25 अगस्त 2011

औरत के दाङी..औरत के दाङी - विनोद त्रिपाठी

इंटरनेशनल राजा ! उस दिन तुमने जब मुझे अकेले में वो बात समझाई थी । समझ गये न वो वाली । तो मैं तुम्हारा प्वाइंट समझ गया था । अब जैसा तुमने समझाया था । वैसे ही होगा । तुम बिल्कुल निश्चिन्त रहो ।
खैर.. अब जरा आज की बात करें । आज मैंने तुमसे 1 जरुरी बात पूछनी थी । तुम भी 1 बात पर बहुत जोर देते हो । मैं भी अब उस बात पर 100% विश्वास करने लगा हूँ । वो बात ये है कि - कोई भी सुख और दुख सिर्फ़ हमारे किये कर्मों के आधार पर हमें मिलता है । कोई व्यक्ति या कैसी भी व्यवस्था सिर्फ़ निमित्त मात्र होते हैं । और ये कर्म गति का सिद्धांत ये सब 1 बहुत बडे लेवल पर गुप्त रूप से अपने आप बडे ही अति कडे अनुशासन की तरह आदिकाल से चल रहा है ।


कल शाम की बात है । मैं, मेरा बाप और नौकर पाण्डु बैठे शराब पी रहे थे । मेरे बापू ने 1 पैग लगाकर अपनी 1 टांग टेबल के उपर रखकर । अपनी 1 आँख बन्द करके गुनगुनाने लगा ।
मैंने उसे कहा - ये जो टेबल पर बोतल शराब की पडी है । ये 250 रुपये की है । अगर तुम्हारी टांग लगने से ये टूट गयी । तो मैं तेरे को तोड दूँगा रे ।
मेरे बाप ने ही.. ही.. ही करते हुये अपनी टांग नीचे कर ली । उधर साला पाण्डु 15 मिनट से रेडियो की .. में उंगली डालकर पता नहीं क्या कर रहा था ।
मैंने उसे भी कहा - या तो कोई बढिया सा गाना लगा ले । नहीं तो फ़ेंक दे इस भैण च.. को गेट से बाहर । पाण्डु भी साला पता नहीं इंसान की कौन सी प्रजाति की नस्ल है । साले का मुँह बिल्कुल गोल है । रंग काला । बाल बिलकुल छोटे । पीछे 1 चुटिया । हमेशा सफ़ेद कुर्ता पजामा पहनता है ।
लेकिन उसके कुर्ते पजामे का स्टायल मेरे को समझ में नहीं आया । साले का कुर्ता न तो बंगाली स्टायल है । और न ही पंजाबी स्टायल । कुर्ते का कालर भी अलग ही स्टायल का है । अचकन टाइप । साला नेताओं जैसा कुर्ता पजामा पहनता है । लेकिन देखने में साला रिक्शावालों का नेता लगता है ।


खैर.. कल शाम जब मैंने देखा कि बापू और पाण्डु के पास आज बैठने का कोई फ़ायदा नहीं । तो मैं अन्दर आकर टी वी देखने लगा । टी वी पर 1 बाबा बैठकर कुछ बोल रहा था । वैसे हिन्दुस्तान में बाबा बनने की खुली छूट है । किसी के पास काम नहीं । तो बाबा बन जाओ । कोई निकम्मा है । तो चलो बाबागिरी कर लेते हैं । अगर जनता को लूटना है । तो बाबा बन जाओ । औरतों से ठरक भोरनी है । तो चलो बाबा बन जाओ । अगर बुढापे में घर वालों ने घर से निकाल दिया । तो चलो बाबा बन जाओ । अगर किस्मत ने च.. दिया । और किसी काम के न रहे । तो बाबा बन जाओ ।
इसी तरह 1 बार 1 पागल सा बाबा आकर किसी रेलगाडी में बैठ गया । टी टी ने उससे टिकट के बारे में पूछा । तो वो साला पागल बाबा बोला - लल्ला हमने टिकटों से क्या लेना है ?
तो टी टी बोला - बाकी लोगो ने टिकट ली है । वो क्या चोर हैं ।


