01 सितंबर 2011

क्षण है द्वार प्रभु का

फाचांग नाम का 1 अदभुत सदगुरु हुआ । उसका इतना ही उपदेश था - अभी यहीं । बस 2 शब्दों का ही उपदेश था । फाचांग मरता था । उसके मरने के समय की घटना है । बिस्तर पर मरणासन्न पड़ा है । अंतिम घड़ियां हैं । शिष्य इकट्ठे हुए हैं । शिष्यों ने सोचा कि जिंदगी भर यह " अभी और यहीं " कहता रहा । अब तो मौत आ गयी । पूछ लें । शायद कुछ और कह दे । तो किसी ने पूछा - वर्तमान में जागरूक होने के सिद्धांत को आप हमें 1 बार " क्षण है द्वार प्रभु का " और समझा दें । फाचांग ने आंख खोली । उसी समय झोपड़ी के छप्पर पर 1 गिलहरी दौड़ी । और उसने चीं-चीं किट-किट की । फाचांग बोला - यही यही । इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं । इट इज जस्ट दिस एंड नथिंग एल्म । मुस्कुराया । आंखें बंद कर लीं । और मर गया ।
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मार्क टवेन ने 1 संस्मरण लिखा है कि वह 1 चर्च में प्रवचन सुनने गया । जब वह प्रवचन सुन रहा था । तो बड़ा प्रभावित हुआ । कोई 5-7-10 मिनट ही बीते थे । वह जो चर्च में बोल रहा था । धर्मगुरु बड़ा प्रभावशाली था । मार्क टवेन ने सोचा कि आज 100 डालर दान कर दूंगा । फिर 10 मिनट और बीते । अब तो उसे सुनने की याद ही नहीं रही । अब वह 100 डालर की सोचने लगा । फिर उसने सोचा कि 100 डालर जरा ज्यादा होते हैं । 50 से ही काम चल जाएगा । फिर और 10 मिनट बीते । फिर वह सोचने लगा । 50 डालर भी । 50 डालर के लायक बात नहीं जंचती । 25 से चल जाएगा । ऐसे सरकता रहा । सरकता रहा । फिर तो 1 डालर पर आ गया । जब आखिरी प्रवचन होने के करीब था । तो 1 डालर पर आ गया । फिर उसने अपने संस्मरण में लिखा है कि तब मुझे खयाल आया । और तब मैं एकदम निकल भागा चर्च से । क्योंकि मुझे डर लगा कि जब चंदा मांगने वाला व्यक्ति थाली लेकर घूमेगा । तो अब मेरी हालत ऐसी हो गयी थी कि मैं थाली में से कुछ लेकर अपनो जेब में न रख लूं । 100 देने चला था । इस डर से जल्दी से चर्च के बाहर निकल आया कि कहीं थाली में से कुछ उठाकर अपनी जेब में न रख लूं ।
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हम ही रोज अपने मुंह में सिगरेट रखकर पीते रहे हैं । और बड़ी मुश्किल से अभ्यास करवाया । पहले दिन पीना शुरू किया था । तो खांसी आ गई थी । तकलीफ हुई थी । तिक्त कड़वाहट फैल गई थी मुंह में । सिगरेट जहर मालूम पड़ी थी । मन को अभ्यास करवाते चले गए ।  फ़िर सिगरेट का अभ्यास मजबूत हो गया । अब हम कहते हैं - छोड़ना है । तो मन कहता है - नहीं । अब तो मजा आने लगा । और यह मजा हमने ही लाया है । यह मजा हमने ही लाया है । मन ने तो पहले ही दिन कहा था कि - क्या कर रहे हो ? यह क्या कर रहे हो ? हमने सुना नहीं । पीए चले गए । अब मन फिर कहेगा कि - यह क्या कर रहे हो ? छोड़ रहे हो ? अब तो रस आने लगा । अब मत छोड़ो । इसमें मन का कोई कसूर नहीं है । हमने ही उसका अभ्यास करवाया है । हमने ही । मन तो सिर्फ यांत्रिक होता है ।
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महात्मा गांधी को जापान से किसी ने 3 बंदर की मूर्तियां भेजी थीं । गांधीजी उनका अर्थ जिंदगी भर नहीं समझ पाए । या जो समझे । वह गलत था । और जिन्होंने भेजी थीं । उनसे भी पुछवाया उन्होंने अर्थ । उनको भी पता नहीं था । आपने भी वह 3 बंदर की मूर्तियां देखीं चित्र में । मूर्तियां भी देखी होंगी । 1 बंदर आंख पर हाथ लगाए बैठा है । 1 कान पर हाथ लगाए बैठा है । 