18 जून 2011

जब गुरु मिलें बन्दीछोर रे

गुरु पर विश्वास किये बिना जीव भवसागर से नहीं तरता । गुरु पर विश्वास बिना तो वह जीव नरक में ही पङता है । हे धर्मदास ! गुरु के समान दान ( मुक्ति दान ) देने वाला और कोई नहीं है । अतः गुरु के चरणों में अपना मन लगाकर रखो । सदगुरु ही नीच वृति और पाप कर्म की गति से छुङाकर ग्यान के स्वरूप को दिखाता है । क्योंकि ग्यान से ही मुक्ति होती है ।
सदगुरु हँस जीव को भक्ति पक्की कराकर सत्यनाम प्रदान करते हैं । और दुष्ट शत्रु मित्र ( काल पुरुष यमदूत आदि ) की पहचान कराकर जीव को उसके निज घर सतलोक भेज देते हैं । मुक्ति दान देने वाले समर्थ सदगुरु और सत्यपुरुष दो नहीं हैं । परन्तु जो निश्चय करके माने । उस सुपात्र शिष्य को अमरलोक जाने का सही चिह्न मिलता है । और उसका सब काल कलेश दुख द्वंद मिट जाता है ।
हे धर्मदास ! सगुण भाव के भक्तों की श्रद्धा भक्ति देखो कि किस प्रकार वे पक्का भरोसा और विश्वास करते हैं । उनके भक्ति कर्म युक्त जीवन को देखो । और विचार करो कि किस प्रकार वे अपने इष्ट के प्रति पूर्ण विश्वास करते हैं । तथा उसमें स्थित रहते हैं ।

ये मनुष्य खुद ही मिट्टी लेकर आता है । और उस मिट्टी से देवी । देवता । बृह्मा । विष्णु । गणेश । महेश । दुर्गा । काली । लक्ष्मी आदि मूर्तियाँ बनाता है । फ़िर उस मूर्ति को सुन्दर वस्त्र गहनों आदि से सजाता है । और फ़िर उसको कर्ता बताता है । तब मूर्तियाँ किसने बनाईं ? उस मूर्ति पर अक्षत और फ़ूल आदि चङाता है । और फ़िर प्रेम और विश्वास से उस मूर्ति का ध्यान अपने मन में लाता है ।
सगुण भक्त उस मूर्ति को कर्ता मानकर स्थापना करता है । जिससे उसका विश्वास कभी भंग नहीं होता । जैसे धोखे में । अनजाने में उस जङ मूर्ति से उसका प्रेम सम्बन्ध हो जाता है । फ़िर वही प्रेम सजीव होकर जागृत स्वरूप में प्रकट होता है । तब वह भक्त जीव अत्यन्त अनमोल और महत्वपूर्ण हो जाता है । और वह हँस स्वरूप अपने इष्टदेव का अति प्रिय हो जाता है । ऐसे भक्त जीवों के प्रेम की भी सदा प्रशंसा बङाई होती है । जोकि दृणता से धोखे से लिपटे हुये हैं ।
अग्यान अँधकार को नष्ट कर ग्यान प्रकाश में लाने वाला । जङ चैतन्य और सत्य असत्य का बोध कराने वाला होने से मैं स्वयँ गुरु कहलाया । सदगुरु और सत्यपुरुष भिन्न नहीं है । परन्तु जीव यदि काल के वश होकर रहेगा । तो वह झूठ और अग्यान में फ़ँसा रहेगा । और विश्वास से गुरु को नहीं मानेगा ।
जब अग्यानी जीव को सदगुरु की चैतन्य मूर्ति पर विश्वास नहीं आता । तो वह जङ मूर्ति के धोखे में पङा रहकर शून्य 0  में अपना मन लगाकर ध्यान करता है । परन्तु उसे कभी शान्ति प्राप्त नहीं होती । लेकिन जो निश्चय पूर्वक सदगुरु की भक्ति प्रण के समान करता है । उसकी निसंदेह मुक्ति होती है । और उसकी मुक्ति टाले से भी नहीं टलती ।

इस तरह जो सदगुरु पर विश्वास पक्का करता है । और सद्गुरु को छोङकर अपना मन किसी दूसरे में नहीं लगाता । ऐसी रहनी का वह अनमोल उच्च जीव ग्यान स्वरूप हँस हो जाता है । जो गुरु के प्रेम के रंग में अपना तन मन रंग लेता है ।
समर्पित शिष्य का ऐसा प्रेम जानकर सदगुरु उसको अमृतवाणी ( खास शिष्यों को खास तौर पर बताये जाने वाले रहस्य सूत्र और उपलब्धियाँ प्रदान कराना - राजीव ) का सद उपदेश करते हैं । जिसका पान करने से आगे पीछे के जन्म जन्मांतर की दुष्ट बुद्धि की खानि दूर हो जाती है ।
हे धर्मदास ! ह्रदय में विचार करो । चैतन्य गुरु की मूर्ति और जङ मूर्ति में क्या अंतर है । 
इसलिये दुर्लभ सदगुरु मिल जाने पर दृणता से विश्वास बनाये रखो । इस तरह गुरु के श्री चरणों में विश्वास पक्का करके पवित्र प्रेम को स्थिर करें । और ह्रदय में सदगुरु के ग्यान का दीपक जलाकर समस्त मोह अंधकार को नष्ट करें । सदगुरु के चरण कमलों की धूल के प्रताप से पाप अग्यान आदि का निश्चय ही नाश हो जाता है ।
क्योंकि सदगुरु के ग्यान के अलावा भवसागर से पार होने का कोई उपाय नहीं है । काल निरंजन की पत्नी आदि शक्ति और काल निरंजन के तीनों पुत्र बृह्मा विष्णु महेश द्वारा चार प्रकार की मुक्ति के नाम पर जीवों को छला और ठगा ही जाता है । और उसको मुक्ति माने भी । तो ये इतनी कठिन है कि - असंभव के समान ही है । जबकि परमात्मा की नाम भक्ति सदगुरु द्वारा मिलने पर मुक्ति अत्यन्त सहज और सर्व सुलभ है ।
भक्ति की महिमा कहहुँ बखानी । सुगम पँथ मोहि पावहि प्राणी । मेरे इस सत्य शब्द उपदेश पर विश्वास करो ।
यह भवसागर मन बुद्धि की पहुँच से परे अगम अथाह है । इसलिये सदगुरु द्वारा दिये नाम को मजबूती से पकङे रहोगे । तो सदगुरु की कृपा से इसकी थाह पा लोगे । परन्तु यदि गुरु सत्य ग्यान वाणी बोलने वाला बन्दीछोङ हो ।
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