21 अक्तूबर 2011

समाधि का अर्थ 3

1 विदेही - स्व व्यक्ति । जो असंप्रज्ञात समाधि को उपलब्ध हो चुका है । प्रतिक्रिया नहीं करता । वह तो सिर्फ देखता है । साक्षी है । और यही साक्षी होने की अग्रि है । जो अचेतन के सारे बीजों को जला देती है । तब 1 क्षण आता है । जब भूमि पूर्णतया शुद्ध होती है । अंकुरित होने की प्रतीक्षा में कोई बीज नहीं रहता । फिर वापस आने की कोई आवश्यकता नहीं रहती । पहले प्रकृति विलीन होती है । और फिर वह स्वयं को विसर्जित करता है ब्रह्मांड में ।
विदेही और प्रकृतिलय असंप्रज्ञात समाधि को उपलब्ध होते हैं । क्योंकि उन्होंने अपने पिछले जन्म में अपने शरीरों के साथ तादात्म्य बनाना बंद कर दिया था । वे पुनर्जन्म लेते हैं । क्योंकि इच्छा के बीज बचे हुए थे । मैं यहां कुछ पूरा करने को हूं । तुम यहां मेरा हिसाब पूरा करने को हो । तुम यहां सयोगवशांत नहीं हो । संसार में लाखों व्यक्ति हैं । तुम्हीं यहां क्यों हो ? और दूसरा कोई क्यों नहीं है ? कुछ पूरा करना है ।
दूसरे जो असंप्रज्ञात समाधि को उपलब्ध होते हैं । वे श्रद्धा वीर्य ( प्रयत्न ) स्‍मृति एकाग्रता और विवेक द्वारा उपलब्ध होते हैं ।
तो ये 2 संभावनाएं हैं । यदि तुम पिछले जन्म में असंप्रज्ञात समाधि को उपलब्ध हो चुके हो । तो इस जन्म में तुम लगभग बुद्ध की भांति जन्मते हो । कुछ बीज हैं । जिन्हें पूरा करना है । जिन्हें गिराना है । जलाना है । इसीलिए मैं कहता हूं तुम करीब करीब बुद्ध की भांति ही उत्‍पन्‍न होते हो । तुम्हें कोई जरूरत नहीं है कुछ करने की । जो कुछ घटित हो । तुम्हें तो बस देखना है ।
इसीलिए कृष्णमूर्ति निरंतर जोर देते है कि कोई जरूरत नहीं कुछ करने की । उनके लिए यह ठीक है । उनके श्रोताओं के लिए यह ठीक नहीं । उनके श्रोताओं के लिए बहुत कुछ है करने को । और वे भटक जायेंगे इस कथन द्वारा । वे स्वयं के बारे में बोल रहे हैं । वे असंप्रज्ञात बुद्ध ही उत्‍पन्‍न हुए । वे विदेही उत्‍पन्‍न हुए । वे प्रकृतिलय उत्‍पन्‍न हुए ।
जब वे केवल 5 वर्ष के थे । वे स्थान कर रहे थे मद्रास में । अडियार के निकट भारत में । और सबसे महान थिआसाफिस्ट लेडबीटर ने उन्हें देखा । वे बिलकुल ही अलग प्रकार के बच्चे थे । अगर कोई उन पर कीचड़ फेंक रहा होता । तो वे प्रतिक्रिया न करते । बहुत सारे बच्चे खेल रहे थे । अगर कोई उन्हें नदी में धकेल देता । तो वे बस चले जाते । वे क्रोधित न होते । वे लड़ाई शुरू न करते । उनकी बिलकुल अलग गुणवत्ता थी - असंप्रशांत बुद्ध की गुणवत्ता । लेडबीटर ने एनी बीसेंट को बुलाया । इस बच्चे को देखने के लिए । वह कोई साधारण बालक न था । और सारा थिआसाफी आंदोलन उसके चारों ओर घूमने लगा ।
उन्होंने बड़ी आशा की थी कि वह अवतार होगा कि वह इस युग का श्रेष्ठतम गुरु होगा । लेकिन समस्या गहरी थी । उन्होंने सही व्यक्ति को चुन लिया था । किंतु उन्होंने गलत ढंग से आशा की थी । क्योंकि वह व्यक्ति जो असंप्रज्ञात बुद्ध के समान उत्‍पन्‍न होता है । अवतार की भांति सक्रिय नहीं हो सकता । सारी क्रिया समाप्त हो गयी है । वह मात्र देख सकता है । वह 1 साक्षी हो सकता है । उसे बहुत सक्रिय नहीं बनाया जा सकता । वह केवल 1 निष्कियता हो सकता है । उन्होंने सही व्यक्ति चुन लिया था । पर फिर भी वह गलत था ।
और उन्होंने बहुत ज्यादा आशा बांध रखी थी । सारा आंदोलन कृष्णमूर्ति के चारों ओर तेजी से घूमने लगा । जब वे इससे बाहर हो अलग हो गये । तो वे बोले - मैं कुछ नहीं कर सकता । क्योंकि किसी चीज की जरूरत नहीं है । सारा आंदोलन ही विफल हो गया । क्योंकि उन्होंने इस आदमी से बड़ी आशा रखी थी । और फिर सारी बात ने ही पूर्णतया अलग मोड़ ले लिया । किंतु इसकी भविष्यवाणी पहले से ही की जा सकती थी ।
एनी बीसेंट, लेडबीटर और दूसरे । वे बहुत प्यारे व्यक्ति थे । पर वास्तव में पूरब की विधियों के प्रति सजग न थे । उन्होंने पुस्तकों से, शास्त्रों से बहुत कुछ सीख लिया था । किंतु वे ठीक ठीक रहस्य को न जानते थे ? जिसे पतंजलि दर्शा रहे हैं कि 1 असंप्रज्ञात बुद्ध 1 विदेह जन्म लेता है । पर वह सक्रिय नहीं होता । वह 1 निष्कियता होता है । उसके द्वारा बहुत कुछ हो सकता है । पर वह तभी हो सकता है । जब कोई आये । और उसे समर्पण करे । क्योंकि वह 1 निक्रियता है । वह बाध्य नहीं कर सकता । तुम्हें कुछ करने को । वह मौजूद है । लेकिन वह आक्रामक नहीं हो सकता ।
उसका निमंत्रण पूरा है । और सबके लिए है । यह 1 खुला निमंत्रण है । पर वह विशेष रूप से तुम्हें निमंत्रण नहीं भेज सकता । क्योंकि वह सक्रिय हो नहीं सकता । वह 1 खुला द्वार है । अगर तुम्हें पसंद हो । तुम गुजर सकते हो । आखिरी जीवन 1 परम निष्कियता होता है । मात्र साक्षित्व । यह 1 मार्ग है । असंप्रज्ञात बुद्ध जन्म ले सकते हैं । पिछले जन्म की परिस्थिति के परिणामवश ।
किंतु इस जन्म में भी कोई असंप्रज्ञात बुद्ध बन सकता है । उनके लिए पतंजलि कहते हैं - श्रद्धा वीर्य स्मृति समाधि प्रज्ञा । दूसरे हैं जो असंप्रज्ञात समाधि को उपलब्ध होते हैं । श्रद्धा प्रयत्न स्मृति एकात्रता और विवेक द्वारा ?
