30 जुलाई 2011

माँ को याद करके अकेले में रो लेता हूँ - विनोद त्रिपाठी

मेरे राजीव राजा ! मेरे दिलदार राजा ! मेरे अलताफ़ राजा ! तुम्हारी और तुम्हारे पाठकों की जोरदार माँग पर आज मैं ये लेख अपनी निजी जिन्दगी पर लिख रहा हूँ । तो फ़िर आज खोल दो खिडकी । और तोड दो दरवाजा ।
मेरा नाम है - विनोद त्रिपाठी । मेरी उमर इस साल 51 हो जायेगी । मैं पिछ्ले 25 साल से हिन्दी का प्रोफ़ेसर हूँ । लेकिन लडकियों के कोलेज में । वैसे मेरी किशोरावस्था से 1 ही इच्छा थी कि मैं पुलिस अफ़सर बनूँ ।
खैर..ये इच्छा पूरी नहीं हो सकी । इस बारे में मैं अब बात नहीं करना चाहता । मेरा कद 6 फ़ुट है । और रंग काला ही समझो । जवानी में 400 बैठक और 250 डण्ड लगा लेता था । जवानी में दिन में 2 बार कसरत भी कर लेता था । दौड भी लगाता था । कभी कभी तो रविवार वाले दिन भी कसरत की छुट्टी नहीं करता था । जवानी में सिर्फ़ पहलवानों और बलवानों से दोस्ती रखता था ।
जब 26 साल की उमर में नौकरी शुरू की । उसके 1 साल बाद शादी हो गयी ( धिक्कार है... ) फ़िर धीरे धीरे देसी कसरत कम कर दी । शराब और सिगरेट के शौकीन हो गये ( लेकिन सीमा में रहते हुये ) उसके बाद भी अब तक मैं कभी न कभी कसरत करता ही रहता हूँ । लेकिन शहरी जिम में ।
लेकिन 1 घन्टा सैर ( कभी सुबह कभी शाम ) रोज करता हूँ । खाने पीने का मैं शौकीन हूँ । लेकिन ताकत वाली देसी और शाकाहारी चीजें ही खाता हूँ । सिगरेट मैं सारा दिन नहीं पीता ।

दिन में कभी कभी थोडी सी चुस्ती लाने के लिये बस ऐसे हल्का सा कश लगा लेता हूँ ।
शराब मैं देसी और अंग्रेजी कोई भी पी लेता हूँ । रोज रात को 8 बजे सिर्फ़ 3 मोटे पैग । मैं पुलिस अफ़सर नहीं बन सका । कोई बात नहीं । मेरे कोई औलाद नहीं है । कोई बात नहीं ।
लेकिन मैं भगवान से बिलकुल भी नाराज नही हूँ । उसकी दुनिया है । जैसे मरजी चलाये । मेरे इस वर्तमान जीवन में जो भी दुख, रोग या शोक आदि अगर किसी को नजर आता है ।
तो उसका 1 ही जवाब है कि - भई ! उसका जिम्मेदार असल में मैं खुद ही हूँ । ये सब मुझे मेरे ही पिछ्ले जन्मों में किये हुये कर्मों का फ़ल मिला है ।
मेरे घर मे मेरे पिताजी हैं । उनका नाम हैं - जगन्नाथ त्रिपाठी उर्फ़ जग्गा सेठ ।
उनकी उमर इस साल 76 हो जायेगी । 1 नम्बर के लुच्चे आदमी हैं कि - इतना लुच्चा आदमी मैंने अपनी पूरी जिन्दगी में न सुना । और न देखा । राम राम । वो भी किसी छोटी मोटी सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे ।
मेरी माँ बस ये ही 1 मेम्बर थी । जो सही थी । गाँव की रहने वाली साधारण । कम पढी लिखी । बेहद धार्मिक महिला थी । लेकिन बेचारी कब की मर चुकी बस उसको ही याद करके अकेला कभी कभी रो लेता हूँ ।