तब वो साला पागल बाबा बोला - हे हे हे लल्ला ! ये सब भी हमारे हैं । तुम भी हमारे हो । ये रेल भी हमारी है । ये जहान जो दिख रहा है । ये भी हमारा है । जो नही दिख रहा । वो भी हमारा है । सब में मैं हूँ । और सब हम में है । सिर्फ़ मैं ही मैं हूँ । और कुछ है ही नहीं । बस सब हमारा है ।
टी टी को गुस्सा आया । और पकड कर उस साले म..च.. को लगा बाहर ले जाने ।
तब वो साला पागल बाबा बोला - लल्ला कहाँ ले जा रहे हो ?
टी टी बोला - पुलिस स्टेशन ।
तब वो साला नकली पागल बाबा घबरा कर बोला - क्यूँ क्यूँ ?
तब टी टी मुस्करा कर बोला - वो कौन सा हमारे बाप का है । वो भी तो तुम्हारा है ।
खैर अपनी म....ने दो । उस नकली पागल बाबा को । अब जरा उस बाबा की बात करें । जिसके बारे में बात करनी थी । तो कल रात टी वी पर 1 बाबा आ रहा था । वो कह रहा था कि - अगर कोई भी दरिद्र है । तो दरिद्र होने में उस बेचारे दरिद्र का कोई दोष नहीं । सब दोष समाज के उच्च वर्ग, सरकार और कानून का है ।
मैंने सोचा कि राजीव बेटे की थ्योरी तो जरा हट के है ।
खैर.. फ़िर उस बाबा का 1 असिस्टेन्ट बोला - हमारे बाबा जी परम तपस्वी और परम योगी हैं ।
राजीव राजा ! ये दो शब्द मैं अपनी तरफ़ से नही लिख रहा । ये कहे थे टी वी पर ।
फ़िर उस आदमी ने कहा कि - शराब और सिगरेट पीने वाले लोगों को दण्ड मिलना चाहिये । उन्हें बेचने वालों को फ़ाँसी पर चढाना चाहिये । हमने आज तक किसी भी शराब या सिगरेट बेचने वाले या इन चीजों का सेवन करने वाले व्यक्तियों से चन्दा या दान कभी नहीं लिया ।
लेकिन बेचारे बाबा को अग्यान शब्द बोलना नहीं आता था । वो अग्यान को अज्यान बोलता था ।
फ़िर उस बाबा का असिस्टेन्ट बोला - ये बाबा जागे हुये हैं ।

मैंने मन में सोचा । हमारा राजीव राजा कौन सा सोया हुआ है ?
फ़िर उसका असिस्टेन्ट बोला - इन बाबा को भगवान ने स्पेशली इस दुनिया में भेजा है । फ़िर वो बाबा खुद ही बोला - मैं राम और कृष्ण का वंशज हूँ ।
मैंने मन में कहा - साले कम से कम इन इतने उत्तम नामों के पीछे " जी " तो लगा दे । सीधा ही नाम लिये जा रहा है ।
मैंने उस बाबा का नाम जान बूझकर नहीं लिखा । क्यूँ कि लिखने की जरुरत नहीं । तुम उसे मेरे से अधिक जानते हो । समझ गये न । वो वाला । हाँ है न । हाँ वही वाला ।
फ़िर उस बाबा ने कहा कि - आने वाला समय सुनहरी आने वाला है ।
मैंने सोचा । मेरा भतीजा राजीव कुमार चतुर्वेदी तो बोलता है कि समय अब आगे ठीक नहीं आने वाला । इसलिये भक्ति करो ।
अब राजीव राजा ! जरा ये बता दो कि तुम्हारी वो वाली बात सही है न कि दुख और सुख कोई दूसरा देने वाला नहीं । सब अपने ही किये कर्मों का नतीजा होते हैं । साथ में ये भी बता दो कि आने वाला समय ठीक है या नहीं ? इसलिये भक्ति की ही इस समय अधिक आवश्यकता है न । लगे हाथ ये भी समझा दो कि परम तपस्वी और परम योगी के क्या मायने हैं ? इस जैसी उपाधि की असल पहुँच कहाँ तक होती है ?