इसका अनुवाद करना लगभग असंभव है । अत: मैं अनुवाद करने की अपेक्षा व्याख्या करूंगा । तुम्हें अनुभूति देने को ही । क्योंकि शब्द तुम्हें भटका देंगे ।
श्रद्धा ठीक ठीक विश्वास जैसी नहीं होती । यह आस्था की भांति अधिक है । आस्था बहुत ही अलग है विश्वास से । विश्वास वह चीज है । जिसमें तुम जन्मते हो । आस्था वह है । जिसमें तुम विकसित होते हो । हिंदू होना 1 विश्वास है । ईसाई होना विश्वास है । मुसलमान होना विश्वास है । पर यहां मेरे साथ शिष्य होना आस्था है । मैं किसी विश्वास की मांग नहीं कर सकता स्मरण रखना । जीसस भी किसी विश्वास की मांग न कर सकते थे । क्योंकि विश्वास वह है । जिसमें तुम जन्मते भर हो । यहूदी विश्वास से भरे थे । उनमें विश्वास था । और वस्तुत: इसीलिए उन्होंने जीसस को समाप्त कर दिया । क्योंकि उन्होंने सोचा कि वे उन्हें विश्वास से बाहर ला रहे हैं । उनका विश्वास नष्ट कर रहे हैं ।
जीसस आस्था के लिए कह रहे थे । आस्था 1 व्यक्तिगत निकटता है । यह कोई सामाजिक घटना नहीं । तुम इसे अपने प्रत्युत्तर, रेसपान्स द्वारा प्राप्त करते हो । कोई आस्था में उलत्र नहीं हो सकता । पर विश्वास में उत्‍पन्‍न हो सकता है । विश्वास 1 मरी हुई श्रद्धा है । श्रद्धा 1 जीवंत विश्वास है । अत: इस भेद को समझने की कोशिश करना ।
श्रद्धा वह है । जिसमें किसी को विकसित होना है । और यह हमेशा व्यक्तिगत होती है । जीसस के पहले शिष्य श्रद्धा को प्राप्त हुए । वे यहूदी थे - जन्मतः यहूदी । वे अपने विश्वास से बाहर सरक आये थे । यह 1 विद्रोह था । विश्वास 1 अंधविश्वास है । श्रद्धा विद्रोह है । श्रद्धा पहले तुम्हें तुम्हारे विश्वास से दूर ले जाती है । इसे ऐसा होना ही होता है । क्योंकि अगर तुम मुरदा कब्रिस्तान में रह रहे होते हो । तब पहले तुम्हें इससे बाहर आना होता है । केवल तभी तुम्हें फिर जीवन से परिचित कराया जा सकता है । जीसस लोगों को श्रद्धा की ओर लाने का प्रयत्न करते रहे । दिखायी हमेशा यह पड़ेगा कि वे उनका विश्वास नष्ट कर रहे हैं ।
अब जब कोई ईसाई मेरे पास आता है । तब वही स्थिति फिर से दोहरायी जाती है । ईसाईयत 1 विश्वास है । जैसे जीसस के वक्‍त में यहूदी धर्म 1 विश्वास मात्र ही था । जब कोई ईसाई मेरे पास आता है । मुझे उसे फिर उसके विश्‍वास से बाहर लाना होता है । उसे श्रद्धा की ओर बढ़ने में मदद देने को । धर्म विश्वास पर आधारित होते हैं । किंतु धार्मिक होना श्रद्धा में होना है । और धार्मिक होने का अर्थ - ईसाई होना हिंदू होना या मुसलमान होना नहीं है । क्योंकि श्रद्धा का कोई नाम नहीं होता । इस पर लेबल नहीं लगा होता । यह प्रेम की भांति है । क्या प्रेम ईसाई हिंदू या मुसलमान होता है ? विवाह ईसाई, हिंदू या मुसलमान होता है । प्रेम ? प्रेम तो जाति को भेदों को नहीं जानता । प्रेम किन्हीं हिंदुओं या ईसाइयों को नहीं जानता ।
विवाह विश्वास की भांति है । प्रेम है श्रद्धा की भांति । तुम्हें इसमें विकसित होना है । यह 1 साहसिक अभियान है । विश्वास कोई साहस नहीं है । तुम इसी में पैदा हुए हो । यह सुविधाजनक है । अगर तुम आराम और सुविधा को खोज रहे हो । तो बेहतर है विश्वास में ही बने रहो । बने रहो हिंदू या ईसाई । नियमों पर चलो । किंतु यह 1 मुरदा बात बनी रहेगी । जब तक तुम अपने हृदय से उतर न पाओ । जब तक तुम अपनी जिम्मेदारी पर धर्म में प्रवेश न करो । और इसलिए नहीं कि तुम ईसाई पैदा हुए । तुम जन्मजात ईसाई कैसे हो सकते हो ?
