02 नवंबर 2011

मेरी लगदी किसे ना वेखी टुटदी नूँ जग जाणदा - सोहन

यार राजीव जी ! अब मैं आपसे क्या कहूँ । कहूँ के ना कहूँ । चलो कह ही देता हूँ । यार ! मुझे आपसे प्यार हो गया है । सच कहता हूँ । BY GOD मुझे आपसे प्यार हो गया है । पाठक सोचेंगे । कितनी अजीब बात है । एक शादीशुदा 33 साल के आदमी को प्यार हो गया है । वो भी किसी लङकी । या औरत से नहीं । एक बाबा से । हा हा हा । सच कहती है दुनियाँ - इश्क पे जोर नहीं । कितनी अजीब चीज है । ये प्यार भी किसी से भी हो जाता है । एक साधारण खेतीखङ आदमी । अपने शौक मनोरंजन के लिए मल्टीमिडिया मोबायल रखता है । गाने साने सुनता है । फिर किसी दोस्त से इन्टरनेट के बारे में जानता है । और अपने फोन पर नेट चालू करवाता है । किसलिये वो वाली फिल्में देखने के लिए । आप समझ रहे हैं ना । वो वाली कुछ दिन देखता है । चैट सैट भी कर लेता है । पर कुछ ही दिनो में मन भर जाता है । पूरा आस्तिक है ।
भगवान को दिल से मानता है । यानि परमात्मा पर पूर्ण विश्वास । लेकिन मूर्ति पूजा । जोत जलाना । अगरबत्ती

जलाना । मंदिर मे माथा टेकना । पता नहीं क्यो ? उसे बचपन से ही अच्छा नहीं लगता । सतसंग में जाता है । और सतसंग बङी लगन से सुनता है ।
सतसंग में आत्मज्ञान का जिक्र आता है । कुछ लोगों से आत्मज्ञान के बारे में पूछता है । पर सन्तुष्ट नहीं होता । नेट याद आता है । और गूगल में आत्मज्ञान सर्च करता है । और राजीव बाबा का पूरा ब्लाग सामने आता है । बङी उत्सुकता से सारे ब्लाग का एक एक लेख बङी गौर से पढता है  । ब्लाग पढकर ऐसा लगता है । जैसे हर शब्द बस उसी के लिये लिखा गया हो । ब्लाग में लिखी हर बात ऐसे फिट बैठती है । जैसे ढिबरी में बोल्ट फिट होता है । अब ये मत कहना कि आपको ढिबरी और बोल्ट का पता नहीं है ।
तो सर जी ! मार्च 2010 से लेकर अक्टूबर 2011 तक ऐसा कोई लेख नहीं । जो मैंने ना पढा हो । अब ये प्यार नहीं तो और क्या है ? पहले ब्लाग से प्यार हुआ । और फिर राजीव बाबा से । इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ । इस प्यार का नाम जुबाँ से नहीं लिया जा सकता - मैं तो प्रेम दिवानी । मेरो दर्द ना जाने कोय । सूली ऊपर सेज पिया की । किस विधि मिलना होय । घायल की गत घायल जाने । जे कोई घायल होय । अब तो ये आलम है कि पँख लग जायें । और उङकर राजीव बाबा के पास पहुँच जाऊँ । पर क्या करूँ । गरीब गृहस्थ आदमी हूँ । कुछ मजबूरियाँ है । कुछ जिम्मेवारियाँ है । लेकिन किसी ने कहा है कि - लगन अवश्य ही पूरी होती है ।
मेरी लगदी किसे ना वेखी टुटदी नूँ जग जाणदा । और किसी ने ये भी कहा है कि - मिलन से अच्छी जुदाई है । क्योकि जुदाई की जो कसक है । जो तङप है । वो प्रियतम को हर वक्त करीब रखती है । आशा है । राजीव बाबा इस लेख की गहराई को आप जरूर समझेंगे । आपका ही - सोहन गोदारा ।
******************
धन्यवाद सोहन जी ! उत्तर इसी लेख में जुङेंगे ।

एक टिप्पणी भेजें