03 जून 2011

काल का अपने दूतों को चाल समझाना ।

धर्मदास बोले - हे साहिब ! जीवों के उद्धार के लिये जो वचन वंश चूङामणि संसार में आया । वह सब आपने बताया । वचन वंश को जो ग्यानी पहचान लेगा । उसको काल निरंजन का दुर्गदानी जैसा दूत भी नहीं रोक पायेगा । तीसरा सुरति अंश चूङामणि संसार में प्रकट हुआ है । वह मैंने देख लिया । फ़िर भी मुझे एक संशय है । हे साहिब ! मुझे समर्थ सत्यपुरुष ने भेजा था । परन्तु संसार में आकर मैं भी काल निरंजन के जाल में फ़ँस गया । आप मुझे सत सुकृत का अंश कहते हो । तब भी भयंकर काल निरंजन ने मुझे डस लिया ।
अगर ऐसा ही सब वंशो के साथ हुआ । तो संसार के सब जीव नष्ट हो जायेंगे । इसलिये हे साहिब ! ऐसी कृपा करिये कि काल निरंजन सत्यपुरुष के वंशो को अपने छल भेद से न छल पाये ।
तब कबीर साहिब बोले - हे धर्मदास !  यह तुमने ठीक ही कहा है । और तुम्हारा यह संशय भी सत्य है । हे धर्मदास ! अब आगे भविष्य में काल निरंजन क्या चाल खेलेगा ? वह मैं तुम्हें बताता हूँ । जब सतयुग मैं सत्यपुरुष ने मुझे बुलाया । और संसार में जाकर जीवों को चेताने के लिये कहा । तो काल निरंजन ने रास्ते में मुझसे झगङा किया । और मैंने उसका घमन्ड चूर चूर कर दिया । पर उसने मेरे साथ एक धोखा किया । और याचना करते हुये मुझसे तीन युग मांग लिये ।

अन्यायी काल निरंजन ने तब ऐसा कहा था - हे भाई ! मैं चौथा कलियुग  नहीं माँगता । और मैंने उसे वचन दे दिया था । और तब जीवों के कल्याण हेतु संसार में आया । क्योंकि मैंने उसको तीन युग दे दिये थे । उसी से उस समय वचन मर्यादा के कारण अपना पँथ प्रकट नहीं किया । लेकिन जब चौथा कलियुग आया ।
तब सत्यपुरुष ने फ़िर से मुझे संसार में भेजा । पहले की ही तरह कसाई काल निरंजन ने मुझे रास्ते में रोका । और मेरे साथ झगङा किया । वह बात मैंने तुम्हें बता दी है । और काल निरंजन के बारह पँथ का भेद भी बता दिया है ।
काल निरंजन ने उस समय मुझसे धोखा किया । उसने मुझसे केवल बारह पँथ की बात कही थी । और गुप्त बात मुझको नहीं बतायी । तीन युग में तो वचन लेकर उसने मुझे विवश कर दिया । और कलियुग में बहुत जाल रचकर ऊधम मचाया । काल ने मुझसे सिर्फ़ बारह पँथ की कहकर गुप्त रूप से चार पँथ और बनाये । जब मैंने जीवों को चेताने के लिये चार कङिहार गुरु के निर्माण की व्यवस्था की । तो काल ने अपना अँश दूत भेज दिया । और अपनी छल बुद्धि का विस्तार किया । और अपने चार अँश दूतों को बहुत शिक्षा दी ।

काल निरंजन ने अपने दूतों से कहा - हे मेरे अँशो ! सुनो । तुम तो मेरे अपने वँश हो । तुमसे जो कहूँ । उसे मानो । और मेरी आग्या का पालन करो ।
हे भाई ! हमारा एक दुश्मन है । जो संसार में कबीर नाम से जाना जाता है । वह हमारा भवसागर मिटाना चाहता है । और जीवों को दूसरे लोक ( सत्यलोक ) ले जाना चाहता है । वह छल कपट कर मेरी पूजा के विरुद्ध जगत में भृम फ़ैलाता है । और मेरी तरफ़ से सबका मन हटा देता है । वह सत्यनाम की समधुर टेर सुनाकर जीवों को सत्यलोक ले जाता है । इस संसार को प्रकाशित करने में मैंने अपना मन दिया हुआ है । और इसलिये मैंने तुमको उत्पन्न किया । मेरी आग्या मानकर तुम संसार में जाओ । और कबीर नाम से झूठे पँथ प्रकट करो । संसार के लालची और मूर्ख जीव काम मोह विषय वासना आदि विषयों के रस में मग्न हैं । अतः मैं जो कहता हूँ । उसी अनुसार उन पर घात लगाकर हमला करो ।
संसार में तुम अपने चार पँथ स्थापित करो । और उनको अपनी अपनी ( झूठी ) राह बताओ ।
चारों के नाम कबीर नाम पर ही रखो । और बिना कबीर शब्द लगाये मुँह से कोई बात ही न बोलो । अर्थात इस तरह कहो । कबीर ने ऐसा कहा । कबीर ने वैसा कहा । जैसे तुम कबीर की ही वाणी उपदेश कर रहे होओ । कबीर नाम के वशीभूत होकर जब जीव तुम्हारे पास आये । तो उससे ऐसे मीठे वचन कहो । जो उसके मन को अच्छे लगते हों । ( अर्थात चोट मारने वाले वाले सत्य ग्यान की बजाय उसको अच्छी लगने वाली मीठी मीठी बातें करो । क्योंकि तुम्हें जीव को झूठ में उलझाना है ।  )

