22 जून 2011

वो भी बता दें ..जो मेरे को नहीं पता ।

राजीव जी ! प्लीज साइड पर हो जाईये । मैंने बुलेट चलाना नया नया सीखा है । मुझे ठीक से अभी ब्रेक लगानी नहीं आती ।
नमस्ते राजीव जी ! ये तो मैं मजाक कर रही थी । मैं आज आपसे ये पूछना चाहती हूँ कि लास्ट टाइम जो आपने मेरे सवालों के जवाब दिये थे । उसमें आपने कहा था कि - वास्तव में शरीर भी पूरी तरह खत्म नहीं होता । सिर्फ़ उसका स्थूल आवरण ही उतरता है ।
मैं आपसे ये जानना चाहती हूँ कि - अगर किसी की मौत बम के विस्फ़ोट से भी हो जाये । अगर उसके चिथडे चिथडे भी हो जायें । क्या तो भी सिर्फ़ स्थूल आवरण ही नष्ट होता है ? क्या सूक्ष्म शरीर पर बिल्कुल भी प्रभाव नहीं पडता ?
ये जो अंतःकरण है । यानि मन । बुद्धि । चित्त और अहम । क्या ये अंतःकरण भी एक प्रकार का सूक्ष्म शरीर ही है ?
आपके अनुसार 6 शरीर होते हैं । क्या स्थूल शरीर के अन्दर एक से अधिक सूक्ष्म शरीर हैं । वो सब क्या हैं ? और कितने प्रकार के हैं ? स्थूल शरीर तो 5 तत्व का बना होता है । इसलिये इसको भूख । नींद । सेक्स आदि की जरूरत होती है ।
लेकिन क्या सूक्ष्म शरीर को भी भूख । प्यास । नींद । थकावट । सेक्स आदि की जरुरत होती है । सूक्ष्म शरीर की जरुरतें क्या क्या होती हैं ? जब तक कोई आत्मा सूक्ष्म शरीर में होती है ( स्थूल शरीर छूट जाने के बाद ) और जब तक उसको अगला जन्म नहीं मिल जाता । क्या तब तक उस सूक्ष्म शरीर के ( प्रतिबिम्ब के आधार पर ) आधार पर वो आत्मा अपने आपको वही व्यक्ति समझती है । जो वो पीछे छूट गये जन्म में थी ।

जैसे सत्यलोक या अमरलोक या सच्चखन्ड में स्थूल शरीर नहीं जा सकता । वो आत्म लोक है । वहाँ सिर्फ़ आत्मा ही जा सकती है । तो क्या वहाँ सूक्ष्म शरीर भी नहीं जा सकता ? क्या सूक्ष्म शरीर भी जब उतर जाता है । और आत्मा अपने वास्तविक शुद्ध स्वरूप में आ जाती है । क्या तब मोक्ष होता है । क्या सत्यलोक पहुँच जाना ही असली मोक्ष है ? क्या सत्यलोक ही हमारा ( आत्माओं का ) सच्चा । निज और अनादि लोक या घर है ?

ये भी बतायें कि - सत्यलोक की भाषा क्या है ? क्युँ कि इस संसार में तो अनेक भाषायें है । जो सब प्रकृति के आधार पर बनी हैं ( सामाजिक ढांचे के अनुसार )  क्या सत्यलोक की भाषा मौन है ? यानि साइलेंस । क्युँ कि कुछ लोग कह देते हैं कि - परमात्मा तो मौन की भाषा समझता है ।
बाकी ये तो मैंने आपके लेखों मे पढ ही लिया था कि - सत्यलोक या सच्चखन्ड में आत्मायें अमृत का आहार करती हैं । आखिर में ये भी बता दें कि - जैसे इस दुनियाँ को संसार बोला जाता है । उसी तरह क्या उस संसार ( सत्यलोक या सच्चखन्ड ) को महा संसार बोलना ठीक होगा ? क्या कही परम संसार भी होता होगा ?
मैं ये भी जानना चाहती हूँ । क्या जीवन ( अगर गहराई से समझें ) वाकई अनन्त है ? क्या वाकई जीवन का या जीवन की शुरुआत का वास्तव में न कोई आदि है । और न ही इसका अन्त । क्या जीवन आदि अन्त रहित है । क्या जीवन को भी अनादि और अनन्त कहना ठीक होगा । मेरा मतलब जन्म फ़िर मौत फ़िर जन्म ( लगातार जनम मरण । फ़िर जन्म का अन्तहीन सिलसिला ) आप मेरी इन सभी जिग्यासाओं का दिल खोलकर खुलासा कर दें । वो भी बता दें । जो मेरे को नहीं पता । क्युँ कि आपका संग करने से ही मेरा अग्यान मिटेगा । अगर आपने मेरी जिग्यासा दूर नहीं की । तो मैं फ़िर बुलेट चलाती हुई सीधा लुधियाना से आगरा पहुँच जाऊँगी । तब फ़िर आप चाय के साथ समोसे और रसगुल्ले तैयार रखना । ओ के जी ।

