08 सितंबर 2011

बिना मिटे कोई उपाय नहीं कोई गति नहीं

आपने बताया कि प्रेम के द्वारा सत्य को उपलब्ध हुआ जा सकता है । कृपया बताएं । क्या इसके लिए ध्यान जरूरी है ?
- फिर प्रेम का तुम अर्थ ही न समझे । फिर प्रेम से कुछ और समझ गए । बिना ध्यान के प्रेम तो संभव ही नहीं है । प्रेम भी ध्यान का 1 ढंग है । फिर तुमने प्रेम से कुछ अपना ही अर्थ ले लिया । तुम्हारे प्रेम से अगर सत्य मिलता होता । तो मिल ही गया होता । तुम्हारा प्रेम तो तुम कर ही रहे हो । पत्नी से । बच्चे से । पिता से । मां से । मित्रों से । ऐसा प्रेम तो तुमने जन्म जन्म किया है । ऐसे प्रेम से सत्य मिलता होता । तो मिल ही गया होता । मैं किसी और ही प्रेम की बात कर रहा हूं । तुम देह की भाषा ही समझते हो । इसलिए जब मैं कुछ कहता हूं । तुम अपनी देह की भाषा में अनुवाद कर लेते हो । वहीं भूल हो जाती है । प्रेम का मेरे लिए वही अर्थ है । जो प्रार्थना का है । 1 पुरानी कहानी तुमसे कहूं । झेन कथा है । 1 झेन सदगुरु के बगीचे में कद्दू लगे थे । सुबह सुबह गुरु बाहर आया । तो देखा । कद्दूओं में बड़ा झगड़ा और विवाद मचा है । कद्दू ही ठहरे । उसने कहा - अरे कद्दूओ यह क्या कर रहे हो ? आपस में लड़ते हो । वहाँ 2 दल हो गए थे कद्दूओं में । और मारधाड़ की नौबत थी । झेन गुरु ने कहा - कद्दूओ, एक दूसरे को प्रेम करो । उन्होंने कहा - यह हो ही नहीं सकता । दुश्मन को प्रेम करें ? यह हो कैसे सकता है ! तो झेन गुरु ने कहा - फिर ऐसा करो । ध्यान करो । कदुओं ने कहा - हम कद्दू हैं । हम ध्यान कैसे करें ? तो झेन गुरु ने कहा - देखो भीतर मंदिर में बौद्ध भिक्षुओं की कतार ध्यान करने बैठी थी । देखो ये कद्दू इतने कद्दू ध्यान कर रहे हैं । बौद्ध भिक्षुओं के सिर तो घुटे होते हैं । कदुओं जैसे ही लगते हैं । तुम भी इसी भांति बैठ जाओ । पहले तो कद्दू हंसे । लेकिन सोचा - गुरु ने कभी कहा भी नहीं । मान ही लें । थोड़ी देर बैठ जाएं । जैसा गुरु ने कहा । वैसे ही बैठ गए । सिद्धासन में पैर मोड़कर आंखें बंद करके । रीढ़ सीधी करके । ऐसे बैठने से थोड़ी देर में शांत होने लगे । सिर्फ बैठने से आदमी शांत हो जाता है । इसलिए झेन गुरु तो ध्यान का नाम ही रख दिये हैं - झाझेन । झाझेन का अर्थ होता है । खाली बैठे रहना । कुछ करना न । कद्दू बैठे बैठे शांत होने लगे । बड़े हैरान हुए । बड़े चकित भी हुए । ऐसी शांति कभी जानी न थी । चारों तरफ 1 अपूर्व आनंद का भाव लहरें लेने लगा । फिर गुरु आया । और उसने कहा - अब 1 काम और करो । अपने अपने सिर पर हाथ रखो । हाथ सिर पर रखा । तो और चकित हो गए । 1 विचित्र अनुभव आया कि वहाँ तो किसी बेल से जुड़े हैं । और जब सिर उठाकर देखा । तो वह बेल 1 ही है । वहां 2 बेलें न थीं । 1 ही बेल में लगे सब कद्दू थे । कद्दुओं ने कहा - हम भी कैसे मूर्ख ? हम तो 1 ही के हिस्से हैं । हम तो सब 1 ही हैं । 1 ही रस बहता है हमसे । और हम लड़ते थे । तो गुरु ने कहा - अब प्रेम करो । अब तुमने जाना कि 1 ही हो । कोई पराया नहीं । 1 का ही विस्तार है ।
