शन की साधना में लग जाना चाहिये । यह तो रही साधक के अपने अभ्यास के पुरूषार्थ की बातें ।
यदि वह अपने को निर्बल व नि:सहाय पाता है । और पुरूषार्थ भी करता है । किन्तु दृढतापूर्वक विचार नहीं कर पाता है । तो उसके लिये यह आवश्यक है कि भक्ति भाव पूर्वक

सन्तों की अमृतमयी वाणी का अध्ययन करे । इसके साथ साथ अपने दशा को अपने बडे श्रेष्ठ सतसंगी से या जो पुराने अभ्यासी हों । और इन कठिनाईयों से गुजर चुके हों । उनके सम्मुख रखें । और उनसे सहायता लेकर अपने भृम का निवारण करे । ऐसा देखा गय है कि इन उपायों को करने से अवश्य सहायता मिलती है ।
इसके साथ साथ सबसे सरल और उत्तम उपाय यह है कि सम्पूर्ण रूप से अपने आपको श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्री चरणों में समर्पित करके ( चाहे वह थोडी ही देर के लिये क्यों न हो ) सम्पूर्ण लगन से दया के लिये प्रार्थना करे । रोये । और गिडगिडाये । इतना करने के बाद अवश्य ही दया बढेगी । और कठिनाई दूर हो जायेगी । इस प्रकार की कठिनाई आने पर भी प्रभु की दया छिपी रहती है । मन के अन्दर जो भी कच्चापन और कसर गुप्त रूप से घर किये हुए है । वह भी कुसंगत के प्रभाव से प्रगट हो जाती है । और जब उपर्युक्त विधि से इसका इलाज हो जाता है । तो भविष्य के लिये वह दूर हो जाती है ।
दूसरी स्थिति यह है कि पहले सन्तों महात्माओं की बातों का मनन करे । सन्त महापुरूषों की वाणी में कहा गया है - मोह माया और संसारियों से मन को सावधान कर लो । चित्त की देखभाल करो । और सन्त महापुरूषों की वाणियों को पढो । और उस पर मनन कर उन पर अमल करो । बार बार अपने मन को उन्हीं वचनों की याद दिला दिलाकर समझावे । फ़ालतू बातों का चिन्तन न करके मालिक के नाम के

भजन, सुमिरन, ध्यान में मन को लगावे । उसमें कोई विघ्न न डालने पाये । बराबर मन में यह सोचे कि समस्त वस्तुओं को देने वाला भगवान है । जो सारी सृष्टि का मालिक व रचयिता है । इसलिये मालिक से मालिक को ही मांगना चाहिये । ऐसे सन्तों ने कहा है कि जितने भोग पदार्थ हैं । जितनी मान बडाई है । जितने सम्मान । धन । धान्य । स्वामित्व । प्रभुत्व आदि वस्तुयें हैं । सब उसी के अधिकार में हैं । पहले उसे प्रसन्न करो । फ़िर वही तुम्हारे लिये जो वस्तु अच्छी तथा हितकर समझेगा । स्वयं दे देगा । वह हमारा परम पिता परमेश्वर है । हम उसकी अज्ञानी सन्तान हैं । हमें क्या मालूम कि कौन सी वस्तु लेकर हमारा भला होगा । और कौन सी वस्तु लेकर नुकसान । वह परम पिता परमेश्वर हमें कदापि ऐसी वस्तु नहीं देगा । जिसमें हमारा अहित है । अत: यदि मनचाही वस्तुएं न प्राप्त हों । तो उदास व दुखी नहीं होना चाहिये । क्योंकि मालिक ने इसी में हमारी भलाई छिपा रखी है ।
यदि इस प्रकार के सोच विचार से मन न माने । तो बार बार यह चाह उठावे कि श्री सदगुरू देव जी महाराज की सेवा, भजन, ध्यान में उपस्थित रखकर दीन भाव से अपने मन की स्थिति को निवेदन करे । और वे जो कुछ अपने श्रीमुख से अपने मन के स्थिति को निवेदन करे । और वे जो कुछ अपने श्रीमुख से कहें । उसे ध्यान देखर सुने । तथा उसे तथा उसे कार्यरूप में परिणत करे । यदि श्री सदगुरू देव महाराज की शरण में न जा सके । तो अपने प्रेमी

