31 मार्च 2011

हमारे नये साधक । बाबा रामबहादुर

बाबा रामबहादुर जी
बाबा रामबहादुर बचपन से ही बाल बृह्मचारी हैं । और अच्छा खासा शरीर अच्छा खासा संपन्न परिवार होने के बाद भी बाबाजी ने शादी नहीं की । बचपन से ही बाबाजी को लगता था कि वह कुछ अलग बात है ? जिसके लिये वह संसार में आये हैं । बाबाजी को अंतर्प्रेरणा सी होती थी कि ब्याह शादी करके संतान आदि का पालन पोषण करते हुये सफ़ल या असफ़ल जिन्दगी गुजारना ही मानव जीवन का लक्ष्य नहीं है । बल्कि ये मनुष्य जीवन किसी बहुत ऊँचे लक्ष्य की प्राप्ति के लिये है ??
पर वो लक्ष्य है क्या ? ये बाबाजी समझ नहीं पाते ?? अतः बाबाजी अपने इस प्रश्न के सही उत्तर की प्राप्ति हेतु जगह जगह भटकने लगे । पर कोई भी साधु महात्मा उनको सन्तुष्ट करने वाला उत्तर नहीं दे पाता । अपनी इस बैचेनी के चलते बाबाजी ने भारत के कई स्थानों का भृमण किया । पर तलाश पूरी नहीं हुयी ।
उस पर एक विचित्र बात ये होती थी कि बाबाजी कुछ अपने मन से कुछ सुने सुनाये आधार पर ध्यान पर बैठते थे । और उन्हें विचित्र विचित्र अनुभव होते थे । पर बाबाजी उन अनुभवों का कोई सही मतलब नहीं समझ पाते थे ।
तब लोगों ने कहा - बाबाजी बिना गुरु के बात नहीं बनेगी । आप कोई सच्चा सन्त तलाश करके पहले उससे अपनी सभी जिग्यासाओं का समाधान पायें । फ़िर उसे गुरु बनायें । कहा है न । पानी पियो छान के । गुरु करो जान के ।
बाबा रामबहादुर जी श्री निर्मल बंसल के साथ

बाबाजी को ये बात उचित भी लगती । पर एक बङा प्रश्न यही था कि सच्चे सन्त की तलाश कहाँ और कैसे की जाय ? वो इतनी जगह घूमे फ़िरे । साधु महात्माओं की संगति की । पर बात कुछ समझ में नहीं आयी ।
तभी लगभग 6 महीने पहले एक शिष्य के बुलाबे पर श्री महाराज जी सदगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज परमहँस इनके गाँव पहुँचे । और बाबा रामबहादुर ने भी उनसे मुलाकात की । प्रश्न उत्तर का सिलसिला आरम्भ हो गया । और कुछ ही देर में रामबहादुर बाबा के मन में वर्षों से घूमते प्रश्न खत्म होने लगे । यहाँ तक कि कुछ ही घन्टों में बाबा रामबहादुर की समझ में ही नहीं आया कि अब क्या प्रश्न पूछें ।
तब लगभग 40 वर्षों से भटकते बाबा रामबहादुर ने समर्पण कर दिया । और विनती की - बहुत भटक लिया । महाराज जी ! अब इस बालक को अपनी शरण में लें । और सत्य शाश्वत ग्यान देने की कृपा करें ।
आज से मैं आपका शिष्य हो गया । आपके चरणों का दास हो गया । अब आप कब स्वीकार करते हो । ये आपकी दया है प्रभु ।
कुछ समय के सतसंग के बाद महाराज जी ने उन्हें मंडल में शामिल करते हुये ढाई अक्षर के महामन्त्र की दीक्षा दी । बाबा रामबहादुर जी जिला मैंनपुरी के किशनी के बसैत के पास नगला रमू में एक मन्दिर पर रहते हैं ।

30 मार्च 2011

मैंने सुना है कि इच्छाधारी नाग होते हैं ??

राजीव बेटा ! 1 बात पूछना मैं भूल गया । ज़रा वो भी बता देना । मैंने सुना है कि इच्छाधारी नाग होते हैं । लोग कहते हैं कि जो नाग 100 साल की उमर पूरी कर लेता है । वो इच्छाधारी हो जाता है । वो कोई भी रूप बदल सकता है । और उसकी उमर बहुत बङ जाती है । यानी हजारों साल की हो जाती है । इसमें कितना सच है ? और कितना झूठ ? इसके बारे में भी ज़रूर बताना । देखो ! अगर तुम नही बताओगे । तो दूसरा कौन छेदीलाल है । जो बताएगा ? इसलिये मेरा कहना मान । और दे दे । मेरे इस सवाल का भी जवाब । क्योंकि शीला की जवानी । हो गयी है पुरानी । लोगो ने निकाल दिया है । उसकी .. ( अत्यन्त गन्दा यौनिक क्रिया का शब्द ) ( हु हु हु हु हु हु हु हु ) ( प्रोफ़ेसर विनोद त्रिपाठी । मध्यप्रदेश । ई मेल से । )

