13 जून 2011

समुद्र और राम की दुश्मनी का कबीर द्वारा निबटारा

तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! इससे आगे क्या हुआ ? वह सब भी मुझे सुनाओ ।
कबीर साहब बोले - उस समय राजा इन्द्रदमन उङीसा का राजा था । राजा इन्द्रदमन अपने राज्य का कार्य न्यायपूर्ण तरीके से करता था ।
द्वापर युग के अंत में श्रीकृष्ण ने प्रभास क्षेत्र में शरीर त्यागा । तब उसके बाद राजा इन्द्रदमन को स्वपन हुआ । स्वपन में श्रीकृष्ण ने उससे कहा । तुम मेरा मंदिर बनबा दो । हे राजन ! तुम मेरा मंदिर बनबाकर मुझे स्थापित करो ।
जब राजा ने ऐसा स्वपन देखा । तो उसने तुरन्त मंदिर बनबाने का कार्य शुरू दिया । मंदिर बना । जैसे ही उसका सब कार्य पूरा हुआ । तुरन्त समुद्र ने वह मंदिर और वह स्थान ही नष्ट कर डुबो दिया ।
फ़िर जब दुबारा मंदिर बनबाने लगे । तो फ़िर से समुद्र क्रोधित होकर दौङा । और क्षण भर में सब डुबोकर जगन्नाथ का मंदिर तोङ दिया ।
इस तरह राजा ने मंदिर को 6 बार बनबाया । परन्तु समुद्र ने हर बार उसे नष्ट कर दिया । राजा इन्द्रदमन मंदिर बनबाने के सब उपाय कर हार गया । परन्तु समुद्र ने मंदिर नहीं बनने दिया । मंदिर बनाने तथा टूटने की यह दशा देखकर मैंने विचार किया ।

क्योंकि अन्यायी काल निरंजन ने पहले मुझसे यह मंदिर बनबाने की प्रार्थना की थी । और मैंने उसे वरदान दिया था । अतः मेरे मन में बात संभालने का विचार आया । और वचन से बँधा होने के कारण मैं वहाँ गया ।
मैंने समुद्र के किनारे आसन लगाया । परन्तु उस समय किसी जीव ने मुझे वहाँ देखा नहीं । उसके बाद मैं फ़िर समुद्र के किनारे आया । और वहाँ मैंने अपना चौरा ( निवास ) बनाया ।
फ़िर मैंने राजा इन्द्रदमन को स्वपन दिखाया । और कहा - अरे राजा ! तुम मंदिर बनबाओ । और अब ये शंका मत करो कि समुद्र उसे गिरा देगा । मैं यहाँ इसी काम के लिये आया हूँ ।
राजा ने ऐसा ही किया । और मंदिर बनबाने लगा । मंदिर बनने का काम होते देखकर समुद्र फ़िर चलकर आया ।
उस समय फ़िर सागर में लहरें उठी ।  और उन लहरों ने चित्त में क्रोध धारण किया । इस प्रकार वह लहराता हुआ समुद्र उमङ उमङ कर आता था कि मंदिर बनने न पाये । उसकी बेहद ऊँची लहरें आकाश तक जाती थी । फ़िर समुद्र मेरे चौरे के पास आया । और मेरा दर्शन पाकर भय मानता हुआ वहीं रुक गया । और आगे नहीं बङा ।
कबीर साहब बोले - तब समुद्र ब्राह्मण का रूप बनाकर मेरे पास आया । और चरण स्पर्श कर प्रणाम किया । फ़िर वह बोला - मैं आपका रहस्य समझा नहीं । हे स्वामी ! मेरा जगन्नाथ से पुराना वैर है । श्रीकृष्ण जिनका द्वापर युग में अवतार हुआ था । और त्रेता में जिनका राम रूप में अवतार हुआ था । उनके द्वारा समुद्र पर जबरन पुल बनाने से मेरा उनसे पुराना वैर है । इसीलिये मैं यहाँ तक आया हूँ । आप मेरा अपराध क्षमा करें । मैंने आपका रहस्य पाया । आप समर्थ पुरुष हैं ।
हे प्रभु ! आप दीनों पर दया करने वाले हैं । आप इस जगन्नाथ @ श्रीराम से मेरा बदला दिलवाईये । मैं आपसे हाथ जोङकर विनती करता हूँ । मैं उसका पालन करूँगा । जब श्रीराम ने लंका देश के लिये गमन किया था । तब वे सब मुझ पर सेतु बाँधकर पार उतरे । जब कोई बलबान किसी दुर्बल पर ताकत दिखाकर बलपूर्वक कुछ करता है । तो समर्थ प्रभु उसका बदला अवश्य दिलवाते हैं ।