मेरी 1 पत्नी है । थू थू थू लानत है । कितने साल हो गये शादी को । अब तक अपना नाम लिखते टाइम अपने आपको " राकेश कुमारी " लिखती है ।
मेरे सास ससुर के 2 बेटियाँ और 1 बेटा है । सास ससुर तो मर चुके हैं । उनकी बडी बेटी यानि मेरी पत्नी अपने बाप पर गयी है ( शक्ल से )  मेरी साली मेरी सास पर गयी है ( शक्ल से )
साला मेरा बीच का है ।
मेरा ससुर देखने में बदसूरत था । और सास मेरी खूबसूरत थी । इसलिये मेरी साली सुन्दर है । और मेरी पत्नी ठीक नहीं है । मेरी शादी से पहले मेरा बाप अक्सर कहता रहता था - बहू तो जैसी मर्जी आ जाये । लेकिन समधन हेमामालिनी जैसी होनी चाहिये ।
बस फ़िर वो ही हो गया ।
हमारे घर में हमारा 1 नौकर है । जो पिछ्ले कुछ साल से हमारे घर काम करता है । उसका नाम है - पान्डु । उसका पूरा नाम है - पान्डू राम पान्डा ।

वो साल में 11 महीने हमारे घर काम करता है । और सिर्फ़ 1 महीने के लिये अपने घर अपने गाँव छुटी को जाता है । तब तक 1 महीना हम लोग कोई काम वाली बाई को लगा लेते हैं ।
कोलेज में मेरे 3 दोस्त हैं । वेदप्रकाश शर्मा ( ये राजनीति शास्त्र का प्रोफ़ेसर है ) पी के सिंगला ( ये इतिहास का प्रोफ़ेसर है )  कान्ती शाह ( ये भूगोल का प्रोफ़ेसर है )
मेरा 1 और दोस्त है । उसका नाम है - मुरलीधर । वो पहले नगर पालिका में नौकरी करता था । लेकिन अब उसने नौकरी छोड दी । अब वो शराब का ठेका चलाता है ।
" बटुक नाथ लल्लन प्रसाद " अखाडे का मालिक भी मेरा दोस्त है । जहाँ मैं कभी कभी जाता रहता हूँ । मुझे 2 जगहों पर घूमना अच्छा लगता है । 1 तो बडी सब्जी मन्डी । और दूसरा नगर पालिका का बनाया सरकारी पार्क ।
रोज रात को मैं । मेरा बाप । और नौकर पान्डु । हम तीनों इकठ्ठे बैठकर शराब पीते हैं ।
मैं 3 मोटे पैग । मेरा बाप सिर्फ़ 2 पैग ( उसको चढ जाती है । इसलिये मैं उसे अधिक नहीं पीने देता ) और पान्डु को भी मैं 1 अच्छा खासा मोटा पैग दे देता हूँ (

बेचारा सारा दिन मेहनत करता है । सेवा करता है ) गर्मियों के मौसम में तो हम लोग अलताफ़ राजा के गाने सुनते हैं । कभी कभी मेरे बाप के कहने पर उसका मनपसन्द गाना " तू चीज बडी बडी है मस्त मस्त " भी लगा लेते हैं ।
सर्दियों में कभी कभी शराब पीते समय मैं " जगजीत सिंह " की गजलें भी लगा लेता हूँ । लेकिन इससे मेरा बाप और नौकर बोर होने लग जाते हैं । मेरी पत्नी घर के काम के अलावा. बाकी समय केबल टी वी पर रोने धोने वाले टी वी सीरीयल देखती रहती है ।
राजीव राजा ! तुम्हारी इस आण्टी के अलावा तेरी 1 और आन्टी भी है । लेकिन 

वो गैर-सरकारी है । मेरा बाप देखने में हिन्दी फ़िल्मों का पुराना विलेन लगता है । बिलकुल जीवन ( फ़िल्मों का पुराना विलेन ) जैसा है ।
हमारा नौकर पान्डु भी देखने में किसी कार्टून से कम नहीं । मोहल्ले वाले भी ठीक ठाक हैं ।
अब मैं तुम्हें अपने बचपन की 1 शरारत बताता हूँ । तुम्हें बेशक ये बात अटपटी लगे । लेकिन मैंने ये शरारत की थी । मैं उस समय सिर्फ़ 10 साल का था । मैं गाँव गया हुआ था । मैं तालाब के पास पडोसी की लडकी के साथ खेल रहा था । वो मेरे से उमर में थोडा सा बडी थी । खेलते खेलते हम दोनों झगड पडे । उस लडकी ने मुझे कोई गाली निकाली । तो मैंने गुस्से में आकर अपनी निक्कर ( हाफ़ पैन्ट ) नीचे करके अपनी नूनी ( लिंग ) के दरशन उसको करवा दिये । वो हँसते हुये भाग गयी ।
पता नहीं कहाँ से उसी समय मेरा बाप पीछे से आ गया । मैंने फ़टाफ़ट अपनी निक्कर ऊपर कर ली ।
मेरा बाप थोडा नकली गुस्से से बोला - ओये क्या कर रहा था ।
मैंने कहा - मैंने तो कुछ नहीं किया ।
तब वो बोला - मैंने देख लिया था । तूने शरारत की थी ।
मैंने कहा - नहीं नहीं । मैंने कोई शरारत नहीं की ।
तब वो मेरा उपहास उडाने के अन्दाज में बोला - तू मुझे क्या सिखायेगा । मैं सब जानता हूँ । 4 आँखें हैं मेरी ।