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मैं आपसे ये जानना चाहती हूँ कि - अगर किसी की मौत बम के विस्फ़ोट से भी हो जाये । अगर उसके चिथडे चिथडे भी हो जायें । क्या तो भी सिर्फ़ स्थूल आवरण ही नष्ट होता है ? क्या सूक्ष्म शरीर पर बिल्कुल भी प्रभाव नहीं पडता ?


- बम विस्फ़ोट तो मामूली चीज है । अगर जवालामुखी के खौलते लावे में इंसान गिर जाये । तो भी सूक्ष्म शरीर पर कोई असर नहीं होता । ये एक तरह से अहम केन्द्रक पर विचार के अणु परमाणु से निर्मित होता है ।
ये जो अंतःकरण है । यानि मन । बुद्धि । चित्त और अहम । क्या ये अंतःकरण भी एक प्रकार का सूक्ष्म शरीर ही है ?
- बिलकुल सही जबाब । आपको मिलते हैं 1 लाख । अगला सवाल 3 लाख के लिये । अंतःकरण ही सूक्ष्म शरीर है ?

आपके अनुसार 6 शरीर होते हैं । क्या स्थूल शरीर के अन्दर एक से अधिक सूक्ष्म शरीर हैं । वो सब क्या हैं ? और कितने प्रकार के हैं ? स्थूल शरीर तो 5 तत्व का बना होता है । इसलिये इसको भूख । नींद । सेक्स आदि की जरूरत होती है । लेकिन क्या सूक्ष्म शरीर को भी भूख । प्यास । नींद । थकावट । सेक्स आदि की जरुरत होती है । सूक्ष्म शरीर की जरुरतें क्या क्या होती हैं ?
- 6 शरीर कृमशः स्थूल । सूक्ष्म । कारण । महाकारण । कैवल्य । वास्तव में आपने ठीक से नहीं समझा । या अनुभव किया । स्थूल ( मोटा ) शरीर केवल एक यंत्र आकार है । असली इंजन सूक्ष्म शरीर ही है । कार के इंजन को पेट्रोल आयलिंग आदि की आवश्यकता होती है । न कि बाडी सीट आदि को । अतः ऊपर की जरूरतें असल रूप में स्थूल शरीर की न होकर सूक्ष्म की अधिक होती हैं । जो भी भोजन आदि का सार तत्व निकलता है । उसको सूक्ष्म शरीर ही लेता है । और इस सार में से भी जो अन्य रसायन आदि बनते हैं । वह बाडी को सप्लाई करता है । 5 तत्व की पूर्ति भी इसी तरीके से होती है । जैसे शरीर में पानी की कमी होने पर ग्लुकोज चढाना ।

जब तक कोई आत्मा सूक्ष्म शरीर में होती है ( स्थूल शरीर छूट जाने के बाद ) और जब तक उसको अगला जन्म नहीं मिल जाता । क्या तब तक उस सूक्ष्म शरीर के ( प्रतिबिम्ब के आधार पर ) आधार पर वो आत्मा अपने आपको वही व्यक्ति समझती है । जो वो पीछे छूट गये जन्म में थी ।
आत्मा पर यदि माया का परदा न हो । तो उसे न सिर्फ़ अपना सभी जन्मों का पूरा इतिहास पता होता है । बल्कि और भी बहुत कुछ पता होता है । सूक्ष्म शरीर में पिछला जन्म पता रहता है ।

जैसे सत्यलोक या अमरलोक या सच्चखन्ड में स्थूल शरीर नहीं जा सकता । वो आत्म लोक है । वहाँ सिर्फ़ आत्मा ही जा सकती है । तो क्या वहाँ सूक्ष्म शरीर भी नहीं जा सकता ?
- हरेक लोक में सूक्ष्म शरीर ही जाता है । परन्तु लोक उपाधि या जरूरत के अनुसार इनका आवरण कई तरह का होता है । जैसे संसार में ड्रेस होती है । कैदी । जेलर । पुलिसमेन । स्टूडेंट etc मुक्त आत्मा ( ओनली सोल ) कुछ अलग सा मैटर है । बहुत विलक्षण खेल है भाई ।

