19 जुलाई 2011

जब लगि करता मेरी मेरी तब लगि बात बने ना तेरी

जब लगि जानै मैं कुछ करता । तब लगि गर्भ जोनि में फ़िरता ।
यह जीव जब तक ऐसा सोचता है कि - मैं ही सब कुछ करने वाला हूँ । तब तक वह 84 लाख योनियों में ही भटकता है । और गर्भ में वास करता है । अर्थात मुक्त नहीं हो सकता ।
जब लगि करता मेरी मेरी । तब लगि बात बने ना तेरी ।
जव तक यह मोह माया और मेरा मेरा करता रहता है । तब तक कभी सदगति को प्राप्त नहीं होता ।
सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिमि हरि शरण न एक हू बाधा ।
जिस तरह समुद्र के समान बहुत सा जल होने पर मछली सुख को प्राप्त होती है । उसी प्रकार प्रभु की भक्ति से भी जीवन में कोई कष्ट बाधा उत्पन्न नहीं होती ।
भाव कुभाव अनख आलस हू । नाम जपत मंगल सब दिस हू ।
भाव से कुभाव से आलस्य से बेमन से भी जो इस सत्यनाम को जपता है । उसके लिये हर तरफ़ आनन्द मंगल ही हो जाता है ।
पानि जोरि आगे भइ ठाढ़ी । प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी ।
- ये प्रसंग शबरी का है । जब राम उसके आश्रम में पहुँचे । तो वह हाथ ( पानि ) जोङकर उनके आगे खङी हो गयी । और राम को देखकर उसके दिल में अत्यन्त प्रेम उत्पन्न हुआ ।
केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी । अधम जाति मैं जड़मति भारी ।
तब वह बोली - हे नाथ ! किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ । मैं नीच जाति में उत्पन्न हुयी हूँ । और मुझे अधिक बुद्धि ग्यान भी नहीं हैं ।
अधम ते अधम अधम अति नारी । तिन्ह मह मैं मतिमंद अघारी ।
हे नाथ ! मैं नीच में भी और भी नीच प्रकार की हूँ । और उस पर एक औरत हूँ । ( शास्त्र सामान्यतः औरत को भक्ति के मामले में बुद्धिहीन और पापी मानते हैं ) उनमें भी मैं बुद्धिहीन और पापिनी हूँ ।
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता । मानउ एक भगति कर नाता ।
तब राम बोले - हे प्रिये ! सुनों । मैं सिर्फ़ एक भक्ति का ही भाव देखता हूँ । अन्य बातों से मुझे कोई मतलब नहीं हैं ।
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई । धन बल परिजन गुन चतुराई ।
हे शबरी ! जाति कुल खानदान धर्म प्रतिष्ठा बङाई मान सम्मान धनी शक्तिशाली भरा पूरा परिवार गुण और चतुरता  ( इनसे मुझे कोई मतलब नहीं हैं )
भगति हीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ।
हे शबरी ! ये सब होते हुये भी ( ऊपर लिखी चीजें ) भक्तिहीन ( भक्ति न करने वाला ) इंसान उसी प्रकार शोभा पाता है । जैसे बिना पानी का बादल । अर्थात ये सब मेरे लिये बेकार है ।
नवधा भगति कहउ तोहि पाही । सावधान सुनु धरु मन माही ।
इसलिये हे शबरी ! मैं तुझसे नवधा भक्ति ( 9 प्रकार की भक्ति ) कहता हूँ । उसे तू सावधानी से सुनते हुये मन में याद रखना ।
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा । दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ।
हे शबरी ! पहली भक्ति संतो का संग करना यानी उनके साथ सतसंग में कुछ समय बिताना है । और दूसरी मेरी कथाओं यानी भक्ति वर्णन को प्रेम से सुनना है ।
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान । चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ।