कलियुग के लालची मूर्ख अग्यानी जीवों को ग्यान की समझ नहीं है । वे देखा देखी की रास्ता चलते हैं । तुम्हारे वचन सुनकर वे प्रसन्न होंगे । और बारबार तुम्हारे पास आयेंगे । जब उनकी श्रद्धा पक्की हो जाय । और वे कोई भेदभाव न मानें । यानी सत्य के रास्ते और तुम्हारे झूठ के रास्ते को एक ही समझने लगें । तब तुम उन पर अपना जाल डाल दो । पर बेहद होशियारी से । कोई इस रहस्य को जानने न पाये ।
तुम जम्बूदीप ( भारत ) में अपना स्थान बनाओ । जहाँ पर कबीर के नाम और ग्यान का प्रमाण है ।
जब कबीर बाँधोंगढ ( छत्तीसगढ ) में जायें । और धर्मदास को उपदेश दीक्षा आदि दें । तब वे उसके 42 वंश के ग्यान राज्य को स्थापित करेंगे । तब तुम्हें उसमें घुसपैठ करके उनके राज्य को डांवाडोल करना है । वैसे मैंने 14  यमों की नाकाबन्दी करके जीव के सत्यलोक जाने का मार्ग रोक दिया है । और कबीर के नाम पर 12 झूठे पँथ चलाकर जीव को धोखे में डाल दिया है ।
हे भाई ! तब भी मुझको संशय है । उसी से मैं तुमको वहाँ भेजता हूँ । उनके 42 वंशो पर तुम हमला करो । और उन्हें अपनी बातों में फ़ँसा लो ।
काल निरंजन की बात सुनकर वे चारों दूत बोले - हम ऐसा ही करेंगे ।
यह सुनकर काल निरंजन बहुत प्रसन्न हुआ । और जीवों को छल कपट द्वारा धोखे में रखने के बहुत से उपाय बताने लगा । जीवों पर हमला करने के उसने बहुत से मन्त्र सुनाये ।
फ़िर उसने कहा - अब तुम संसार में जाओ । और चारों तरफ़ फ़ैल जाओ । और ऊँच नीच गरीब अमीर किसी को मत छोङो । और सब पर काल का फ़ँदा कस दो । तुम ऐसी कपट चालाकी करो कि जिससे मेरा आहार जीव कहीं निकलकर न जाने पाये ।
हे धर्मदास ! यही चारों दूत संसार में प्रगट होंगे । जो चार अलग अलग नामों से कबीर के नाम पर पँथ चलायेंगे । इन चार दूतों को मेरे चलाये बारह पँथों का मुखिया मानों ।
इनसे जो चार पँथ चलेंगे । उससे सब ग्यान उलट पुलट हो जायेगा । ये चार पँथ बारह पँथो का मूल यानी आधार होंगे । जो वचन वँश ( कबीर साहिब का असली पँथ ) के लिये शूल के समान पीङादायक होंगे । यानी हर तरह से उनके कार्य में विघ्न करते हुये जीवों के उद्धार में बाधा पहुँचायेंगे ।
यह सुनकर धर्मदास घबरा गये । और बोले - हे साहिब ! अब मेरा संशय और भी बङ गया है । मुझे उन काल दूतों के बारे में अवश्य बताओ । आप उनका चरित्र मुझे सुनाओ । उन काल दूतों का वेश और उनका लक्षण कहो । ये संसार में कौन सा रूप बनायेंगे । और किस प्रकार जीवों को मारेंगे । वे कौन से देश में प्रकट  होंगे । आप मुझे शीघ्र बताओ ।

आगे जल्द प्रकाशित होगा ।
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