क्या सूक्ष्म शरीर भी जब उतर जाता है । और आत्मा अपने वास्तविक शुद्ध स्वरूप में आ जाती है । क्या तब मोक्ष होता है । क्या सत्यलोक पहुँच जाना ही असली मोक्ष है ? क्या सत्यलोक ही हमारा ( आत्माओं का ) सच्चा । निज और अनादि लोक या घर है ?
- सत्यलोक पहुँचकर जीव ( शब्द पर ध्यान दें ) मुक्त हो जाता है । सत्यलोक ही असली घर है । असली मोक्ष बहुत ऊपर है । जो किसी बिरला को ही मिलता है । सार शब्द जब आवे हाथा । तब तब काल नवावे माथा । यह असली मोक्ष है ।

ये भी बतायें कि - सत्यलोक की भाषा क्या है ? क्युँ कि इस संसार में तो अनेक भाषायें है । जो सब प्रकृति के आधार पर बनी हैं ( सामाजिक ढांचे के अनुसार )  क्या सत्यलोक की भाषा मौन है ? यानि साइलेंस । क्युँ कि कुछ लोग कह देते हैं कि - परमात्मा तो मौन की भाषा समझता है ।
- आप चिंता न करें । एक आटोमैटिक सिस्टम से हम ( साधक ) जहाँ भी पहुँचते है । वह भाषा खुद ही आ जाती है । जैसे आप मेरे ब्लाग को ही सिलेक्ट लेंगुएज ट्रान्सलेसन द्वारा कई भाषाओं में बदल सकते हैं । सत्यलोक में मौन नहीं है । आराम से बातचीत खेलकूद आदि सब आनन्दमय व्यवस्था है । परमात्मा से मैं रोज ही फ़ोन ( हाटलाइन पर भाई ) पर बात करता हूँ ।


जैसे इस दुनियाँ को संसार बोला जाता है । उसी तरह क्या उस संसार ( सत्यलोक या सच्चखन्ड ) को महा संसार बोलना ठीक होगा ? क्या कही परम संसार भी होता होगा ?
- संसार का निर्माण संशय भाव संशय बेस पर हुआ है । संशय का ही नाम संसार है । संशय से ही संसार बना है । सचखंड में संशय नाम की कोई चीज नहीं होती । वहाँ सिर्फ़ आनन्द ही आनन्द है । इसलिये उसे आनन्दधाम कहते हैं । परम का मामला विलक्षण है । वो VVIP क्षेत्र हरेक के लिये नहीं हैं । भले ही आपको खुद कबीर साहब या नानक साहब ने हँसदीक्षा क्यों न दी होती । उसके लिये खुद को मिटाना होता है । कबिरा खङा बजार में लिये लुकाठी हाथ । जो घर फ़ूकें आपना चले हमारे साथ । यह चीज हो ।

क्या जीवन ( अगर गहराई से समझें ) वाकई अनन्त है ? क्या वाकई जीवन का या जीवन की शुरुआत का वास्तव में न कोई आदि है । और न ही इसका अन्त । क्या जीवन आदि अन्त रहित है । क्या जीवन को भी अनादि और अनन्त कहना ठीक होगा । मेरा मतलब जन्म फ़िर मौत फ़िर जन्म ( लगातार जनम मरण । फ़िर जन्म का अन्तहीन सिलसिला )
- जीवन यात्रा का आदि अन्त दोनों ही है । भले ही आप करोंङों जन्म करोंङों योनियों में भटकते रहें । प्रलय और सृष्टि में नये सिरे से शुरूआत और विनाश हो जाता है । ग्यान के बिना और मुक्त न होने तक ये ऐसे ही चलता रहेगा ।


आप मेरी इन सभी जिग्यासाओं का दिल खोलकर खुलासा कर दें । वो भी बता दें । जो मेरे को नहीं पता । क्युँ कि आपका संग करने से ही मेरा अग्यान मिटेगा । अगर आपने मेरी जिग्यासा दूर नहीं की । तो मैं फ़िर बुलेट चलाती हुई सीधा लुधियाना से आगरा पहुँच जाऊँगी । तब फ़िर आप चाय के साथ समोसे और रसगुल्ले तैयार रखना । ओ के जी ।
वो भी बता दें । जो मेरे को नहीं पता - आपको ये नहीं पता कि ये बुलेट चल नहीं रही । बल्कि खङी है । और चाय के साथ रसगुल्ले खाने से चाय फ़ीकी लगती है । फ़िर भी खाना चाहो । तो आपकी मर्जी ।
सभी बँधुओं से - बस आप इतना ध्यान रखिये । मैं एक शुद्ध चैतन्य आत्मा हूँ । और परमात्मा परम और शाश्वत सत्य है । बाकी बना बिगङी प्रकृति में हो रही है । जिसको मन महसूस कर रहा है । आत्मा से इसका कोई लेना देना नहीं है ।
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