MY ANS - इस अखिल सृष्टि में मनुष्य और 84 लाख योनियों के सामान्य जीव  ( यथा.. पशु पक्षी वृक्ष पहाङ आदि ) को छोङकर बाकी सब योनियाँ अपने स्तर के अनुसार मायावी शक्ति वाली होती  हैं । फ़िर चाहे वह देवता हो । राक्षस । किन्नर । गंधर्व । ऋषि । मुनि । गण । कृत्या । यमदूत । कालदूत । भैरवी शक्तियाँ आदि कोई क्यों न हो । अपनी उपाधि या पद के अनुसार मायावी ताकत रखती हैं ।
जब भी कोई मनुष्य सामान्य से ऊपर उठकर किसी भी साधना से जुङता है । तो फ़िर वह भी विशेष होकर अपनी साधना के बल पर साधना के अनुसार ताकत हासिल कर लेता है । लेकिन किसी भी पशु पक्षी आदि जीव में यह ताकत नहीं होती कि वो किसी प्रकार की मायावी ताकत हासिल कर सके ।
लेकिन यह सत्य है कि इच्छाधारी नाग होते हैं । न सिर्फ़ नाग होते हैं । बल्कि पौराणिक कथाओं के अनुसार भैंसा । बकरा । अजगर । घोङा । गिद्ध । वानर । भालू आदि लगभग समस्त जानवरों में मायावी शक्ति के अनेक उदाहरण मिलते हैं ।
अब सबाल ये है कि ये स्पेशल मायावी जानवर कौन होते हैं ?..वास्तव में ये पथभृष्ट हुये । किसी गलती पर दन्डित होकर निकाले गये । पदच्युत ( बर्खास्त या डिसमिस ) हुये । या डिमोशन हुये विभिन्न प्रकार के देवता होते हैं । इनसे पद तो छिन जाता है । पर अपने तप और पुण्य के बल ( क्योंकि वो तो अभी बाकी है । क्षीण नहीं हुआ । ) से ये इच्छाधारी हो जाते हैं । और हजारों साल की आयु को प्राप्त कर लेते हैं । इस तरह ये स्वतंत्र देवता होते हैं । और अपनी इच्छानुसार कोई भी शरीर ( मगर मायावी या बनाबटी ) जैसे..मनुष्य ..पशु पक्षी आदि धारण कर लेते हैं । और बार बार तरह तरह के शरीर धारण कर सकते हैं । बस पहले जो ये अपनी पद शक्ति का इस्तेमाल कर सत्ता संचालन में अपनी भूमिका निभाते थे । वह खत्म हो जाती है ।
ये सब अफ़वाह है - बाकी जैसी कि हर अलौकिक बात जिसको हम सही से नहीं जानते । उसके साथ कोई न कोई अफ़वाह जुङ जाती है कि कोई नाग 100 वर्ष की आयु पूरी कर ले । तो इच्छाधारी हो जाता है । हो सकता है कि कभी किसी ने नाग से मनुष्य बनते किसी इच्छाधारी को देखा हो । और तमाम तरह की मनगढन्त कहानियों का जन्म हुआ हो । रही सही कसर बाद में फ़िल्म वाले फ़िल्म बनाकर पूरी कर देते हैं । और झूठ सच बन जाता है ।

28 मार्च 2011

अपना होय तो दियो बतायी । कबीर साहब और धर्मदास

पागल बाबा खन्ना पंजाब में
सदगुरु कबीर साहब के शिष्य धनी धर्मदास जी का जन्म बहुत ही धनी वैश्य परिवार में हुआ था । बाद में कबीर साहब की शरण में आकर उनसे परमात्म ग्यान लेकर धर्मदास ने अपना जीवन सार्थक और परिपूर्ण किया । इस तरह उन्हें धर्मदास की जगह धनी धर्मदास कहा जाने लगा । धर्मदास वैष्णव थे । और ठाकुर पूजा किया करते थे । अपनी मूर्तिपूजा के इसी कृम में धर्मदास मथुरा आये । जहाँ उनकी भेंट कबीर साहब से हुयी । धर्मदास जी दयालु व्यवहारी और पवित्र जीवन जीने वाले इंसान थे । अत्यधिक धन संपत्ति के बाद भी अहंकार उन्हें छूआ तक नहीं था । वे अपने हाथों से स्वयँ भोजन बनाते थे । और पवित्रता के लिहाज से जलावन लकङी को इस्तेमाल करने से पहले धोया करते थे । एक बार इसी समय में जब वह मथुरा में भोजन तैयार कर रहे थे । उसी समय कबीर साहब से उनकी भेंट हुयी । उन्होंने देखा कि भोजन बनाने के लिये जो लकङियाँ चूल्हे में जल रही थीं । उसमें से ढेरों चीटिंयाँ निकलकर बाहर आ रही थी । धर्मदास ने जल्दी से शेष लकङियों को बाहर निकालकर चीटिंयों को जलने से बचाया । उन्हें वहुत दुख हुआ । वे अत्यन्त व्याकुल हो उठे । लकङियों में जलकर मर गयी चीटियों के प्रति उनके मन में बेहद पश्चाताप हुआ । वे सोचने लगे । आज मुझसे महापाप हुआ है । अपने इसी दुख की वजह से उन्होंने भोजन भी नहीं खाया । उन्होंने सोचा कि जिस भोजन के बनने में इतनी चीटियाँ जलकर मर गयी हों । उसे कैसे खा सकता हूँ । उनके हिसाब से वह दूषित भोजन खाने योग्य नहीं था । अतः वह भोजन उन्होंने किसी दीन हीन साधु महात्मा आदि को कराने का विचार किया । अतः वो भोजन लेकर बाहर आये । तो उन्होंने देखा । कबीर साहब एक घने शीतल वृक्ष की छाया में बैठे हुये थे ।
धर्मदास ने उनसे भोजन के लिये निवेदन किया ।
इस पर कबीर साहब ने कहा । हे सेठ धर्मदास ! जिस भोजन को बनाते समय हजारों चींटियाँ जलकर मर गयीं । उस भोजन को मुझे कराकर ये पाप तुम मेरे ऊपर क्यों लादना चाहते हो । तुम तो रोज ही ठाकुर जी की पूजा करते हो । फ़िर उन्हीं भगवान से क्यों नहीं पूछ लिया था कि इन लकङियों के अन्दर क्या है ?
धर्मदास को बेहद आश्चर्य हुआ कि इस साधु को ये सब बात कैसे पता चली । उस समय तो धनी धर्मदास के आश्चर्य का ठिकाना न रहा । जब कबीर साहब ने वे चीटिंया भोजन से जिंदा निकलते हुये दिखायीं । इस रहस्य को वे समझ न सके ।
उन्होने दुखी होकर कहा । हे बाबा ! यदि मैं भगवान से इस बारे में पूछ सकता । तो मुझसे इतना बङा पाप क्यों होता ।
धर्मदास को पाप के महाशोक में डूबा देखकर कबीर साहब ने अध्यात्म ग्यान के गूढ रहस्य बताये । जब धनी धर्मदास ने उनका परिचय पूछा । तो कबीर साहब ने अपना नाम सदगुरु कबीर साहब और निवासी अमरलोक ( सत्यलोक ) बताया । इसके कुछ देर बाद कबीर साहब अंतर्ध्यान हो गये ।
धर्मदास जी को जब कबीर साहब बहुत दिनों तक नहीं मिले । तो वो व्याकुल होकर जगह जगह उन्हें खोजते फ़िरे ।  और उनकी स्थिति पागल समान हो गयी । तब उनकी पत्नी ने सुझाव दिया ।
तुम ये क्या कर रहे हो ? उन्हें खोजना बहुत आसान है जैसे कि चींटी चींटा गुङ को खोजते हुये खुद ही आ जाते हैं ।
धर्मदास ने कहा - क्या मतलब ??
उनकी पत्नी ने कहा - खूब भन्डारे कराओ । दान दो । हजारों साधु अपने आप आयेंगे । जब वह साधु तुम्हें दिखे । तो उसे पहचान लेना ।