धर्म जन्म के साथ कैसे संबद्ध हो सकता है ? जन्म तुम्हें धर्म नहीं दे सकता । यह तुम्हें 1 समाज 1 पंथ 1 सिद्धांत 1 संप्रदाय दे सकता है । यह तुम्हें दे सकता है - अंधविश्वास । यह शब्द अंधविश्वास यानी सुपरस्टिशन बहुत अर्थपूर्ण है । इसका अर्थ है - अनावश्यक विश्वास । सुपर शब्द का अर्थ है - अनावश्यक अतिरिका, सुपरल्‍फुस । विश्वास, जो अनावश्यक बन गया है । विश्वास जो मुरदा बन गया है । किसी समय शायद यह जीवित रहा हो । पर धर्म को फिर फिर जन्म लेना होता है ।
ध्यान रहे । तुम धर्म में पैदा नहीं होते । धर्म तुममें बार बार पैदा होता है । तब यह होती है - श्रद्धा । तुम अपने बच्चों को तुम्हारा धर्म नहीं दे सकते । उन्हें खोजना होगा । और उन्हें उनका अपना धर्म पाना होगा । प्रत्येक को अपना धर्म खोजना है । और पाना है । यह 1 जोखम है । साहस है । सबसे बड़ा साहस । तुम अज्ञात में बढ़ते हो ।
पतंजलि कहते हैं - श्रद्धा पहली चीज है । अगर तुम असंप्रशांत समाधि को उपलब्ध होना चाहते हो । संप्रज्ञात समाधि के लिए तुम्हें तर्क की जरूरत है - सम्यक तर्क की । भेद को समझो । संप्रज्ञात समाधि के लिए सम्यक तर्क, सम्यक विचार आधार है । असंप्रज्ञात समाधि के लिए - सम्यक श्रद्धा तर्कणा नहीं ।
तर्क नहीं । बल्कि 1 तरह का प्रेम होता है । और प्रेम अंधा होता है । यह तार्किक बुद्धि को अंधा दिखता है । क्योंकि यह 1 छलांग है अंधेरे में । तर्कगत बुद्धि पूछती है - कहां जा रहे हो तुम ? ज्ञात क्षेत्र में बने रहो । और प्रयोजन क्या है नयी घटना में जाने का ? क्यों न पुरानी परत में ही ठहरे रही ? यह सुविधापूर्ण है । आरामदायक है । और जो कुछ तुम चाहते हो । यह पहुंचा सकती है ।’ किंतु प्रत्येक को उसका अपना मंदिर खोजना होता है । केवल तभी वह .जे ? होता है ।
तुम यहां मेरे पास हो । यह है - श्रद्धा । जब मैं यहां नहीं रहूंगा । तुम्हारे बच्चे शायद यहां होंगे । वह होगा - विश्वास । श्रद्धा घटित होती है । केवल जीवित गुरु के साथ । विश्वास होता है - मृत गुरुओं के प्रति । जो अब नहीं रहे । पहले शिष्यों के पास धर्म होता है । दूसरी और तीसरी पीढ़ी धीरे  धीरे धर्म खो देती है । तब यह संप्रदाय बन जाता है । तब तुम आसानी से उस पर चलते हो । क्योंकि तुम इसमें उत्‍पन्‍न हुए होते हो । यह 1 कर्तव्य होता है । प्रेम नहीं । यह 1 सामाजिक आचार संहिता है । यह बात मदद करती है । लेकिन यह तुममें गहरे नहीं उतरी होती । यह तुम तक कुछ नहीं लाती । यह घटना नहीं है । यह तुममें प्रकट हो रही गहराई नहीं है । यह मात्र 1 सतह है । 1 आकार । जरा जाओ । और चर्च में देखो । रविवार को जाने वाले लोग । वे जाते हैं । वे प्रार्थना भी करते हैं । पर वे प्रतीक्षा कर रहे होते है कि कब यह समाप्त हो ।
1 छोटा बच्चा चर्च में बैठा हुआ था । पहली बार ही वह आया था । और वह सिर्फ 4 साल का था । मां ने उससे पूछा - तुमने इसे पसंद किया ?' वह बोला - संगीत अच्छा है । लेकिन कमर्शियल बहुत लंबा है । जब तुममें कोई श्रद्धा न हो । तब यह कमर्शियल ही होता है । श्रद्धा सम्यक आस्था है । विश्वास असम्यक आस्था है । किसी दूसरे से मत ग्रहण करो धर्म । तुम इसे उधार नहीं ले सकते । वह तो धोखा हुआ । तब तो तुम इसे पा रहे हो । इसके लिए बिना कुछ खर्च किये । और हर चीज की कीमत चुकानी होती है । असंप्रशांत समाधि को उपलब्ध होना सस्ता मामला नहीं है । तुम्हें पूरी कीमत चुकानी होती है । और पूरी कीमत है - तुम्हारा समग्र अस्तित्व ।
ईसाई होना मात्र 1 लेबल है । धार्मिक होना लेबल नहीं है । तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व संलग्र होता है । यह 1 प्रतिबद्धता होती है ।
लोग मेरे पास आते हैं । और वे कहते हैं - हम आपसे प्रेम करते हैं । जो कुछ भी आप कहते है । अच्छा है । किंतु हम संन्यास नहीं लेना चाहते । क्योंकि हम वचनबद्ध नहीं होना चाहते । पर जब तक तुम वचनबद्ध न होओ । अंतर्ग्रस्त न होओ । तुम विकसित नहीं हो सकते । क्योंकि तब कोई संबंध नहीं होता । तब तुम्हारे और मेरे बीच शब्द होते है - संबंध नहीं । तब मैं 1 शिक्षक हो सकता हूं । लेकिन मैं तुम्हारा गुरु नहीं होता । तब तुम 1 विद्यार्थी हो सकते हो । पर शिष्य नहीं ।
श्रद्धा प्रथम द्वार है । दूसरा द्वार है - वीर्य । वह भी कठिन है । इसे प्रयत्न की तरह अनूदत किया जाता है । नहीं, प्रयत्न तो इसका हिस्सा मात्र है । वीर्य शब्द का अर्थ बहुत सारी चीजों से है । लेकिन इसका बहुत गहन अर्थ है - जैविक ऊर्जा । अनेक अर्थों में वीर्य का 1 अर्थ है - शुक्राणु काम ऊर्जा । अगर तुम ठीक से इसका अनुवाद करना चाहते हो । तो वीर्य है - जैविक ऊर्जा । तुम्हारी समग्र ऊर्जा । तुम्हारा ऊर्जामय रूप । निस्संदेह यह ऊर्जा केवल प्रयास द्वारा लायी जा सकती है । इसलिए इसका 1 अर्थ प्रयास है । लेकिन यह बड़ा क्षुद्र अर्थ हुआ । उतना विराट नहीं है । जितना कि वीर्य शब्द ।