साले अलग अलग किस्म के बाबे कनफ़्यूज कर देते हैं । अपने जो बाबा रामदेव जी हैं । वो अक्सर कहते हैं कि - सरकार बलात्कारी भी है । अब अगर कोई एम. पी आकर कहे - बाबा ! बता मैंने किसका बलात्कार किया है ? कब किया है ? और कैसे किया है ?
ये बार बार बलात्कार बोलकर क्या साबित करना चाहते हो ? तब पता नहीं । बाबा रामदेव जी क्या जवाब दें ।
खैर.. तुम्हारी नयी लिखी प्रेत कहानी मैंने पढी थी । उतनी हारर नहीं थी । लेकिन मुझे मजा आया । उस कहानी की नायिका का इलाज तो तुम जैसा ही कर सकता है । लेकिन मुझे अगली बार मालती से जरुर मिलवाना । मुझे जरा उससे कुछ काम है ।
अब मैं और क्या कहूँ । राजीव राजा ! तुम तो अंतरयामी हो ।
1 बार 1 छोटा सा लडका ( बिलकुल तेरे जैसा । जैसे तुम अपने बचपन में थे ) गाँव से पहली बार किसी छोटे शहर में आया । उस बेचारे ने न तो कभी कोई साधु टायप व्यक्ति देखा था । और न ही कभी किसी सरदार आदमी को देखा था । 1 दिन वो लडका अपने नये निवास स्थान पर दोपहर को छ्त पर पतंग उडा रहा था । सामने थोडा दूर छ्त पर कोई व्यक्ति अपने बाबा रामदेव जी ( जो रामलीला मैदान से भाग लिये थे ) जैसा उस लडके की तरफ़ पीठ करके अपने लम्बे बाल सुखा रहा था । अचानक उस आदमी ने वहाँ से उठकर जाते हुये उस लडके की तरफ़ अपना 


चेहरा घुमा लिया । उसे देख लडका भय से जोर जोर से रोने लगा । और चिल्लाने लगा - औरत के दाङी ....औरत के दाङी...।
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अब राजीव राजा ! जरा ये बता दो कि तुम्हारी वो वाली बात सही है न कि दुख और सुख कोई दूसरा देने वाला नहीं । सब अपने ही किये कर्मों का नतीजा होते हैं । 
- यही महा प्रश्न लक्ष्मण जी और उनके भाई श्री राम के बीच सीताहरण के बाद और बालि वध के बाद सुग्रीव द्वारा राज्य में पहुँच जाने के बाद लक्ष्मण की निराशा और क्षोभ के बाद उठा था । जिसमें लक्ष्मण अब तक की कष्टदायी स्थितियों के लिये कभी कैकयी कभी दशरथ आदि को दोषी ठहरा रहे थे ।
तब भगवान राम ने कहा था - कोऊ न काहू सुख दुख कर दाता । निज कर कर्म भोग सब भ्राता ।
वास्तव में अगर द्वैत से हटकर थोङी देर के लिये बात करें । तो कहीं कोई भगवान etc नहीं बैठा । जो आपको सुख या दुख दे रहा हो । या आपका भाग्य लिख रहा हो । ये सब ऊर्जा ( आत्मा - के प्रभाव से )  के द्वारा पदार्थ matter में घटना घट रही हैं । बहुत ही संक्षिप्त में जिस तरह किसी के इस जीवन से जुङी तमाम बातें तमाम दृश्य AV फ़ाइल्स के रूप में उसकी अंतकरण रूपी मेमोरी में रिकार्ड हैं । उसी तरह तमाम जन्मों का AV Data कारण शरीर रूपी स्टोर रूम में जमा है । जो आपको चेतना की लाइट से प्रतिबिम्बित चित्र दिखाता है ।