ये मनुष्य और सभी जीव इसी तरह कालपुरुष की कैद में हैं ।

धर्मदास को बात उचित लगी । और वे ऐसा ही करने लगे । उन्होंने अपनी सारी संपत्ति खर्च कर दी । पर वह साधु ( कबीर साहब ) नहीं मिला ।
बहुत समय भटकने के बाद उन्हें कबीर साहब काशी में मिले । परन्तु उस समय वे वैष्णव वेश में थे । फ़िर भी धर्मदास ने उन्हें पहचान लिया । और उनके चरणों में गिर पङे ।
और बोले - हे सदगुरु महाराज मुझ पर कृपा करें । और मुझे अपनी शरण में लें । हे गुरुदेव मुझ पर प्रसन्न हों । मैं उसी समय से आपको खोज रहा हूँ । आज आपके दर्शन हुये हैं ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास तुम मुझे कहाँ खोज रहे थे । तुम तो चींटी चींटो को खोज रहे थे । सो वे तुम्हारे भन्डारे में आये । ( इस पर धर्मदास को अपनी मूर्खता पर बङा पश्चाताप हुआ..तब उसे प्रायश्चित भावना में देखकर कबीर साहब ने फ़िर कहा )
 लेकिन तुम बहुत भागयशाली हो । जो तुमने मुझे पहचान लिया । अब तुम धैर्य धारण करो । मैं तुम्हें जीवन के आवागमन से मुक्त कराने वाला मोक्ष ग्यान दूँगा ।
इसके बाद धर्मदास निवेदन करके कबीर साहब को अपने साथ बाँधोगढ ले आये ।
इसके बाद तो बाँधोगढ में कबीर साहब के श्रीमुख से आलौकिक आत्मग्यान सतसंग की अविरल धारा ही बहने लगी । दूर दूर से लोग सतसंग सुनने आने लगे । धर्मदास और उनकी पत्नी आमिन ने महामंत्र की दीक्षा ली । बाँधोगढ के नरेश भी कबीर साहब के सतसंग में आने लगे । और बाद में दीक्षा लेकर वे भी कबीर साहब के शिष्य बने ।
यहाँ कबीर साहब ने बहुत से उपदेश दिये । जिन्हें उनके शिष्यों ने बाँधोगढ नरेश और धनी धर्मदास के आदेश पर संकलित कर गृंथ का रूप दिया ।
विशेष -- जब भी किसी सच्चे सन्त का प्राकटय होता है तो कालपुरुष भयभीत हो जाता है कि अब ये जीवों को मोक्ष ग्यान देकर उनका उद्धार कर देगा । इससे हरसंभव बचाव के लिये वो अपने कालदूत वहाँ भेज देता है । धर्मदास का पुत्र नारायण दास जो कालदूत था । कबीर साहब का बहुत विरोध करता था । लेकिन उसकी एक भी नहीं चली । खुद कबीर साहब के पुत्र के रूप में कमाल कालदूत था । वह भी कबीर का बहुत विरोध करता था ।
बाद में..कबीर साहब ने धर्मदास को सुयोग्य शिष्य जानते हुये मोक्ष का अनमोल ग्यान दिया । और साथ ही ये ताकीद भी की ।
धर्मा तोहे लाख दुहाई । सार शब्द बाहिर नहीं जाई ।
इस पर धर्मदास ने कहा ।
सार शब्द बाहिर नहीं जाई । तो हँसा लोक को कैसे जाई ।
तब कबीर साहिब ने कहा - अपना होय तो दियो बतायी ।

26 मार्च 2011

भ्रुम जो सत्य लगता है ।

काले सफ़ेद बिंदु बतायें ?
कौण सा पहिया तेज चाले है ?
ये चित्र कुछ कहता है । मगर क्या ?