हे समर्थ स्वामी ! आप मुझ पर दया करो । मैं उससे बदला अवश्य लूँगा ।
तब कबीर साहब बोले - हे समुद्र ! जगन्नाथ से तुम्हारे वैर को मैंने समझा । इसके लिये मैंने तुम्हें द्वारिका दिया । तुम जाकर श्रीकृष्ण के द्वारिका नगर को डुबो दो । यह सुनकर समुद्र ने मेरे चरण स्पर्श किये । और वह प्रसन्न होकर उमङ पङा । तथा उसने द्वारिका नगर डुबो दिया । इस प्रकार समुद्र अपना बदला लेकर शान्त हो गया । इस तरह मंदिर का काम पूरा हुआ ।
तब जगन्नाथ ने पंडित को स्वपन में बताया कि सत्य कबीर मेरे पास आये हैं । उन्होंने स्मुद्र के तट पर अपना चौरा बनाया है । समुद्र के उमङने से पानी वहाँ तक आया । और सत्य कबीर के दर्शन कर पीछे हट गया । इस प्रकार मेरा मंदिर डूबने से उन्होंने बचाया ।
तब वह पंडा पुजारी समुद्र तट पर आया । और स्नान कर मंदिर में चला गया । परन्तु उस पंडित ने ऐसा पाखंड मन में विचारा । कि पहले तो उसे म्लेच्छ का ही दर्शन करना पङा है । क्योंकि मैं पहले कबीर चौरा तक आया । परन्तु जगन्नाथ प्रभु का दर्शन नहीं पाया ( पंडा म्लेच्छ कबीर साहब को समझ रहा है )
हे धर्मदास ! तब मैंने उस पंडे की बुद्धि दुरुस्त करने के लिये एक लीला की । वह मैं तुमसे छिपाऊँगा नहीं । जब पंडित पूजा के लिये मंदिर में गया । तो वहाँ एक चरित्र हुआ । मंदिर में जो मूर्ति लगी थी । उसने कबीर का रूप धारण कर लिया । और पंडित ने जगन्नाथ की मूर्ति को वहाँ नहीं देखा । क्योंकि वह बदलकर कबीर रूप हो गयी ।
पूजा के लिये अक्षत पुष्प लेकर पंडित भूल में पङ गया कि यहाँ ठाकुर जी तो हैं ही नहीं । फ़िर भाई किसे पूजूँ । यहाँ तो कबीर ही कबीर है । तब ऐसा चरित्र देखकर उस पंडा ने सिर झुकाया ।
और बोला - हे स्वामी ! मैं आपका रहस्य नहीं समझ पाया । आप में मैंने मन नहीं लगाया । मैंने आपको नहीं जाना । उसके लिये आपने यह चरित्र दिखाया । हे प्रभु ! मेरे अपराध को क्षमा कर दो ।
तब कबीर साहब बोले - हे ब्राह्मण ! मैं तुमसे एक बात कहता हूँ । जिसे तू कान लगाकर सुन । मैं तुझे आग्या देता हूँ कि तू ठाकुर जगन्नाथ की पूजा कर । और दुविधा का भाव छोङ दे । वर्ण । जाति । छूत । अछूत । ऊँच । नीच । अमीर । गरीब का भाव त्याग दे । क्योंकि सभी मनुष्य एक समान हैं । इस जगन्नाथ मंदिर में आकर जो मनुष्य में भेदभाव मानता हुआ भोजन करेगा । वह मनुष्य अंगहीन होगा । भोजन करने में जो छूत अछूत रखेगा । उसका शीश उल्टा ( चमगादङ ) होगा ।
हे धर्मदास ! इस तरह पंडित को पक्का उपदेश करते हुये मैंने वहाँ से प्रस्थान किया ।
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