सतसंगी भाइयों से, जो अभ्यास में अपने से बढकर हों । उनसे अपनी इस दशा को इशारों से या खुलकर कहे । जो उपाय वे बतावें । उन पर अमल करे । संसार के तुच्छ और नश्वर पदार्थों के लिये अपने भजन और ध्यान की बलि चढा देना । सच्चे आनन्द को खो देना । और प्यारे परम पिता परमेश्वर से विमुख होना । केवल मूर्खता है । और कुछ नहीं । जैसे जिस डाली पर बैठा हो । उसी डाली को काट रहा हो । अपने सुरत के कल्याण के पथ में आप ही रोडा बन रहे हो । अपनी प्रगति में स्वयं देर लगा रहे हो ।
सन्तों महापुरूषों का कहना है कि तुम सन्तों, महात्माओं की संगति में रहकर श्री सदगुरू के नाम के भजन, सुमिरन, ध्यान की धुन में रहो । और औरों को यही करने की प्रेरणा दो । इससे जन्मों जन्मों के कर्मों का मैल उतर जाता है । और मन से अभिमान जाता रहता है । इससे काम और क्रोध प्रभावी नहीं रह पाते । और लोभ, मोह, मत्सर रूपी श्वान मर जाते हैं । तात्पर्य यह है कि श्री सदगुरू के शरण में रहकर नाम का भजन, सुमिरन और अपने गुरू की सेवा, पूजा, दर्शन, ध्यान करने से मन के सभी विकार दूर हो जाते हैं । और मन पवित्र हो जाता है । इसके अतिरिक्त श्री सदगुरू की पावन संगति से यह लाभ भी होता है कि जीवों पर दया करने और सभी तीर्थों की यात्रा और स्नान तथा अन्य पुण्यकर्मों का फ़ल स्वत: प्राप्त हो जाता है । दया करके स्वयं श्री सदगुरू देव जी महाराज ऐसी सद्बुद्धि प्रदान करें । जिससे हम सभी उनके नाम के सुमिरन ध्यान, उनके सेवा, सन्त महात्माओं की संगति और जीव मात्र के प्रति प्रेम और दया के मार्ग पर आजीवन चलते रहें । सन्तों,

महापुरूषों के सत्संग के प्रभाव से जिन्हें अपने श्री सदगुरू देव जी महाराज से मिलन तथा उनकी अमृत वाणी सुनने, उनकी सेवा, पूजा, दर्शन करने का उत्तम संयोग उपलब्ध हुआ है । मैं उन पर कुर्बान जाता हूं कि वही परम पवित्र एवं पुण्य भागी जीव हैं । जिन पर श्री सदगुरू का कृपा पूर्ण हाथ है । ऐसे जीव ही मायाजाल से छूट सकने में सफ़ल हो जाते हैं ।
श्री सदगुरू सांचा दरबार आपका । होती हैं पूरी मुरादें यहां । जो द्वार पे आता आपके । पूरी होती है आश यहां ।
अपनी इस प्रेम निष्ठा तथा सम्पूर्ण श्रद्धा विश्वास के साथ दृढ निश्चय करके भजन, ध्यान के अभ्यास में लगे । ऐसा करने से प्रभु की दया और श्री सदगुरू की कृपा से शीघ्र दशा सुधर जायेगी । और आन्तरिक अभ्यास में रस तथा आनन्द का अनुभव होने लगता है ।
अभ्यासी को इस बात की परख हो जायेगी कि श्री सदगुरू भगवान अपने भक्त की किस प्रकार देखभाल व सम्हाल करते हैं । और उनके मन की मलिनता को किस प्रकार धीरे धीरे निकालते हैं । उनकी अज्ञानता को दूर करते हुए उनके में भजन भक्ति के प्रति प्रेम निष्ठा बढा देते हैं । तथा उन्हें परमार्थ पथ पर अग्रसर करते हुए अपने भजन ध्यान में आनन्द व भक्ति का रस प्रदान करते हैं । इसलिये कृपा करना मुझ पर । और वरदहस्त रखना सिर पर । और देना सद बुद्धि मुझे । मांगी मैं भक्ति का ही वर ।
71 प्रश्न - कभी कभी शारीरिक व्याधियां । कष्ट और काम, क्रोध आदि के वेग विचलित कर देते हैं । जिससे भजन 