18 मार्च 2011

हत्थाजोडी सिद्ध करने के तरीके

हत्थाजोड़ी - हत्थाजोड़ी 1 प्राकृतिक वनस्पति है । जो कि मध्यप्रदेश के कुछ भागों में स्वतः उत्पन्न होती है । वस्तुतः यह उस वनस्पति की जड़ होती है । जिसका आकार मानव हाथ के पंजो जैसा होता है । और देखने पर ऐसा प्रतीत होता है । जैसे कि कोई मानव हाथ मुट्ठी बांधे हुए हो । मध्यप्रदेश की वनवासी जातियां अक्सर इसे बेचती हुयी दिख जाती हैं । हत्थाजोड़ी बहुत ही शक्तिशाली व प्रभावकारी वस्तु है ? यह -
मुकदमा । शत्रु संघर्ष । दरिद्रता आदि के निवारण में बहुत प्रभावी है । इसके जैसी चमत्कारी वस्तु आज तक देखने में नही आई ?   इसमें वशीकरण को भी अदभुत शक्ति है । भूत प्रेत आदि का भय नही रहता । यदि इसे तांत्रिक विधि से सिद्ध कर दिया जाए । तो साधक निश्चित रूप से चामुण्डा देवी का कृपा पात्र हो जाता है । यह जिसके पास होती है । उसे हर कार्य में सफलता मिलती है । धन संपत्ति देने वाली यह बहुत चमत्कारी साबित हुई है । तांत्रिक वस्तुओं में यह महत्वपूर्ण है । हत्थाजोड़ी में अदभुत प्रभाव निहित रहता है । यह साक्षात चामुंडा देवी का प्रतिरूप है ? यह जिसके पास भी होगी । वह अदभुत रुप से प्रभावशाली होगा । सम्मोहन, वशीकरण, अनुकूलन, सुरक्षा में अत्यंत गुणकारी होता है - हत्थाजोड़ी । हमारे तंत्र शास्त्र तथा तन्त्र का प्रयोग करने वालो के लिये 1 महत्वपूर्ण वनौषधि के नाम से जानी जाती है । इसके पत्ते हरे रंग के होते हैं । साथ ही यह भी देखा जाता है । इन पत्तों के नीचे के हिस्से मे सफ़ेद रंग की परत होती है । और इस सफ़ेद हिस्से पर बाल जैसे मुलायम रोंये होते हैं । इसके ऊपर गुलाब की तरह का फ़ूल आता है । कहीं कहीं पर फ़ूल में नीला रंग भी दिखाई देता है । यह प्राय: पंसारियों के पास या राशि रत्न बेचने वालों के पास से प्राप्त की जा सकती है । इसे तांत्रिक सामान बेचने वाले भी अपने पास रखते हैं ।
1 हत्थाजोडी को करजोडी हस्ताजूडी के नाम से भी जाना जाता है । 
2 उर्दू में इसे बखूर इ मरियम कहा जाता है । 
3 ईरान में इसे चबुक उशनान के नाम से जाना जाता है । 
4 लैटिन में इसे सायक्लेमेन परसीकम कहा जाता है ।
इसकी उपज किसी भी पेड की छाया में तथा नम जमीन में होती है । इसकी जड गोल होती है । और रंग काला होता है । इसी जड में हत्था जोडी बनती है । यदि आप खूब मेहनत और लगन से काम करके धनोपार्जन करते हैं । फिर भी आपको आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है । तो आपको अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए इससे सम्बंधित उपाय करने चाहिए । इसके लिए किसी भी शनिवार अथवा मंगलवार के दिन हत्था जोड़ी घर लाएं । इसे लाल रंग के कपड़े में बांधकर घर में किसी सुरक्षित स्थान में अथवा तिजोरी में रख दें । इससे आय में वृद्घि होगी । एवं धन का व्यय कम होगा ।    तिजोरी में सिन्दूर युक्त हत्थाजोड़ी रखने से आर्थिक लाभ में वृद्धि होने लगती है.
हत्थाजोड़ी के कुछ प्रयोग - 
1 प्रसव की सुगमता के लिये ग्रामीण इलाकों में इसे चन्दन के साथ घिसकर प्रसूता की नाभि पर चुपड देते हैं । इससे बच्चा आराम से हो जाता है ।
2 गर्भपात करवाने के लिये भी इसे प्रयोग मे लाया जाता है । लेकिन इसके आगे के लक्षण बहुत खराब होते हैं । जैसे हिस्टीरिया का मरीज हो जाना । 
3 जब कभी पेशाब रुक जाती है । तो इसे पानी के साथ घिसकर पेडू पर लगाने से पेशाब खुल जाता है ।
4 पेट मे कब्ज रहने पर इसको पानी के साथ घिसकर पेट पर चुपडने से कब्जी दूर होने लगती है ।
5 मासिक धर्म के लिये इसके चूर्ण की पोटली बनाकर योनि में रखने से शुद्ध और साफ़ मासिक धर्म होने लगता है । लेकिन इस कार्य के लिये किसी योग्य डाक्टर या वैद्य की सहायता लेनी जरूरी होती है ।
6 हत्थाजोडी का चूर्ण पीलिया के बहुत उपयोगी है । पीलिया के मरीज को हत्थाजोडी के चूर्ण को शहद के साथ चटाने से लाभ मिलता है । लेकिन इसका चूर्ण शहद के साथ खिलाने के बाद रोगी को कपडा ओढ़ा देना जरूरी होता है । जिससे पीलिया का पानी पसीने के रूप में निकलने लगेगा । कुछ समय बाद पसीने को तौलिया से साफ़ कर लेना चाहिये । इससे यह समूल रोग नष्ट करने मे सहायक होती है.
7 पारा शोधन की प्रक्रिया में भी हत्थाजोडी को प्रयोग मे लाते हैं । हत्थाजोडी के चूर्ण को पारे के साथ खरल करते हैं । धीरे धीरे पारा बंधने लगता है । मनचाही शक्ल मे पारे को बनाकर गलगल नीबू के रस मे रख दिया जाता है । कुछ समय मे पारा कठोर हो जाता है । लेकिन पारा और हत्थाजोडी असली हो । तभी यह सम्भव है । अन्यथा कुछ हासिल नहीं होता
8 हत्थाजोडी को सिन्दूर में लगाकर दाहिनी भुजा में बांधने से कहा जाता है कि वशीकरण होता है । 
9 बिल्ली की आंवर/जेर हत्थाजोडी और सियारसिंगी को सिन्दूर में मिलाकर 1 साथ रखने से कहा जाता है कि भाग्य मे उन्नति होती है । 
10 यदि बच्चा रोता अधिक है । और जल्दी जल्दी बीमार हो जाता है । तो शाम के समय, हत्थाजोडी के साथ रखे लौंग इलायची को लेकर धूप देना चाहिए । स्वाहा । यह क्रिया शनिवार के दिन अधिक लाभकारी होती है ।
11 किसी भी व्यक्ति से वार्ता करने में साथ रखें । तो वो बात मानेगा ।
12 जिसको भी वश में करना हो । उसका नाम लेकर जाप करें । तो इसके प्रभाव से वह व्यक्ति वशीभूत होगा ।
13 त्रि-धातु के तावीज में गले में धारण करने से बलशाली से बलशाली व्यक्ति भी डरता है । सभी कार्यों में निरंतर निर्भय होता है ।
14 प्रयोग के बाद चांदी की डिबिया में सिन्दूर के साथ ही तिजोरी में रख दें ।
हत्थाजोडी को सिद्ध करने के तरीके -
1 - क्क हत्थाजोडी मम सर्वकार्य सिद्ध कुरू कुरू स्वाहाः । 
मंत्र से पीपल के पते पर अपना नाम लिखकर हत्थाजोड़ी को पत्ते पर रखें । रुद्राक्ष माला से रोजाना 3 माला 5 दिन तक जाप करें । इसे सिद्ध अभिमंत्रित होने पर पूजास्थल पर रखें । साधक के सभी कार्य करने हेतु जागृत हो जाती है ।

13 मार्च 2011

पिछली गुरु पूर्णिमा 2

परमपूज्य सतगुरुदेव श्री शिवानन्द जी महाराज 
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पिछली गुरु पूर्णिमा को मैंने एक डिजिटल कैमरा तैयार कर लिया था । पर एन वक्त पर वह कैमरा एक परिचित अपने गाँव जाने तथा वहाँ के दृश्यों को लाने हेतु ले गया । उसे शाम तक वापस लौट आना था । लेकिन इत्तफ़ाकन वह बीमार पङ गया । इस तरह मेरा स्टिल व वीडियोग्राफ़ी का प्रोग्राम फ़ेल हो गया । पर एक बच्चे ने अपने मोबायल फ़ोन से कुछ क्लिप बनाये । व स्टिल फ़ोटोग्राफ़ी की । होनी की बात । उसकी बहन की गलती से लगभग तीस फ़ोटो डिलीट हो गये । लेकिन वीडियो क्लिप किसी तरह बच गये । आज अचानक उनका ध्यान आने पर पोस्ट कर रहा हूँ ।
रिकार्डिंग कर्ता अर्जुन महाराज जी के साथ ।