गुरु के चरणों का ध्यान और भक्ति भाव से बिना किसी अभिमान के उनकी सेवा करना हे शबरी तीसरे प्रकार की भक्ति है । तथा बिना किसी कपट चालाकी के सरल ह्रदय से मेरे गुणों का वर्णन करना मेरी चौथी भक्ति है ।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा ।
हे शबरी ! दृण विश्वास से मेरे निर्वाणी महामंत्र का जाप मेरी पाँचवी भक्ति है । जिसको वेदों में बताया गया है ।
छठ दम सील बिरति बहु करमा । निरत निरंतर सज्जन धरमा ।
निरंतर सज्जनों के धर्म का आचरण करते हुये बहुत सी व्यर्थ की कामनाओं का दमन तथा स्वभाव में शीलता और बहुत से कर्मों से विरत होना ( दूर रहना ) हे शबरी मेरी छठवीं भक्ति है ।
सातव सम मोहि मय जग देखा । मोते संत अधिक करि लेखा
हे भामिनी ! इस संसार के सभी जीवों में मुझे ही देखना और साधु सन्तों को मुझसे भी बङकर मानना मेरी सातवीं भक्ति है ।
आठव जथा लाभ संतोषा । सपनेहु नहिं देखइ परदोषा ।
हे शबरी ! जितना भी लाभ धन सुख साधन हो । उसी में संतोष रखे । और स्वप्न में भी दूसरे के दोष पर विचार न करे । ये मेरी आठवीं भक्ति है ।
नवम सरल सब सन छलहीना । मम भरोस हिय हरष न दीना ।
हे शबरी ! सबके साथ सरल और छल कपट रहित व्यवहार करते हुये । और मुझ पर ही अटल विश्वास रखते हुये अपने ह्रदय में सुख और दुख दोनों में समान ही रहे । व्यथित न हो । ये मेरी नवीं भक्ति है ।
नव महु एकउ जिन्ह के होई । नारि पुरुष सचराचर कोई ।
हे शबरी ! इन नौ भक्ति में से एक भी जिसके अन्दर होती है । वह इस सकल सृष्टि में स्त्री पुरुष कोई भी क्यों न हो ।
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे । सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे ।
हे भामिनी ! वह मुझे अत्यन्त प्रिय ही है । फ़िर तुझ में तो यह सभी की सभी ही हैं ।
मम दरसन फल परम अनूपा । जीव पाव निज सहज सरूपा ।
हे शबरी ! मेरे दर्शन का फ़ल परम अनुपम है । जब कोई भी जीव अपने सहज स्वरूप ( आत्म स्वरूप ) में स्थित होने लगता है । तब वह मेरा दर्शन पाता है ।
परहित बस जिन्ह के मन माही । तिन्ह कहु जग दुर्लभ कछु नाही ।
जो दूसरे का भला ही सोचते हैं । और जिनके मन में बस परमार्थ की ही भावना है । उनके लिये इस संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है ।
कोमल चित अति दीनदयाला । कारन बिनु रघुनाथ कृपाला ।
उन दीनदयाल प्रभु का अति कोमल ह्रदय है । वे रघुनाथ जी बिना कारण ही सब पर कृपा करते हैं ।
सुनहु उमा ते लोग अभागी । हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ।
इसलिये हे पार्वती ! ( शंकर जी बोले ) वे लोग अत्यन्त अभागे ही हैं । जो ऐसे दयालु प्रभु से मन हटाकर विषय वासनाओं में पङे जीवन को बरबाद करते हैं ।
अब प्रभु कृपा करहु यहि भांती । सब तजि भजन करहु दिन राती ।
सुग्रीव बोला - हे प्रभु ! अब आप ऐसी कृपा करिये कि मैं सब इच्छाओं वासनाओं को त्याग कर निरंतर आपका ही भजन करूँ ।
सनमुख होय जीव मोहि जबही । कोटि जन्म अघ नासो तबही ।
आत्मस्वरूप में स्थित होकर जैसे ही जीव मेरे सन्मुख होता है । मैं उसके करोंङो जन्मों के पाप नष्ट कर देता हूँ ।
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