07 जून 2011

कबीर और रावण

त्रेता युग में जब मुनीन्द्र स्वामी ( कबीर साहब त्रेता में मुनीन्द्र नाम से प्रकट हुये ) प्रथ्वी पर आये । और उन्होंने जाकर जीवों से कहा - यम रूपी काल से तुम्हें कौन छुङायेगा ?
तब वे अग्यानी भृमित जीव बोले - हमारा कर्ता धर्ता स्वामी पुराण पुरुष ( काल निरंजन ) है । वह पुराण पुरुष विष्णु हमारी रक्षा करने वाला है । और हमें यम के फ़ंदे से छुङाने वाला है ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! उन अग्यानी जीवों में से कोई तो अपनी रक्षा और मुक्ति की आस शंकर से लगाये हुये था । कोई अपनी रक्षा के लिये चंडी देवी को ध्याता गाता था । अब क्या कहूँ । ये वासना का लालची जीव अपनी सदगति भूलकर पराया ही हो गया । और सत्यपुरुष को भूल गया । तथा तुच्छ देवी देवताओं के हाथ लोभवश बिक गया ।
काल निरंजन ने सब जीवों को प्रतिदिन पाप कर्म की कोठरी में डाला हुआ है । और सबको अपने मायाजाल में फ़ँसाकर मार रहा है । यदि सत्यपुरुष की ऐसी आग्या होती । तो काल निरंजन को अभी मिटाकर जीवों कों भवसागर के तट पर लाऊँ ।
लेकिन यदि अपने बल से ऐसा करूँ । तो सत्यपुरुष का वचन नष्ट होता है । इसलिये उपदेश द्वारा ही जीवों को सावधान करूँ । कितनी विचित्र बात है कि जो ( काल निरंजन ) इस जीव को दुख देता खाता है । वह जीव उसी की पूजा करता है । इस प्रकार बिना जाने यह जीव यम के मुख में जाता है ।

हे धर्मदास ! तब चारों तरफ़ घूमते हुये मैं लंका देश में आया । वहाँ मुझे विचित्र भाट नाम का श्रद्धालु मिला । उसने मुझसे भवसागर से मुक्ति का उपाय पूछा । और मैंने उसे ग्यान का उपदेश दिया । उस उपदेश को सुनते ही विचित्र भाट का संशय दूर हो गया । और वह मेरे चरणों में गिर गया । मैंने उसके घर जाकर उसे दीक्षा दी ।
उस विचित्र भाट की स्त्री राजा रावण के महल गयी । और जाकर रानी मंदोदरी को सब बात बतायी ।
उसने मंदोदरी से कहा - हे महारानी जी ! हमारे घर एक सुन्दर महामुनि श्रेष्ठ योगी आये हैं । उनकी महिमा का मैं क्या वर्णन करूँ । ऐसा सन्त योगी मैंने पहले कभी नहीं देखा । मेरे पति ने उनकी शरण गृहण की है । और उनसे दीक्षा ली है । तथा इसी में अपने जीवन को सार्थक समझा है ।
यह बात सुनते ही मंदोदरी में भक्ति भाव जागा । और वह मुनीन्द्र स्वामी के दर्शन करने को व्याकुल हो गयी । वह दासी को साथ लेकर स्वर्ण हीरा रत्न आदि लेकर विचित्र भाट के घर आयी । और उन्हें अर्पित करते हुये मेरे चरणों में शीश झुकाया । तब मैंने उसको आशीर्वाद दिया ।

मंदोदरी बोली - आपके दर्शन से मेरा दिन आज बहुत शुभ हुआ । मैंने ऐसा तपस्वी पहले कभी नहीं देखा कि जिनके सब अंग सफ़ेद और वस्त्र भी श्वेत ( सन्तमत में गेरुआ के बजाय सफ़ेद वस्त्र धारण किये जाते हैं । पर मैं लापरवाह और मौजी टायप का होने के कारण.. क्योंकि सफ़ेद वस्त्र जल्दी गन्दे हो जाते हैं । इसलिये गेरुआ ही पहनता हूँ । वेश लिये मुझे 7 साल हो गये - राजीव ) हैं ।
हे स्वामी जी ! मैं आपसे विनती करती हूँ । मेरे जीव ( आत्मा ) का कल्याण जिस तरह हो । वह उपाय मुझे कहो । मैं अपने जीवन के कल्याण के लिये अपने कुल और जाति का भी त्याग कर सकती हूँ ।
हे समर्थ स्वामी ! अपनी शरण में लेकर मुझ अनाथ को सनाथ करो । भवसागर में डूबती हुयी मुझको संभालो । अब आप मुझे बहुत दयालु और प्रिय लगते हो । अपके दर्शन मात्र से मेरे सभी भृम दूर हो गये ।
तब मैंने कहा - हे रावण की प्रिय पत्नी मंदोदरी सुनो । सत्यपुरुष के नाम प्रताप से यम की बेङी कट जाती है । तुम इसे ग्यान दृष्टि से समझो । मैं तुम्हें खरा ( सत्यपुरुष ) और खोटा ( काल निरंजन ) समझाता हूँ ।
सत्यपुरुष असीम अजर अमर हैं । तथा तीन लोक से न्यारे हैं । अलग हैं । उन सत्यपुरुष का जो कोई ध्यान सुमरन करे । वह आवागमन से मुक्त हो जाता है ।
मेरे ये वचन सुनते ही मंदोदरी का सब भृम भय अग्यान दूर हो गया । और उसने पवित्र मन से प्रेमपूर्वक नामदान लिया । तब मंदोदरी इस तरह गदगद हुयी । मानों किसी कंगाल को खजाना मिल गया हो । फ़िर रानी चरण स्पर्श कर महल को चली गयी । मंदोदरी ने विचित्र भाट की स्त्री को समझाकर हँसदीक्षा के लिये प्रेरित किया । तब उसने भी दीक्षा ली ।
हे धर्मदास ! फ़िर मैं रावण के महल से आया । और मैंने द्वारपाल से कहा - मैं तुमसे एक बात कहता हूँ । अपने राजा को मेरे पास लेकर आओ ।