वीर्य का अर्थ होता है कि तुम्हारी संपूर्ण ऊर्जा को इसमें ले आना । केवल मन काम न देगा । तुम मन से हां कह सकते हो । लेकिन यह काफी न होगा । कुछ भी बचाये बिना स्वयं को पूरा का पूरा दांव पर लगाने की जरूरत होती है । यही है वीर्य का अर्थ । और यह तभी संभव होता है । जब श्रद्धा हो । अन्यथा तुम कुछ बचा लोगे मात्र सुरक्षित होने के लिए ही । निरापद होने के लिए ही । तुम्हें लगेगा - यह आदमी शायद हमें गलत दिशा में ले जा रहा हो । और हम किसी भी क्षण पीछे हटने की सुविधा बनाये रखना चाहते हैं । 1 क्षण में हम कह सकें कि बस, जितना है काफी है । अब और नहीं ।
तुम तुम्हारा अपना 1 हिस्सा रोके रहते हो । सिर्फ सावधानी से देखने के लिए ही कि यह आदमी कहां ले जा रहा है । मेरे पास लोग आते हैं । और वे कहते हैं - हम सतर्कता से देख रहे हैं । पहले हमें देखने दें कि क्या घट रहा है । वे बहुत चालाक हैं - नासमझ चालाक । क्योंकि ये चीजें बाहर से नहीं देखी जा सकतीं । जो घट रही है । वह आंतरिक घटना है । कई बार तुम देख भी नहीं सकते कि किसे यह घट रही है । बहुत बार केवल मैं देख सकता हूं । जो घट रहा है । तुम बाद में ही सजग होते हो उसके प्रति । जो घटित हुआ है ।
दूसरे नहीं देख सकते । बाहर से कोई संभावना नहीं देखने की । कैसे तुम बाहर से देख सकोगे गुह्य । शारीरिक मुद्रा तुम देख सकते हो । लोग ध्यान कर रहे हैं । यह तुम देख सकते हो । लेकिन जो अंदर घटित हो रहा है - वह ध्यान है । जो वे बाहर कर रहे हैं । वह केवल स्थिति का निर्माण करना है ।
ऐसा हुआ कि 1 बहुत बड़ा सूफी गुरु था - जलालुद्दीन । उसका 1 छोटा सा विद्यालय था अनूठे शिष्यों का । वे अनूठे थे । क्योंकि वह बहुत ध्यान से चुनने वाला गुरु था । जब तक कि उसने उसे चुन ही न लिया हो । वह किसी को न आने देता । उसने बहुत थोड़े लोगों पर काम किया । लेकिन जो लोग वहां से गुजरते । कई बार उसे देखने आ जाते । जो वहां घटित हो रहा था । 1 बार लोगों की 1 टोली आयी । कुछ प्रोफेसर थे । वे हमेशा बड़े सजग लोग होते हैं । बड़े चालाक । और उन्होंने देखा । गुरु के घर में । अहाते में ही । 50 लोगों का समूह बैठा हुआ था । और वे पागलों जैसी मुद्राएं बना रहे थे । कोई हंस रहा था । कोई रो चीख रहा था । कोई कूद रहा था ।
प्रोफेसर लोग देखते रहे । वे बोले - क्या हो रहा है ? यह आदमी उन्हें पागलपन की ओर ले जा रहा है । वे पागल ही हैं । और वे मूर्ख हैं । क्योंकि 1 बार कोई पागल हो जाता है । तो वापस लौटना कठिन होता है । और यह तो बिलकुल मूर्खता हो गयी । हमने इस तरह की बात कभी नहीं सुनी । जब लोग ध्यान करते हैं । वे शांतिपूर्वक बैठते हैं ।
और उनके बीच बहुत विवाद हुआ । उनके 1 वर्ग ने कहा - चूंकि हम नहीं जानते । क्या घट रहा है ? तो कोई निर्णय देना अच्छा नहीं है । फिर उनमें लोगों का 1 तीसरा वर्ग था । जो बोला - जो कुछ भी हो ? यह आनंददायक है । हम देखना चाहेंगे । यह सुंदर है । हम क्यों नहीं इसका आनंद ले सकते ? जो वे कर रहे हैं । उसकी क्यों फिक्र करें ? उन्हें देखना भर ही इतना सुंदर है । 
कुछ महीनों बाद । फिर वही टोली आश्रम में आयी देखने को । अब क्या हो रहा था ? हर कोई मौन था । 50 व्यक्ति वहां थे । गुरु था वहां । वे शांति से बैठे हुए थे । इतने मौनपूर्वक । जैसे कि वहां कोई था ही नहीं । वे मूर्तियों की भांति थे । फिर बहस छिड़ी । उनका 1 वर्ग था जो कहने लगा - अब वे बेकार हैं । देखने को है क्या ? कुछ नहीं । पहली बार हम आये थे । तो यह सुंदर था । हमने इसका मजा लिया । लेकिन अब वे सिर्फ ऊबाऊ है । दूसरा वर्ग बोला - पर लगता है कि वे ध्यान कर रहे हैं । पहली बार तो वे पागल से ही थे । यह सही चीज है करने की । इसी तरह ध्यान किया जाता है । यह शास्त्रों में लिखा हुआ है । इसी तरह से व्याख्या की गयी है ।
किंतु फिर भी उनमें 1 तीसरा वर्ग था । जिसने कहा - हम ध्यान के बारे में कुछ भी नहीं जानते । कैसे निर्णय दे सकते हैं हम ?
तब फिर कुछ महीनों बाद वह टोली आयी । अब वहां कोई न था । केवल वे सदगुरु बैठे थे । और मुसकुरा रहे थे । सारे शिष्य गायब हो गये थे । अत: उन्होंने पूछा - क्या हो रहा है ? पहली बार हम आये । तो वहाँ पागल भीड़ थी । और हमने सोचा कि यह व्यर्थ था । और आप लोगों को पागल किये दे रहे थे । अगली बार हम आये । तो  बहुत अच्छा था । लोग ध्यान कर रहे थे । कहां चले गये हैं वे सब ?