1 मुंह पर हाथ लगाए बैठा है । गांधीजी ने जो व्याख्या की । वह वही थी । जो गांधीजी कर सकते थे । उन्होंने व्याख्या की कि - बुरी बात मत सुनो । तो यह बंदर जो कान पर हाथ लगाए बैठा है । यह बुरी बात मत सुनो । मुंह पर लगाए बैठा है । बुरी बात मत बोलो । आंख पर लगाए बैठा है । बुरी बात मत देखो । लेकिन इससे गलत कोई व्याख्या नहीं हो सकती । क्योंकि जो आदमी बुरी बात मत देखो । ऐसा सोचकर आंख पर हाथ रखेगा । उसे पहले तो बुरी बात देखनी पड़ेगी । नहीं तो पता नहीं चलेगा कि - यह बुरी बात हो रही है । मत देखो । तो देख ही ली । तब तक आपने । और बुरी बात की एक खराबी है कि आंख अगर थोड़ी देख लें । और फिर आंख बंद की । तो भीतर दिखाई पड़ती है । वह बंदर बहुत मुश्किल में पड़ जाएगा । बुरी बात मत सुनो । सुन लोगे । तभी पता चलेगा कि बुरी है । फिर कान बंद कर लेना । तो वह बाहर भी न जा सकेगी अब । अब वह भीतर घूमेगी । नहीं, यह मतलब नहीं है । मतलब यह है । देखो ही मत । जब तक भीतर देखने की कोई जरूरत न बन जाए । सुनो ही मत । जब तक भीतर सुनना अनिवार्य न हो जाए । बोलो ही मत । जब तक भीतर बोलना अनिवार्य न हो । यह बाहर से संबंधित नहीं है । लेकिन गांधीजी जैसे लोग सारी चीजें बाहर से ही समझते हैं । यह भीतर से संबंधित है ।
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1 रात मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी ने कहा कि - 40 साल हो गए विवाह हुए । जब शुरू शुरू में विवाह हुआ था । तो तुम मुझे इतना प्रेम करते थे कि कभी मेरी अंगुलियां काट लेते थे । कभी मेरे ओंठों पर घाव हो जाता था । लेकिन अब तुम वैसा प्रेम नहीं करते । और कल मेरा जन्मदिन है । तो आज तो कुछ वैसा प्रेम करो । मुल्ला ने कहा - सो भी जा । अब रात खराब मत करवा । तो पत्नी नाराज हो गई । उसने कहा - मेरा कल जन्मदिन है । मुल्ला ने कहा - बाहर बहुत सर्दी है । उठना ठीक नहीं । पत्नी ने कहा - उठने की जरूरत क्या है । मैं यहां पास ही हूं । 1 बार तो तुम मेरी अंगुलियों को फिर वैसा काटो । जैसा 40 साल पहले प्रेम में तुमने काटा था । मुल्ला ने कहा - ठीक, नहीं मानती । तो मुल्ला बिस्तर से उठा । पत्नी ने कहा - कहां जाते हो ? उसने कहा - बाथरूम से दांत तो ले आऊं । उम्र ढल जाती । वासनाएं वही चली जातीं । दांत गिर जाते । काटने का मन । कटवाने का मन नहीं गिरता । शरीर सूख जाता । वासना हरी ही बनी रहती है ।
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सुना है मैंने कि मुल्ला नसरुद्दीन पर 1 अंधेरे रास्ते पर 4 चोरों ने हमला कर दिया । मुल्ला ऐसा लड़ा । जैसा कि कोई लड़ सकता था । चारों को पस्त कर दिया । फिर भी 4 थे । हड्डी पसली तोड़ दी चारों की । बामुश्किल वे 4 मुल्ला पर कब्जा पा सके । खीसे में हाथ डाला । तो केवल अठन्नी निकली । तो उन्होंने नसरुद्दीन से कहा कि - भैया, अगर रुपया तेरे खीसे में होता । तो आज हम जिंदा न बचते । हद कर दी तूने भी । अठन्नी के पीछे ऐसी मारकाट मचाई । और हम इसलिए सहे गए । और इसलिए लड़े चले गए कि तेरी मारपीट से ऐसा लगा कि बहुत माल होगा । मुल्ला ने कहा - सवाल बहुत माल का नहीं है । आई कैन नाट एक्सपोज माई फाइनेंशियल कंडीशन टु टोटल स्ट्रैंजर्स । अपनी माली हालत मै बिलकुल अजनबी लोगों के सामने प्रकट नहीं कर सकता । अठन्नी ही है । लेकिन इससे माली हालत तो सब खराब हो गई न । तुम 4 आदमियों के सामने पता चल गया कि अठन्नी । सब बात ही खराब हो गई । इसलिए लड़ा । अगर मेरे खीसे में लाख 2 लाख रुपए होते । तो लड़ता ही नहीं । कहता - निकाल लो ।
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चल हंसा उस देश समद जहां मोती रे ।
मोती समद जहां मोती समद जहां मोती रे ।
चल हंसा उस देश निराला । बिन शशि भान रहे उजियारा ।
लागे ना काल की चोट जगामग ज्योति रे । चल हंसा
जब चलने की करी तैयारी । माया जाल फंस्या अति भारी ।
कर ले सोच विचार घड़ी दोय होती रे । चल हंसा
चाल पड्या जड़ दुविधा छूटी । पिछली प्रीत कुटुंब से टूटी ।
हंसा भरे उड़ान हंसिनी रोती रे ।  चल हंसा
जाय किया समदर में बासा । फेर नहीं आवण की आशा ।
गावै भानीनाथ मोत सिर सोती रे ।
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