तब द्वारपाल विनयपूर्वक बोला -  राजा रावण बहुत भयंकर है । उसमें शिव का बल है । वह किसी का भय नहीं मानता । और किसी बात की चिंता नहीं करता । वह बङा अहंकारी और महान क्रोधी है । यदि मैं उससे जाकर आपकी बात कहूँगा । तो वह उल्टा मुझे ही मार डालेगा ।
तब मैंने कहा - तुम मेरा वचन सत्य मानों । तुम्हारा बाल बांका भी नहीं होगा । अतः निर्भीक होकर रावण से ऐसा जाकर कहो । और उसको शीघ्र बुलाकर लाओ ।
तब द्वारपाल ने ऐसा ही किया । वह रावण के पास जाकर बोला - हे महाराज ! हमारे पास एक सिद्ध ( सन्त ) आया है । उसने मुझसे कहा है कि अपने राजा को लेकर आओ ।
यह सुनकर रावण बेहद क्रोध से बोला - अरे द्वारपाल ! तू निरा बुद्धिहीन ही है । यह तेरी बुद्धि को किसने हर लिया है । जो यह सुनते ही तू मुझे बुलाने दौङा दौङा चला आया । मेरा दर्शन शिव के सुत.. गण आदि भी नहीं पाते । और तूने मुझे एक भिक्षुक को बुलाने पर जाने को कहा ।
हे द्वारपाल ! मेरी बात सुन । और उस सिद्ध का रूप वर्णन मुझे बता । वह कौन है ? कैसा है ? क्या वेश है ? यह सब बात बता ।
तब द्वारपाल बोला - हे राजन ! उनका श्वेत उज्जवल स्वरूप है । उनकी श्वेत ही माला तथा श्वेत तिलक अनुपम है । और श्वेत ही वस्त्र तथा श्वेत साज सामान है । चन्द्रमा के समान उसका स्वरूप प्रकाशवान है ।
तब मंदोदरी बोली - हे राजा रावण ! जैसा द्वारपाल ने बताया । वह सिद्ध सन्त परमात्मा के समान सुशोभित है । आप शीघ्र जाकर उनके चरणों में प्रणाम करो । तो आपका राज्य अटल हो जायेगा । हे राजन ! इस झूठी मान बङाई के अहम को त्याग कर आप ऐसा ही करें ।
मंदोदरी की बात सुनते ही रावण इस तरह भङका । मानों जलती हुयी आग में घी डाल दिया गया हो । रावण तुरन्त हाथ में शस्त्र लेकर चला कि जाकर उस सिद्ध का माथा काटूँगा । जब उसका शीश गिर पङे । तब देखें । वह भिक्षुक मेरा क्या कर लेगा ?