सदगुरु ने कहा - काम हो चुका है । इसलिए शिष्य यहां नहीं रहे । और मैं प्रसन्नता पूर्वक मुस्करा रहा हूं । क्योंकि घटना घट चुकी । और तुम हो नासमझ । जानता हूं मैं । देखता मैं भी रहा हूं । केवल तुम्हीं नहीं । मैं जानता हूं । तुम्हारे बीच जो विवाद चल रहे थे । और जो तुम पहली बार और दूसरी बार सोच रहे थे । जलालुद्दीन ने कहा - वह कोशिश जो तुमने 3 बार यहां आने में की । वह काफी थी तुम्हारे ध्यानी बनने के लिए । और जिस वाद विवाद में तुम पड़े थे । उसमें जो ऊर्जा तुमने लगायी । उतनी ऊर्जा काफी थी । तुम्हें शांत बना देने को । और उसी अवधि मे वे शिष्य जा चुके हैं । और तुम उसी स्थान पर खडे हुए हो । भीतर आओ । बाहर से मत देखो । वे बोले - हां, इसीलिए तो हम फिर फिर आ रहे हैं देखने को कि क्या घट रहा है । जब हम निश्चित हो जायें । तो ठीक है । अन्यथा हम प्रतिबद्ध नहीं होना चाहते ।
चालाक लोग कभी प्रतिबद्ध नहीं होना चाहते । लेकिन क्या कोई जीवन होता है बिना प्रतिबद्धता का ? लेकिन चालाक लोग सोचते है कि प्रतिबद्धता बंधन है । लेकिन क्या कोई स्वतंत्रता होती है बिना बंधन की ? पहले तुम्हें संबंध में उतरना होता है । केवल तभी तुम उसके पार जा सकते हो । पहले तुम्हें गहरी प्रतिबद्धता में उतरना होता है - गहराई से गहराई का । हृदय से हृदय का संबंध । और केवल तब तुम इसके पार हो सकते हो । दूसरा कोई मार्ग नहीं है । अगर तुम बाहर ही खड़े रहो । और देखते रहो । तो तुम कभी मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते । मंदिर प्रतिबद्धता है । और फिर कोई संबंध नहीं हो सकता ।
गुरु और शिष्य 1 प्रेम संबंध में होते हैं । यह उच्चतम प्रेम है । जो संभव है । जब तक कि संबंध न हो । तुम विकसित नहीं हो सकते ।
पतंजलि कहते हैं - पहली बात है श्रद्धा । और दूसरी ऊर्जा  प्रयास । तुम्हारी सारी ऊर्जा को ले आना होता है । 1 हिस्सा काम न देगा । यह घातक भी हो सकता है । अगर तुम केवल आंशिक रूप से भीतर आओ । और आशिक रूप से बाहर भी बने रहो । क्योंकि यह बात तुम्हारे भीतर 1 दरार पैदा करेगी । यह बात तुम्हारे भीतर 1 तनाव निर्मित कर देगी । यह आनंद की अपेक्षा 1 चिंता बन जायेगी ।
जहां तुम तुम्हारी समग्रता में होते हो । वहां आनंद होता है । जहां तुम केवल हिस्से में होते हो । तो वहां चिंता होती है । क्योंकि तब तुम बंट जाते हो । और उससे तनाव पैदा होता है । 2 हिस्से अलग ढंग से चल रहे हैं । तब तुम कठिनाई में होते हो ।
दूसरे जो असंप्रज्ञात समाधि को उपलब्ध होते हैं । वे श्रद्धा वीर्य ( ऊर्जा ) स्मृति समाधि ( एकाग्रता ) और प्रज्ञा ( विवेक ) के द्वारा उपलब्ध होते हैं ।
यह " स्मृति " शब्द जो है । यह है स्मरण । जिसे गुरजिएफ कहते हैं - आत्मस्मरण । यह है स्मृति ।
तुम अपने को स्मरण नहीं करते । हो सकता है । तुम लाखों चीजों का स्मरण करो । लेकिन तुम निरंतर भूलते चले जाते हो स्वयं को । जो तुम हो । गुरजिएफ के पास 1 विधि थी । उसने इसे पाया पतंजलि से । और वस्तुत: सारी विधियां पतंजलि से चली आती हैं । वे विशेषज्ञ थे विधियों के । स्मृति है - स्मरण । जो कुछ तुम करो । उसमें स्व स्मरण बनाये रहना । तुम चल रहे हो - गहरे में । स्मरण रखना कि - मैं चल रहा हूं कि मैं हूं । चलने में ही खो मत जाना । चलना भी है - वह गति । वह क्रिया । और वह आंतरिक केंद्र भी है । गति, क्रिया और आंतरिक केंद्र - मात्र सजग, देखता हुआ साक्षी ।
लेकिन मन में दोहराओ मत कि मैं चल रहा हूं । अगर तुम दोहराते हो । तो वह स्मरण नहीं है । तुम्हें निःशब्द रूप से जागरूक होना है कि - मैं चल रहा हूं । मैं खा रहा हूं । मैं बोल रहा हूं । मैं सुन रहा हूं । जो कुछ करते हो तुम । उस भीतर के " मैं " को भूलना नहीं चाहिए । यह बना रहना चाहिए । यह अहं-बोध नहीं है । यह आत्‍मबोध है । मैं बोध अहंकार है । आत्‍मा का बोध है - अस्मिता । शुद्धता । सिर्फ मैं हूं इसका होश ।
साधारणत: तुम्हारी चेतना किसी विषय वस्तु की ओर लक्षित हुई रहती है । तुम मेरी ओर देखते हो । तुम्हारी संपूर्ण चेतना मेरी ओर बह रही है 1 तीर की भांति । तो तुम मेरी ओर लक्षित हो । आत्म स्मरण का अर्थ है - तुम्हारे पास द्विलक्षित तीर होगा । इसका 1 हिस्सा मुझे देख रहा हो । दूसरा हिस्सा अपने को देख रहा हो । द्वि-लक्षित तीर है - स्मृति । आत्‍म स्मरण ।
यह बहुत कठिन है । क्योंकि विषय वस्तु को स्मरण रखना । और स्वयं को भूलना आसान होता है । विपरीत भी आसान है - स्वयं को स्मरण रखना । और विषय को भूल जाना । दोनों आसान हैं । इसीलिए वे जो बाजार में होते । संसार में होते । और वे जो मंदिरों मठों में होते । संसार से बाहर होते । वे 1 ही हैं । दोनों एकलक्षित हैं । बाजार में वे वस्तुओं को, विषयों को देख रहे होते है । मठों में वे अपने को देख रहे होते हैं ।
स्मृति न तो बाजार में है । न ही संसार के बाहर वाले मठों में । स्मृति 1 घटना है - आत्म स्मरण की । जब 'रू' और 'पर' दोनों 1 साथ चैतन्य में होते हैं । यह संसार की सर्वाधिक कठिन बात है । अगर तुम इसे क्षण भर को । 1 आशिक क्षण को भी प्राप्त कर सको । तो तुम्हें तुरंत सतोरी की झलक प्राप्त होगी । तत्काल तुम शरीर से कहीं और बाहर जा चुके होओगे ।