वह जहां से कदुओं ने पकड़ा अपने सिर पर । उसी को योगी सातवां चक्र कहते हैं - सहस्रार । हिंदू वहीं चोटी बढ़ाते हैं । चोटी का मतलब ही यही है कि वहाँ से हम 1 ही बेल से जुड़े हैं । 1 ही परमात्मा है । 1 ही सत्ता । 1 अस्तित्व । 1 ही सागर लहरें ले रहा है । वह जो पास में तुम्हारे लहर दिखाई पड़ती है । भिन्न नहीं । अभिन्न है । तुमसे अलग नहीं । गहरे में तुमसे जुड़ी है । सारी लहरें संयुक्त हैं । तुमने कभी 1 बात खयाल की ? तुमने कभी सागर में ऐसा देखा कि 1 ही लहर उठी हो । और सारा सागर शांत हो ? नहीं, ऐसा नहीं होता । तुमने कभी ऐसा देखा । वृक्ष का 1 ही पत्ता हिलता हो । और सारा वृक्ष मौन खड़ा हो । हवाएं न हों ? जब हिलता है । तो पूरा वृक्ष हिलता है । और जब सागर में लहरें उठती हैं । तो अनंत उठती हैं । 1 लहर नहीं उठती । क्योंकि 1 लहर तो हो ही नहीँ सकती । तुम सोच सकते हो कि 1 मनुष्य हो सकता है । पृथ्वी पर ? असंभव है । 1 तो हो ही नहीं सकता । हम तो 1 ही सागर की लहरें हैं । अनेक होने में हम प्रगट हो रहे हैं । जिस दिन यह अनुभव होता है । उस दिन प्रेम का जन्म होता है ।
प्रेम का अर्थ है - अभिन्न का बोध हुआ । अद्वैत का बोध हुआ । शरीर तो अलग अलग दिखाई पड ही रहे हैं । कद्दू तो अलग अलग हैं ही । लहरें तो ऊपर से अलग अलग दिखाई पड़ ही रही हैं । भीतर से आत्मा 1 है । प्रेम का अर्थ है - जब तुम्हें किसी में और अपने बीच एकता का अनुभव हुआ । और ऐसा नहीं है कि तुम्हें जब यह एकता का अनुभव होगा । तो 1 और तुम्हारे बीच ही होगा । यह अनुभव ऐसा है कि हुआ कि तुम्हें तत्क्षण पता चलेगा कि सभी 1 हैं । भ्रांति टूटी । तो वृक्ष, पहाड़ पर्वत, नदी नाले, आदमी पुरुष, पशु पक्षी, चांद तारे सभी में 1 ही कैप रहा है । उस 1 के कंपन को जानने का नाम प्रेम है । प्रेम प्रार्थना है । लेकिन तुम जिसे प्रेम समझे हो । वह तो देह की भूख है । वह तो प्रेम का धोखा है । वह तो देह ने तुम्हें चकमा दिया है ।
मांगती हैं भूखी इंद्रियां । भूखी इंद्रियों से भीख ।
और किससे तुम मांगते हो भीख । यह भी कभी तुमने सोचा ? जो तुमसे भीख मांग रहा है । भिखारी भिखारी के सामने भिक्षापात्र लिए खड़े हैं । फिर तृप्ति नहीं होती । तो आश्चर्य कैसा ? किससे तुम मांग रहे हो ? वह तुमसे मांगने आया है । तुम पत्नी से मांग रहे हो । पत्नी तुमसे मांग रही है । तुम बेटे से मांग रहे हो । बेटा तुमसे मांग रहा है । सब खाली हैं । रिक्त हैं । देने को कुछ भी नहीं है । सब मांग रहे हैं । भिखमंगों की जमात है ।
मांगती हैं भूखी इंद्रियां । भूखी इंद्रियों से भीख ।
मान लिया है स्खलन । को ही तृप्ति का क्षण ।
नहीं होने देता विमुक्त । इस मरीचिका से अघोरी मन ।
बदल बदल कर मुखौटा । ठगता है चेतना का चिंतन ।