पिछली गुरु पूर्णिमा

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रिकार्डिंग कर्ता अर्जुन महाराज जी के साथ ।
परमपूज्य सतगुरुदेव श्री शिवानन्द जी महाराज


पिछली गुरु पूर्णिमा को मैंने एक डिजिटल कैमरा तैयार कर लिया था । पर एन वक्त पर वह कैमरा एक परिचित अपने गाँव जाने तथा वहाँ के दृश्यों को लाने हेतु ले गया । उसे शाम तक वापस लौट आना था । लेकिन इत्तफ़ाकन वह बीमार पङ गया । इस तरह मेरा स्टिल व वीडियोग्राफ़ी का प्रोग्राम फ़ेल हो गया । पर एक बच्चे ने अपने मोबायल फ़ोन से कुछ क्लिप बनाये । व स्टिल फ़ोटोग्राफ़ी की । होनी की बात । उसकी बहन की गलती से लगभग तीस फ़ोटो डिलीट हो गये । लेकिन वीडियो क्लिप किसी तरह बच गये । आज अचानक उनका ध्यान आने पर पोस्ट कर रहा हूँ ।

06 मार्च 2011

ध्यान अक्रिया की 1 अवस्था है

शाम्भवी मुद्रा भी क्रिया योग के अंतर्गत आने वाली अति प्रभावशाली क्रिया विधि है । ये मुद्रा आज्ञा चक्र के जागरण में प्रयुक्त होती है । इस क्रिया मुद्रा का कार्य देह के विभिन्न केन्द्रों ( मूलाधार, काम, नेत्र ) की ऊर्जा को आज्ञा चक्र पर केन्द्रित करना है । शाम्भवी मुद्रा के अन्तर्गत योगी आंखों की दोनों पुतलियों से दोनों भौहों के मध्य इंगित करते हैं । दूसरे शब्दों में आंखों की पुतलियों द्वारा भौ मध्य में त्राटक करते हैं । भौ मध्य में ध्यान केन्द्रित करते हैं । इस मुद्रा में आंखे खुली रहती हैं । सतत बिना पुतलियों के हलन चलन के ऊपर देखते रहना होता है ।
शाम्भवी मुद्रा क्रिया 1 जटिल विधि है । प्रारम्भ में साधक को आंखों में दर्द हो सकता है । सर में दर्द हो सकता है । कुछ कठिनाईया अनुभव हो सकती हैं । इस विधि को सुगम किया जा सकता है ।
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शरीर 1 वाहन है - ईसाईयों का 1 संप्रदाय था । जिसके फकीर अपने को दिन रात कोड़े मारते थे । शरीर को कष्ट देने के लिए । क्योंकि शरीर दुश्मन है । यह तो वैसे ही है । जैसे कोई उठकर अपनी कार की पिटाई करने लगे । क्योंकि यह कार मुझे कहीं भी ले जाए जा रही है । कार तुम्हें कैसे कहीं ले जाएगी ? शरीर रथ है । जैसा कि इस उपनिषद में कहा है । 1 कार है । उसमें भीतर बैठकर तुम्हीं चला रहे हो । तो अगर तुम पाप की तरफ जाते हो । तो यह मत सोचना कि शरीर ले जा रहा है । यह बहुत नासमझी की बात है । तुम पाप की तरफ जाना चाहते हो । शरीर तुम्हारे साथ चला जाता है । तुम कार को वेश्यालय की तरफ ले जाते हो । कार वेश्यालय चली जाती है । कार को कोई प्रयोजन नहीं कि तुम कहा जा रहे हो ? कार का काम चलना है । तुम मंदिर ले जाना चाहते हो । कार मंदिर के द्वार पर रुक जाती है । लेकिन जब वेश्यालय के द्वार पर रुकती है । तो तुम उतरकर कार की पिटाई शुरू कर देते हो । तुम नासमझ हो ।
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त्वमेव माता च पिता त्वमेव - कुछ धर्मों ने उस आत्यंतिक सत्ता को माता कहा है । तब फिर पिता कहां है ? ये सबकी सब मानव केंद्रित भावनाएं हैं । मनुष्य परमात्मा की कल्पना सिवाय मानव स्वरूप के नहीं कर सकता । इसलिए वह उसे माता या पिता कहकर पुकारता है । परन्तु जिन्होंने भी जाना है । और जो भी इस मानव केंद्रित अवस्था के पार गए हैं । मनुष्य के भाव के पार गए हैं । वे कहते हैं कि - वह दोनों नहीं है । वह दोनों के पार है । वह दोनों का मिलन है । उस आत्यंतिक में मां और पिता दोनों ही समाविष्ट हो जाते हैं ।
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1 लङकी ने बुजुर्ग से पूछा - प्यार की हकीकत क्या है ? बुजुर्ग ने कहा - जाओ बाग में जो सबसे खूबसूरत फ़ूल हो । उसे ले आओ । लङकी 1 दिन बाद वापस आई । और कहा कि - मैं फ़ूल देखती रही । 1 सबसे खूबसूरत फ़ूल था । मगर मैं उससे बेहतर की तलाश मेँ आगे चल पङी । पर आगे उससे सुन्दर कोई फ़ूल ना था । और जब मैं लौट के आयी । तो उस फ़ूल को कोई और तोड़ चुका था । बुजुर्ग ने कहा - ये ही प्यार की हकीकत है कि जो आपके सामने है । उसकी कदर नही की जाती । और जब वापस लौटो । तो वो चीज हाथ नहीं आती ।