ध्यान का अभ्यास कृम लडखडा सा जाता है । और मन में ग्लानि होती है । इसका क्या उपाय है ?
उत्तर - जो व्याधि और कष्ट पिछले कर्मों के फ़लस्वरूप आते हैं । उन्हें भोगते समय यदि भजन, सुमिरन तथा श्री सदगुरू का ध्यान करते हुए भोगा जाय । तो कष्ट कम होता है । पूर्ण शरणागत होने से श्री सदगुरू देव की दया साथ होती है । वह दया भोग की प्रक्रिया को बहुत कम कर देती है । अर्थात शूली से कांटा बना देती है । मन भर कष्ट को सेर भर बना देती है । इतिहास में ऐसे उदाहरणों के कोई कमी नहीं है । कभी कभी तो कष्ट या बीमारी की हालत में भी श्री सदगुरू की कृपा से भजन और ध्यान में अत्यन्त आनन्द और रस प्राप्त होता है । जिसके कारण अभ्यासी उस बीमारी आदि से स्वयं शीघ्र नहीं छूटना चाहते । बल्कि यदि कोई शारीरिक कष्ट होता है । तो उसका स्वागत करते हैं ।
सौ सौ बार काटिये । शीष कीजिये कुर्बान । नानक कीमत ना पवै । परिया दूर मकान ।
श्री सदगुरू की कृपा से इस जीव का जो कल्याण होता है । उसके बदले यदि सौ सौ बार वह जीव या साधक अपना दिर काट कर उन पर न्यैछावर करे । तो भी उनकी कृपा का मूल्य नहीं चुकेगा । समर्पण की ऐसी ऊंची भावना न रखने वाला अथवा उनसे उऋण होने की भावना रखने वाला व्यक्ति या साधक उनके श्री चरणों से बहुत दूर फ़ेका जायेगा । ऐसी बात को मन से निकाल कर पूरी श्रद्धा और भाव से श्री सदगुरू का भजन, सुमिरन, सेवा, पूजा, दर्शन ध्यान में लगने व करते रहने से जीते जी मुक्ति हो जाती है । सदगुरू की दया ही तो मुक्ति की खान होती है । यह बात साधक को पूरी तरह से समझ लेना चाहिये ।
जैसा तुमने पूछा है । वैसी दशा केवल उन अभ्यासियों की होती है । जो फ़िदाई ( जी जान से न्यौछावर ) होते हैं ।

जिन्होंने श्री सदगुरू की शरण ग्रहण की है । उन्हें विश्वास रखना चाहिये कि उनके कर्म भोग श्री सदगुरू की दया से सहज ही में कटते जायेंगे । अपने सम्बन्धियों को कष्ट में देखकर उन्हें यदि चिन्ता होती है । तो उसमें श्री सदगुरू की दया से सहायता मिलती है । और उन्हें दुख का अभ्यास कम होता है । यह है श्री सदगुरू भगवान की दया का अंग । उनकी दया की महिमा का स्मरण करके एक भक्त के उदगार हैं -
स्वरूपे स्थिरता लभ्या सदगुरोभर्जनाद यत: । अत: साष्टांग्ड्नत्याहं स्तुवत्रित्यं स्तुवत्रित्यं गुरूं भजे ।
श्री सदगुरू के स्वरूप में साधक की भावना भजन, सुमिरन, ध्यान करने से ही हो सकती है । यह बात जब श्री सदगुरू की दया से मेरी समझ में आ गयी । तो अब मैं नित्य श्री सदगुरू देव जी महाराज को साष्टांग प्रणाम तथा उनकी स्तुति करता हूं । और उनकी भजन भक्ति, सेवा पूजा, दर्शन ध्यान सदा करता रहूंगा । जिससे मुझे भजन, भक्ति, ध्यान का आनन्द का रस सदा सदा मिलता रहे ।
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- ये शिष्य जिज्ञासा से सम्बन्धित प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार ।
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