13 जनवरी 2012

मन तो सरसों की पोटली के समान है

51 प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! केवल जप - ध्यान लेकर रहना बहुत कठिन है । मैं तो अधिक दिन नहीं रह सका ।
उत्तर - कर्म और उपासना एक साथ करना चाहिये । 2 - 4 नहीं कर सके । इसका मतलब यह नहीं कि कर नहीं सकोगे । बारम्बार कोशिश करनी चाहिये । श्री सदगुरू देव जी महाराज प्रमाण देते हैं कि बछडा खडा होने की कोशिश करते हुए 100 बार गिरता है । तो भी छोडता नहीं । आखिर में दौडना सीख जाता है । पहले पहल कर्म में रहने से एक प्रकार की शिक्षा होती है । तब मन को साधन - भजन में लगाया जा सकता है । नहीं तो साधन - भजन के समय भी मन उसी प्रकार रहता है । 1 समय आता है । जब सब छोडकर सिर्फ़ जप - ध्यान ही लेकर रहने की इच्छा होती है । तब सारे कर्म अपने आप छूट जाते हैं । मन जब जागृत होता है । तभी ऐसा होता है । नहीं तो जबरदस्ती करने से 2-4 दिन तो अच्छा लगता है । परन्तु उसके बाद फ़िर अच्छा नहीं लगता है ।
बृह्मचर्य से खूब शक्ति आती है । एक व्यक्ति 25-25 व्यक्ति का काम कर सकता है । बृह्मचर्य के नियमों में जप । ध्यान । स्वाध्याय । सतसंग । श्री सदगुरू देव जी महाराज की श्री वाणी का अमल । सेवा । ध्यान । सुमिरन । चिन्तन । मनन सब शामिल है । खुद का किससे भला होगा । यह क्या सभी लोग जान सकते हैं ? इसीलिये गुरू - महात्माओं का संग करना पडता है । श्री स्वामी जी महाराज के श्री चरण कमल की शरण में आना पडता है । तुमको स्वाधीनता पूरी देता हूं । करके तो देखो । कितने दिन कर सकते

हो । 2-4  दिन । मन अभी कच्चा है । नियन्त्रित नहीं है । इसलिये सब गडबडी हो रही है । मन्द गति से काम बनने वाला नहीं है । आलसी होने से साधन, भजन नहीं होगा । जो भी करो 16 आने मन लगाकर करो । तब आनन्द है । कौशल है । श्री स्वामी जी महाराज बराबर यही कहा करते हैं कि लग जाओ । और काम समाप्त कर फ़िर से सेवा । चिन्तन । मनन । में प्रभु के उपदेशानुसार दिन बिताना चाहिये । श्री स्वामी जी महाराज कहते हैं कि काम करते - करते बीच में अवसर पाने पर श्री सदगुरू देव जी महाराज का स्मरण । चिंतन । मनन । भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा करना चाहिये । काम समाप्त कर फ़िर से प्रणाम करना चाहिये । जो भी कार्य शुरू करे । मालिक को दण्डवत प्रणाम करके करें । और समाप्त होने से प्रणाम करे । सब मालिक को अर्पण करके करें । सब सहज हो जायेगा । श्री सदगुरू चरणों में समर्पण भाव से निवदेन करके कार्य प्रारम्भ करें । कठिन से कठिन कार्य सरल हो जायेगा । सहज सुखद हो जायेगा ।
52  प्रश्न - हे मेरे श्री सदगुरू देव जी महाराज ! मन को शान्त कैसे करना होगा ?
उत्तर - भजन । श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज के द्वारा मिले हुए गुरू मन्त्र का सुमिरन - ध्यान करके मन को शान्त किया जाता है । मन को शान्त करना होगा । जडत्व को स्थान न दें । स्थिर मन से मन को प्रशान्त करना होगा । नहीं तो प्रतिक्रिया को सम्भाला नहीं जा सकता । इसका परिणाम बुरा होता है । सेवा । पूजा । भजन । सुमिरन । दर्शन । ध्यान । चिन्तन । मनन के द्वारा इन्द्रियां और