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खेचरी मुद्रा साधना एवं ध्यान - खेचरी मुद्रा साधना क्रिया योग के अंतर्गत आती है । ध्यान अक्रिया की 1 अवस्था है । स्तोत्र तंत्र योग के अंतर्गत आता है । विशेष बात ये है । क्रिया योग और तंत्र योग दोनों की साधना विधियां 1 ही स्थान पर पहुंचा देती हैं । जिसे चित्त की अक्रिया अवस्था अथवा ध्यान अवस्था कहा जाता है । खेचरी मुद्रा के अंतर्गत योगी अपनी जिह्वा ( जीभ ) को उल्टा कर तालू से पीछे हलक की ओर अधिक से अधिक बढ़ाने का अभ्यास करते हैं । तथा तालू से पीछे हलक की ओर जिह्वा को सटाकर आँखें बंद कर बैठ जाते हैं । इस क्रिया में उनको जिह्वा पर ध्यान पूर्वक नियन्त्रण बनाये रखना होता है । क्योंकि जिह्वा अपनी मूल अवस्था में आने का प्रयास करती रहती है । दूसरी ओर तंत्र मार्ग का साधक हो । या ध्यान मार्ग का साधक हो । उनको खेचरी मुद्रा स्वतः गठित होती है । क्योंकि अंततः वह भी ध्यान में प्रवेश करते हैं । लेकिन जो खेचरी मुद्रा घटित होती है । और जो खेचरी मुद्रा की विधि साधी जाती है । उन दोनो में अंतर है । जो स्वतः घटती है । उसमे जिह्वा तालू से स्वतः लग जाती है । और जिह्वा मुढ कर हलक की ओर नहीं खिंचती । साथ ही साधक ध्यान समाधि में प्रवेश कर जाता है । वास्तव में हमारे तालू के मध्य में 1 केन्द्र है । 1 स्रोत है । जैसे ही ऊर्जा उसको भेदती है । वैक्यूम बनता है । और जिह्वा तालू से चिपक जाती है । कबीर उस केन्द्र के लिए ही बोलते हैं - गगन बीच अमृत का कुंआ झरे सदा सुख कारी रे । तालू के मध्य वह स्रोत है । जहाँ से स्राव होता है । 
" ल " वर्णाक्षर नाद का मूलाधार चक्र और खेचरी मुद्रा दोनों से पूरक सम्बन्ध है । जब मैं इस स्तोत्र को टाइप कर रहा था । तब मैंने ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव किया । इसके उच्चारण में त्रुटि न हो । इसको ध्यान में रखकर मैंने इसको सन्धि विच्छेद द्वारा सरल कर दिया है । इसको लय के साथ उच्चारण करने से ही आनन्द की प्राप्ति होती है । तन्त्र शास्त्र के अनुसार कुण्डलनी शक्ति के जागरण और ऊर्ध्व गमन हेतु देवी ललिता त्रिपुर सुन्दरी की तंत्रोक साधना का प्रावधान है । ये स्तोत्र देवी ललिता की उपासना खण्ड से ही लिया गया है । श्री ललिता लकार सतनाम स्तोत्र इसका पूर्ण नाम है । ये स्तोत्र बहुत ही दुर्लभ है । वर्त्तमान काल में इसको खोजकर प्राप्त करना कठिन हैं ।
विधि - सर्वप्रथम इस स्तोत्र का साधक को कण्ठस्थ होना अति आवश्यक है । विधि प्रारम्भ करने से पूर्व इसको कण्ठस्थ कर लें । उच्चारण शुद्ध और लयबद्ध होना चाहिए ।
पहला चरण - सुखासन में बैठकर आँखें बन्द कर लें । पश्चात स्तोत्र का पाठ करें । पाठ करते समय 1-1 शब्द स्वयं श्रवण करते हुए उच्चारण करें । उच्चारण करते समय ध्यान जिह्वा पर सतत बना रहे । आप पायेंगे उच्चारण के समय जीभ बारबार तालू से स्पर्श करती है ।
दूसरा चरण - जिह्वा को ऊपर तालू से लगाकर बैठ जाएं । ध्यान पूर्वक जिह्वा को तालू से लगाये रखें । प्रारम्भ के दिनों में प्रयास से लगाये रखना पड़ेगा । किन्तु विधि जैसे जैसे सक्रिय होगी । जिह्वा का तालू से लगे रहना स्वाभाविक हो जायेगा । दूसरे चरण की अवधि 30 मिनट रहेगी ।
तीसरा चरण - शरीर को ढीला छोड़कर लेट जाएं । अवधि 10 मिनट रहेगी ।
विशेष - पहला चरण दिन में जब भी समय मिले । दुकान पर । आफिस में । बस में । कार में । उसको करें । पहला चरण दिन में कभी भी कितनी भी बार किया जा सकता है । सबसे महत्वपूर्ण पहला चरण है । ऐसा करने से दूसरा चरण जल्दी स्वताः घटेगा । किन्तु दिन में 1 बार पूर्ण विधि करनी आवश्यक है ।
श्री ललिता लकार स्तोत्र -
ललिता लक्ष्मी लोलाक्षी लक्ष्मणा लक्ष्मणार्चिता ।
लक्ष्मण प्राणरक्षणि लाकिनी लक्ष्मण प्रिया ।