इसे आजमाना । लेकिन ध्यान रहे । अगर तुममें श्रद्धा नहीं है । तो यह 1 तनाव बन जायेगी । ये उसकी समस्याएं हैं । यह ऐसा तनाव बन सकती है कि तुम पागल बन सकते हो । क्योंकि यह 1 बहुत तनाव की स्थिति होती है । इसलिए स्व और पर । भीतरी और बाहरी दोनों को याद रखना कठिन होता है । दोनों को याद रखना बहुत बहुत दुःसाध्य है । अगर श्रद्धा होती है । तो वह तनाव को कम कर देगी । क्योंकि श्रद्धा है - प्रेम । यह तुम्हें शांत करेगी । यह तुम्हारे चारों ओर 1 संतोषदायिनी शक्ति होगी । वरना तनाव इतना ज्यादा हो सकता है कि तुम सो न पाओगे । तुम किसी क्षण शांत न हो पाओगे । क्योंकि यह 1 निरंतर उलझन बनी रहेगी । और तुम निरंतर 1 चिंता में ही रहोगे ।
इसीलिए तुम 1 बात कर सकते हो । ऐसा आसान होता है कि तुम 1 एकांत मठ में जा सकते हो । आंखें बंद कर सकते हो । स्वयं का स्मरण कर सकते हो । और संसार को भूल सकते हो । लेकिन कर क्या रहे हो तुम ? तुम तो बस, सारी प्रक्रिया को उल्टा भर रहे हो । और कुछ नहीं कर रहे । कोई परिवर्तन नहीं । या, तुम इन धर्म स्थानों को भूल सकते हो । और भूल सकते हो इन मंदिरों को । और इन गुरुओं को । और बने रह सकते हो संसार में । आनंद उठा सकते हो संसार का । वह भी आसान है । कठिन बात तो है - दोनों के प्रति सचेत होना ।
और जब तुम दोनों के प्रति सचेत होते हो । और साथ साथ ऊर्जा जागरूक होती है । संपूर्णतया ही विपरीत दिशाओं को लक्षित होती हुई । तो तनाव होता है । इंद्रियातीत अनुभव होता है । तुम मात्र तीसरे बन जाते हो । तुम दोनों के साक्षी हो जाते हो । और जब तीसरा प्रवेश करता है । पहले तुम विषय वस्तु को और स्वयं को देखने की कोशिश करते हो । लेकिन अगर तुम दोनों को देखने की कोशिश करते हो । तो बाद में, थोड़ी देर में तुम अनुभव करते हो । तुम्हारे भीतर कुछ घट रहा है । क्योंकि तुम 'तीसरे' बन रहे हो । तुम दोनों के बीच में हो - पर और स्व के बीच । अब तुम न तो विषय हो । और न ही विषयी ।
श्रद्धा, प्रयास, स्मृति, एकाग्रता और विवेक द्वारा उपलब्ध होते हैं । श्रद्धा है - आस्था । वीर्य है - समग्र प्रतिबद्धता । समग्र प्रयास । समग्र ऊर्जा ले आनी होती है । तुम्हारी सारी शक्ति लगानी पड़ती है । यदि तुम वास्तव में ही सत्य के खोजी हो । तो तुम कोई दूसरी चीज नहीं खोज सकते । इसमें संपूर्णत: डूबना होता है । तुम इसे पार्ट टाइम जॉब नहीं बना सकते । और न ही कह सकते - सुबह किसी समय में ध्यान करता हूं । और फिर खत्म । नहीं, ध्यान को तुम्हारे लिए 24 घंटे का सातत्य बनना होता है । जो कुछ भी तुम करो । ध्यान को सतत वहां पृष्ठभूमि में होना होता है । ऊर्जा की आवश्यकता होगी । तुम्हारी समस्त ऊर्जा की आवश्यकता होगी ।
और अब कुछ और बातें समझ लेनी हैं । अगर तुम्हारी सारी ऊर्जा की आवश्यकता होती है । तो कामवासना अपने आप तिरोहित हो जाती है । क्योंकि इस पर नष्ट करने को तुम्हारे पास ऊर्जा नहीं है । ब्रह्मचर्य पतंजलि के लिए कोई अनुशासन नहीं है । यह 1 परिणाम है । तुम तुम्हारी समग्र ऊर्जा आध्यात्मिक अभ्यास में लगा देते हो । तो तुम्हारे पास कामवासना के लिए कोई ऊर्जा नहीं बची रहती । और ऐसा साधारण जीवन में भी घटता है । किसी बड़े चित्रकार को देखो । वह स्त्री को पूरी तरह भूल जाता है । जब वह चित्र बना रहा होता है । तो उसके मन में कामवासना नहीं होती । क्योंकि उसकी सारी ऊर्जा चित्र में संलग्र रहती है । कामवासना के लिए उसके पास कोई अतिरिका ऊर्जा नहीं है ।
कोई महान कवि, महान गायक, नृत्यकार जो अपनी प्रतिबद्धता में पूर्णतया डूबा होता है । बिना किसी प्रयास के ब्रह्मचर्य पा लेता है । ब्रह्मचर्य के लिए उसके पास कोई अनुशासन नहीं है । कामवासना अतिरिक्त ऊर्जा है । काम 1 सुरक्षा साधन है । जब तुम्हारे पास बहुत ऊर्जा होती है । और तुम इसके साथ कुछ नहीं कर सकते । तो प्रकृति ने सेफ्टी वॉल्व बनाया है । 1 सुरक्षा की व्यवस्था । ताकि इसे तुम बाहर फेंक सको । तुम इसे मुका कर सको । अन्यथा तुम पागल हो जाओगे । या फूट पड़ोगे । तुम विस्फोटित हो जाओगे । और अगर तुम इसे दबाने की कोशिश करते हो । तो भी तुम पागल हो जाओगे । क्योंकि इसे दबाना मदद न देगा । इसे आवश्यकता है रूपांतरण की । और वह रूपांतरण समग्र प्रतिबद्धता द्वारा आता है । 1 योद्धा, अगर वह वस्तुत: योद्धा है - 1 अपराजेय योद्धा । वह कामवासना से परे होगा । उसकी सारी ऊर्जा कहीं और लगी है ।
1 बहुत सुंदर कहानी है । 1 महान दार्शनिक था । विचारक । जिसका नाम था - वाचस्पति । वह अपने अध्ययन में बहुत ज्यादा अंतर्गस्त था । 1 दिन उसके पिता ने उससे कहा - अब मैं बूढ़ा हो चला । और मैं नहीं जानता कि - कब किस क्षण मर जाऊं । और तुम मेरे इकलौते बेटे हो । और मैं चाहता हूं । तुम विवाहित होओ । वाचस्पति अध्ययन में इतना ज्यादा डूबा हुआ था कि वह बोला - ठीक है । यह सुने बगैर कि उसके पिता क्या कह रहे है । तो उसका विवाह हुआ । पर वह बिलकुल भूला रहा कि उसकी पत्नी थी । इतना डूबा हुआ था वह अपनी अध्ययनशीलता में ।
और यह केवल भारत में घट सकता है । यह कहीं और नहीं घट सकता । पत्नी उससे इतना अधिक प्रेम करती थी कि वह उसे अड़चन न देना चाहती । तो यह कहा जाता है कि 12 वर्ष गुजर गये । वह छाया की भांति उसकी सेवा करती । हर बात का ध्यान रखती । लेकिन वह जरा भी शांति भंग न करती । वह न कहती - मैं हूं यहां । और क्या कर रहे हो तुम ? वाचस्पति लगातार 1 व्याख्या लिख रहा था । जितनी व्याख्याएं लिखी गयी हैं । उनमें से 1 महानतम व्याख्या । वह बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिख रहा था । और वह उसमें डूबा हुआ था इतना ज्यादा । इतनी समग्रता से कि वह केवल अपनी पत्नी को ही नहीं भूला । उसे इसका भी होश न था कि कौन भोजन लाया । कौन थालियां वापस ले गया । कौन आया शाम को और दीया जला गया । किसने उसकी शय्या तैयार की ?