अब सुख दुख क्या है ? जो आपको अच्छा लगता है । उसे सुख कह दिया गया है । बुरा प्रतीत होने को दुख नाम दिया गया है । इसको समझना बहुत आसान है । आपने डण्ड पहलवानी बहुत पहले से की । सैर आदि करते हैं । तो उसका फ़ल क्या सिर्फ़ उसी दिन के लिये थोङे ही था । अपनी उस कसरत का फ़ल आपको तब तक मिलेगा । जब तक उसके द्वारा हुआ आंतरिक रासायनिक बदलाव आपके शरीर में रहेगा । इसमें निरंतर योगदान करते रहने से उस क्रियाफ़ल के अनुसार आगे भी लाभ लेंगे । इसके विपरीत विभिन्न व्यसनों से या अस्वास्थय कारी रहन सहन से जिसने शरीर को नुकसान पहुँचाया है । वह स्वयँ को कमजोर हताश ही अनुभव करेगा । कोई इंसान मेहनत से जितना कमा लेता है । उसी अनुपात में सुख उठाता है ।

अब उलझन बस इसलिये हो जाती है कि आपको अपना पिछले जन्मों का किया माया के प्रभाव से याद नहीं रहता । जबकि जीवनधारा निरन्तर प्रवाहित है । उसमें कहीं अवरोध नहीं हैं । बस आत्मा के प्रभाव से अंतकरण में feed हो गया तरह तरह का matter ही समय आने पर अलग अलग रंग दिखाता है । जिसको आप सुख दुख कहते हो । विभिन्न जन्मों की यह यात्रा - एक माँ के पेट में गर्भ धारण से लेकर बच्चे के जन्म तक की परिस्थितियों । और एक बच्चे के जन्म जवानी बुढापा और मृत्यु तक हुये बहुत से बदलाव को देखने पर स्पष्ट समझ में आता है । जैसा इस 1 जन्म का माडल है । वैसा ही आपके लाखों या अब तक हुये जन्मों का खेल है । और ये निरन्तर है । मृत्यु एक आवश्यक परिवर्तन क्रिया ही है । 
साथ में ये भी बता दो कि आने वाला समय ठीक है या नहीं ? इसलिये भक्ति की ही इस समय अधिक आवश्यकता है न । 

- इसका बहुत कुछ उत्तर ऊपर वाले उत्तर में आ जाता है । जिस प्रकार एक शिशु । बालक । किशोर । युवा । अधेङ । वृद्ध । जर्जर और फ़िर मृत्यु । और फ़िर नया जन्म । फ़िर वही चक्र । यह जीवन यात्रा एक घूमते चक्र पर कृमशः हो रही है । जिस प्रकार आपने बच्चों के चाबी वाले खिलौने में कई गरारियाँ एक दूसरे से दाँतों द्वारा जुङी हुयी घूमते हुये देखी होंगी । इसी प्रकार आपका जीवन चक्र यहाँ के कालचक्र ( सूर्य ) से घूमता है । सूर्य का काल चक्र समय के कालचक्र से घूमता है । समय का कालचक्र महाकाल के कालचक्र से घूमता है । अब इसमें एक विलक्षण सिस्टम से चाबी खत्म होते ही खिलौना आटोमेटिक रुक ( मृत्यु ) जाता है । अब जैसे बच्चा जन्म के समय अच्छा लुभावना मनोहारी होता है । फ़िर ज्यों ज्यों करके वह उमृ को प्राप्त होता हुआ विकारी ( मतलव उसमें बच्चे जैसी बात नहीं रहती ) होता जाता है । और जर्जर बुङापा आते आते घृणित सा हो जाता है । फ़िर मृत्यु के बाद तो बदबू ही देने लगता है ।
वैसे ही एक इंसान के जीवन की तरह युग भी जन्म ( शुरू की अवस्था ) शिशु ( सतयुग ) किशोर ( त्रेता ) जवान ( द्वापर ) और बुङापा ( कलियुग ) खण्ड प्रलय ( मृत्यु ) और फ़िर से जन्म । फ़िर से सतयुग ।
अब वैसे तो कलियुग के 22000 वर्ष और शेष हैं । और अभी सिर्फ़ 5000 ही हुये हैं । लेकिन इस सबके लिये नियुक्त प्रमुख शक्ति प्रकृति और उसके विभिन्न अंग किसी शासन प्रशासन की तरह कार्य करते हैं । अतः आपको हर तरफ़ जो असंतुलन दिखाई दे रहा है । उसे संतुलन करने के लिये ये शासन प्रशासन जरूरी कदम उठायेगा । क्योंकि सर्वशक्तिमान आत्मा एक तिनका भर रियायत नहीं करता । अतः पूरी सरकार ही गिर जायेगी । इसलिये बैलेंस के लिये खण्ड प्रलय होगी ही ।