लोला लकारा लोमेशा, लोल जिव्हा लज्जावती । 
लक्ष्या लाक्ष्या लक्ष रता लकाराक्षर भूषिता ।
लोल लयात्मिका लीला, लीलावती च लांगली । 
लावण्यामृत सारा च लावण्यामृत दीर्घिका ।
लज्जा लज्जा मती लज्जा, ललना ललन प्रिया ।
लवणा लवली लसा लाक्षकी लुब्धा लालसा ।
लोक माता लोक पूज्या, लोक जननी लोलुपा ।
लोहिता लोहिताक्षी च लिंगाख्या चैव लिंगेशी ।
लिंग गीती लिंग भवा, लिंग माला लिंग प्रिया ।
लिंगाभिधायिनी लिंगा लिंग नाम सदानन्दा ।
लिंगामृत प्रीता लिंगार्चन प्रीता लिंग पूज्या ।

लिंगरूपा लिंगस्था च, लिंगा लिंगन तत्परा ।
लता पूजन रता च लता साधक तुष्टिदा ।
लता पूजक रक्षणी, लता साधन सिद्धिदा ।
लता गृह निवासिनी लता पूज्या लता राध्या । 
लता पुष्पा लता रता लता धारा लता मयी ।
लता स्पर्श संतुष्टा, लता आलिंगन हर्षिता । 
लता विद्या लता सारा लता आचार लता निधि ।
लवंग पुष्प संतुष्टा लवंग लता मध्यस्था ।
लवंग लतिका रूपा लवंग होम संतुष्टा ।
लकाराक्षर पूजिता च लकार वर्णोदभवा ।
लकार वर्ण भूषिता लकार वर्ण रुचिरा ।
लकार बीजोदभवा तथा लकाराक्षर स्थिता ।
लकार बीज नीलया, लकार बीज सर्वस्वा ।
लकार वर्ण सर्वांगी लक्ष्य छेदन तत्परा ।
लक्ष्य धरा लक्ष्य घूर्णा, लक्ष्य जापेन सिद्धिदा ।
लक्ष कोटि रूप धरा लक्ष लीला कला लाक्ष्या ।
लोकपालेन अर्चिता च लाक्षा राम विलेपना ।
लोकातीता लोपा मुद्रा, लज्जा बीज रूपिणी ।
लज्जा हीना लज्जा मयी लोक यात्रा विधयिनी ।
लास्या प्रिया लये करी, लोक लया लम्बोदरी लघिमादि सिद्धि दात्री ।
लावण्य निधि दायिनी, लकार वर्ण ग्रथिता, लं बीजा ललिताम्बिका । 

05 मार्च 2011

वेदव्यास से आज तक किसी भी इंसान ने सत्य को नहीं जाना ??


किसी को टिप्पणी देना अलग बात है । और अध्ययन करना अलग । ये रटी रटाई फ़ालतू बुक्स को प्रवचन देने से किसी का उद्धार नहीं होता । वेदव्यास से आज तक किसी भी इंसान ने सत्य को नहीं जाना ?? और तुम चले एक घन्टे में सत्य बताने ? एक प्रश्न पूछता हूँ । बताओ । आज मैं कब उठा था ? और कब सोने वाला हूँ । उत्तर ई मेल करके देना । vikasa15@rediff.com

kisi ko tippani dena alag baat hai aur addhyan karna alag .ye rati ratai faltu books ko pravachan dene se kisi ka uddhar nahin hota . ved vyas se aaj tak kisi bhi insaan ne satya ko nahin jana . aur tum chale 1 ghante main satya batane . ek prashna poochta hoon . batao aaj main kab utha tha . aur kab sone wala hoon ? uttar email karke dena . vikasa15@rediff.com
** किन्ही ग्यानीजन की ये टिप्पणी " ये जीव कालमाया का कैदी है " पर आयी है । इन्होंने एक प्रश्न भी पूछा है । लेकिन ये टिप्पणी का सही अर्थ ही मैं अग्यानी नहीं समझ सका । तो इनके प्रश्न का उत्तर क्या दूँगा ?
खैर..इसी मुद्दे पर चर्चा । पर कुछ समय बाद । अभी थोङी व्यस्तता है ।

03 मार्च 2011

आप बतायें कि हम किसकी बात पर भरोसा करें ?