मन आप ही आप संयमित हो जाता हैं । किन्तु पहले उसे वश में करने की कोशिश करनी चाहिये ।
1 आसन में बहुत देर तक जप, ध्यान करने की शक्ति धीरे - धीरे आती है । पहले - पहल दिन में 4 -5 बार बैठने का अभ्यास करना अच्छा रहता है । मन लगे । न लगे । जप करते रहना चाहिये । अभ्यास करते रहना चाहिये । जप करते जाना उचित हैं । क्योंकि कौन जाने मन कब एकाग्र हो जाय । इस तरह मन एकाग्र होने की सम्भावना अधिक रहती है । इसलिये इस शान्त भाव की प्राप्ति के लिये इच्छा न होते हुए भी सेवा । पूजा । भजन । सुमिरन । दर्शन । ध्यान किया जाना अच्छा है । श्री स्वामी जी महाराज श्री मुख से बताते हैं कि बचपन में गीली मिट्टी के समान स्वभाव रहता है । इसलिये जिसे सामने देखता है । उसी के लिये जिद जोर पकड लेती है । नरम मिट्टी से जो भी गढने की इच्छा हो गढ सकते हो । सभी वस्तुयें तैयार की जा सकती हैं । 1 वस्तु बना ली । फ़िर उसे तोडकर दूसरी वस्तु बना ली । जब तक मिट्टी गीली रहती है । तब तक जो भी इच्छा हो । गढ सकते हैं । परन्तु इस मिट्टी को आग में पकाने पर फ़िर वह नहीं गढी जा सकती है । तुम लोगों का मन अभी गीली मिट्टी के समान है । अभी जिस तरह से गढोगे । वैसा होगा । थोडी चेष्टा करने से श्री सदगुरू देव जी महाराज की तरफ़ चला जायेगा । अभी से मन को श्री सदगुरू देव भगवान में लगाये रखने से दूसरा कोई भाव उसमें प्रवेश नहीं कर पायेगा । श्री सदगुरू देव जी महाराज की श्री चरण-शरण में यदि मन 1 बार पक जाए । तो फ़िर कोई चिन्ता नहीं होगी । मालिक के भाव में खो जाओ । मन को संसार में बिखरने मत दो ।

मन तो सरसों की पोटली के समान है । सरसों की पोटली खुलकर सरसों बिखर जाने पर उसे समेटने जैसा कठिन है । उमृ हो जाने पर मन जब संसार में बिखर जायेगा । तब उसे समेटकर ईश्वर चिन्तन में लगाना भी वैसा ही कठिन है । इसलिये तुम लोगों से कहता हूं कि बिखर जाने से पहले मन को गढ डालो । श्री सदगुरू देव जी महाराज के भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान । चिन्तन । मनन रूपी खूंटे से बंध जाओ । यदि ऐसा न किया । तो उमृ अधिक हो जायेगी । और मन संसार में बिखर जायेगा । तब सच्चिदानन्द में मन को लगाने के लिये काफ़ी मेहनत करनी पडेगी । 26 से 30 वर्ष तक जो करना है । कर ही लेना चाहिये ।
अभी शरीर मन सतेज है । इस समय एक उद्देश्य निश्चित कर परिश्रम करना होगा । इस उमृ में मन में जो छाप पक्की होगी । वही सारे जीवन भर सम्बल होकर रहेगी । अभी से लग जाओ । ईश्वर लाभ ही एकमात्र जीवन का उद्देश्य है । श्री सदगुरू देव जी महाराज की आरती । पूजा । सेवा । भजन । सुमिरन । दर्शन । ध्यान । चिन्तन । मनन ही जीवन का उद्देश्य है । यह निश्चित कर सको । उसमें मन को ठीक - ठीक लगा सको । तो फ़िर तुम्हारा जीवन इतने सुन्दर रूप से गठित हो जायेगा कि संसार का दुख, कष्ट या अशान्ति किसी भी प्रकार तुम्हारा स्पर्श न कर सकेगी । बस आनन्द ही आनन्द रह जायेगा । आप अपार आनन्द के अधिकारी हो जाओगे ।