होते ही पटाक्षेप, बिखर जाएगी । अनमोल पंचभूतो की भीड़ ।
यह तुमने जिसे अपना होना समझा है । यह तो पंचभूतो की भीड़ है । यह तो हवा, पानी, आकाश तुममें मिल गए हैं । यह तुमने जिसे अपनी देह समझा है । यह तो केवल संयोग है । यह तो बिखर जाएगा । तब जो बचेगा इस संयोग के बिखर जाने पर । उसको पहचानो । उसमें डूबो । उसमें डुबकी लगाओ । वहीं से प्रेम उठता है । और उसमें डुबकी लगाने का ढंग ध्यान है । अगर तुमने ध्यान की बात ठीक से समझ ली । तो प्रेम अपने आप जीवन में उतरेगा । या प्रेम की समझ ली । तो ध्यान उतरेगा । ये 1 ही बात को कहने के लिए 2 शब्द हैं । ध्यान से समझ में आता हो । तो ठीक । अन्यथा प्रेम । प्रेम से समझ में आता हो । तो ठीक । अन्यथा ध्यान । लेकिन दोनों अलग नहीं हैं ।
अकबर शिकार को गया था । जंगल में राह भूल गया । साथियों से बिछड़ गया । सांझ होने लगी । सूरज ढलने लगा । अकबर डरा हुआ था । कहाँ रुकेगा रात । जंगल में खतरा था । भाग रहा था । तभी उसे याद आया कि सांझ का वक्त है । प्रार्थना करनी जरूरी है । नमाज का समय हुआ तो बिछाकर अपनी चादर नमाज पढ़ने लगा । जब वह नमाज पढ़ रहा था । तब 1 स्त्री भागती हुई, अल्हड़ स्त्री उसके नमाज के वस्त्र पर से पैर रखती हुई, उसको धक्का देती हुई वह झुका था । गिर पड़ा । वह भागती हुई निकल गई । अकबर को बड़ा क्रोध आया । सम्राट नमाज पढ़ रहा है । और इस अभद्र युवती को इतना भी बोध नहीं है । जल्दी जल्दी नमाज पूरी की । भागा घोड़े पर । पकड़ा स्त्री को । कहा - बदतमीज है । कोई भी नमाज पढ़ रहा हो । प्रार्थना कर रहा हो । तो इस तरह तो अभद्र व्यवहार नहीं करना चाहिए । फिर मैं सम्राट हूं । सम्राट नमाज पढ़ रहा है । और तूने इस तरह का व्यवहार किया । उसने कहा - क्षमा करें । मुझे पता नहीं कि आप वहाँ थे । मुझे पता नहीं कि कोई नमाज पढ़ रहा था । लेकिन सम्राट  1 बात पूछनी है । मैं अपने प्रेमी से मिलने जा रही हूं । तो मुझे कुछ नहीं दिखाई पड़ रहा है । मेरा प्रेमी राह देखता होगा । तो मेरे तो प्राण वहाँ अटके हैं । तुम परमात्मा की प्रार्थना कर रहे थे । मेरा धक्का तुम्हें पता चल गया ? यह कैसी प्रार्थना ? यह तो अभी प्रेम भी नहीं है । यह प्रार्थना कैसी ? तुम लवलीन न थे । तुम मंत्रमुग्ध न थे । तुम डूबे न थे । तो झूठा स्वांग क्यों रच रहे थे ? जो परमात्मा के सामने खड़ा हो । उसे तो सब भूल जाएगा । कोई तुम्हारी गर्दन भी उतार देता तलवार से । तो भी पता न चलता । तो प्रार्थना । मुझे तो कुछ भी याद नहीं । क्षमा करें । अकबर ने अपनी आत्मकथा में घटना लिखवाई है । और कहा है कि उस दिन मुझे बड़ी चोट पड़ी । सच में ही यह भी कोई प्रार्थना है ? यह तो अभी प्रेम भी नहीं ।
प्रेम का ही विकास, आत्यंतिक विकास, प्रार्थना है ।
अगर तुम्हें किसी व्यक्ति के भीतर परमात्मा का अनुभव होने लगे । और किसी के भीतर तुम्हें अपनी ही झलक मिलने लगे । तो प्रेम की किरण फूटी । तुम जिसे अभी प्रेम कहते हो । वह तो मजबूरी है । उसमें प्रार्थना की सुवास नहीं है । उसमें तो भूखी इंद्रियों की दुर्गंध है ।