हम प्रसाद कुमार सेतिया कानपुर से हैं । हम भी आपका ब्लाग शौक से पढते हैं । बहुत खूब लिखते हैं आप । हम भी आपसे कुछ जानना चाहते हैं । कृपया बताने का कष्ट करें ।
Q 1 पहली बात ये निर्गुण सगुण का असली अर्थ क्या होता है ? कोई कहता है । परमात्मा सगुण हैं । पर कोई कहता है । परमात्मा निर्गुण है । कोई यह भी कह देता है । परमात्मा सगुण और निर्गुण दोनों ही है । आप बतायें कि हम किसकी बात पर भरोसा करें ?
ANS - सत रज तम इन तीन गुणों से सृष्टि में सब बना बिगङी या निर्माण विध्वंस हो रहा है । इन तीन गुणों से युक्त को सगुण कहा जाता है । इस तरह लगभग हरेक कोई ही सगुण है । क्योंकि इन तीन गुणों के बिना सृष्टि के एक तुच्छ प्राणी का भी खेल संभव नहीं है । ये तीन गुण माया के हैं । न कि परमात्मा के । परमात्मा से इन गुणों को चेतन रूपी शक्ति मिलती है । वास्तव में परमात्मा निर्गुण है । और उसमें किसी भी तरह की कोई बात नहीं है ।..लेकिन सगुण परमात्मा का भृम इसलिये फ़ैल गया । क्योंकि साधु महात्माओं ऋषि महर्षि आदि ने अपनी किताबों में राम श्रीकृष्ण शंकर आदि को परमात्मा कह दिया । जबकि ये परमात्मा नहीं उपाधि हैं । अब क्योंकि इनमें गुण थे । अतः अग्यानतावश लोग कहने लगे कि परमात्मा सगुण और निर्गुण दोनों ही है । इसको इस तरह कहना तो ठीक है कि ये गुण परमात्मा के होने से हैं । लेकिन परमात्मा में कोई गुण नहीं है । उदाहरण के लिये बिजली पंखा टीवी फ़्रिज आदि चलाती है । और तीनों अलग अलग तरह का कार्य करते हैं । अब आप विचार करिये कि बिजली में कौन सा गुण है ?
पंखा - बिजली हवा देती है क्या ? फ़्रिज - बिजली चीजों को ठंडा करती है क्या ? टीवी - बिजली चित्र दिखाती है क्या ? लेकिन ये सब चल बिजली से ही रहे है । इसी प्रकार अलग अलग गुण परमात्मा के होने से हैं । पर परमात्मा में बिजली की तरह कोई बात नहीं है ।
Q 2 ये जो मैं आपके सामने बैठा हूँ । ये मेरी फ़िजीकल बाडी है । और प्रसाद कुमार सिर्फ़ इस बाडी का नाम है । जिस दिन ये बाडी खत्म हो जायेगी । तब प्रसाद सेतिया भी खत्म । लेकिन इस बाडी के अन्दर जो आत्मा है । वो कहते हैं कि अमर है । और बार बार जन्म लेती है । तो फ़िर मेरी रियल सेल्फ़ real self क्या है ? क्या मैं ही आत्मा हूँ ?? ( ये सेतिया जी ने किसी बाबाजी से सतसंग में पूछा । )
ANS - आत्मा बारबार जन्म नहीं लेती । आत्मा तो न जीता है । न मरता है । आत्मा के साथ जो ये जीव भाव जुङ गया है । यही जन्म लेता और मरता है । आपका रियल सेल्फ़ तो " आत्मा " ही है । और आप भी अभी ?? आत्मा ही हो । ( इस अभी ? में बङा रहस्य है ? ) लेकिन इसको बिना किसी परदे । बिना किसी भाव भावना की स्थिति में जान लो तब । अभी आप प्रसाद कुमार सेतिया जीव यानी जीवात्मा हो । जब तक आप मोक्ष ग्यान द्वारा स्वयँ को क्रियात्मक स्तर पर नहीं जान लेते । तब तक आप मूल आत्मा से जुङे मगर जीव भाव वाले जीवात्मा हो । न कि सिर्फ़ आत्मा । और जब तक आप इसे नहीं जान लेते । जनम मरण के चक्कर से जूझते हुये सिर्फ़ एक जीवात्मा ही हो । आत्मा को जानना ही मोक्ष है । सिर्फ़ मानना ही नहीं । मान लो । अभी आप गरीब हो । और कोई आपको बताये कि आपके पूर्बजों का काफ़ी धन विदेश में जमा है । जिसके आप वारिस भी हो । तो सिर्फ़ बताने से क्या आप रईस बन गये ? जब तक आप सभी कार्यवाही करके उस धन को प्राप्त नहीं कर लेते । आप सौ साल भी गरीब के गरीब ही रहोगे । यही खेल जीवात्मा आत्मा और फ़िर परमात्मा का भी है ।
Q 3 ये आत्मा अनादि है ??
ANS - जी हाँ । ये आत्मा अनादि ही है । क्योंकि इसका कभी जन्म नहीं हुआ । और न ही कभी आत्मा का जन्म हो सकता है । इसको आप इस तरह समझे कि उदाहरण के लिये समुद्र परमात्मा और उसकी एक बूँद आत्मा । यदि समुद्र से एक बूँद । हजार बूँद । लाख । करोङ । अरब । खरब बूँद निकाली जाय । तो ये उसका जन्म हुआ कि अंश हुआ ?? बूँद में और समुद्र जल में एक सी ही समानता होगी । पर समुद्र के रूप में वह बहुत ताकतवर है । जबकि बूँद के रूप में अल्पशक्ति वाला ।
Q 4 मैंने उन बाबाजी से दो सवाल किये । पहले सवाल का उत्तर उन्होंने दे दिया । कृपया आप बतायें । क्या उनका उत्तर बिलकुल सही था ??
( तब बाबाजी ने पहले संस्कृत का एक श्लोक बोला । जो मेरी समझ में तो नहीं आया । फ़िर उन्होंने उस श्लोक का हिन्दी में ट्रान्सलेसन करते हुये कहा कि हाँ ये सही है । असली स्वरूप तो हम सबका आत्मा ही है । ) ( ये बाबाजी ने सेतिया जी को उत्तर दिया । )
ANS - जाहिर है कि बाबाजी ने सही उत्तर ही दिया । लेकिन इसको इतना उलझाकर बताने की क्या आवश्यकता थी ?? ये उत्तर तो छोटी मोटी धर्म पुस्तकों में भी लिखा है । और इसको समझाना अधिक कठिन और देर वाली बात हरगिज नहीं है ।..बाबाजी ने आपका जो दूसरा प्रश्न टाल दिया । वह भी मामूली प्रश्न था । एक सच्चे सन्त का कर्तव्य यही है कि जब जिग्यासु जनता सामने प्रश्न पूछ रही हो । तो उसका तुरन्त समाधान करे । दिन रात के बहाने नहीं बनाये जाते । सतसंग का मौका गृहस्थ इंसान को मुश्किल से ही मिलता है । सारी..सेतिया जी । लेकिन ये सच्चे सन्त की पहचान नहीं है । जैसा व्यवहार उन्होंने किया ।
Q 5 अगर दूसरा सवाल मैं आपसे करता । तो आप क्या उत्तर देते ?
ANS - आपके दूसरे सवाल का उत्तर मैंने दे दिया है ।
( अगर वो दूसरे सवाल का जबाब दे देते । तो मैं उनसे तीसरा सवाल भी करता । वो तीसरा सवाल ये था )
Q 6 कि आत्मा और परमात्मा का आपस मैं क्या सम्बन्ध है ?? सुनने मैं आता है कि " आत्मा सो परमात्मा " इसका क्या अर्थ है ?? और क्या आत्मा परमात्मा की संतान है ?? तो क्या परमात्मा वाले सारे गुण आत्मा में भी हैं ??
ANS - ऊपर मैंने लिखा कि आत्मा परमात्मा का अंश है । यही उसका सम्बन्ध भी है । जब ये आत्मा सबसे परे होकर अपनी मूल और आदि सृष्टि ( शुरूआत ) से पहले की अनादि स्थिति को प्राप्त हो जाता है । तब यही परमात्मा है । संतान इसको प्रतीकात्मक और भाव रूप में समझाने हेतु कह दिया । परमात्मा कभी शादी नहीं करता । जो उसकी संतान होगी । यहाँ आपके प्रश्न अनुसार आत्मा और परमात्मा दो अलग स्थितियाँ हो जाती हैं । आत्मा जब सभी जीव आदि भावों से अलग हो गया । तब वो हुआ आत्मा । लेकिन जब वह एक ही रह गया । और सब जान गया । तब हुआ । परमात्मा । कहने का मतलब वही । अनादि स्थिति का हो जाना । मतलब परमात्मा । परमात्मा में कोई गुण नहीं होते । कुछ भी नहीं होता ।
Q 7 आपने बृह्मकुमारी नाम की संस्था के बारे में सुना होगा । वो लोग कहते हैं कि आत्मा का स्वरूप बिल्कुल एक दिव्य तारे ?? जैसा है । जैसे कोई अति सूक्ष्म दिव्य चाँदी जैसा प्रकाश । कृपया बतायें । क्या ये बात सही है ?? हमें आपकी उचित प्रतिक्रिया का इन्तजार रहेगा ।
ANS - ये दिव्य तारा ?? क्या और कैसा होता है ? इसी ब्लाग पर एक पाठक ने कहा कि बृह्मकुमारी वाले कहते हैं कि आत्मा को कभी देखा नहीं जा सकता । फ़िर उन्हें कैसे पता कि वो लाल है कि पीली है । अति सूक्ष्म ? दिव्य चाँदी ? दिव्य तारा ? ये सब चीजें क्या होती हैं । अति सूक्ष्म ?? पर विचार करते हुये सोचिये । फ़िर उन्होंने कौन से सूक्ष्मदर्शी से इसको देखा ? ये सब पढी और सुनी हुयी बातें हैं । असली बात कुछ अलग ही है ? आप खुद सोचिये । ? वाचक निशान वाली ये सभी बात आपको अजीव नहीं लग रहीं ??