मन को संसार से समेट कर मालिक के भजन । ध्यान । दर्शन । सेवा । पूजा । चिन्तन । मनन में लगा देने से जीवन में सदा आनन्द ही आनन्द रहता है ।
53 प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! नाम जपना क्या जरूरी है ?
उत्तर - हां । अत्यन्त जरूरी है । श्री सदगुरू देव जी महाराज द्वारा प्राप्त गुरू मंत्र । गुरू नाम जपने से कल्याण । सुख समृद्धि मिलती है । नाम । नाम । नाम । केवल नाम का जाप करो । खूब कर्म करो । और नाम जपो । सब कर्मों के भीतर श्री सदगुरू देव जी महाराज का नाम जपो । तब तो सही है । श्री सदगुरू देव भगवान का नाम रूपी पहिया सब कर्मों के बीच चले । तब तो होगा । करके देखो । एक दम सारे ताप शान्त हो जायेंगे । कितने ही महा पातकी इस नाम का आश्रय ले श्री सदगुरू देव जी महाराज का नाम । भजन । ध्यान । दान । सेवा । पूजा । दर्शन । सुमिरन । चिन्तन करके शुद्ध मुक्त आत्मा हो गये ।
श्री सदगुरू स्वामी जी के ऊपर खूब विश्वास करो । दृढ विश्वास करो । नाम और नामी को 1 कर डालो । श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज का नाम जपने वाले भक्त श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्रीकमलवत चरणों में निवास करते हैं ।
श्री सदगुरू स्वामी जी महाराज को खूब पुकारते रहो । श्रद्धा भाव से निर्जन में अकेले में बैठकर उन्हें प्यार से पुकारते रहना चाहिये । और बीच - बीच में प्रार्थना करो कि मुझ पर कृपा करें । श्री सदगुरू देव जी महाराज मुझे

श्रद्धा । भक्ति दें । इतनी गहरी आन्तरिकता से पुकारो कि आंसुओं की धार बहने लगे । मन और मुख 1 करना होगा ।
संसार की सभी वस्तुओं को गुरूमय देखना । सोचना । मेरे श्री सदगुरू देव जी महाराज सर्व भूतों में, कण -कण में विराजमान है । ऐसा करते ही तृणदपि सुनीच’ हो जाओगे । सबके पास बैठना । पर सुनना केवल श्री सदगुरू देव जी महाराज की कथा । गुणगान करना । श्री सदगुरू देव जी महाराज का । यह जानना कि जिस स्थान में श्री सदगुरू देव जी महाराज का भजन । सुमिरन । सेवा । पूजा । दर्शन । ध्यान । श्री सदगुरू देव जी महाराज की महिमा का वर्णन नहीं होता । वह स्थान शमशान के समान है । श्री सदगुरू भगवान के नाम-सुमिरन से । भजन । कीर्तन । सेवा ।


पूजा । दर्शन । ध्यान से । उनके गुणगान के प्रताप से शमशान तक के भूत भाग जाते हैं । भजन । सुमिरन । ध्यान । सेवा से भूतों का डेरा भी तप:स्थली बन जाता है ।
श्री सदगुरू देव जी महाराज का नाम जपो । श्री सदगुरू भगवान को श्रद्धा भाव से । आर्त भाव से पुकारो । श्री सदगुरू स्वामी जी तो अपने ही है । सच्चे साथी और जीवों के हितैषी एकमात्र श्री स्वामी जी का ही हैं । प्रभु दर्शन क्यों नहीं देंगें ? श्री सदगुरू स्वामी जी को सब कुछ करबद्ध होकर बतलाओ । प्रभु सही रास्ता दिखा देंगे । जिद करनी है । तो प्रभु से करो । वे सब पूर्ण कर देंगे ।
दीक्षा और क्या है ? श्री सदगुरू देव जी महाराज के श्री मुख से मिला हुआ गुरू मंत्र ही दीक्षा है । इस मंत्र को नाम कहते हैं । और सदगुरू यानी नाम रूपी मंत्र देने वाले । श्री सदगुरू देव जी महाराज ही नामी हैं । इसी नाम को रूचि 