क्यों और कैसे ? ये डिटेल में लिख ही चुका है ।

रही बात विभिन्न बाबाओं द्वारा धरती पर स्वर्ग लाने की । एकदम निराधार है । पब्लिक की याददाश्त बहुत कमजोर है । वरना गाय थ्री परिवार ने कभी दीवालें रंग दी थी । हम बदलेंगे युग बदलेगा । धरती पर यग्य हवन द्वारा स्वर्ग आयेगा । न हम ( लोग ) बदले । न युग बदला । हाँ वे मालामाल होकर इसी प्रथ्वी पर स्वर्ग वासी हो गये । भृम की मारी बहनों ने भी ऐसी ही घोषणा की । बाबा जी ये करेंगे । वो करेंगे । जीवन बगिया में फ़ूल खिलेंगे । उनके आश्रमों में फ़ूल खिल गये । लोगों के गमले ही सूख गये । फ़ाँसाराम बापू आदि ने उनके पुत्र ने भी जाने कितनों का जीते जी ही उद्धार कर दिया । अभी ताजा ताजा दामदेव बाबा ने गाँव गाँव घर घर तक योग पहुँचाने की बात कही । योग तो शायद 10% भी नहीं पहुँचा । उनका धन योग 100% अवश्य हो गया ।
गौर करें । कभी भी कोई कथा भागवत वक्ता । कोई भी आश्रम संचालक । कोई भी साधु कबीर तुलसी आदि आत्मग्यानी सन्तों की वाणी के बिना अभी भी बात नहीं कह पाता । फ़िर इन महान सन्तों ने आज से 500 साल पहले भी ऐसी बात नहीं कही । ओशो के ये पास भी नहीं फ़टक पायेंगे ।
याद करें । ओशो कहते थे - मैं तुम्हें ( दूसरे बाबाओं ) सुख देने नहीं । तुम्हारा सुख छीनने आया हूँ । कबीर कहते थे - अभी भी चेत जा जीव ! तू प्रति क्षण काल के गाल में जा रहा है ।
हाँ ये ठीक है । अच्छा समय 2020 के बाद से ही शुरू हो जायेगा । पर तब ये कहने वाले बाबा भी नहीं होंगे । सुनने वाले भक्त भी नहीं होंगे । फ़िर क्या फ़ायदा ? खण्ड प्रलय में ऊँची भक्ति वाले या हँस जीव ही आगे के निर्माण हेतु बचते हैं ।
लगे हाथ ये भी समझा दो कि परम तपस्वी और परम योगी के क्या मायने हैं ? इस जैसी उपाधि की असल पहुँच कहाँ तक होती है ? 
- ये परम आदि शब्द लोगों ने मनमर्जी से इधर उधर जोङ दिये हैं । वास्तव में एक निर्धन और रोगी कमजोर इंसान से लेकर हाईएस्ट पावरफ़ुल और अत्यन्त धनी इंसान के बीच में इंसान के जो विभिन्न करोंङों लेवल करोंङों स्थितियाँ बनती हैं । वैसी ही भक्ति में करोंङों लेवल करोंङों स्थितियाँ बनती हैं । जो जितना कमायेगा । उतना अच्छा खायेगा । जो सिस्टम यहाँ का है । ठीक वही सिस्टम वहाँ का है । ये स्कूल है । वो नियुक्ति और आफ़िस है । बस गौर से समझने की जरूरत है ।
प्रस्तुतकर्ता - श्री विनोद त्रिपाठी । प्रोफ़ेसर । लाला लाजपत राय नगर । भोपाल । मध्य प्रदेश । ई मेल से ।
- त्रिपाठी जी ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
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