ऐसा सोचते हुये रावण बाहर मेरे पास आया । और उसने 70 बार पूरी शक्ति से मुझ पर शस्त्र चलाया । मैंने उसके शस्त्र प्रहार को हर बार एक तिनके की ओट पर रोका । अर्थात रावण वह तिनका भी नहीं काट सका । मैंने तिनके की ओट इस कारण की कि रावण बहुत अहंकारी है । इस कारण अपने शक्तिशाली प्रहारों से जब रावण तिनका भी न काट पायेगा । तो अत्यन्त लज्जित होगा । और उसका अहंकार नष्ट हो जायेगा ।
तब यह तमाशा देखती हुयी ( मेरा बल प्रताप जानकर ) मंदोदरी रावण से बोली - हे स्वामी ! आप झूठा अहंकार और लज्जा त्याग कर मुनीन्द्र स्वामी के चरण पकङ लो । जिससे आपका राज्य अटल हो जायेगा ।
यह सुनकर खिसियाया हुआ रावण बोला - मैं जाकर शिव की सेवा पूजा करूँगा । जिन्होंने मुझे अटल राज्य दिया । मैं उनके ही आगे घुटने टेकूँगा । और हर पल उन्हीं को दण्डवत करूँगा ।
तब मैंने उसे पुकारकर कहा - हे रावण ! तुम बहुत अहंकार करने वाले हो । तुमने हमारा भेद नहीं समझा । इसलिये आगे की पहचान के रूप में तुम्हें एक भविष्यवाणी कहता हूँ । तुमको रामचन्द्र मारेंगे । और तुम्हारा माँस कुत्ता भी नहीं खायेगा । तुम इतने नीच भाव वाले हो ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! मुनीन्द्र स्वामी के रूप में मैंने अहंकारी रावण को अपमानित किया । और फ़िर अयोध्या नगरी की ओर प्रस्थान किया ।
तब रास्ते में मुझे मधुकर नाम का एक गरीब ब्राह्मण मिला । वह मुझे प्रेमपूर्वक अपने घर ले गया । और मेरी बहुत प्रकार से सेवा की । गरीब मधुकर ग्यान भाव में स्थिर बुद्धि वाला था । उसका लोक और वेद का ग्यान बहुत अच्छा था । तब मैंने उसे सत्यपुरुष और सत्यनाम के बारे में बताया । जिसे सुनकर उसका मन प्रसन्नता से भर गया ।
और वह बोला - हे परम सन्त स्वरूप स्वामी ! मैं भी उस अमृतमय सत्यलोक को देखना चाहता हूँ ।
तब उसके सेवा भाव से प्रसन्न होकर ’" अच्छा " ऐसा कहते हुये मैं उसके शरीर को वहीं रहा छोङकर उसके जीवात्मा को सत्यलोक ले गया । अमरलोक की अनुपम शोभा छटा देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ ।
और गदगद होकर मेरे चरणों में गिर पङा ।
और बोला - हे स्वामी ! आपने सत्यलोक देखने की मेरी प्यास बुझा दी । अब आप मुझे संसार में ले चलो । जिससे मैं अन्य जीवों को यहाँ लाने के लिये उपदेश ( गवाही ) करूँ । और जो जीव घर गृहस्थी के अंतर्गत आते हैं । उन्हें भी सत्य बताऊँ ।
हे धर्मदास ! जब मैं उसके जीवात्मा को लेकर संसार में आया । और जैसे ही मधुकर के जीवात्मा ने देह में प्रवेश किया । तो उसका शरीर जाग्रत हो गया । मधुकर के घर परिवार में 16 अन्य जीव थे । मधुकर ने उनसे सब बात कही ।
और मुझसे बोला -  हे साहिब ! आप मेरी विनती सुनो । अब हम सबको सत्यलोक में निवास दीजिये । क्योंकि यह प्रथ्वी तो यम का देश है । इसमें बहुत दुख है । फ़िर भी माया से बँधा जीव अग्यानवश अँधा हो रहा है । इस देश में काल निरंजन बहुत प्रबल है । वह सब जीवों को सताता है । और अनेक प्रकार के कष्ट देता हुआ जन्म मरण का नरक समान दुख देता है । काम क्रोध तृष्णा और माया बहुत बलबान है । जो इसी काल निरंजन की रचना है । ये सब महाशत्रु देवता मुनि आदि सबको व्यापते हैं । और करोंङो जीवों को कुचलकर मसल देते हैं ।
ये तीनों लोक यम निरंजन का देश हैं । इसमें जीवों को क्षण भर के लिये वास्तविक सुख नहीं है । आप हमारा ये जन्म जन्म का कलेश मिटाओ । और अपने साथ ले चलो ।
तब मैंने उन सबको सत्यपुरुष के नाम का उपदेश देकर हँसदीक्षा से गुरु ( की ) आत्मा बनाया । और उनकी आयु पूरी हो जाने पर उनको सत्यलोक भेज दिया ।
उन 16 जीवों को सत्यलोक जाते हुये देखकर संसारी जीव के लिये विकराल भयंकर यमदूत उदास खङे देखते रहे । उन्हें ऊपर जाते देखकर वे सब विवश और बेहद उदास हो गये ।
वे सब जीव सत्यपुरुष के दरबार में पहुँच गये । जिन्हें देखकर सत्यपुरुष के अंश और अन्य मुक्त हँस जीव बहुत प्रसन्न हुये ।
सत्यपुरुष ने उन 16 हँस जीवों को अमर वस्त्र पहनाया । स्वर्ण के समान प्रकाशवान अपनी अमर देह के स्वरूप को देखकर उन हँस जीवों को बहुत सुख हुआ । सत्यलोक में हरेक हँस जीव का दिव्य प्रकाश 16 सूर्य के समान है । वहाँ उन्होंने अमृत ( अमीरस ) का भोजन किया । और अगर ( चंदन ) की सुगन्ध से उनका शरीर शीतल होकर महकने लगा ।
इस तरह त्रेता युग में मेरे ( मुनीन्द्र स्वामी के नाम से ) द्वारा ग्यान उपदेश का प्रचार प्रसार हुआ । और सत्यपुरुष के नाम प्रभाव से हँस जीव मुक्त होकर सत्यलोक गये ।
जय गुरुदेव की । जय जय श्री गुरुदेव ।
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