पूर्वक विश्वास रख कर जपने से ही कल्याण होगा । केवल दीक्षा ले लेने से नहीं बनेगा । ध्यान-धारणा करनी होगी । दर्शन । ध्यान । सेवा । पूजा । सुमिरन । भजन करते हुए प्रभु को ह्रदय से पुकारना होगा ।
पहले अवस्था से लेकर । अन्तिम अवस्था तक । प्रार्थना करना अच्छा है । श्री सदगुरू देव जी महाराज की महिमा का स्मरण । और उनकी सेवा । दर्शन । ध्यान । चिन्तन । मनन । निरन्तर करते रहना चाहिये । चाहे हजारों काम रहें । प्रतिदिन दोनों समय । श्री सदगुरू देव जी महाराज का स्मरण । मनन । चिन्तन । भजन । ध्यान । सेवा । पूजा । दर्शन और आरती करना चाहिये । भोग लगाना चाहिये । प्रसाद ग्रहण करना चाहिये । यह सब करना । कभी भी भूलना नहीं चाहिये । शरीर मन को निर्मल और निष्पाप करने के लिये सदगुरू - नाम के जप । ध्यान । भजन । दर्शन । सुमिरन । चिन्तन छोड दूसरा कोई उपाय नहीं है । इसलिये श्री सदगुरू देव जी महाराज को अपना बना डालो । उन्हीं के हो जाओ । नाम जो नहीं जपेगा । वह व्यर्थ कर्मों में भटकेगा । नाम ही जगत में सार है ।
54  प्रश्न - श्री स्वामी जी महाराज ! 24 घण्टे में कितना समय - ध्यान करना उचित है । और कितना समय पूजा पाठ में लगाना चाहिये ।
उत्तर - भजन - ध्यान । दर्शन । पूजन में सेवा में जितना समय लगाया जा सके । उतना ही कल्याण होगा । जो लोग केवल साधन-भजन लेकर रहना चाहते हैं । उन्हें कम से कम 15-16 घण्टे जप - ध्यान करना चाहिये । अभ्यास के साथ समय और भी बढ जाएगा । मन जितना भीतर की ओर जाएगा । उतना ही आनन्द पाओगे । साधना - भजन में 1 बार आनन्द मिलने से किसी भी दशा में उसे फ़िर छोडने की इच्छा नहीं होगा । तब कितने समय तक क्या करना होगा ? इस प्रश्न की 


मीमांसा मन स्वयं ही कर देगा । जब तक मन की ऐसी अवस्था न हो । तब तक इसका विशेष प्रयत्न करना कि 24 घण्टे में कम से कम दो तिहाई समय जप, ध्यान में कटे । शेष समय में सदग्रन्थ का पाठ करना । और इसका चिन्तन करना कि जप ध्यान के समय मन में कितने प्रकार के विचार उठते हैं ? मन कितना स्थिर होता है आदि । सिर्फ़ आंख -कान बन्द कर 1 - 1 घण्टा जप - ध्यान करने से ही सब नहीं हो जाता । श्री सदगुरू देव जी महाराज के दर्शन और सेवा भी आवश्यक है । इस प्रकार चिन्तन करने पर मन की अवस्था अच्छी तरह से समझ में आ जाती है । और मन में जो सब बुलबुले उठते हैं । उन्हें त्याग देने की चेष्टा की जा सकती है । इस प्रकार क्रमश: मन शान्त अवस्था में आ जाता है । तभी ठीक - ठीक भजन  ध्यान होगा । जप । ध्यान । दर्शन । सेवा । पूजा का उद्देश्य मन को शान्त करना होता है । ध्यान । सुमिरन । चिन्तन करके भी मन शान्त न हो । आनन्द न मिले । तो समझना होगा कि सुमिरन - ध्यान ठीक नहीं हो रहा है ।
***************
- ये शिष्य जिज्ञासा से सम्बन्धित प्रश्नोत्तरी श्री राजू मल्होत्रा द्वारा भेजी गयी है । आपका बहुत बहुत आभार ।
एक टिप्पणी भेजें