लहर सागर का नहीं श्रृंगार । उसकी विकलता है ।
गंध कलिका का नहीं उदगार । उसकी विकलता है ।
कूक कोयल की नहीं मनुहार । उसकी विकलता है ।
गान गायक का नहीं व्यापार । उसकी विकलता है ।
राग वीणा की नहीं झंकार । उसकी विकलता है ।
अभी तो तुम जिसे प्रेम कहते हो । वह विकलता है । वह तो मजबूरी है । वह तो पीड़ा है । अभी तुम संतप्त हो । अभी तुम भूखे हो । अभी तुम चाहते हो कोई सहारा मिल जाए । अभी तुम चाहते हो । कहीं कोई नशा मिल जाए । इसे मैंने प्रेम नहीं कहा । प्रेम तो जागरण है । विकलता नहीं । विक्षिप्तता नहीं । प्रेम तो परम जाग्रत दशा है । उसे ध्यान कहो ।
अगर तुमने प्रेम की मेरी बात ठीक से समझी । तो यह प्रश्न उठेगा ही नहीं कि अगर प्रेम से सत्य मिल सकता है । तो फिर ध्यान की क्या जरूरत है ? प्रेम से सत्य मिलता है । तभी जब प्रेम ही ध्यान का 1 रूप होता है । उसके पहले नहीं । दूसरी तरह के लोग भी हैं । वे भी आकर मुझसे पूछते हैं कि - अगर ध्यान से सत्य मिल सकता है । तो फिर प्रेम की कोई जरूरत है ? उनसे भी मैं यही कहता हूं कि अगर तुमने मेरे ध्यान की बात समझी । तो यह प्रश्न पूछोगे नहीं । जिसको ध्यान जगने लगा । प्रेम तो जगेगा ही ।
बुद्ध ने कहा है - जहां जहॉ समाधि है । वहां वहाँ करुणा है । करुणा छाया है - समाधि की । चैतन्य ने कहा है - जहां जहां प्रेम । जहां जहां प्रार्थना । वहां वहां ध्यान । ध्यान छाया है प्रेम की । ये तो कहने के ही ढंग हैं । जैसे तुम्हारी छाया तुमसे अलग नहीं की जा सकती । ऐसे ही प्रेम और ध्यान को अलग नहीं किया जा सकता । तुम किसको छाया कहते हो ? इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता । ये तो पद्धतियां हैं ।
2 पद्धतियां हैं - सत्य को खोजने की । जो है । उसे जानने के 2 ढंग हैं - या तो ध्यान में तटस्थ हो जाओ । या प्रेम में लीन हो जाओ । या तो प्रेम में इतने डूब जाओ कि तुम मिट जाओ । सत्य ही बचे । या ध्यान में इतने जाग जाओ कि सब खो जाए । तुम ही बचो । 1 बच जाए किसी भी दिशा से । जहां 1 बच रहे । बस सत्य आ गया । कैसे तुम उस 1 तक पहुंचे ? ‘मैं’ को मिटाकर पहुंचे कि ‘तू’ को मिटाकर पहुंचे । इससे कुछ भेद नहीं पड़ता है । लेकिन मन बड़ा बेईमान है । अगर मैं ध्यान करने को कहता हूं । तो वह पूछता है - प्रेम से नहीं होगा ? क्योंकि ध्यान करने से बचने का कोई रास्ता चाहिए । प्रेम से हो सकता हो । तो ध्यान से तो बचें  फिलहाल । फिर देखेंगे । फिर जब मैं प्रेम की बात कहता हूं । तो तुम पूछते हो - ध्यान से नहीं हो सकेगा ? तब तुम प्रेम से बचने की फिक्र करने लगते हो । तुम मिटना नहीं चाहते । और बिना मिटे कोई उपाय नहीं । बिना मिटे कोई गति नहीं ।
20 नवंबर 1976 श्री रजनीश आश्रम पूना ।
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