पता नहीं कैसे उस समय मेरे मुँह से अचानक ही निकल गया - क्या 4 आँखें है । 2 तो मुँह पर लगी हैं । 2 क्या ग... पर लगी हैं ।
राजीव राजा ! तुम अन्दाजा लगा लो कि उस समय मेरी कितनी पिटाई हुई होगी ।
खैर.. ये मेरी जिंदगी की शानदार शरारत थी ।
बातें तो अब पूरी जिन्दगी भर की लिखने लग जाओ । तो पूरी किताब भी कम पडेगी ।
बस जाते जाते पाठकों को सन्देश देना चाहता हूँ कि - मेरे लिखे लेख आपको थोडा अधिक खुले हुए लगते हैं । उन लेखों को छापने से पहले राजीव राजा, उनकी एडिटिंग करता है ( तब जाकर छापने योग्य बनते हैं )  लेकिन राज की बात ये है कि - राजीव को लेख मैं बहुत सन्कोच से लिखता हूँ । जिनको ये बेचारा मुश्किल से छापने योग्य बनाकर फ़िर छापता है । वो भी आप लोगों को थोडे से वो वाले लगते हैं । अगर मैं सचमुच दिल खोलकर लिख दूँ । और राजीव राजा उन्हें ज्यों का त्यों छाप दे  । तो फ़िर तो इस ब्लाग के ही चटाके पटाके हो जायेंगे ।

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प्रस्तुतकर्ता - प्रोफ़ेसर श्री विनोद त्रिपाठी । भोपाल । मध्य प्रदेश । ई मेल से ।
- आपका बहुत बहुत धन्यवाद त्रिपाठी जी । मेरा ख्याल है । हमारे तमाम पाठकों को आपके वारे में जानकर अच्छा लगेगा ।
इस लेख में जो आपने आत्मा की आवाज -  ( ...मैं पुलिस अफ़सर नहीं बन सका । कोई बात नहीं । मेरे कोई औलाद नहीं है । कोई बात नहीं ।
लेकिन मैं भगवान से बिलकुल भी नाराज नही हूँ । उसकी दुनिया है । जैसे मरजी चलाये । मेरे इस वर्तमान जीवन में जो भी दुख, रोग या शोक आदि अगर किसी को नजर आता है ।
तो उसका 1 ही जवाब है कि - भई ! उसका जिम्मेदार असल में मैं खुद ही हूँ । ये सब मुझे मेरे ही पिछ्ले जन्मों में किये हुये कर्मों का फ़ल मिला है । )
.......कही । यह मुझे बहुत अच्छी लगी । क्योंकि ये बहुत ही बङा सत्य है । हम अपनी किसी बात को भगवान को दोष देते हैं । जबकि सब किया धरा हमारा ही होता है । फ़िर जब ऐसा बोध होने लगता है । यानी उसकी रजा में हमारी रजा हो जाती है । और हम समर्पण हो जाते हैं । तब - उसकी रजा में रजा । तो कट गयी सजा । और - उसकी रजा से ना रजा । तो बङ गयी सजा ।
आप एक बार उसके बनाये - सत्य दया ईमान दान आदि थोङे ही गुण अपनाकर देखिये । कुछ दिन तो कष्ट महसूस होता है । फ़िर जीवन की बगिया में फ़ूल खिल उठते हैं । सुन्दर रंग बिरंगे फ़ूल ।
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