12 वर्ष गुजर गये । और वह रात्रि आयी । जब उसकी व्याख्या पूरी हो गयी थी । उसे अंतिम शब्द भर लिखना था । और उसने प्रण किया हुआ था कि जब व्याख्या पूरी होगी । वह संन्यासी हो जायेगा । तब वह मन से संबंधित न रहेगा । और सब कुछ समाप्त हो जायेगा । यह व्याख्या उसका एकमात्र कर्म था । जिसे परिपूर्ण करना था ।
उस रात वह थोड़ा विश्रांत था । क्योंकि उसने करीब 12 बजे अंतिम वाक्य लिख दिया था । पहली बार वह अपने वातावरण के प्रति सजग हुआ । दीया धीमा जल रहा था । और अधिक तेल चाहिए था । 1 सुंदर हाथ उसमें तेल उड़ेलने लगा था । उसने पीछे देखा । यह देखने को कि वहां कौन था । वह नहीं पहचान सका चेहरे को । और बोला - तुम कौन हो । और यहां क्या कर रही हो ? पत्नी बोली - अब जो आपने पूछ ही लिया है । तो मुझे कहना है कि 12 वर्ष पहले आपने मुझे अपनी पत्नी के रूप में ग्रहण किया था । लेकिन आप इतने डूबे हुए थे अपने कार्य के प्रति इतने प्रतिबद्ध थे कि मैं बाधा डालना या 'शांति भंग करना न चाहती थी ।
वाचस्पति रोने लगा । उसके अश्रु बहने लगे । पत्नी ने पूछा - क्या बात है ? वह बोला - यह बहुत जटिल बात है । अब मैं धर्मसंकट में पड़ घबरा गया हूं । क्योंकि व्याख्या पूरी हो गयी है । और मैं संन्यासी होने जा रहा हूं । मैं गृहस्थ नहीं हो सकता । मैं तुम्हारा पति नहीं हो सकता । व्याख्या पूरी हुई । और मैंने प्रतिज्ञा की है । अब मेरे लिए कोई समय नहीं । मैं तुरंत जा रहा हूं । तुमने मुझसे पहले क्यों न कहा ? मैं तुम्हें प्रेम कर सकता था । तुम्हारी सेवा, तुम्हारे प्रेम, तुम्हारी निष्ठा के लिए अब मैं क्या कर सकता हूं ?
ब्रह्मसूत्र पर अपने भाष्य का उसने नाम दिया - भामती । भामती था उसकी पत्नी का नाम । बेतुका है नाम । बादरायण के ब्रह्मसूत्र के भाष्य को 'भामती' कहना बेतुका है । इस नाम का कोई संबंध जुडूता नहीं । लेकिन उसने कहा - अब कुछ और मैं कर नहीं सकता । अब केवल पुस्तक का नाम लिखना ही शेष है । अत: मैं इसे भामती कहूंगा जिससे कि तुम्हारा नाम सदैव याद रहे ।
उसने घर त्याग दिया । पत्नी रो रही थी । आंसू बहा रही थी । पर पीड़ा में नहीं । आनंद में । वह बोली - यह पर्याप्त है । तुम्हारी यह भावदशा, तुम्हारी आंखों में भरा यह प्रेम पर्याप्त है । मैंने पर्याप्त पाया । अत: अपराधी अनुभव न करें । जायें । मुझे बिलकुल भूल जायें । मैं आपके मन पर बोझ नहीं बनना चाहूंगी । मुझे याद करने की कोई आवश्यकता नहीं ।
यह संभव होता है । अगर तुम किसी चीज में समपता से डूबे होते हो । तो कामवासना तिरोहित हो जाती है । क्योंकि कामवासना सुरक्षा का एक उपाय है । जब तुम्हारे पास अप्रयुक्‍त ऊर्जा होती है । तब कामवासना तुम्हारे चारों ओर पीछा करती 1 छाया बन जाती है । जब तुम्हारी समग्र ऊर्जा प्रयुक्‍त हो जाती है । कामवासना तिरोहित हो जाती है । और वह है अवस्था - ब्रह्मचर्य की । वीर्य की । तुम्हारी सारी अंतर्निहित ऊर्जा के विकसित होने की । श्रद्धा, वीर्य ( प्रयास ) स्मृति, समाधि ( एकाग्रता ) और प्रज्ञा विवेक । श्रद्धा । वीर्य - तुम्हारी समग्र जीव ऊर्जा, तुम्हारी समग्र प्रतिबद्धता । और प्रयत्न । स्मृति - स्व स्मरण । और समाधि । इस शब्द 'समाधि' का अर्थ है । मन की वह अवस्था । जहां कोई समस्या अस्तित्व नहीं रखती । यह शब्द आया है - समाधान से । यह मन की वह अवस्था है । जहां तुम नितांत स्वस्थ अनुभव करते हो । जहां कोई समस्या नहीं होती । कोई प्रश्न नहीं । यह मन की 1 प्रश्न शून्य और समस्या शून्य अवस्था होती है । यह कोई एकाग्रता नहीं । एकाग्रता तो मात्र 1 गुणवत्ता है । जो उस मन में चली आती है । जो समस्या रहित होता है । अनुवाद करने की यही कठिनाई है ।
मन की इस अवस्था का हिस्सा है - एकाग्रता । यह तो बस घटती है । उस बच्चे को देखो । जो अपने खेल में निमग्न है । उसकी एकाग्रता प्रयास रहित है । वह अपने खेल पर एकाग्र नहीं हो रहा है । एकाग्रता सह परिणाम है । वह खेल में इतना अधिक तल्लीन है कि एकाग्रता घटती है । अगर तुम किसी चीज पर जानबूझ कर एकाग्र होते हो । तो प्रयास होता है । तब तनाव होता है । तब तुम थक जाओगे ।
समाधि स्वत: घटती है - सहजता पूर्वक । अगर तुम तन्मय होते हो । डूबे हुए होते हो । अगर तुम मुझे सुन रहे हो । यह समाधि है । अगर तुम मुझे समग्रता पूर्वक सुनते हो । तो किसी दूसरे ध्यान की जरूरत नहीं । यह बात 1 एकाग्रता बन जाती है । ऐसा नहीं है कि तुम एकाग्र होते हो । यदि तुम प्रेम पूर्वक सुनते हो । एकाग्रता पीछे चली आती है ।
असंप्रज्ञात समाधि में, जब श्रद्धा संपूर्ण होती है । जब प्रयास संपूर्ण होता है । जब स्मरण गहरा होता है । समाधि घटती है । जो कुछ भी तुम करते हो । तुम संपूर्ण एकाग्रता सहित करते हो - एकाग्र होने के प्रयास के बिना । और यदि एकाग्रता को प्रयास की आवश्यकता होती है । तो यह असुंदर है । यह बात तुम्हें रोग की तरह ग्रस्‍ती रहेगी । तुम इसके द्वारा नष्ट होओगे । एकाग्रता को 1 परिणाम की भांति होना चाहिए । तुम किसी व्यक्ति को प्रेम करते हो । और मात्र उसके साथ होने से तुम एकाग्र हो जाते हो । ध्यान रखना । किसी चीज पर एकाग्र कभी न होना । बल्कि गहराई से सुनना । समग्रता से सुनना । और तुम्हारे पास एकाग्रता स्वयं चली आयेगी ।
फिर होता है - विवेक । प्रज्ञा । प्रज्ञा विवेक नहीं है । विवेक केवल 1 हिस्सा है प्रज्ञा का । वस्तुत: प्रज्ञा का अर्थ है - 1 बोधपूर्ण जागरूकता । बुद्ध ने कहा है कि ध्यान की लौ ऊंची प्रज्वलित होती है । तो उस अग्रि शिखा को घेरने वाला प्रकाश प्रज्ञा है । भीतर है समाधि । और तुम्हारे चारों ओर 1 प्रकाश । 1 आभा पीछे आने लगती है । तुम्हारे प्रत्येक कार्य में तुम प्रज्ञावान और विवेक पूर्ण होते हो । यह ऐसा नहीं है कि तुम विवेक पूर्ण होने की कोशिश कर रहे हो । यह तो बस घटता है । क्योंकि तुम इतनी अधिक समग्रता से जागरूक होते हो । जो कुछ तुम करते हो । विवेक पूर्ण होता है । ऐसा नहीं है कि तुम निरंतर सोच रहे हो सही काम करने की बात ।
वह व्यक्ति जो लगातार सोच रहा है । सही काम करने की बात । वह तो कुछ कर ही न पायेगा । वह गलत भी न कर पायेगा । क्योंकि यह बात इतना तनाव बन जायेगी उसके मन पर । और क्या सही है । और क्या गलत है ? तुम कैसे निर्णय ले सकते हो ? प्रज्ञावान व्यक्ति चुनता नहीं । वह मात्र अनुभव करता है । वह तो अपनी जागरूकता सब ओर फेंकता है । और उसके प्रकाश में वह आगे बढ़ता है । जहां कहीं वह बढ़ता है, सही है ।
सही बात चीजों से संबंधित नहीं है । यह तुमसे संबंधित है । वह जो कार्य कर रहा है - उससे । ऐसा नहीं है कि बुद्ध सही बातें करते थे । नहीं । जो कुछ वे करते । वह सही होता । विवेक तो अपर्याप्त शब्द है । प्रज्ञावान व्यक्ति के पास विवेक होता ही है । वह उसके बारे में सोचता नहीं है । यह उसके लिए सहज है । यदि तुम इस कमरे से बाहर जाना चाहते हो । तो तुम बस दरवाजे से बाहर चले जाते हो । तुम टटोलते ढूंढते नहीं । तुम पहले दीवार के पास नहीं चले जाते रास्ता खोजने को । तुम तो बाहर ही चले जाते हो । तुम सोचते भी नहीं कि यह दरवाजा है । लेकिन जब अंधे आदमी को बाहर जाना होता है । तो वह पूछता है - कहां है दरवाजा ? और फिर इसके बाद वह इसे छूने की कोशिश भी करता है । वह अपनी की लिये बहुत जगह दस्तक देगा । वह टटोलेगा । ढूंढेगा । और अपने मन में वह निरंतर सोचेगा - यह द्वार है या दीवार ? मैं सही जा रहा हूं । या गलत ? और जब वह द्वार तक आ पहुंचेगा । तब वह सोचेगा - हां, अब यही है द्वार ।
यह सब घटता है । क्योंकि वह अंधा है । तुम्हें चुनाव करना होता है । क्योंकि तुम अंधे होते हो । तुम्हें सोचना पड़ता है । क्योंकि तुम अंधे हो । तुम्हें अनुशासन और नैतिकता में रहना होता है । क्योंकि तुम अंधे हो । जब समझ खिलती होती है । जब ज्योति वहां होती है । तुम मात्र देखते हो । और हर चीज स्पष्ट होती है । जब तुम्हारे पास आंतरिक स्पष्टता होती है । तब हर चीज स्पष्ट होती है । तुम संवेदनशील बन जाते हो । जो कुछ तुम करते हो । सही ही होता है । ऐसा नहीं है कि यह सही है । और इसलिए तुम इसे करते हो । तुम इसे समझ सहित करते हो । और यह सही । तो श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा । दूसरे जो असंप्रज्ञात समाधि को उपलब्ध होते हैं । इसे उपलब्ध करते है । श्रद्धा, असीम ऊर्जा, प्रयास, समग्र आत्म स्मरण, समस्‍या शून्य मन और विवेक की अग्रि शिखा के द्वारा ।
पंतजलि: योगसूत्र 1  समाधि का अर्थ 1 जनवरी 1975 श्री रजनीश आश्रम पूना ।

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